रविवार, नवंबर 24, 2019

हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ?

हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ? 



𝑻𝒉𝒆 𝑷𝒊𝒏𝒅𝒂𝒓𝒊
ये तस्वीर 1908 की है, अमृतसर के हरमंदिर साहेब की जिसे ईसाई वामपंथी गोल्डन टेंपल कहते है ।
अब आपके मन मे ये प्रश्न उठा कि हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ?
ज़रा इतिहास में चलते है।
सिखों के पहले गुरु गुरु नानक थे।
2-गुरु अंगददेव
3- गुरु अमरदास
4-गुरु रामदास
5- गुरु अर्जुनदेव
6- गुरु हरगोविंद
7- गुरु हरराय
8 - गुरु हरकिशन
9- गुरु तेगबहादुर
10- गुरु गोविंद सिंह

सभी गुरु के नाम मे #राम #अर्जुन #गोविंद यानी के कृष्ण व हर यानी के महादेव के नाम पर है।

जब औरँगजेब ने कश्मीर के पंडितो को इस्लाम स्वीकार करने के कहा तो कश्मीरी पंडित गुरू तेगबहादुर के पास मदद के लिये गए गुरु तेगबहादुर ने कहा जाओ औरंगजेब से कहना यदि गुरु तेगबहादुर मुसलमान बन गया तो हम भी मुसलमान बन जायगे ये बात पंडित औरंगजेब तक पहुंचा देते है।

औरंगजेब गुरु तेगबहादुर को दिल्ली बुलाकर मुसलमान बनने के लिए कहते गुरु द्वारा अस्वीकार करने पर उन्हें यातना दे कर मार दिया जाता है।
अब प्रश्न ये की सिख हिन्दू से अलग है, तो कश्मीरी पंडितओ के लिए गुरु तेगबहादुर ने अपने प्राण क्यो दिए ?

गुरु गोविन्द सिंह का प्रिय शिष्य बंदा बहादुर ( लक्ष्मण दास ) भारद्वाज कुल का ब्राम्हण था। जिसने गुरु गोविन्द सिंह के बाद पंजाब में मुगलो की सेना से संघर्ष किया -
कृष्णा जी दत्त जैसे ब्राह्मण ने गुरु के सम्मान के लिए अपने सम्पूर्ण परिवार को कुर्बान कर दिया।

राजा रणजीत सिंह कांगड़ा के ज्वालामुखी देवी के भक्त थे।उन्होंने देवी मंदिर का पुर्ननिर्माण कराया -
आज भी कई सिख व्यापारियों की दुकानों में गणेश व देवी की मूर्ति रहती है आज भी सिख नवरात्रि में अपने घरों जोत जलाते है नवजोत सिंह सिद्धू के घर मे शिवलिंग की पूजा होती है

***

अब प्रश्न ये की सिख क्यों व कैसे हिन्दू से अलग कर दिए गए ?

1857 की क्रांति से डरे ईसाई ( अंग्रेज़) ने हिन्दू समाज को को तोड़ने की साज़िश रची 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया।जिसका केंद्र पंजाब का लाहौर था।
स्वामी दयानंद ने ही सबसे पहले स्वराज्य की अवधारणा दी जब देश का नाम हिंदुस्तान तो ईसाईयों ( अंग्रेज़ ) का राज क्यों।
स्वामी दयानंद के इन विचारों से पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़ गयी। लाला हरदयाल लाला लाजपतराय सोहन सिंह भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह जैसे क्रांन्तिकारी नेता आर्य समाजी थे,अतः ईसाई मिशनरियों( अंग्रेजो) ने अभियान चलाया की सिख व हिन्दू अलग है ताकि पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर किया जा सके इसके लिए अंग्रेज़ समर्थक सिखों ने अभियान चलाया की सिख हिन्दू नही है,और अलग धर्म का दर्जा देने की मांग की ( जैसे आज कर्नाटक में ईसाई बने लिंगय्यात हिन्दू धर्म से अलग करने की मांग कर रहे है। ) ईसाई मिशनरियों ( अंग्रेज़) ने 1922 में गुरुद्वारा एक्ट पारित कर सिखों को हिन्दू से अलग कर उन्हें अलग धर्म का घोषित कर दिया आजादी के बाद गुलाब चचा ने इसे बनाये रखा
दोस्तो हिन्दू सिखों का खून एक है।🚩

गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 में खालसा( पवित्र) पंथ का गठन किया और कहा मै चारो वर्ण के लोगो को सिंह बना दूँगा।

" देश धर्म संस्कृति की रक्षा प्राण देकर ही नही प्राण लेकर भी की जाती है।"

📺𝐒𝐮𝐛𝐬𝐜𝐫𝐢𝐛𝐞: https://www.youtube.com/channel/UCCI5j_6mO-aUIFWHPlsBKoA

शनिवार, नवंबर 23, 2019

गाजी मियां - पीर या कातिल ?

गाजी मियां - पीर या कातिल ?
प्रसन्नता की बात है कि सभी मुसलमान पीर फकीरों की पोल प्रामाणिक हवालों के साथ खुल गयी है । चाहे वो अजमेर का फकीर हो या निजामुद्दीन का औलिया सभी यहां विदेशी मुसलमान हमलावरों के साथ आये और हिंदुओं का कत्ल और धर्मांतरण कराने के जिम्मेदार थे । ऐसा ही एक हिंदुओं का कातिल गाजी मियां है जिसकी बहराइच में स्थित दरगाह में लाखों हिंदू जाते हैं। उनको यह भी नही पता कि इस्लाम में काफिरों के कातिल को गाजी नाम देकर सम्मानित किया जाता है । इस लेख में इसी कातिल की चर्चा की जायेगी ।
गाजी मियां की पहली लूट :
गाजी मियां का पूरा नाम सैयद सालार मसऊद गाजी था जो गजनी के कुख्यात बादशाह महमूद गजनवी का रिश्ते में भांजा लगता था। गजनवी ने अजमेर नगर गाजी मियां के बाप सैयद सालार साहू को दे दिया था जहां गाजी मियां का जन्म हूआ । एक बार गाजी मियां ने गजनी पहुंचकर अपने मामा को हिंदुस्तान पर हमला करने , हिंदुओं को लूटने और जबरदस्ती मुसलमान बनाने की पट्टी पढाई। फिर क्या था ! मामा भांजे ने अस्सी हजार तीन सौ तुर्कों की सेना लेकर धावा बोल दिया। गाजी मियां ने नगरकोट और मथुरा को लूटकर गुजरात में जबरदस्त ऊधम मचाया । अनेक मदिर , मठ लूटकर , हजारों हिंदुओं का कत्ल कर , हीरे जवाहरात लूटकर मामा के साथ वापस गजनी चला गया।
गाजी मियां की दूसरी लूट :
पहली लूट के कुछ दिनों बाद उसके मामा बादशाह महमूद गजनवी ने अपने वजीर के कहने पर कुछ वजहों के चलते अपने भांजे को देश निकाले की सजा दे दी। कहीं कोई ठिकाना ना देख यह भाग कर फिर हिंदुस्तान आ गया जिसे चढाई का नाम दे दिया गया।
हिंदुस्तान के धर्मांतरित मुसलमानों ने गाजी मियां का साथ दिया। अबकी बार इसने सिंध में अर्जुन और मुल्तान में सेठ अनंगपाल को लूटा। दिल्ली, मेरठ और कन्नौज में लूटमार मचाते, हिंदुओं का कत्ल और उन्हें तलवार के जोर से मुसलमान बनाते वह बाराबंकी पहुंचा। यहां के पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल तथा नगर को लूटकर इसने यहां अपनी छावनी बनाई। यहां मुसलमानों की बड़ी सेना बनाकर इसने सैफुद्दीन को बहराइच, मीर हसन को महोबा, अजीजुद्दीन को गोपामऊ, अहमद मलिक को लखनऊ और मलिक फैज को बनारस जिहाद के तहत हिंदुओं का कत्ल , लूटमार, धर्मपरिवर्तन और उनकी औरतों का बलात्कार करने भेजा। यही कुरानिक जिहाद है। खानजादे , बंजारा,कुंजड़े, रंकी आदि जो पहले हिंदू थे मुसलमान हो गये पर आज भी हिंदुओं की तरह ही रहते हैं। समय की मांग है कि अब इन सबकी घर वापसी करवा लेनी चाहिये ।
राजा सुहेलदेव पासी व गाजी मियां का युध्द:
कड़ा मानिकपुर के वीर हिंदुओं ने गाजी मियां की सेना से कड़ा युध्द किया। कड़ा मानिकपुर का राजपरिवार अनेक हिंदुओं के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ लेकिन बहराइच में लड़ाई होती रही। सैफुद्दीन की हार होते जानकर गाजी मियां बहराइच में आकर लड़ने लगा। लेकिन वीर हिंदुओं के सामने गाजी मियां की एक ना चली । उसकी हार पर हार होती रही और उसकी सेना के सिकंदर, बरहना, मातुल, रजब, हठीले, इब्राहीम आदि सभी सभी योध्दा मारे गये । गाजी मियां एक महुये के पेड़ के नीचे ठहर कर लड़ने लगा। तभी महाराज सुहेलदेव जी ने एक बाण ऐसा तानकर मारा कि गाजी मियां अपनी घोड़ी लल्ली से नीचे गिरकर कुटिला (टेढ़ी) नदी के किनारे महुये के पेड़ के नीचे गिरकर मर गया।
गाजी मियां की दरगाह :
गाजी मियां सन 1034 में मारा गया। इसके मारे जाने के 317 साल बाद सन 1351 में फिरोज तुगलक ने अपनी मां के कहने पर इसकी मजार बनवाई। मजे की बात यह है कि मारे जाने के बाद इसकी लाश का क्या हुआ किसी को आजतक कुछ नही पता । जहां तुगलक ने इसकी दरगाह बनवाई वहां हिंदुओं का पवित्र बालार्क तीर्थ था और एक पवित्र सूर्यकुंड भी जहां ज्येष्ठ मास में स्नान का प्रसिध्द मेला लगता था। जब तुगलक को खोज के बाद भी गाजी मियां की लाश या कब्र का कुछ पता न चला तो कुछ मुसलमानों के यह कहने पर कि इसकी लाश को सूर्यकुंड में फेंक दिया गया था उसने कुंड को पाटकर गाजी मियां की दरगाह बनवा दी जो आज भी वहां मौजूद है।
हिंदू कभी अपने पवित्र कुंड में, जहां वो श्रध्दा से स्नान करते हैं, अपने दुश्मन की लाश भी नहीं डाल सकते। लेकिन एक बहाना ढ़ूंढ लिया गया। इस कब्र में गाजी मियां की लाश है ही नही जो जांच में भी साबित हो जायेगी। कुंड में हिंदुओं का जो मेला लगता था उसे मुसलमानों ने गाजी मियां की पूजा के मेले का रंग दे दिया। बौध्दों के पुराने मंदिर का नाम बदलकर 'कदम रसूल' कर दिया, शंकर भगवान के त्रिशूल को मुसलमान गाजी मियां की 'सांग ' कहने लगे। हिंदुओं को इसपर गम्भीरता से विचार करना चाहिये कि हिंदू मेला और तीर्थस्थान को गाजी मियां की दरगाह और पूजा का रूप दे दिया गया है। अत: एक भी हिंदू वहाँ ना जाकर इसे वापस लेने का आंदोलन शुरू करे।
गाजी मियां से जुड़ी गप्पें :
1- जुहरा बीबी रुदौली, जिला बाराबंकी, के एक तेली की अंधी लड़की थी। इसके मां बाप ने अधी होने के कारण इसे गाजी मियां की कब्र पर चढ़ा दिया था। मरने के बाद जुहरा भी वहीं दरगाह में दफना दी गयी । कुछ दिनों बाद जुहरा के घर वाले हर साल मरी हुयी जुहरा का गाजी मियां से ब्याह करने लगे। अभी भी जुहरा की पलंग पीढ़ी (डोली) रुदौली से दरगाह आती है और दोनों मरे हुओं का ब्याह हर साल होता है।
2- भूत भगाने का धधा :
दरगाह के एक ओर बरहना पीर के डंडे तार में बांधे हुये हैं और इनसे भूत भगाये जाते हैं।भूत अधिकतर औरतों को ही लगते हैं जो यहां भारी तादाद में पहुंचती हैं। जबकि बीते हुये काल को भूत कहते हैं। भूत ना तो किसी को लगता है और नही कोई भगाता है। लेकिन हिंदू औरतें इस बहकावे में आ जाती हैं।
