शनिवार, जून 22, 2013

उत्तराखंड प्राकृतिक आपदा ???


सामने आया केदारघाटी की तबाही का वैज्ञ‌ानिक सच


इसरो और उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र ने केदार घाटी की आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं। इनमें यह तथ्य सामने आया है कि केदारनाथ पहले से ही तबाही की जद में था।

उपग्रह से मिले चित्रों ने दर्शाया है कि केदारघाटी का 95 फीसदी हिस्सा जलप्रलय की भेंट चढ़ गया है। इसके अलावा केदारधाम में 16 और 17 जून को मची भारी तबाही का वैज्ञानिक सच सामने आ गया है।

अध्ययन में यह बात सामने आई है कि केदारनाथ के ऊपर स्थित चौराबाड़ी और सहयोगी ग्लेशियर का पानी मलबे के साथ मिलकर भारी बारिश के चलते बेकाबू हुआ। अगर बीच में एक बड़ा स्लोप न आया होता तो तबाही का मंजर कुछ और ही होता।

स्टडी में यह बात सामने आई है कि भारी बरसात और ग्लेशियर की स्नो लेयर पिघलने के बाद पानी ने जड़ में मौजूद मोरेंस (ग्लेशियर की निचली सतह) को बढ़ा दिया। भारी दबाव के साथ पानी आगे बढ़ा तो पलभर में बोल्डर और सैंड्स ने रफ्तार पकड़ ली। सौभाग्य से बीच में एक बड़ा स्लोप आ गया।

स्लोप पर ऊपर चढ़ने में पानी वाले इस मलबे की रफ्तार कम हो गई। इसके चलते बड़े-बड़े बोल्डर केवल मंदिर और केदार वैली में ही आकर रुक गए। बाकी मलबा केदारवैली को पार करने के बाद काफी कम स्पीड पर था लेकिन इससे आगे के रूट में नीचे की ओर स्लोप होने के चलते इसने दोबारा रफ्तार पकड़ी।

जिसकी वजह से रामबाड़ा और गौरीकुंड में भारी तबाही हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि केदार वैली में यह मलबा दो ऊंचे स्लोप से न गुजरता तो हरिद्वार तक तबाही का खतरनाक मंजर होता।

ये सच आए सामने
1. सैटेलाइट इमेज में यह बात सामने आई है कि तबाही का यह मलबा ऊपर से केवल एक ही स्ट्रीम में चला था जो कि बाद में दो नई धाराओं में बंट गया। अब यहां पानी का एक नया रास्ता बन गया है।

2. आपदा से पहली तस्वीर में यह साफ है कि पानी एक बहुत पतली धारा में बह रहा है लेकिन हादसे के बाद की तस्वीर में यहां अनेक धाराएं देखी गई हैं।

3. प्री और पोस्ट इमेज से यह पता चला है कि कि केदारनाथ धाम और आसपास के क्षेत्रों में आपदा से भारी तबाही हुई है।

4. सैटेलाइट डाटा में यह बात साफ हो गई है कि दोनों ग्लेशियर में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हुआ है। तेज बारिश की वजह से यह आपदा आई है।

5- सोनप्रयाग, रेलगांव, कुंड, विद्यापीठ, काकडागाड़, भीरी, चंद्रपुरी, सौड़ी, अगस्त्यमुनि और तिलवाड़ा में इमारतों व सड़क के साथ ही पुल भी बह गए हैं।

6. यह भी साफ हो गया है कि वासुकीताल का इस आपदा में कोई रोल नहीं है।

इन जगहों पर हुई सबसे ज्यादा तबाही
प्री और पोस्ट सैटेलाइट इमेज से यह पता चलता है कि सबसे ज्यादा तबाही केदारनाथ, गुरियाया, लेंचुरी, घिंदुपाणी, रामबाड़ा, गौरीकुंड और नीचे के क्षेत्रों में रुद्रप्रयाग, मुंडकटा गणेश, सोनप्रयाग, रेलगांव, सीतापुर, रामपुर, खाट, ब्यूंग, जुगरानी, चुन्नी विद्यापीठ, सेमीकुंड, काकडा, भीरी, बांसवाड़ा, तिमारिया, चंद्रापुरी, भटवाड़ी, सौड़ी, बेदुबागरचट्टी, बनियाड़ी, विजयनगर, अगस्त्यमुनि, सिल्ली और गंगताल में हुई है।



