मंगलवार, जनवरी 31, 2012

खुली साजिश, बच गईं जयललिता, रुक गया तख्तापलट!

नई दिल्ली। राजनीति में कोई दोस्त नहीं होता। इस बात का एहसास इस वक्त तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से ज्यादा किसी और को नहीं हो सकता। वो हमारे-आपके बीच हैं...जिंदा हैं और अब सुरक्षित भी। लेकिन पिछले 6 महीने में जो कुछ हुआ उसमें अगर जयललिता छोटी सी भी चूक करतीं तो कहानी कुछ और हो सकती थी।

जी हां, डीएमके को सत्ता से बेदखल करने के तुरंत बाद से ही जयललिता के खिलाफ साजिश का चक्रव्यूह रच दिया गया। तहलका मैगजीन की मानें तो इस साजिश की सबसे बड़ी सूत्रधार थीं शशिकला। वो शशिकला जिसे दुनिया पिछले 25 साल से जयललिता की सबसे करीबी दोस्त के तौर पर जानती थीं।

खुली साजिश, बच गईं जयललिता, रुक गया तख्तापलट!

ये कहना गलत नहीं होगा की जयललिता की सियासी हो या फिर रोजमर्रा की जिंदगी, उसकी डोर भी शशिकला के हाथ में थी। इसी शशिकला के बेटे को जयललिता ने अपनाया और 1995 में उसकी शादी में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा पानी की तरह बहा दिए।




सवाल है कि फिर अचानक क्या हुआ जो सब कुछ बदल गया। पिछले 25 साल से शशिकला अपने रिश्तेदारों की फौज के साथ जयललिता के घर में ही रहती थीं। कहने वाले कहते हैं कि इस दौरान जयललिता सत्ता में रहीं या विपक्ष में, उनका कोई फैसला शशिकला की मर्जी के बिना नहीं हुआ। पद की शपथ जयललिता लेती थीं लेकिन शासन पर पूरा नियंत्रण शशिकला का ही था। सवाल फिर वही, ऐसा क्या हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया।

17 दिसंबर, 2011 को जयललिता ने शशिकला को और उसके रिश्तेदारों को अपने घर से निकाल दिया। 40 से ज्यादा वो नौकर भी हटा दिए गए जो शशिकला 1989 में अपने साथ अपने गांव मन्नारगुडी से लेकर आई थीं। ये 25 साल की दोस्ती खत्म होने का आखिरी सबूत था क्योंकि जयललिता के घर में सारे नौकर, खाना बनाने वाले, ड्राइवर, सिक्योरिटी गार्ड, मैसेंजर सब शशिकला के गांव से ही आए थे। तहलका मैगजीन की मानें तो मन्नारगुडी से आए इन लोगों ने जयललिता के इर्दगिर्द एक ऐसा जाल डाल दिया कि वो हकीकत कभी समझ ही नहीं पाईं।

नेताओं को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, अफसरों को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, कारोबारियों को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, शशिकला ने जयललिता की जिंदगी पर कब्जा कर लिया था और हैरानी ये कि जयललिता को इसकी भनक तक नहीं हुई।

भरोसे का कत्ल इसी को कहते हैं। जब जयललिता पिछले साल चुनाव में जबरदस्त कामयाबी के बाद मुख्यमंत्री के दफ्तर में पहुंची तो उन्हें एहसास नहीं था कि आसपास क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। वो खुद आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों में इतना परेशान थीं कि उन्होंने ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझा और इस बीच उनकी कुर्सी को हमेशा के लिए खिसकाने की तैयारी कर ली गई।

सूत्रों की मानें तो इस वक्त मुश्किल में पड़ी एक मुख्यमंत्री की मदद एक मुख्यमंत्री ने की वो थे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। मोदी और जयललिता के बीच रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे हैं। यही वजह है कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में जयललिता ने नरेंद्र मोदी को खासतौर पर बुलाया था। तहलका मैगजीन के मुताबिक मुख्यमंत्री का पद संभालने के कुछ ही महीनों बाद जयललिता को नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले आगाह किया। उनसे कहा कि अपने इर्दगिर्द रहने वाले लोगों और खासकर शशिकला की हरकतों पर ध्यान दें।

तमिलनाडु में शशिकला और उसके रिश्तेदारों की टोली को मन्नारगुडी माफिया कहा जाता है और मोदी ने उन्हें इस माफिया से बचकर रहने को कहा। जयललिता के लिए ये एक चौंकाने वाला खुलासा था। जिस दोस्त पर वो आंख मूंद कर भरोसा करती हैं उससे किस तरह का खतरा। ये सवाल जयललिता को लगातार मथ रहा था और इसका जवाब भी उन्हें नरेंद्र मोदी से ही मिला।

तमाम विवादों से अलग नरेंद्र मोदी को करीब से जानने वाले जानते हैं कि वो दोस्ती और दुश्मनी कितनी अच्छी तरह निभाते हैं। दरअसल गुजरात में उन्हें एक अरबपति एनआरआई ने बताया कि तमिलनाडु में एक प्रोजेक्ट के लिए मन्नारगुडी माफिया ने पूरे प्रोजेक्ट की कीमत का 15 फीसदी रिश्वत के तौर पर मांगा। मन्नारगुडी माफिया कोई और नहीं शशिकला और उसके रिश्तेदार ही थे। ये बात नरेंद्र मोदी ने तुरंत जयललिता को बता दी।

मोदी से बात होने के बाद जयललिता ने पहली बार शशिकला की हरकतों पर गौर करना शुरू किया। इसी दौरान चेन्नई मोनोरेल प्रोजेक्ट का मामला उनके सामने आया। जयललिता चाहती थीं कि चेन्नई में मोनोरेल प्रोजेक्ट पर जल्द से जल्द काम किया जाए। वो सिंगापुर की एक बड़ी कंपनी को इस प्रोजेक्ट का ठेका देने के भी पक्ष में थीं। लेकिन जब कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद फाइल जयललिता के पास पहुंची तो वो चौंक गईं।

सरकार की तरफ से मलेशिया की दूसरी कंपनी को ठेका देने की तैयारी कर ली गई थी। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। जयललिता ने तत्काल मुख्य सचिव देबेंद्रनाथ सारंगी को बुलवा लिया। सवाल-जवाब के दौर के बीच जयललिता को दूसरा झटका लगा। सारंगी ने उन्हें बताया कि दरअसल जयललिता के लिखित आदेश के बाद ही उन्होंने मलेशिया की कंपनी को ठेका देने का फैसला किया। सवाल फिर उछला-आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने इस केस की सारी फाइलें अपने पास मंगवा लीं देखा कि एक फाइल पर मलेशिया की कंपनी को ठेका देने की बात लिखी है। जयललिता के दस्तखत भी हैं। अब शक की सूई घूमी शशिकला की ओर।

ये रिश्तों में तल्खी की शुरुआत थी। जयललिता ने शशिकला को बुलाकर पूछा कि फाइल पर फर्जी साइन किसने किए। शशिकला ने इससे साफ इनकार कर दिया लेकिन इस वाकये ने जयललिता के मन में एक ऐसी गांठ बना दी जिसका खुलना नामुमकिन था। शशिकला पर जयललिता का शक बढ़ता ही गया।

ये वो दौर था जब चेहरे से हमेशा बेहद आत्मविश्वास में रहने वाली जयललिता का खुद पर भी भरोसा हिल गया। राज्य की मुख्यमंत्री होने के बावजूद सरकार में फैसले कोई और ले रहा था। मुश्किल ये कि अफसर भी उसका साथ दे रहे थे। बिना अफसरों की मिलीभगत के इतनी अहम फाइल पर मुख्यमंत्री के फर्जी साइन कोई नहीं कर सकता।