3- कोढ़ी अच्छा करने का नाबदान :
दरगाह संगमरमर की बनी है। गाजी मियां की कब्र बीचों बीच है और अगल बगल जुहरा और उसके भाइयों की कब्रें हैँ। मरी हुयी जुहरा और गाजी के ब्याह के दिन कब्र को स्नान कराया जाता है। मैला पानी मोरी (नाबदान) में जमा हो जाता है। मेले के दिनों अनेक कोढी इसी गंदे नाबदान में आकर पड़े रहते हैं। सूर्यकुंड में पहले एक गर्म पानी का स्त्रोत था जिसमें नियमित स्नान करने से कोढ़ आदि अनेक चर्म रोग ठीक हो जाया करते थे। यह नाबदान उसी गर्म पानी के स्त्रोत की नकल है। अब देखिये कैसे कोढ़ ठीक होता है ? इन्हीं कोढ़ियों के बीच में योजनाबध्द तरीके से अचानक कभी कभी स्वस्थ मुसलमान कोढी होने का नाटक कर कूद जाते हैं, जो काया पावा, काया पावा (कोढ़ अच्छा हो गया) कहकर उछलते,कूदते और चिल्लाते हैं। यह शोर मेले भर में फैलाया जाता है कि गाजी मियां ने कोढ़ी का कोढ़ अच्छा कर दिया। हिंदू फिर गाजी मियां को करामाती देवता समझने लगते हैं।
जबकि गाजी ना कोई देवता है और ना ही उसमें कोई करामात है। उसे मरे 900 साल से भी अधिक हो गये। उसकी कब्र का भी कुछ पता नहीं है। कहीं होगी तो एक भी हड्डी सलामत नहीं बची होगी। कब्र पर ऐसा नाटक मुजावर और डफाली ही करते हैं ताकि हिंदुओं से पैसा ऐंठा जाये और उन्हें मुसलमान भी बना लिया जाये। ऐसे ही गाजी मियां जैसे हिंदुओं के कातिल पीर , मदार आदि की पूजा के बहानें हर साल लाखों हिंदू मुसलमान बनाये जा रहे हैं।
4- मामा भांजे की लड़ाई :
डफाली मेले में कहते फिरते हैं कि यह मामा भांजे की लड़ाई, गाजी मियां लक्ष्मण के अवतार थे और गाय बचाने की लड़ाई में मारे गये थे। डफालियों की यह बात सरासर झूठी है। मामा भांजे की लड़ाई नहीं, महमूद गजनवी और गाजी मियां ही मामा भांजे लगते थे जिन्होंने हिंदुओं को मारा, सताया और कत्ल किया। गाजी मियां लक्ष्मण का अवतार नहीं बल्कि दरिंदा मुसलमान था। गाय बचाने की कौन कहे, उसने तो खूद गायों और हिंदुओं का कत्ल ए आम किया था। किसी भी हिंदू को डफाली, मुजाफर फकीर आदि के बहकावे में कभी नहीं आना चाहिये ।
डफालियों की करतूत :
डफाली बाल लगा हुआ एक झंडा लिये रहते हैं जिससे हिंदू लड़कों, औरतों और बीमारों को झाडते फूंकते और गाजी मियां की तारीफ के गाने गाते हैं। इस झंडे की हकीकत यह है कि जब गाजी मियां तलवार के जोर पर हिंदुओं को मुसलमान बनाता था तो उनकी चोटियां काटकर एक झंडा बना लेता था। डफाली गाजी मियां की यही नकल करते हैं और अपने झंडे के बालों को सुरा गाय की पूंछ बताते हैं। अब ये अपने झंडों को सुरा गाय की पूंछ ना कहें तो तो कहें क्या ? अगर हिंदुओं को मालूम हो जाये कि यह बाल उनके पुरखों की चोटियां या नकल है तो भला कौन हिंदू इन्हें अपने दरवाजे पर खड़ा होने देगा ?