News Cutting 30/06/2013




जिस दिन उत्तराखंड में तेज वर्षा हुयी उस दिन इन 39 टनल्स पर वर्षा जल की वजह से दबाब बढ़ गया , और वो क्षतिग्रस्त होने लगी , बाँध और टनल्स बना रही निजी कम्पनियों को अपना करोडो रूपया डूबता दिखने लगा , इसलिए उत्तराखंड सरकार से मिलीभगत करके निजी कम्पनियों ने एक के बाद एक उन 39 टनल्स का लाखो क्यूसेक पानी छोड़ दिया , जिस कारण लाखो क्यूसेक जल वेग के साथ पहले से ही हो रही वर्षा के जल के साथ मिल गया जिससे   यह भयानक तबाही मच गयी ||
कुछ तथ्य विचारणीय हैं ...


१. आतंकवादियों के दिवास्वप्न मुगलिस्तान की सीमा में उत्तराखंड का आना 
२. चीन और पाकिस्तान की बढती अंतरंगता 
३. चीन का भारतीय क्षेत्रों पर दावा..
४. हाल ही में चीन से तनाव... विदेश मंत्री की चीन यात्रा 
५. चीन से युद्ध के सन्दर्भ में सेना के मूवमेंट के लिए उत्तराखंड में तेजी से से बन रहा सड़कों का संजाल 
६. भारत की सत्ता में कोई भी राष्ट्र समर्पित व्यक्ति का न होना.. सभी घोटालों के आरोपी ..
७. धर्मांतरण के लिए लगभग हर मीडिया पर लगातार आ रहे विज्ञापन और उनका सफल न होना 
८. मुगलिस्तान नामक स्वप्न के लिए पहाड़ों से मैदानी लोगों को काटने की चाल होने की संभावना 

अब इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निम्न समाचार एवं विश्लेषण का अध्धयन कर मनन करिए 

बादल फटना (क्यूलोनिवस) हमेशा प्राक्रतिक कारणो से नही होता है ,बादलो से बरसात होती है , और बरसात की एक दर होती है ,बादलो की दर थोड़ी बहुत बदलती है,....दस गुना तक नही ?

जब बादल भारी मात्रा में आद्रता (यानि पानी ) लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वो अचानक फट पड़ते हैं, यानि संघनन बहुत तेजी से होता है...या जब कोई गर्म हवा का झोंका ऐसे बादल से टकराता है तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है ! उदाहरण के तौर पर २६ जुलाई २००५ को मुंबई में बादल फटे थे, तब वहां बादल किसी ठोस वस्‍तु से नहीं बल्कि गर्म हवा से टकराए थे!

केदारनाथ में पिछले 5,000 सालो में कभी बादल नही फटे , अचानक आज कैसे ? 20 एम एम तक बरसने वाली बरसात का लेवल 300 एम एम से ज्यादा कैसे हो गया ? जब पहाड़ो के बीच में बादल टकराते है उससे बरसात होती है , पर दस गुना पानी के लिये दस गुना ज्यादा बादलो की जरूरत पड़ती है जो बस इस ''आधुनिक विज्ञान'' से संभव है ......प्राक्रतिक कारण से संभव ही नही है ?