तभी जयललिता को एक और खुफिया जानकारी मिली और इस जानकारी ने उनके होश फाख्ता कर दिए। सालों से जयललिता कुछ दवाइयां लगातार ले रही थीं। घर में जो नर्स थी उसे भी शशिकला ने ही नौकरी दी थी। अचानक एक दिन जयललिता बिना शशिकला को कुछ बताए शहर के एक नामी डॉक्टर से मिलने चली गईं। साथ में वो दवाइयां भी थीं जो जयललिता को दी जा रही थीं। इस डॉक्टर ने जयललिता और उन्हें दी जा रही दवाइयों की जांच की।

तहलका के मुताबिक जयललिता को नशे की दवा दी जा रही थी और सबसे बड़ी बात कि उन दवाओं में हल्का जहर था। यानी...मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने के लिए जयललिता को जहर दिया जा रहा था। मैगजीन की मानें तो जयललिता को जहर देकर मारने की तैयारी कर ली गई थी।

इस वक्त जयललिता की स्थिति का अंदाजा लगाइए। राज्य की सबसे ताकतवर महिला लेकिन अपनी ही हत्या की साजिश से अनजान। घर में ही, घर के ही लोग उन्हें रास्ते से हटा देना चाहते थे। यकीनन हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। जयललिता को समझ आ गया कि अब जो कुछ भी करना है बहुत जल्द करना है।

सरकार अपनी लेकिन ना नेता अपने और ना ही अफसर। अजीब हालात से गुजर रही थीं जयललिता। इसी दौरान उनका पुलिस के बड़े अफसरों से भी भरोसा उठने लगा। दरअसल मुख्यमंत्री बनने के बाद ये तो तय था कि जयललिता डीएमके के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ेंगी। लेकिन उन्होंने एंटी करप्शन विभाग के अफसरों को ये भी ताकीद की थी कि करुणानिधि के परिवार को बिना ठोस सबूत ना छेड़ा जाए।

हुआ इसका उल्टा। मुख्यमंत्री की बात को नकारते हुए तमिलनाडु पुलिस ने डीएम के दूसरे नेताओं के अलावा करुणानिधि के बेटे स्टालिन के खिलाफ भी केस दर्ज कर लिया। जयललिता ने तुरंत खुफिया विभाग के आईजी से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला शशिकला से पूछकर ही ये केस दर्ज किया गया है। अब जयललिता को ऐहसास हुआ कि शशिकला उन्हें रास्ते से हटाने के लिए डीएमके के साथ भी खेल रही हैं।

करुणानिधि के उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जा रहे स्टालिन के खिलाफ केस का फायदा उनके भाई अझागिरी को होता। इसलिए अब जयललिता के सामने सवाल था कि क्या शशिकला उनके तख्तापलट के लिए डीएमके के एक धड़े से जा मिली हैं। इस सवाल का जवाब भी उन्हें जल्द ही मिल गया।

जयललिता के खिलाफ साजिश के तार अब बैंगलोर से जुड़ रहे थे। तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक को कर्नाटक के डीजीपी ने एक सनसनीखेज जानकारी दी। सूत्रों की मानें तो दिसंबर के पहले हफ्ते में बैंगलोर में शशिकला और उनके रिश्तेदारों ने मिलकर एक खुफिया बैठक की। इस बैठक में आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में जयललिता की मुश्किल पर बात हुई। जयललिता को हटाने के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा इस पर भी चर्चा की गई।

लेकिन शशिकला और उसके रिश्तेदारों को अंदाजा नहीं था कि उनकी एक एक बात कर्नाटक पुलिस सुन रही है। जिस कमरे में ये बैठक हो रही थी वहां कर्नाटक पुलिस ने माइक्रोफोन लगा दिए थे। कर्नाटक पुलिस ने बैठक में हुई पूरी बातचीत का टेप बनवाकर तमिलनाडु पुलिस को भेज दिया। कुछ ही घंटों बाद मुख्यमंत्री जयललिता के सामने ये टेप रखे हुए थे। उन्होंने एक-एक बात गौर से सुनी और फिर हमेशा मुस्कराती दिखने वाली जयललिता के चेहरे पर सख्ती आ गई।

बीजेपी के एक मुख्यमंत्री और बीजेपी की एक सरकार ने मिलकर जयललिता को तख्तापलट से बचा लिया। वर्ना शशिकला की कमान में मुन्नारगुडी माफिया ने तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने की पूरी तैयारी कर ली थी। दिसंबर के दूसरे हफ्ते तक जयललिता तय कर चुकी थीं कि उन्हें अब आगे क्या करना है। जयललिता ने अपने भरोसेमंद राज्य के पुलिस महानिदेशक के रामानुजम को बुलाया। मकसद था शशिकला के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाना। तहलका की मानें तो इसके बाद अगले 5 दिनों तक शशिकला और उसके रिश्तेदारों की एक-एक हरकत पर नजर रखी गई। पुलिस पर भरोसा कम था इसलिए एक प्राइवेट जासूसी एजेंसी की मदद भी ली गई। शशिकला, उसके रिश्तेदारों और सारे सहयोगियों के फोन टैप करने शुरू हुए और हर दिन की रिपोर्ट जयललिता के पास भेजी जाने लगी।

अंदाजा लगाइए एक मुख्यमंत्री को किसी के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए निजी जासूसी एजेंसी की मदद लेनी पड़ी। लेकिन पिछले साल दिसंबर में तमिलनाडु में ये भी हुआ। हालांकि जयललिता को जो रिपोर्ट मिली उसने उनकी चिंता और बढ़ा दी।

शशिकला के तार तमिलनाडु के सत्ता के गलियारे और प्रशासनिक अमले हर जगह फैले हुए थे। वो एक झटके में सभी को नहीं हटा सकती थीं क्योंकि मुकाबला करने लायक सियासी ताकत जयललिता के पास बची नहीं थी। उन्होंने शुरुआत की अफसरों से। जयललिता ने सबसे पहले खुफिया विभाग में अपने भरोसेमंद अफसरों की तैनाती करनी शुरू की। उन्होंने खुफिया विभाग के आईजी का तबादला कर दिया। पिछले 10 साल से जयललिता की सुरक्षा में लगे पर्सनल सिक्योरिटी अफसर को भी हटा दिया गया। इसके बाद कैबिनेट बुलाकर जयललिता ने ऐलान कर दिया कि अब सरकार में आखिरी फैसला उनका ही होगा। मंत्रियों को ताकीद की गई कि वो शशिकला के किसी भी आदेश को नहीं मानें।

जयललिता के ये तेवर देखकर शशिकला सकते में थी। सूत्रों की मानें को शशिकला ने जयललिता को सफाई देने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं मानीं। 17 दिसंबर को शशिकला को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा झटका लगा। चेन्नई के जिस घर में शशिकला जयललिता के साथ पिछले 25 साल से रह रही थीं उन्हें वहां से बाहर निकाल दिया गया। शशिकला के सारे रिश्तेदार, सारे कर्मचारी, सब बाहर। अपना घर सुरक्षित करने के बाद जयललिता ने अब खुद को मिले धोखे की सजा देने की तैयारी की।

--पुलिस और कानूनी जानकारों को शशिकला के अकाउंट खंगालने के लिए कहा गया।

--शशिकला के करीबी रिश्तेदार रावनन को सिंगापुर से लौटते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया।

--रावनन के घर पर छापेमारी में पुलिस को 50 करोड़ रुपए नकद मिले।

जयललिता को धीरे-धीरे पता चल रहा था कि मन्नारगुडी माफिया ने उनका नाम लेकर कैसे अरबों रुपए कमाए हैं। आरोप है कि शशिकला और उसके रिश्तेदारों ने इस दौरान 5000 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया था। यही नहीं विधानसभा चुनाव के टिकट बांटने में भी शशिकला ने 300 करोड़ रुपए कमाए। कहा ये भी जाता है कि जयललिता की सत्ता में वापसी के कुछ महीने के भीतर ही मन्नारगुडी माफिया ने 1000 करोड़ रुपए कमा लिए थे।