डफाली हिंदुओं को समझाते फिरते हैं कि गाजी मियां औलाद देते हैं, उनको पूजने से लड़के नहीं मरते , बड़ी बरक्कत होती है। अब जब इस दरिंदे की पोल खूल ही चुकी है तो हर पढ़े लिखे हिंदू को चाहिये वह गांव देहात के हर गरीब भोले भाले हिंदु भाई बहनों को समझा दे कि यह सारी बातें झूठी हैं। गाजी उनके पुरखों का कातिल था और इसकी फर्जी दरगाह सूर्यकुंड पर बनी है। डफालियों से कोई पूछे अगर ऐसा है तो गाजी मियां और उसके साथी कैसे मर गये ? अभी भी रोज कितने ही मुसलमान बीमार होकर मरते हैं, डफाली इन मुसलमानों से पूजा क्यों नहीं करवाते ? क्या गाजी मियां की पूजा का असर हिंदुओं पर ही अधिक होता है जो सारे मुसलमान डफाली , फकीर, मुजावर सिर्फ हिंदुओं के पीछे ही लगे रहते हैं ? सच तो यह है कि गाजी मियां, शहीद मर्द, पीर मजार, मस्जिद की फूंक भीख मांगने आदि का बहाना कर ये धूर्त आजतक हिंदुओं को मुसलमान बनाये जा रहे
हिंदू जागने लगा है :
बहुत से हिंदुओं ने अब गाजी मियां , ताजिया, पीर, मजार आदि मुसलमानी कब्रों को पूजना छोड़ दी है। बाकी लोग भी धीमें धीमें समझ रहे हैं कि गाजी मियां हिंदुओं और गौ माता का हत्यारा था और उसकी पूजा उन्हें नहीं करनी चाहिये। यह देखकर डफालियों को परेशानी हो रही है और नित नये नये हथकंडों से हिंदुओं को बहका और डरा रहे हैं कि तुम्हारे पुरखे गाजी मियां को पूजते थे। अब अगर तुम उनको नहीं पूजोगे तो गाजी मियां नाखुश होकर तुम्हारे बाल बच्चों का बुरा हाल कर देंगे। समस्त हिंदुओं को समझ लेना चाहिये कि इन शातिर मुसलमान पीरों की कब्र में सड़ी गली हड्डियां किसी काम की नहीं हैं। ये खूद को सड़ने गलने से बचा नहीं पायीं तो हिंदुओं का क्या खाक करेंगी !
इसबात को समझाने के लिये बस एक उदाहरण काफी है। सुल्तानपुर के दलित हिन्दू सम्पती ने पिछले कई साल से गाजी मियां की पूजा बिल्कुल बंद कर दी है । अपने घर से गाजी मियां की चौकी भी खोदकर बाहर फेंक दी है। जब डफाली रवाना बजाते हुये उसके घर आये तो उसने फटकार कर कह दिया कि-
"जाओ, मैं नहीँ पूजता तुम्हारे गाजी मियां को। मुझे मालूम चल गया है कि गाजी मियां कौन था और उसने हिंदुओं के साथ क्या क्या अत्याचार किया है ।"
डफालियों ने सम्पती को बहुत डराया धमकाया और समझाया पर उसने एक ना सुनी। अब न वो गाजी मियां की पूजा करता है और ना ही किसी कब्र, ताजिया आदि पर चढ़ाई रेवड़ी, बताशा, शर्बत, मलीदा आदि ही खाता है। दस साल में उसके तीन लड़के हुये जो सब स्वस्थ और प्रसन्न हैं। गाजी मियां उसकी किसी भी संतान का एक बाल तक टेढ़ा नही कर पाया।
गाजी मियां की पूजा किसी भी हिंदू को भूलकर नहीं करनी चाहिये। परम पिता परमेश्वर को प्रेम से पूजो ओर धर्म कर्म से रहो तो फिर देखो , एक गाजी मियां की कौन कहे, बीस गाजी मियां और समस्त मुसलमान पीरों की कब्र में सड़ी गली हड्डियां मिलकर भी किसी हिंदू का एक बाल भी टेढ़ा नहीं कर सकतीं। ऐसा ही सारे हिंदुओं को समझा देना चाहिये। सदियों से गाजी मियां और वीर हिंदुओं के बीच हुये युध्द पर गावों में गाये जा रहे आल्हा का आनंद लेते हुये बोलिये :
' सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय !'
' गाजी मियां की पूजा और हिंदू '
- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय

रविवार, नवंबर 10, 2019

सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?

सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?
सिख , हिन्दू नहीं होते है , इस फर्ज़ीवाड़े को सबसे पहले गढ़ने वाला मैक्स आर्थर मेकलीफ़ ( Max Arthur Macauliffe) था ।
यह गुरुमुखी का विद्वान भी था जिसने Guru Granth Sahib का English translation भी किया था ।
Max Arthur Macauliffe जिसे सिख पंथ को एक धार्मिक संस्था का रूप दिया था का हिंदूइस्म के विषय में क्या विचार थे जरा ध्यान दे-
It (Hinduism) is like the boa constrictor of the Indian forests. When a petty enemy appears to worry it, it winds round its opponent, crushes it in its folds, and finally causes it to disappear in its capacious interior....Hinduism has embraced Sikhism in its folds; the still comparatively young religion is making a vigorous struggle for life, but its ultimate destruction is, it is apprehended, inevitable without State support.
【 हिंदी अनुवाद - यह (हिंदू धर्म) भारतीय जंगलों का Boa Constrictor (उष्णकटिबंधीय अमेरिका का एक बड़ा और
शक्तिशाली सर्प, कभी-कभी बीस या तीस फुट लंबा ) की तरह है। जब एक छोटा विरोधी इसकी चिंता करता प्रतीत होता है, तो यह अपने प्रतिद्वंद्वी के चारों ओर घूमता है, इसे अपने लपेटे में ले लेता है, और आखिरकार इसे अपने विशालता में गायब कर देता है .... हिंदू धर्म ने सिख धर्म को अपने लपेटे में लिया है; अभी भी तुलनात्मक रूप से यह युवा धर्म जीवन के लिए एक सशक्त संघर्ष कर रहा है, लेकिन इसका अंतिम विनाश यह है कि इसे राज्य समर्थन के बिना अपरिहार्य माना जाता है। 】
Max Arthur Macauliffe 1864 मे इंडियन सिविल सर्विसेज से पंजाब में आया था। 1882 में ये पंजाब का डिप्टी कमीशनर बना।
मेकलीफ़ वो पहला इंसान था जिसने सिख हिन्दू नहीं है कि परिकल्पना की थी। उसने देखा कि सिख एक मार्शल कौम है। इसलिए सिख आर्मी के लिए उपयुक्त है।
इसलिए इन्होंने पंजाब मे आर्मी की नौकरी में सिखों के लिए आरक्षण लागु कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप कोई भी राम कुमार सरकारी नौकरी नही पा सकता था पर वही राम कुमार दाड़ी मूछ और पगडी रखकर राम सिंह बनकर नौकरी पा सकता था। उस समय तक इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाता था।
इसका नतीजा ये हुआ कि पंजाब मे सिख population 1881 से 1891 के बीच 8.5% बढी।
1891 से 1901 के बीच 14% बढी।
1901 से 1911 के बीच 37% बढी।
1911 से 1921 के बीच 8% बढी।
इनके पंजाबी के ट्यूटर थे Kahn Singh Nabha जिन्होने 1889 मे "हम हिन्दू नहीं" नामक पुस्तक लिखी । जिसको Macauliffe जी ने फंड किया ।