(NEWS AMAR UJALA अंतिम अपडेट 23 जून 2013
एनआईडीएम के प्रोफेशन इन हेड डॉ. चंदन घोष )


जिस गांधी सरोवर की वजह से केदारनाथ धाम में तबाही मची, वह सरोवर अब केदारनाथ मंदिर के लिए खतरा बन गया है। अब जब भी बारिश होगी सरोवर का पानी मलबे के साथ मंदिर की तरफ ही आएगा। पानी ने अपना पुराना रास्ता बदलकर नया बना लिया है, जो मंदिर की तरफ ही जाता है। ऐसेमें जब तक वैज्ञानिक अध्ययन कराकर मंदिर की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए जाते तब तकधाम में पूजा-अर्चना शुरू हो पाना संभव नहीं है। इस तथ्य से नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (एनआईडीएम) के वैज्ञानिक भी इनकार नहीं कर रहे। एनआईडीएम के प्रोफेशन इन हेड डॉ. चंदन घोष ने कहा कि जिस तरह से गांधी सरोवर टूटा है, उससे भविष्य के लिए खतरा पैदा हो गया है।घोष ने कहा कि सेटेलाइट से इसकी वास्तविक स्थिति जानने की कोशिश की जा रही है। इस सवालका भी जवाब तलाशा जा रहा है कि सरोवर क्यों टूटा? पानी का प्राकृतिक रास्ता क्यों बंद हुआ? उनका कहना है कि जब तक पानी के रास्ते को बंद नहीं किया जाता, तब तक केदारनाथ में किसी प्रकारकी मानवीय गतिविधियां नहीं की जानी चाहिए।


क्या ऐसा नहीं लग रहा कि वासुकि ताल (गांधी सरोवर) के पानी के निकासी के प्राकृतिक मार्ग से कोई छेड़ छाड़ हुई है ??? कुछ न कुछ दाल में काला अवश्य है .. क्योंकि ये घटना ऐसे समय हुई जब बारिश का समय नहीं होता है और चारो धाम एवं हेमकुंड साहेब में तीर्थ यात्रियों की संख्या अधिक से अधिक होती है  और इस क्षेत्र में बादल फटने की घटना लगभग न के बराबर होती है .. मेघालय और चेरापूंजी दो ही ऐसे भारतीय क्षेत्र हैं जहां पर बादल फटने की घटना अवश्य होती है 



Jai Kumar एक और घटना इसी खबर से जुडी है .....इस क्षेत्र में वासुकी ताल में लोग जब अपनी जान बचाकर उपर जगल की तरफ जा रहे थे तो एक आनोखी घटना घटी ..वहां नेपाली लोग लोगो को काट रहे थे और वहां लोग बेहोश भी हो रहे थे ...एक स्थानीय निवासी जो जान बचाकर वहां से भागने में सफल हुआ ...आप बीती सुना रहा है .....अब सवाल उठता है उस जंगल में नेपाली लोग कहाँ से चले गए ..और अगर गए भी है तो उनकी हालत भी सभी लोगो की तरह होनी चाहिय कम से कम उस जंगल में ...और हाँ चीनी और नेपालियों में समानता होती ही है ..!

Madhvi Gupta वेसे अनुमान यही लग रहा है की सी आईए का वियतनाम मे अपनाया गया हथियार का उन्नत रुप का खेल था ... जो इस बार चीन कि धरती से खेला गया !कभी आपने सुना कि चीन ने औलँपिक मे खेल गाँव पर बारिश ना गिरे ईसलिए बादलो को पहले ही बरसा दिया था ... विमान से कैमिकल छिडक के ! क्या आपने DRDO कि ये यह तकनिक [केवल बारिश करवाने कि] के सफल परिक्षण के बारे मे नही सुना ! ईजराइल एक भी बादल बिना बरसे नही जाने देता !

उतराखणड तबाह होने से भारत को अरबो डालर का उधार लेना पडेगा जोकि हमे अमेरिका के गुलाम विशव बैँक से लेना पडेगा ।हम पर कर्जा बढ जाएगा ।जिससे अमेरिका की मंदी को रहत मिलेगी .............