जयललिता अपनी हमराज रहीं शशिकला पर लगे आरोप देख रही थीं और सबूत भी। 17 दिसंबर को शशिकला को घर से निकालने के अगले ही दिन 18 दिसंबर को जयललिता ने अपने तमाम मंत्रियों के 38 पर्सनल सिक्योरिटी अफसरों का भी तबादला कर दिया। कहा जाता है कि शशिकला इन पर्सनल सिक्योरिटी अफसरों के जरिए ही पूरी सरकार के एक एक फैसले पर नजर रखती थीं। मन्नारगुडी माफिया से नजदीकी के चलते इन्हें मंत्रियों से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता था। लेकिन अब जयललिता ने ये संपर्क भी काट दिया। अब जयललिता के रडार पर वो मंत्री आए जो शशिकला के करीबी माने जाते थे।

सूत्रों की मानें तो दिसंबर के तीसरे हफ्ते में जयललिता ने पीडब्ल्यूडी मंत्री के वी रामालिंगम को बुलाया। जैसे ही रामालिंगम कमरे में दाखिल हुए जयललिता ने उनसे कहा-भविष्य के मुख्यमंत्री का स्वागत है। ये सुनते ही रामालिंगम सन्न रह गए...आखिर ये क्या हुआ। माना जाता है कि शशिकला ने मंत्री रामालिंगम को जयललिता के खिलाफ तंत्र पूजा करने में भी लगा दिया था। मकसद ये कि तंत्र-मंत्र के सहारे वो जयललिता को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं। सूत्रों की मानें तो जयललिता ने शशिकला के करीबी 13 मंत्रियों की लिस्ट तैयार कर ली है। इन मंत्रियों पर किसी भी वक्त गाज गिर सकती है। जयललिता की तैयारी तमाम प्रशासनिक विभागों के मुखियाओं को बदलने की भी है।

सस्पेंस...ड्रामा...अफसरों-नेताओं की मिलीभगत...और मकसद एक मुख्यमंत्री का तख्तापलट...मकसद एक मुख्यमंत्री को हमेशा के लिए रास्ते से हटाना। ये कहानी फिल्मी भले लगती है लेकिन हकीकत भी यही है। जयललिता अब एक-एक करके पूरे प्रशासन से शशिकला के करीबियों को हटा रही हैं। उन्हें ये भी ऐहसास हो गया है कि राजनीति और जिंदगी में भरोसा और दोस्ती आंख मूंदकर नहीं की जाती। source : http://khabar.ibnlive.in.com/news/66458/12/4

रविवार, जनवरी 29, 2012

अब तक करीब सोनिया गाँधी के विषय मे चालीस आर टी आई

एक तरफ भोंदू युवराज और सोनिया गाँधी अपनी पीठ थपथपाते है कि कांग्रेस ने इस देश को आरटीआई जैसा कानून दिया ..लेकिन सरकार ने सोनिया गाँधी के विषय मे डाले जाने वाले आर टी आई को उठाकर फेक दिया ..

अब तक करीब सोनिया गाँधी के विषय मे चालीस आर टी आई के द्वारा जानकारी मांगी गयी है ..
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१- सोनिया गाँधी पिछले १० सालो मे कहा कहा गयी ?

करीब पांच साल तक धक्के खाने के बाद जब अरजदार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया तब सरकार ने कहा कि सरकार को इस बारे मे कोई जानकरी नहीं है ..
वाह रे कांग्रेस .. कोई भी विदेश जाता है तो पासपोर्ट पर हवाई अड्डे पर इम्मीग्रेशन का मुहर लगता है और उसके पासपोर्ट मे पूरी जानकारी दर्ज की जाती है .. और सबको मालूम है कि पासपोर्ट किसी भी व्यक्ति की निजी सम्पति नहीं होता बल्कि सरकार की समाप्ति है .और ये सरकार के लिए एक मिनट का काम है की वोसोनिया गाँधी के पूरे विदेश यात्रा का ब्यौरा दे ..

अभी भी केस सुप्रीम कोर्ट मे चल रहा है , लेकिन ना जाने क्यों सोनिया गाँधी के तरफ से इस छोटे मामले मे भारत के बड़े वकीलों मे से एक अभिषेक मनु सिंघवी लड़ रहे है ..
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२- सोनिया गाँधी के ईलाज का खर्च क्या भारत सरकार ने उठाया था ? यदि हा तो कितना भुगतान हुआ?

कई महीनों तक कई मंत्रालयों मे ये अर्जी गुजरी ..किसी ने जबाब नहीं दिया ..जब अरजदार ने सुचना आयोग मे केस किया तब इसे सांसदों का विशेषाधिकार का मामला बताकर इस अर्जी पर कोई जबाब देने से सरकार ने मना कर दिया .
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३-सोनिया और राहुल गाँधी सरकारी फाइलों मे अपना अधिकारिक धर्म क्या लिखते है और हकीकत मे वो किस धर्म का पालन करते है ?

पांच सालो तक विभिन्न मंत्रालयों मे ये फाइल भटकती रही .. बाद मे सुप्रीम कोर्ट मे जाने पर सरकार का जबाब आया कि चूँकि सरकार जनगणना के समय लोगो के निजी जानकारी इकट्ठा करती है इसलिए कानून के मुताबिक सरकार इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं कर सकती ..
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४- सोनिया गाँधी को वोटर कार्ड जारी करने के समय सोनिया गाँधी ने कौन कौन से दस्तावेज
निर्वाचन आयोग को दिए ?

कहने को तो भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वत्रंत संवैधानिक संस्था है लेकिन सोनिया गाँधी के मामले पर वो भी एक गुलाम जैसे व्यहार करने लगता है .. यसुचना सीधे सीधे निर्वाचन आयोग के अधिकार छेत्र मे आता है फिर भी निर्वाचन आयोग ने नौ विभागों मे इस फाइल को सालो तक घुमाया .. और आज भी कोईजबाब नही दिया
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५- भारत पाक युद्ध के समय सोनिया गाँधी कहा थी ?

आज तक किसी भी विभाग ने इसका खुलासा आधिकारिक रूप से नहीं किया है .जबकि विदेश मंत्रलय एक मिनट के इसका जबाब दे सकता है .. हकीकत मे भारत पाक युद् के समय अफवाह उडी थी कि पाकिस्तानी लड़ाकू विमान दिल्ली पर बमबारी कर सकते है .. फिर सोनिया गाँधी अपने बच्चो और राजीव गाँधी को अकेले छोडकर अपनी जान बचाने के लिए इटली रहने चली गयी थी .
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६- सोनिया गाँधी का जन्म प्रमाण पत्र

आज तक सरकार ने अरजदार को नहीं दिया .. ईसाई समाज मे जन्म प्रमाण पत्र देने का अधिकार केवल चर्च के पादरी को है .. और सोनिया गाँधी के पास भी इटली के तुरिन कस्बे के पादरी का जन्म प्रमाण पत्र होना चाहिए , लेकिन सोनिया गाँधी भारत मे एफिडेविद करके बनाया हुआ दूसरा जन्म प्रमाण पत्र सरकारी विभागों मे दी है ..