1909 मे खुद Macauliffe साहब ने भी Sikh religion: Its Gurus, Sacred writings, and authors नामक पुस्तक लिखी । जिसकी भूमिका में इन्होंने ये भी बताया है कि किस तरह इन्होंने खालसा पूजा पद्यति आरम्भ की और सिखो के लिए आर्मी में अलग शपथ परम्परा की शुरुआत की ।
इस समय तक गुरूद्वारो ( दरबार) महंतो और साधुओं की देखरेख मे होते थे। गुरूद्वारो के लिए महंतो और हिन्दु पुरोहित की जगह खालसा सिखो की प्रबंधक कमेटी का विचार भी इन्हीं का था। इन गुरूद्वारो से जुड़ी हुई जमीन और सम्पत्ति भी थी।
1920 के शुरूआत से महंतो से गुरूद्वारो को छीनने का अकाली दल का सिलसिला चालू हुआ। इसके लिए महंतो पर तरह तरह के आरोप लगाकर( महिलाओ से दुष्कर्म, गलत कर्मकांड आदि) उन्हे बदनाम किया गया, जनता मे उनके खिलाफ छवि बनाई गयी।
सबसे पहले बाबे दी बेर गुरूद्वारा, सियालकोट जो एक महंत की विधवा की देखरेख मे था, बलपूर्वक कब्जाया गया।
फिर हरमंदिर साहिब ( स्वर्ण मंदिर) छीना गया। फिर गुरूद्वारा पंजा साहिब कब्जाया गया। इसका कब्जे के विरोध 5-6 हजार लोगो ने गुरूद्वारा घेर लिया जिन्हे पुलिस ने बलपूर्वक हटाया।
फिर गुरूद्वारा सच्चा सौदा, गुरूद्वारा तरन तारन साहिब आदि महंतो पर आरोप लगा पुलिस के सहयोग से कब्जाये गये।
इन कब्जो के लिए महंतो को पीटा गया उनकी हत्यारे की गई। जिसके लिए बाकायदा बब्बर अकाली नामक दल का गठनकर मूवमेंट चलाया गया।
ननकाना साहिब गुरूद्वारे पर कब्जा सबसे अधिक बडा खूनी इतिहास है। जिसमे दोनो के कई सैकडो लोग तक मारे गये।
फिर गुरूद्वारा गंजसर नाभा और कई अन्य हिसंक तरीके एवं पुलिस के सहयोग से महंतो से छीने गये।
1925 मे सिख गुरूद्वारा बिल पारित हुआ और कानून बना कर गुरूद्वारो के कब्जे खालसा सिखो को दिये गये। SGPC का गठन हुआ।
फिर एक रेहता मर्यादा बनाई गई जो तय करती है कि कौन सिख है और कौन नही। जिसका पूर्णरूपेण उद्देश्य सिख से हिन्दू विघटन निकाला है।
SGPC के तत्वावधान मे सिख इतिहास को नये सिरे से लिखा गया। हिन्दू परछाई को को सिख मे से जितना हो सके अलग किया गया। नये नये हिन्दू ( खासकर ब्राह्मण) विलेन कैरेक्टर सिख इतिहास में घड़े गए।
पंजाबी मे पारसी भाषा के शब्दो का अधिकधिक प्रयोग किया गया। गंगू बामन और स्वर्ण मंदिर की नीव मुसलमान के हाथो रखवाना, जिसका इससे पहले कोई प्रमाण और इतिहास नही है, घडे गये और इनका प्रचार किया गया ।
गुरू गोविंद सिंह जी की वाणी दशम ग्रंथ मे चंडी दी वार और विचित्र नाटक को इसमे ब्राह्मणी मिलावट घोषित किया गया।
हकीकत राय, सति दास, मति दास, भाई दयाल आदि के बलिदानों को सिखों के बलिदान बताकर प्रचारित किया गया। जबकि इनके वंशज तो आज की तारीख मे भी हिन्दू है।
बंदा बहादुर जिसका की उस समय तत खालसा बनाकर विरोध किया गया और मुग़लों से मिलकर मिलकर उसे पकड़वाया गया था। SGPC आज उसे सिख हीरो के रूप में बताती है।