सबसे ज्यादा विचारणीय बिंदु ये है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा किये जा रहे धर्म परिवर्तन का कार्य पहाड़ों पर लगभग शून्य प्रतिशत ही है क्योंकि सनातनियों के सभी तीर्थ पहाड़ों पर ही हैं जिसके कारण पहाड़ के सभी निवासी प्रत्यक्ष रूप से धर्म से जुड़े रहते हैं अतः अब एक ही विकल्प शेष रहता है इन मिशनरियों के पास उड़ीसा वाला मॉडल अर्थात पहले गरीब बनाओ उसके बाद पैसे के बल पर धर्म परिवर्तन कराओ .. अब ये मॉडल तभी सफल होगा जब पहाड़ों पर सनातन धर्मावलम्बियों का आवागमन कम से कम है .. अब जो ये सदी की सबसे बड़ी त्रासदी हुई है उसके कारण सभी रास्ते बंद हो गए तथा भय का भी वातावरण बना जिससे इन तीर्थयात्रियों का आवागमन कम हो जाएगा जिस का सीधा असर पहाड़ के निवासियों के रोजगार पर पडेगा, गरीबी फैलेगी और तब ये मिशनरियां पैसे के बल पर अपने धर्मांतरण के कुचक्र में सफल हो जायेंगी. कुछ समय पहले इन्होने जम्मू कश्मीर में भी प्रयास किया था लेकिन वहां मुस्लिम बहुलता के कारण ये सफल नहीं हो पाए और बात खुलने पर इनके पादरियों को जान बचा कर भागना पडा. 


Santanu Arya

केदारनाथ में जो हुआ वो प्रकुतिक था या मानव निर्मित ...एक बहुत गहरी साजिश चल रही है हिन्दुओ के खिलाफ...

केदारनाथ से 200 किलोमीटर उत्तर में दुनिया की एकजानीमानी कंपनी अपने मिनरल वॉटर का कारखाना लगाना चाहती है..जिनके लिए मौजूदा सरकार की और से बातचीत के बाद लाइसेंसमिलने के बाद 70 के लगभग डेम बनवाए गए.जिनसे बहाने के तौर बिजली का उत्पादन किया जा रहा हैजबकि उत्तराखंड में ज्यादातर बिजली "मध्यप्रदेश एवं गुजरात"से ही जाती है...

जानकारी ये भी मिली है की इस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने यहीं पर अपनेकारखाने के लिए 500 एकड़ जमीन ली है.पूछने पर ये कहा गया की यहाँ के ग्लेशियर हर वर्ष बनते हैंऔर पिघलते हैं जिसे शुद्ध माना गया है...और जिसे साफ़ करने इतना खर्च नहीं आता.. वरना ये अपना प्लांटचाहें तो आइसलैंड में लगा सकते हैं...लेकिन यहाँ के ग्लेशियर सदीओं से नहीं पिघले हैं जिसे अशुद्ध माना जाता है ... दूसरा कारण ये बताया जा रहा है कि भारत में उपलब्ध बाज़ार विश्व के बड़े बाजारों में से है...

और वो कम्पनी और कोई नहीं... वो nestle है... जिसकी maggi हर कोईखाता है... बहिष्कार करो ऐसी कंपनी का


सम्बंधित तंतु

http://navbharattimes.indiatimes.com/india/north/---/articleshow/10519240.cms
http://www.bhaskar.com/article/JK-the-st-2608468.html

जीत शर्मा मानव

कैसे आया लाखो क्यूसेक पानी एक साथ पहाड़ियों से ?बारिश से आया पानी तो रिस रिस कर आता ना की एक साथ वेग के साथ ?क्यों बदली कई मुख्य नदियों ने अपनी दिशा जबकि नदी के आस पास का क्षेत्र असीम है और उसमे लाखो क्यूसेक पानी समाहित हो कर एक ही दिशा में बह सकता है ?