इस बारे मे कहा जाता है कि सोनिया गाँधी ने अपनी जन्मतिथि मे फेरफार की है क्योकि सुब्रमण्यम स्वामी ने जो तुरिन के चर्चसे उनका जन्मतिथि हासिल किये है उसके अनुसार तो सोनिया गाँधी के पिता चार सालो से जेल मे थे .फिर इनका जन्म !!!!!!!!!!!!!!!
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७-राबर्ट वढेरा का पिछले पन्द्रह सालो का आईटी रिटर्न

आयकर विभाग नहीं दे रहा है . क्योकि कहा जाता है की प्रियंका से शादी के पहले राबर्ट के पास पैन कार्ड तक नहीं था और वो आयकर नहीं देते थे क्योकि उनकी आमदनी इतनी भी नहीं थी की वो आयकर के दायरे मे आये .. इस जानकारी से सरकार को डर है की राष्ट्रीय दामाद जनता के सामने बेनकाब हों जायेगा ..
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८-राबर्ट वढेरा को किस कानून के तहत हवाई अड्डों पर जाँच से छूट मिली है ?

ये फाइल कई विभागों के चक्कर काट रही है ..और आज तक सरकार ने नहीं बताया की आखिर राबर्ट वढेरा को हवाई अड्डे पर सुरछा जाँच से छूट क्यों मिली है ?
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९- राहुल गाँधी ने अपनी एमफिल की डिग्री नाम बदल कर ली है और वो मैकेंजी मे भी नाम बदलकर एक साल तक नौकरी किये .. राहुल गाँधी के पासपोर्ट पर अलग नाम है और उनके संसंद मे दिये फार्म और निर्वाचन मे अलग है .. क्या भारत सरकार इसे फ्रोड नहीं मानती ?

आज तक इसका जबाब नहीं आया .. फिर जब राहुल गाँधी के आफिस मे अरजदार ने पूछा तो राहुल गाँधी का सिर्फ एक लाईन का जबाब आया की लिट्टे से मेरे जान को खतरा था ..

लेकिन ये कानून की परिधि मे एक फ्राड मना जायेगा

मित्रों ये है दावा जो राहुल गाँधी यूपी मे अपने कुर्ते की आस्तीन चढाकर कहते है कि हमने इस देश को आर टी आई जैसा शशक्त कानून दिया ..लेकिन ये कानून इस नकली गाँधी परिवार के आगे कितना ताकतवर है उसका नमूना आप खुद देख लीजिए ..

सोमवार, जनवरी 23, 2012

जन गण मन की कहानी-कितना सच कितना झूठ-क्या होना चाहिए आपका राष्ट्रगान

रविन्द्र नाथ टेगोर ने अपने ICS ऑफिसर बहनोई को भेजे एक पत्र में लिखा था कि 'जन गण मन' गीत मुझसे अंग्रेजो के दबाव में लिखवाया है. यह में अंग्रेजों के राजा जॉर्ज पंचम की खुशामद में लिखा गया है, इसके शब्दों का अर्थ देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है.

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था. सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया. पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये. इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया. रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा.

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे. उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था. और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए. रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता". इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था.

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है. हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो. तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित हैं, खुश हैं, प्रसन्न हैं , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है. तुम्हारी ही हम गाथा गाते है. हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो. "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया. जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया. क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है. जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की. वह बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये. रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था.

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया. तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था. टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है. जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया.

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली. इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया. सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे.

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे. अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) . इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है. इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है. लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे. 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये.

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी. लेकिन वह दो खेमो में बट गई. जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे. मतभेद था सरकार बनाने को लेकर. मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने. जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है. इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया. कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए. एक नरम दल और एक गरम दल.

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी. वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे. और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे). लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे. उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना. हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे. वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी. नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम".

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है. और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है. उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे. उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया. जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली. संविधान सभा की बहस चली. संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई.

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना. और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु. उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी). अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास. गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये. तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा". लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए.

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है. उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया. नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था.

बीबीसी ने एक सर्वे किया था. उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम. बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है. कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है.

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का. अब ये आप को तय करना है कि देश का राष्ट्र गान क्या होना चाहिए और क्या नहीं. source : http://www.mpsamachar.com/news.asp?key=184

शनिवार, जनवरी 21, 2012

अलोकतांत्रिक है, सलमान रुश्दी का विरोध : जाहिद खान

भारतीय मूल के विवादास्पद ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी एक बार फिर चर्चा में हैं। रुश्दी की चर्चा उनकी कोई नई किताब को लेकर नहीं, बल्कि उनके भारत आने को लेकर है। वे भारत आएं, इससे पहले ही उनकी यात्रा को लेकर विवाद शुरू हो गया है। विरोध का ये झंडा उठाया है, दारुल उलूम देवबंद ने। उस दारुल उलूम ने जो दुनिया में इस्लामी तालीम का सबसे बड़ा मरकज माना जाता है। दारुल उलूम देवबंद के कुलपति मौलाना अब्दुल कासिम नोमानी ने भारत सरकार से मांग की है कि वह रुश्दी को भारत न आने दे। क्योंकि, उन्होंने अपने उपन्यास में मुसलमानों के मजहबी जज्बात को चोट पहुंचाई है।

दारुल उलूम से विरोध की यह आवाज उठी, तो इससे और भी आवाजें मिल गईं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और दूसरे मजहबी इदारे व अंजुमनों के साथ-साथ सियासी पार्टियां भी इस वाक् युद्ध में शामिल हो गईं। सबके अपने-अपने एतराज और दलीले हैं। अपने छोटे से सियासी फायदे के लिए उन्हें इस बात की जरा सी भी परवाह नहीं कि इस विवाद से दुनिया में मुल्क की क्या छवि बनेगी और उसकी लोकतांत्रिक छवि को कितना नुक्सान पहुंचेगा? इस सब के बाद आखिरकार रुश्दी ने अपनी भारत यात्रा फिलहाल स्थगित कर दी है।

गौरतलब है कि सलमान रुश्दी राजस्थान की राजधानी जयपुर में 20 से 24 जनवरी तक होने वाले साहित्य महोत्सव में हिस्सा लेने वाले थे। उनकी यात्रा विशुद्ध साहित्यिक यात्रा थी, लेकिन इस यात्रा को भी तंगनजर मजहबी उलेमाओं और मतलबपरस्त सियासतदानों ने विवाद का मौजू बना कर रख दिया है। रुश्दी की मुखालफत उनकी उस किताब ‘सैटेनिक वर्सेज’ को लेकर हो रही है, जो आज से 24 साल पहले लिखी गई थी। रुश्दी पर इल्जाम है कि उन्होंने अपनी इस किताब में जानते-बूझते एक ऐसा किरदार गढ़ा, जिससे मुसलमानों के मजहबी जज्बात भड़कें। सैटेनिक वर्सेज के विरोध से इतर जिन पाठकों ने इस किताब को पढ़ा है, उनका मानना है कि किताब में ऐसा कुछ भी नहीं, जो एतराज के काबिल हो। सच बात तो यह है कि किताब में सलमान रुश्दी ने एक इमाम का जो किरदार दिखलाया है, वह ईरान के सर्वोच्च धार्मिक लीडर अयातुल्लाह खुमैनी से मिलता-जुलता है।

जाहिर है, जब यह किताब उस वक्त बाजार में आई, तो इसका सबसे ज्यादा विरोध ईरान में ही हुआ। ईरान में न सिर्फ किताब सैटेनिक वर्सेज का विरोध हुआ बल्कि किताब के लेखक सलमान रुश्दी का भी विरोध हुआ। यहां तक कि ईरान हुकूमत ने ‘ईश निंदा’ के इल्जाम में रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा जारी कर दिया। पूरी दुनिया में सैटेनिक वर्सेज को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया कि किताब इस्लाम और उसके पैगम्बर का मखौल उड़ाती है। जबकि, विरोध करने वालों में से शायद ही कुछ ऐसे हों, जिन्होंने यह किताब पढ़ी हो या उसे कुछ समझा हो। सारा विरोध केवल सुनी सुनाई बातों पर ही आधारित है।