निर्मली अखाडा जोकि गुरू गोविंद सिंह जी का ही डाला हुआ है और संस्कृत एवं वेदांत के प्रचार प्रसार को समर्पित है हिन्दू विरोध की खातिर इस तक को SGPC ने सिख इतिहास से नकार दिया।
गुरू नानक के पुत्र थे श्रीचंद जोकि अपने समय कै महानतम और प्रसिद्ध योगी थे ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी।
गुरू राम राय जोकि गुरू हर राय के बडे पुत्र थे ने देहरादून मे अपनी गद्दी स्थापित की। इनकी जगह इनके छोटे भाई कृष्ण राय ने पिता की गद्दी सम्भाली और अगले सिख गुरू कहलाये।
ये सभी अखाडे आज भी महंतो द्वारा संचालित है। समाज सेवा मे है।
आनंद मैरिज एक्ट पास कर सिखों के लिए अलग से विवाह पद्यति आरम्भ की गई। अन्यथा 1920 से पहले तक तो हिन्दू पुरोहित ही सिख घरों में विवाह आदि वैदिक संस्कार करवाने जाते थे।
पर Max Arthur Macauliffe की नीति जिससे एक अलग खालसा सिख पंथ की नीव पड़ी की परिणति खालिस्तान आन्दोलन के रूप में सामने आई। बब्बर खालसा उग्रवादियों ने करीब 50000 हजार निरपराध हिन्दुओं की हत्या कर दी। अवसरवादी राजनीती के चलते इन हत्याओ को इस देश ने भुला दिया।
सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है "गुरु ग्रन्थ साहिब" इसको आप उठाकर पढ़ेंगे और देखेंगे तो इसमें "हरी" शब्द 8 हज़ार से भी अधिक बार इस्तेमाल किया गया है, वहीँ "राम" शब्द 2500 से अधिक बार, जबकि "वाहेगुरु" शब्द मात्र 17 बार गुरु ग्रन्थ साहिब को ही अब सिखों का गुरु माना जाता है, चूँकि सिख के आखिरी गुरु गोबिंद सिंह ने इसे ही आगे के लिए गुरु घोषित किया था।
गोविन्द सिंह का तो नाम भी "गोविन्द है" और "सिंह" हिन्दू उपनाम है, जो सिख समूह के बनने से पहले से ही हिन्दू इस्तेमाल करते आये है ।
खालिस्तानी वो लोग हैं जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज हिंदुओं की बानी के बावजूद अपने ही धर्म ग्रन्थ को झुठला कर कहते हैं कि "यह वो राम , वो। कृष्णा, वो जगदीश " नहीं हैं। अपने ही दसवें गुरु के लिखे चण्डी दी वार " चढ़ मैदान चण्डी महिषासुर नु मारे" को झुठलाते हैं। "देव शिवा वर मोहे इहे" को झुठलाते हैं। लाखों खालिस्तानी है आज, इनका पूरा गैंग सक्रिय है, कनाडा, ब्रिटैन जैसे देशों में तो इनका पूरा गैंग ही सक्रिय है, और पाकिस्तान से इनकी बड़ी मित्रता है
ये हिन्दुओ को गाली देते है । ये हिन्दुओ की ही संतान, इन सभी के पूर्वज हिन्दू ही थे, स्वयं नानक भी पैदा होते हुए हिन्दू थे
उनके पिता का नाम कालू चंद, (कालू, कल्याण मेहता) था ।
और ये खालिस्तानी हिन्दुओ को गाली देते है, इन खालिस्तानियों को औरंगजेब और पाकिस्तान प्यारा है ।
आईये इस अलगववदवादी मानसिकता से बचे। एकता में ही शक्ति है। यह सन्देश स्मरण करे।
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सलंग्न चित्र-पाकिस्तान में स्थित एक गुरूद्वारे का है जिसमें पाकिस्तान सरकार ने एक इस्लामिक स्कूल में परिवर्तित कर दिया।