असल में केंद्र और उत्तराखंड सरकार उत्तराखंड और हिमालय से प्रवाहित होने वाली नदियों पर हर ३० से ८० किलोमीटर के अन्तराल पर डैम बना रही है जिससे विधुत पैदा की जा सके | याद रहे की धारी देवी मंदिर को भी केवल बाँध की वजह से हटाया जा रहा है क्योकि मंदिर के ऊपर से बाँध को ले जाया जाना है | अब सरकार को इस विधुत को पैदा करने और नदियों के पानी को विधुत पैदा करने के लिए ना जाने क्यों रोक कर रखा जाना आवश्यक लगा | जिसके लिए उत्तराखंड और केंद्र सरकार ने इन बांधों के साथ साथ 267 टनल (गुफा) पहाड़ियों को काटकर बनायीं , जिसके लिए विस्फोट का सहारा लिया गया , आये दिन हर घंटे इन पहाड़ियों में एक ना एक विस्फोट किया जाने लगा जिससे पहाड़ियों का निचला और उपरी भाग काफी क्षतिग्रस्त हो गया या कमजोर पड़ गया | जिन 267 टनल्स को बनाया जा रहा है उनमे से 39 टनल्स बन कर तैयार हो चुकी थी और उनमे लाखो क्यूसेक पानी बिजली पैदा करने के लिए रोक कर रखा गया था | जिस दिन उत्तराखंड में तेज वर्षा हुयी उस दिन इन 39 टनल्स पर वर्षा जल की वजह से दबाब बढ़ गया , और वो क्षतिग्रस्त होने लगी , बाँध और टनल्स बना रही निजी कम्पनियों को अपना करोडो रूपया डूबता दिखने लगा , इसलिए उत्तराखंड सरकार से मिलीभगत करके निजी कम्पनियों ने एक के बाद एक उन 39 टनल्स का लाखो क्यूसेक पानी छोड़ दिया , जिस कारण लाखो क्यूसेक जल वेग के साथ पहले से ही हो रही वर्षा के जल के साथ मिल गया जिससे यह भयानक तबाही मच गयी || अभी तक के प्राप्त गैर सरकारी आकड़ों के हिसाब से करीब ३० हज़ार लोगो की मौत हुयी है जिसे सरकार केवल ८२२ मौते बता रही है |

वर्षा जल से हथनीकुंड बैराज से जब पानी दिल्ली के लिए छोड़ा गया तो हरियाणा और दिल्ली दोनों स्थानों पर वर्षा हो रही थी , क्योकि इससे पहले हरियाणा ने पानी को हरियाणा में रोक कर रखा था और जब वर्षा जल की अधिकता के कारण हरियाणा ने ६ लाख क्यूसेक पानी दिल्ली की ओर छोड़ा तो केवल ३ घंटे में तीव्र वेग के साथ यमुना खतरे के निशान पर बहने लगी | अब सोचिये एक टनल में अगर 2 लाख क्यूसेक पानी भी जमा था तो 39 टनल्स में 78 लाख क्यूसेक पानी जब पहाड़ से निचे गिरता हुआ आएगा तो कुछ बचेगा क्या ??

वर्ष २०१२ और जनवरी 2013 को नेशनल ज्युलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया ने उत्तराखंड में अंधाधुंध बन रहे बांधों को लेकर चिंता जताई थी और 109 गावों को अति असुरक्षित दायरे में रखा था , साथियों इन 109 गावों में से 70 गावों का वजूद समाप्त हो चुका है | और सरकार कह रही है की सिर्फ ८२२ लोग मरे है और आकड़ा 1000 पार कर सकता है , अगर एक गावं में रहने वालों की संख्या २०० भी लगा लूँ तो १४००० ग्रामवासी लापता है और हजारो श्रद्धालु अलग ||

यही सब छुपा कर रखना चाह रही थी उत्तराखंड सरकार | इसीलिए सेना को बुलाने में दो दिन लग गए , इसीलिए बचाव कार्य ३ दिन बाद धीरे धीरे शुरू किया गया , इसीलिए मोदी जी को प्रभावित क्षेत्रों में नहीं जाने दिया गया |

आकड़ों में थोडा असंतुलन हो सकता है किन्तु सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता ||