बहरहाल, कई इस्लामिक मुल्कों के साथ-साथ भारत में भी कट्टरपंथियों के दबाव में तत्कालीन भारतीय हुकूमत ने सैटेनिक वर्सेज पर पाबंदी लगा दी। तब से किताब पर यह पाबंदी आज तक जारी है। अलबत्ता, सलमान रुश्दी कई बार भारत आ चुके हैं। जिस जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में उनके आने को लेकर बवाल मचा हुआ है, वहां वे साल 2007 में भी शिरकत कर चुके हैं। लेकिन तब ऐसा कोई हंगामा नहीं हुआ। फिर अचानक ऐसी क्या बात हुई कि उनका विरोध होना शुरू हो गया? जबाव ज्यादा मुश्किल नहीं। उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं। जिसमें उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे खास है।

उत्तर प्रदेश में 100 से ज्यादा ऐसी सीटे हैं, जहां मुसलमानों के वोट निर्णायक साबित होंगे। जाहिर है, इन्हीं वोटों की खातिर सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां मुसलमानों को लुभाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं। भारत में यह बात कई बार साबित हो चुकी है कि यहां का मुसलमान आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों की बजाय धार्मिक भावनात्मक मुद्दों पर बहुत जल्दी प्रभावित होता है। लिहाजा सभी सियासी पार्टियां, खास तौर पर चुनाव के समय भावनात्मक मुद्दे उछालकर मुस्लिम वोटों की फसल काटती रहती हैं। सलमान रुश्दी का मुद्दा भी इससे इतर नहीं।
ताज्जुब की बात यह है कि इस मर्तबा यह मुद्दा कोई सियासी पार्टी ने नहीं बल्कि दारुल उलूम देवबंद जैसे इस्लामिक शैक्षणिक संस्थान ने उठाया है। जिस देवबंद ने भारत की आजादी के हक में नारा बुलंद किया हो और जिसने मुल्क के बंटवारे की सख्त मुखालफत की हो, उसका सलमान रुश्दी के खिलाफ इस तरह का गैर जिम्मेवाराना रुख बिल्कुल बेतुका है।

सलमान रुश्दी और उनकी किताब सैटेनिक वर्सेज के अप्रिय प्रसंग को सारी दुनिया ने लगभग बिसरा दिया है। खुद, ईरान जहां से रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा आया, अब इस पर जरा भी जोर नहीं देता। तब भारत जैसे लोकतांत्रिक और सहिष्णु मुल्क में रुश्दी के खिलाफ उस फतवे के आधार पर विरोध करना कितना जायज है? रुश्दी को भारत आने से रोकने की मांग न सिर्फ अलोकतांत्रिक बल्कि अभारतीय है। भारत सरकार को कट्टरपंथियों की सलमान रुश्दी के वीजा रद्द करने की मांग को जरा सा भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अलबत्ता, यदि कुछ मुस्लिम तंजीमों और सियासी पार्टियों को लगता है कि सलमान रुश्दी के भारत आने से मुल्क का अमन या कानून का बंदोबस्त बिगड़ेगा तो वे अदालत जा सकते थे। लेकिन बिला वजह की बयानबाजी ने माहौल को बिगाड़ने का ही काम किया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार हैं)

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

इस्लाम समर्थक हिन्दू आचार्य ?

इस्लाम समर्थक हिन्दू आचार्य ?


आजकल प्रचार का जमाना है .और लोग अपना प्रचार करने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं .इसीलिए कुछ मुस्लिम ब्लोगरों ने इस्लाम का प्रचार करने के लिए यही तरकीब अपना रखी है .सब जानते हैं कि अधिकांश हिन्दू संगठन और संस्थाए भी दोगली विचारधारा रखती हैं .और कुछ तथाकथित स्यंभू आचार्य ,और पंडित अपना धर्म बेच चुके है ,और इस्लाम का प्रचार कर रहे है .कुछ दिनों पूर्व " सनातन धर्म इस्लाम " (http://sanatan-dharm-islam.blogspot.com/)के नाम से एक ब्लॉग नजर में आया ,जिसमे किसी अहमद पंडित और किसी लक्ष्मी शंकर आचार्य के साथ कुछ अन्य हिन्दू लेखकों ने मिलकरयह सिद्ध करने का प्रयास किया है ,कि इस्लाम एक उदार धर्म है ,इसमें जबरदस्ती नहीं है .यह हरेक व्यक्ति को अपना धर्म पालन करने की अनुमति देता है .इस्लाम की नजर में सभी मनुष्य समान हैं .इस्लाम लोगों में सद्भावना फैलाना चाहता है .आदि ,इन्हीं बातों प्रमाणित करने के लिए इस ब्लॉग में कुरान शरीफ की कुछ आयतें और विडिओ भी दिए गए है .यहाँ पर ब्लॉग में किये गए दावों की दुर्भावना रहित समीक्षा दी जा रही है ,ताकि उन हिन्दू विद्वानों को सटीक उत्तर दिया जा सके .और सत्यासत्य का निर्णय हो सके .देखिये -
1 - इस्लाम का अर्थ शांति नहीं है .
अभी तक लोग इसी भ्रम में पड़े हुए हैं ,कि इस्लाम का अर्थ शांति है .और इसलिए इस्लाम शांति का धर्म है .लेकिन इस्लाम का वास्तविक अर्थ शांति नहीं बल्कि समर्पण है ."Islam" does not mean "peace" but "submission"जैसा कि कहा जाता है ("السلام" ولكن "تقديم"استسلاما )इस्लाम शब्द अरबी के तीन अक्षरों (root sīn-lām-mīm (SLM [ س ل م ) से बना है .और कुरान में कई जगह इस्लाम का अर्थ समर्पण ही किया गया है ,सूरा तौबा 9 :29 में इसका अर्थ-
To surrender -اسلام=Submission बताया है .इसी तरह सूरा आले इमरान 3 :83 में इसका अर्थ अल्लाह का धर्म और सूरा आले इमरान 3 :19 में भी वही अर्थ"islam is surrender to allah 's will استسلاما=To surrender " दिया है .इस्लाम का अर्थ शांति फैलाना कदापि नहीं है .इस शब्द का प्रयोग लोगों को धमकी देकर आत्मसमर्पण (surrender ) करने के लिए किया जाता रहा है ,जो इन हदीसों से सिद्ध होता है .