जय जय सियाराम ,, जय जय महाकाल ,, जय जय माँ भारती ,, जय जय माँ भारती के लाल ||

______________________________________ जीत शर्मा "मानव"
कुछ नहीं बहुत कुछ है जो उत्तराखंड की राज्य सरकार छुपा रही है .केदारघाटी में जहां लाशों का अम्बार लगा है .वहां जाने की किसी को इजाजत नहीं दे जा रही है .इस क्षेत्र में सरकार की कार्यवाही अत्यंत गोपनीय तरीके से चल रही है. बस कुछ ही दिन में इस घाटी का रहस्य हमेशा के लिए दफ़न हो जाएगा . यहाँ सरकार श्रधालुओं का लाशों के साथ क्या व्यवहार कर रही है इस पर पर्दा डाला जा रहा है. जाहिर है सरकार द्वारा बरती जा रही यह गोपनीयता कोई अच्छा संकेत नहीं दे रही है. ऐसी हालत में दाहसंस्कार की प्रक्रिया विधिवत संपन्न हो भी रही है या नहीं कहना मुश्किल है. आशंका है कि इसमें भारी धांदली चल रही है.
इस क्षेत्र में मिडिया पर भी प्रतिबन्ध लगा हुआ . पूरे घाटी की जबरदस्त पहरेदारी चल रही है . सरकार कोई फोटो जारी नहीं कर रही है. लगता है कि सारी प्रक्रिया केंद्र सरकार के निर्देश पर ही हो रही है . आपदा के इस असली रहस्य को दबाने के लिए ही मुख्यमंत्री निर्देश पाने के लिए दिल्ली के चक्कर काटते रहे हैं.
आखिर इस रहस्य से पर्दा उठेगा भी या नहीं कहना मुश्किल है


Another aspect...
आपको याद होगा चीन ने कुछ वर्ष पहले ब्रह्मपुत्र नदी में पानी के प्रवाह को एक चट्टान से रोक कर परीक्षण किया था.. बहुत ही चर्चित समाचार था... अब उसी को ध्यान में रखते हुए वासुकि ताल में हुए विस्फोट और उससे हुई तबाही पर भी मनन करिए .... कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है क्योंकि लगभग सभी एक ही बात कह रहे हैं कि एक तेज आवाज हुई और उसके कुछ ही देर बाद जल प्रलय ... ... हजारो लोग मौत के मुंह में समा गए और और उत्तराखंड की सभी मुख्य सड़कें नष्ट हो गई ... अगर ये मान भी लें कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं थी और ये एक प्राकृतिक आपदा ही थी.. लेकिन क्या ये एक उदाहरण नहीं है कि युद्ध के समय चीन सबसे पहले उत्तराखंड में बने बांधों और जल निधि भंडारों को ही अपने निशाने पर लेगा.. रक्षा विशेषज्ञों को इस बिंदु पर मनन करना चाहिए .और यदि ऐसा है तो समाधान का मार्ग पहले से ही खोज कर रखना होगा..As per my calculation:
What happened..in Kedarnath ..is part of a big scheme..against Hindu Religion ..
it look like that ..it was must had been used there the world known `Cloud Seeding` mathod...

What you need for such Chemical raining ...
A River, Mountains and a small Aeoplane which carry the Silver Iodide to chemical vapore the clouds or can be injected from the ground with a small rocket Injection..
Which had been used often by British Colonial Opressor in India, Afrika etc...this method is used since 1941.

Today`s Kedarnath Episode show similar out come which had `Tanganyika Groundnut Scheme` which had same result due to River Kinyansungwe in Tanzania ..in April 1946..
British had lost 49 Millions Gold Pound that time and more then 100.000 people and many animal lost their lives.

It may be set to show the appeasement to the Muslim.. but as well ..what Chrsitian Missionary teach in the south on daily basis that the wrong Hindu Religion invite such catastrophical weather...to proof their theory that only the Christianity is the true Religion in this World..

Now ..what Muslim wanted that the prohibitation of the Pilgerimages and what Missionries wanted will happen..till the overmath is cleared some terrorists will blow up the temple or smash it totally for the revenge of the Babri Masque ...Jai Bhole Nath..

# Mohinder Paljit Kaur

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