"रसूल ने यहूदियों से कहा कि यह सारी जमीन मुसलमानों की है .इसलिए तुम इसे खाली कर दो .और इस्लाम कबूल करो .और खुद को अल्लाह के रसूल के सामने समर्पित कर दो " बुखारी -जिल्द 9 किताब 92 हदीस 447
"एक औरत ने रसूल से पूछा कि इस्लाम क्या है ,तो रसूल ने कहा ,सिर्फ अल्लाह की इबादत करना , रोजा रखना ,जकात देना और खुद को अल्लाह की मर्जी के हवाले कर देना "बुखारी -जिल्द 1 किताब 1 हदीस 47
"रसूल ने Byzantine ईसाई शाशक "हरकल Harcaleius को सन्देश भेजा ,जिसमे कहा कि मैं अल्लाह का रसूल मुहम्मद तुम्हें चेतावनी देता हूँ ,कि अगर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो ,तो समर्पण कर दो .और इस्लाम स्वीकार कर लो "बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 191
वह इस्लाम भक्त हिन्दू आचार्य बताएं कि क्या इस्लाम का अर्थ समर्पण करना नहीं है ? और इस्लाम के जन्म से लेकर मुसलमान इसी तरह से विश्व में शांति (अशांति ) नहीं फैला रहे हैं ?
2 -इस्लाम में जबरदस्ती नहीं है
इन इस्लाम परस्त पंडितों ने जकारिया नायक के सामने मुस्लिमों को खुश करने के लिए यह कह दिया कि इस्लाम में किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं है ,और सबको अपना धर्म पालने की आजादी है .इसके लिए इन लोगों ने कुरान की इन आयतों का हवाला दिया है -
अ -"दीन (इस्लाम ( में कोई जबरदस्ती नहीं है " सूरा -बकरा 2 :256
ब-"तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और हमारे लिए हमारा दीन "सूरा -काफिरून 109 :6
बहुत कम लोग यह जानते हैं कि कुरान की सूरतें और आयते घटनाक्रम के अनुसार ( according revelation ) नहीं है .इसलिए इनका सही तात्पर्य और अर्थ समझने के लिए हदीसों का सहारा लेना जरुरी है .पहली आयत 2 :256 यहूदियों से सम्बंधित है .हदीस में कहा है ,
"अब्दुल्ला इब्न अब्बास ने कहा कि इस्लाम से पहले जिन औरतों के बच्चे नहीं होते थे ,या बार बार मर जाते थे ,वह यहूदियों के मंदिर में जाकर रब्बी के सामने यह मन्नत मांगती थीं ,कि अगर मुझे बच्चा होगा ,या मेरी संतान जीवित रहेगी तो उसे मैं यहूदी बनाकर तुम्हारे हवाले कर दूंगी . मक्का में ऐसे बहुत से बच्चे यहूदियों के पास थे . जब इस्लाम आया तो रसूल ने उन सभी बच्चों को यहूदियों से मुक्त कराया और कहा कि " दीन ( मान्यता ) में कोई जबरदस्ती नहीं है "
अबू दाउद-किताब 14 हदीस 2676
इसी तरह दूसरी आयत 109 :6 का जवाब उसी सूरा में मिल जाता है ,जिसमे कहा है कि "हे काफिरों मैं उसकी इबादत नहीं करूँगा ,तुम जिसकी इबादत करते हो
" सूरा -काफिरून 109 :4 .इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए कुरान की इस आयत को पढ़िए जो कहती है कि,
"और जो लोग इस सच्चे दीन (इस्लाम )को अपना दीन नहीं मानते ,तुम उनसे लड़ो ,यहाँ तक वह अपमानित और विवश होकर जजिया न देने लगें "
सूरा- तौबा 9 :29
अब कोई कैसे मान सकता है ,कि इस्लाम बलपूर्वक नहीं फैलाया गया ,और सबको अपने धर्मों के पालन करने की अनुमति देता है ?
3 -इस्लाम वैश्विक भाईचारा चाहता है


वास्तव में इस्लाम " वैश्विकबंधुत्व "الأخوة العالمية" universal fraternity" नहीं बल्कि " मुस्लिम भाईचारे "" الاخوان المسلمين" muslim brotherhood की वकालत करता है . जो इन आयतों से स्पष्ट हो जाती है ,जो कहती हैं .
" ईमान वाले (मुस्लिम ) तो भाई भाई हैं "सूरा -अल हुजुरात 49 :10
यही बात इन हदीसों में में साफ तौर से कही गयी है ,कि मुसलमान दुसरे धर्म वालों के भाई या मित्र नहीं हो सकते .हदीस में है ,
"रसूल ने कहा कि इमान वालों को सिर्फ इमान वालों से ही दोस्ती करना चाहिए "अबू दाउद -किताब 41 हदीस 4815 और 4832
"रसूल ने कहा हे ईमान वालो तुम मेरे शत्रुओं ( गैर मुस्लिम ) को अपना भाई या दोस्त नहीं समझो " बुखारी -किताब 59 हदीस 572
कुरान में गैर मुस्लिमों से दोस्ती न करने का कारण भी दे दिया है और रसूल के स्वभाव के बारे में कहा है कि ,
"मुहम्मद अल्लाह के ऐसे रसूल हैं ,जो काफिरों के प्रति कठोर और अपने लोगों ( मुसलमानों ) के प्रति अत्यंत दयालु हैं "सूरा -अल फतह 48 :29
सब जानते हैं कि मुसलमान रसूल का अनुकरण करते हैं ,और जब रसूल ही गैर मुस्लिमों से दोस्ती और भाईचारे को बुरा बताते हों ,तो मुसलमानों क्या मजाल जो हिन्दुओं से दोस्ती कर सकें .यही कारण था कि जब केजरीवाल मौलाना अरशद मदनी के पास दोस्ती के लिए गए तो उनको भगा दिया गया .और अन्ना का आन्दोलन फेल हो गया .( जागरण 28 दिसंबर 2011 )याद रखिये गाँधी ने भी यही किया था .
4-विधर्मी भटके लोग और जानवर हैं
आप सोच रहे होंगे कि इस्लाम गैर मुस्लिमों से मित्रता करने का विरोधी क्यों है .क्योंकि इस्लाम कि नजर में सभी गैर मुस्लिम ,जैसे यहूदी ,ईसाई और हिन्दू भटके हुए लोग और कुत्ते ,बन्दर ,सूअर और चूहे की तरह निकृष्ट प्राणी है .यह कुरान की इन आयातों और हदीसों से सिद्ध होता है .जो कहती हैं कि-
"क्या कभी कोई अँधा और आँखों वाला व्यक्ति बराबर हो सकता है "सूरा -रअद 13 :16
" निश्चय ही जमीन पर चलने वाले सभी जीवों में अल्लाह कि नजर सबसे निकृष्ट जीव वह लोग हैं जो इस्लाम नहीं लाते"सूरा-अनफ़ाल 8 :55
"जो इस्लाम को छोड़कर अपनी ही इच्छा पर चलते हैं ,उनकी मिसाल कुते की तरह है .जो अपनी इच्छा पर चलता है "सूरा-आराफ 7 :176
"जब वह हमारी बात ( इस्लाम लाओ ) छोड़कर ढिढाई से वही पुराना काम करने लगे ,तो हमने (अल्लाह ) कहा जाओ तुम धिक्कारे हुए बन्दर बन जाओ "
सूरा -आराफ़ 7 :166
"और जब उन लोगों (यहूदी ) हमारे आदेश को नहीं माना तो हमने कहा तुम बन्दर बन जाओ "सूरा -बकरा 2 :65
"जिन्होंने अल्लाह के आलावा किसी और की इबादत की ,तो उन पर अल्लाह का प्रकोप हुआ .जिस से उन में से बन्दर और सूअर बना दिए गए .
सूरा -अल मायदा 5 :60 .यही बातें इन हदीसों में दी गयी है -
" अबू सईद ने कहा कि रसूल ने कहा "सभी यहूदी और ईसाई भटके हुए लोग है और जानवरों से बदतर है .यह एक दिन गर्त में जा गिरेंगे "
बुखारी -जिल्द 4 किताब 56 हदीस 662
" अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा यहूदी चूहों की तरह है ,जब इनको बकरी का दूध दिया जाता है ,तो पी लेते है .लेकिन जब ऊंटनी का दूध दिया जाता है तो इनको कोई स्वाद नहीं आता.यानि तौरेत पढ़ लेते हैं लेकिन कुरान से इकार करते है "सही मुस्लिम किताब 42 हदीस 7135 यही कारन है कि मुसलमान हिन्दू ,ईसाई और यहूदी जैसे जानवरों से दोस्ती नहीं करते हैं .
5-अल्लाह भटकाता रहे ,और
लगता है अल्लाह ने जिस दिन कुरान उतारी थी ,उसी दिन से पृथ्वी से काफिरों ( गैर मुस्लिम ) के सफाया की योजना बना रखी थी .कि वह उनको गुमराह करके उनसे गुनाह ,अपराध कराता रहे .फिर जहाँ भी इस्लामी हुकूमत हो जाये वहां जिहादी किसी न किसी बहाने उनको क़त्ल करते रहें .यह बात कुरान कि इन आयतों से स्पष्ट हो जाता है -
" यदि अल्लाह चाहता तो सबको एक गिरोह बना देता ( ताकि वह सत्कर्म करते ) लेकिन वह जिसको चाहे गुमराही में डाल देता है "
सूरा-अन नह्ल 16 :93
" वह लोग बिच में ही डावांडोल रहते हैं ,न इधर के और न उधर के . जिसको चाहे गुमराही में डाल देता है,और जिसे खुद अल्लाह भटका दे उनके लिए कोई रास्ता नहीं रहता "सूरा -अन निसा 4 :143
"अल्लाह जिसको चाहे उसको भटका देता है ,और जिसको चाहे सन्मार्ग दिखा देता है "सूरा-अल मुदस्सिर 74 :31
"अल्लाह ने जानबूझ कर उनको सन्मार्ग से भटका दिया है ,और उनके कानों और दिलों पर ठप्पा लगा दिया है "सूरा -अल जसिया 45 :23
अल्लाह के इस काम में शैतान भी मदद करते रहते हैं .जो इस आयत से पता चलता है .
"क्या तुम नहीं जानते कि हमने इन काफिरों पर अपने शैतानों को छोड़ रक्खा है ,जो इनको गुमराह करते रहते हैं "सूरा -मरियम 19 :83
काश वह हिन्दू पंडित जकारिया नायक से पूछते कि ,जब खुद अल्लाह ही शैतान के साथ मिलकर लोगों को गुमराह कराता रहता है ,तो असली अपराधी अल्लाह क्यों नहीं है .फिर गैर मुस्लिमों पर हमले क्यों किये जाते हैं ?जैसा कि आगे बताया गया है -
6-जिहादी मारते रहें
क्या इसी को इस्लामी कानून कहते हैं कि ,करे अल्लाह और भरें हिन्दू या गैर मुस्लिम .फिर भी जिहादी अल्लाह की जगह गैर मुस्लिमों पर जिहाद करते रहते हैं .जैसा कि कुरान की इन आयतों में लिखा है ,
"हे ईमान वालो तुम उन सभी काफिरों से लड़ते रहो जो तुम्हारे आस पास रहते हों "सूरा -तौबा 9 :123
"जो इमान वाले हैं ,वह हमेशा अल्लाह के लिए लड़ते रहते है "सूरा -निसा 4 :76
"जहाँ तक हो सके तुम हमेशा सेना और शक्ति तैयार रखो ,और काफिरों को भयभीत करते रहो "सूरा -अनफाल 8 :60
" हे नबी तुम काफिरों और मुनाफिकों के साथ सदा जिहाद करो और उन पर सख्ती करते रहो "सूरा -अत तहरिम 66 :9 .और सूरा तौबा 9 :73
"तुम उनसे इतना लड़ो की वह बाकि न रहें ,और सभी धर्म इस्लाम हो जाएँ "सूरा -अन्फाल 8 :39 और सूरा -बकरा 2 :193
"हे नबी तुम ईमान वालों को हमेशा लड़ाई करने पर उकसाते रहो "सूरा -अन्फाल 8 :63


अब पाठकों से विनम्र नवेदन है कि वह पहले ऊपर दिए गए "सनातन धर्म इस्लाम "में दिए गए हिन्दू पंडितों के तर्कों को पढ़े ,फिर निष्पक्ष होकर कुरान की दी गयी आयतों को पढ़ें . फिर अपना निर्णय टिपण्णी के रूप में देने की कृपा करें .अथवा ,प्रथम अनुच्छेद में जिस ब्लॉग का हवाला दिया गया है ,उसमे उन पंडितों और आचार्यों के पते दिए गए हैं ,जो इस्लाम के भक्त है .आप उन से सवाल कर सकते हैं . http://bhaandafodu.blogspot.com/2012/01/blog-post_12.html

बुधवार, जनवरी 18, 2012

HINDUISM IS A PERFECT RELIGION BY ITSELF

Introduction

Hinduism is the religion of the Hindus, earlier known as Sanatan Dharma.

In the Vedic period, Sanatan Dharma was prevailing all over the world and there was no other religion prevailing on the Earth in those periods.

All other religions have originated from Hinduism - Sanatan Dharma.

Hinduism is the oldest of all living religions. Hinduism is not a man-made religion. It was not founded by any single person like other religions.

Islam was founded by a psychic man called - Mohammed Paigambar.

Christianity was founded by a man called Jesus.

Hinduism is not based on a set of dogmas preached by a particular set of teachers. It was not started as a system, like Islam or Christianity. It is the product of the seers of the Vedas.

Vedas means - Science of life.

Hinduism was developed from age to age by the teachings of Avataras, Rishis, Vedas, the Upanishads, the Gita and the Itihasas.

Hinduism will exist as long as the world lasts because, there is a peculiar, mysterious spiritual force that is ingrained in the heart of every Hindu.

Hinduism is also known by the names Sanatana Dharma and Vaidika Dharma.

Sanatana Dharma means eternal religion, the Ancient Law. Vaidika Dharma means the religion of the Vedas.

The Vedas are the foundational scriptures of Hinduism.

A Religion of Freedom

Hinduism allows absolute freedom to the rational mind of man. Hinduism never demands any undue restraint upon the freedom of human reason, the freedom of thought, feeling and will of man.

Like in Islam, there is a binding that every Muslim should unconditionally accept the Quran and he who questions or disbelieves the Quran, will be tortured, killed, looted, raped, slaughtered alongwith his family and friends - Such heinous preachings do not exist and will never be accepted in Hinduism, because Hinduism is a Religion of Eternal Peace and Humanity.

Hinduism is a religion of freedom

It allows the widest freedom in matters of faith and worship. It allows absolute freedom to the human reason and heart with regard to questions such as the nature of God, soul, creation, form of worship, and goal of life. It does not force anybody to accept particular dogmas or forms of worship. It allows everybody to reflect, investigate, enquire and cogitate. Hence, all sorts of religious faiths, various forms of worship or Sadhana, diverse kinds of rituals and customs, have found their honourable place side by side within Hinduism, and are cultured and developed in harmonious relationship with one another.

Hinduism, unlike other religions, does not dogmatically assert that the final emancipation is possible only through its means and not through any other. It is only a means to an end, and all means which will ultimately lead to the end are equally approved.

The religious hospitality of Hinduism is proverbial. Hinduism is extremely catholic and liberal. This is the fundamental feature of Hinduism. Hinduism pays respects to all religions. It does not revile any other religions. It accepts and honours truth, wherever it may come from and whatever garb it may put on.

Hindu Philosopy and Legends

In every religion, there are three parts, viz., philosophy, mythology and ritual. Philosophy is the essence of religion. It sets forth its basic principles or fundamental doctrines or tenets, the goal, and the means of attaining it. Hindu Legends explain and illustrate the Hindu Philosophy by means of legendary lives of great men or of supernatural beings, which existed amongst us in their times and such Legendary Men and Avatars will continue to come and live amongst us in times to come. The lives of such legendary men and Avataras is meant to guide to the path of achieving the final goal of our lives - Moksha.

Such teachings are not given in any other religion, which have originated only from one man and his rules.

Ritual gives a still more concrete form of philosophy so that everyone may understand it. Ritual consists of forms and ceremonies. Such rituals, which set the form of our lives to the path of Divine happiness is one more thing Hinduism has given to us humans. Such rituals help us humans to maintain the difference in the lifestyles of us Humans from animals.

Mythology is an essential part of Hinduism. Mythology means concretized philosophy. Mythology is the science which investigates myths or fables or legends founded on remote events, especially those made in the early period of a people's existence. Mythology inspires the readers through precepts and laudable examples, and goads them to attain perfection of life of the highest ideal being, which is called as Avatar in the Sanatan Dharma or Hinduism.

The abstract teachings and subtle ideas are made highly interesting through the garb of stories, parables, legends, allegories and narratives. The sublime and abstract philosophical ideas and ideals of Hinduism are taken straight to the heart of the masses through impressive legends and examples. Mythology in Hinduism is nothing but History of Supreme being in Human history, who actually lived amongs the masses in the Vedic period and also in the later ages. Such examples and legends start from the earliest period of the Satya Yuga and then follow in the Treta Yuga and Dvapar Yuga. Such examples also have their legendary existence in the Kali Yuga. The latest exampls of such legends of Hinduism are - LORD KRISHNA (The eight avatar of Lord Vishnu), who lived amongs us during the ending era of Dvapar Yuga and LORD BUDDHA (The nineth avatar of Lord Vishnu), who lived among us in Kali Yuga.

There are great truths behind the ancient legends of Hinduism.

You cannot ignore a thing simply because it has happened in the ancient period of the Human Race. Do not argue. Use your intellect with the right degree when you study the legends of Hinduism. When you keep your Intellect in the right degree, then it helps you to understand the actual Science behind all the legends in Hinduism and their purpose of guiding the Human Race towards the path of attaining Divinity towards the end of our lives ie Moksha.

Give up arrogance, vanity. Cultivate love for divinity. Sit like a child and open your heart freely. You will comprehend the great truths revealed by such legends. You will penetrate into the hearts of the Rishis and sages who wrote this history of legends in Hinduism. You will really enjoy the Legendary History of Hinduism now.

You can grasp the subtle, philosophical truths through such legends only. The object of legends is merely to guide your minds to the truths of religion.

Emphasis on Practice

Hinduism is not a religion of mere theories. It is eminently practical. In no religion will you find such a variety of Yoga practiced, and such sublime unique philosophy expounded.

Hinduism provides spiritual food and Yoga Sadhana for all sorts of people to suit their temperaments, capacities, tastes, stages of spiritual development, and conditions of life. It prescribes Yoga Sadhana even for a scavenger or a cobbler to attain God-realization, while doing his ordinary avocation in the world. Hindu Yoga and Vedanta teachers lay great stress on self-restraint, Tapas, renunciation and practical Sadhana, which are best calculated to control the mind and the senses and unfold the Divinity within or attain Self-realization.

Religion is the practical aspect of philosophy. Philosophy is the rational aspect of religion. The philosophy of Hinduism is not armchair philosophy. It is not meant for intellectual curiosity and vain discussion. Hindu philosophy is a way of life. The philosopher of Hinduism seriously reflects after hearing the Srutis (Vedas), does Atma-vichara (enquiry into the nature of the Self), constantly meditates, and then attains Self-realization or Atma-sakshatkara. Moksha (liberation from birth and death) is his goal. He attempts to attain Jivanmukti (liberated being) now and here.

Law of Karma

The Law of Karma is one of the fundamental doctrines of Hinduism.

As a man sows, so shall he reap. This is the law of Karma.

Desire produces Karma.

You work and exert to acquire the objects of your desire. Karma produces its fruits as pain and pleasure. You will have to take births after births to reap the fruits of your Karmas. This is the law of Karma.

The doctrine of reincarnation or transmigration is a fundamental tenet of Hinduism.

You will 'NOT' cease to exist after death.

Before this birth you have passed through countless lives.

The word 'reincarnation' literally means coming again into a physical body. The individual soul takes again a mortal vehicle. The word 'transmigration' means passing from one plane to another-passing into a new body.

The doctrine of rebirth is a corollary to the law of Karma. The differences of disposition that are found between one individual and another must be due to one's respective past actions. Past action implies past birth. Further, all your Karmas cannot certainly bear fruit in this birth alone. Therefore, there must be another birth for enjoying the remaining actions. Each soul has a series of births and deaths.

Such births and deaths will continue till you attain knowledge of the Self.

You do not come into the world in total forgetfulness and in utter darkness. You are born with certain memories and habits acquired in the previous births. Desires take their origin from previous experiences. We find that none is born without desire. Every being is born with some desires, which are associated with the things enjoyed by him in the past life.

Such desire proves the existence of his soul in the previous lives.

Man contains within himself infinite possibilities. The magazine of power and wisdom is within him.

He has to unfold the Divinity within. This is the object of living and dying.

Hindu Sects

A foreigner is struck with astonishment when he hears about the diverse sects and creeds of Hinduism. But, these varieties are really an ornament to Hinduism. They, certainly, are not its defects.There are various types of mind and temperament. So, there should be various faiths also. This is but natural.

This is the cardinal tenet of Hinduism. There is room in Hinduism for all types of souls-from the highest to the lowest-for their growth and evolution.

Hinduism thus has studied all types of egos, mindsets, characters existing in any Human Being and has made such various types of provisions to guide all of them to the final goal of divinity - Moksha. Hinduism is NOT an unilateral text. It contains various sects and diversions according to different types of humans living in the whole world. Thus Hinduism - speaking in social sense, possesses the power of embracing - Unity in Diversity in the true sense.

The term Hinduism is most elastic

It includes a number of sects and cults, allied, but different in many important points. Hinduism has, within its fold, various schools of Vedanta, Saivism, Saktism, Vaishnavism, etc. It has various cults and creeds. It is more a league of religions than a single religion with a definite creed. It is a fellowship of faiths. It is a federation of philosophies. It accommodates all types of men and women. It prescribes spiritual food for everybody, according to his qualification and growth.

This is the beauty of this magnanimous religion. This is the glory of Hinduism.

Hence there is no conflict among the various cults and creeds.

Sanatan Dharmists, Arya Samajists, Deva Samajists, Jains, Sikhs and Brahmo Samjists are all Hindus. Despite all the difference of metaphysical doctrines, modes of religious discipline, and forms of ritualistic practices and social habits prevalent in the Hindu society, there is an essential uniformity in the conception of religion, and in the outlook on life and the world, among all sections of Hindus.

Glory of Hinduism

Muslim emperors ruled India for seven hundred years. The British ruled India for two hundred years. Some joined Islam through force. The Muslim emperors and the British were not able to convert the whole of India. The glory of Hinduism still persists. The culture of Hinduism still prevails. Nothing can shake its greatness and root.

Hinduism is neither asceticism nor illusionism, neither polytheism nor pantheism. It is a synthesis of all types of religious experiences. It is a whole and complete view of life. It is a complete Science. It is characterized by wide toleration, deep humanity and high spiritual purpose. It is free from fanaticism. That is the reason why it has survived the attacks of the followers of other religions of the world.

Hinduism is extremely liberal, tolerant and elastic

No religion is so very elastic and tolerant like Hinduism. Hinduism is very stern and rigid regarding the fundamentals. It is very elastic in readjusting to the externals and non-essentials. That is the reason why it has succeeded in living through millennia.

The foundation of Hinduism has been laid on the bedrock of spiritual truths. The entire structure of Hindu life is built on eternal truths, the findings of the Hindu Rishis or seers. That is the reason why this structure has lasted through times immemorial.

Hinduism stands unrivaled in the depth and grandeur of its philosophy. Its ethical teachings are lofty, unique and sublime. It is highly flexible and adapted to every human need.

It is not in need of anything from any other religion. No other religion has produced so many great saints, great patriots, great warriors, great Pativratas (chaste women devoted to their husbands). The more you know of the Hindu religion, the more you will honour and love it. The more you study it, the more it will enlighten you and satisfy your heart.

HINDUISM IS A PERFECT RELIGION BY ITSELF

COMPILED BY

VAIBHAV GUPTE