सोमवार, अगस्त 31, 2020

300 वर्ष आयु के श्री तैलंग स्वामी

 Koushal Mishra

300 वर्ष आयु के श्री तैलंग स्वामी :-

वाराणसी की गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है। गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं, वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएं हो रही थीं। आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।

पुलिस के आठ-दस जवानों ने पता लगाया, मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी जब कि घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी पर आखिर पकड़ना तो था ही वे आगे बढ़े। योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो। साथ ही वह कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों किसी से भी उन्हें भय न हो। मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता तो अनेक सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा तो भी उन्हें बालकों जैसी क्रीड़ा का आनन्द लेने का मन तो करता ही है यों कहिए आनंद की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है बाल सुलभ सरलता और क्रीड़ा द्वारा ऐसे ही आनंद के लिए “श्री तैलंग स्वामी” नामक योगी भी इच्छुक रहे हों तो क्या आश्चर्य ?

पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए ओर वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया। स्वामी जी गंगा में कूद गये पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं हाँ चारों तरफ से घेरा डाल दिया कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा- लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा-सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे अब अस्ताचलगामी हो चले किन्तु स्वामी जी प्रकट न हुए कहते हैं उन्होंने जल के अंदर ही समाधि ले ली। उसके लिये उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी और यह जन श्रुति थी कि तैलंग स्वामी पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगायें जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते नहीं देखा तथापि उनकी आयु 300 वर्ष की बताई जाती है। वाराणसी में घर-घर में तैलंग स्वामी की अद्भुत कहानियां आज भी प्रचलित हैं। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था। 300 पौंड वजन था उनका जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी। आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया इसीलिये वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गये इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातः काल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं, शक्ति तो आखिर शक्ति ही है संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा सम्पादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या। इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे और उस पार जा रही नाव के मल्ला को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े। लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे और जिस प्रकार मेढ़क मिट्टी के अंदर और उत्तराखण्ड के रीछ बर्फ के नीचे दबे बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे किन्तु यह क्या जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलित कर तैरता चला जाता है उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों । नाव उस पार नहीं पहुँच पाई स्वामी जी पहुँच गये। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा होगा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई तब तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। हनुमान जी ने मेघनाथ के सारे अस्त्र काट डाले किन्तु जब उसने ब्रह्म-पाश फेंका तो वे प्रसन्नता पूर्वक बँध गये। लगता है श्री तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की अवहेलना नहीं करना चाहते थे पर यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत चढ़-बढ़ कर है तभी तो वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस प्रकार चुपचाप ऐसे बैठे रहे मानों उनको कुछ पता ही न हो। हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई और हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर रात गहरी नींद सोया क्योंकि उसे स्वामी जी गिरफ्तारी मार्के की सफलता लग रही थी।

प्रस्तुत घटना “मिस्ट्रीज आँ इंडिया इट्स योगीज” नामक लुई-द-कार्टा लिखित पुस्तक से अधिकृत की जा रही है। कार्टा नामक फ्राँसीसी पर्यटक ने भारत में ऐसी विलक्षण बातों की सारे देश में घूम-घूम कर खोज की। प्रसिद्ध योगी स्वामी योगानंद ने भी उक्त घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “आटो बाई ग्राफी आँ योगी” के 31 वे परिच्छेद में किया है।

प्रातः काल ठंडी हवा बह रही थी थाने जी हवालात की तरफ की तरफ आगे बढ़े तो पसीने में डूब गया- जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायु सेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रखा थी। फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया ? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को खुला नहीं फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गये। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया चारों तरफ पहरा लगा और ताली लेकर थानेदार थाने में ही सोया। सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बेद ताला बाकायदा बंद। सन्तरी पहरा भी दे रहे उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे। थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

श्री तैलंग स्वामी के बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार जलते हुये तेज कड़ाहे में खौल रहे तेल में पानी के छींटे डाले जाएं तो तेल की ऊष्मा बनाकर पलक मारते दूर उड़ा देती है। उसी प्रकार विष खाते समय एक बार आँखें जैसी झपकती पर न जाने कैसी आग उनके भीतर थी कि विष का प्रभाव कुछ ही देर में पता नहीं चलता कहाँ चला गया। एक बार एक आदमी को शैतानी सूझी चूने के पानी को लेजाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा महात्मन् ! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ स्वामी जी उठाकर पी गये उस चूने के पानी को, और अभी कुछ ही क्षण हुये थे कि कराहने और चिल्लाने लगा वह आदमी जिसने चूने का पानी पिलाया था। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा याचना की तब कहीं पेट की जलन समाप्त हुई। उन्होंने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है यह तो न्यूटन का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य है। उसकी दिशा उलटी और ठीक क्रिया की ताकत कितनी होती है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र, प्राण उसकी ऊर्जा, ईंधन आवा शक्ति, मन इंजन और ड्राइवर चाहे जिस प्रकार के अद्भुत कार्य लिए जा सकते हैं इस शरीर से भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य योग विद्या, योग साधना में सन्निहित हैं जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते है...............अखण्ड ज्योति 
बृजेश कुमार श्रीवास्तव🙏🌺🙏🌺🙏

मुझे न स्वीडन से और न ही स्वीडिश नागरिकों के प्रति कोई सहानभूति हो रही है।

 

स्वीडन जल रहा है और 2020 कि भयानकता की श्रंखला में एक और कड़ी जुड़ गई है। आज स्वीडन में शरणार्थी बन कर आये मध्यपूर्व एशिया के शांतिदूत लोग ही स्वीडन को जला रहे है। हालांकि यह घटना दुःखदायक है लेकिन फिर भी मुझे न स्वीडन से और न ही स्वीडिश नागरिकों के प्रति कोई सहानभूति हो रही है।

यह जो हो रहा है, यह देर सबेर होना ही था और आगे यूरोप के वे सब राष्ट्र इसी तरह जलाए जाएंगे, जो बढ़ चढ़ कर हमे रोहंगिया मुस्लिम, जम्मू कश्मीर, शाहीनबाग़, सीएए इत्यादि पर मानवाधिकार का पाढ़ पढ़ाते है। इन राष्ट्रों ने मानवाधिकार का इतना पाढ़ पढ़ लिया है कि इन्होंने, अपने घर मे आग लगाने के लिए, दिल खोल कर, मध्यपूर्व एशिया से शरणार्थियों को अपने यहां आने दिया था।

सीरिया से लोग भाग रहे थे तब किसी भी मध्यपूर्व एशिया के मुस्लिम राष्ट्र ने इन मुसलमानों को अपने यहां नही घुसने दिया था, बल्कि उन्हें योरप की तरफ धकेल दिया था। उस वक्त योरप के लिबरल समाज व नेताओं ने अपने देश के उन लोगो का विरोध किया था जो इन शरणार्थियों को अपने देश मे शरण नही देना चाहते थे। उस वक्त इन लोगो ने यह नारा दिया कि ये इस्लामिक संस्कृति से आये मुस्लिम, खतरनाक नही है बल्कि वे स्वयं खतरे में है। योरप के लिबरल समाज ने उनका खुले ह्रदय से स्वागत किया था। आज यही शरणार्थी स्वीडन को जला कर स्वीडन के नमक का हक़ अदा कर रहे है।

स्वीडन में वही हुआ है जो भारत मे दिल्ली और बेंगलुरु में हुआ है। सबसे पहले मुस्लिम लड़को ने दो स्वीडिश लड़को का बलात्कार किया और उन्हें मरने के लिए गड्डे में फेंक दिया। जब वे पुलिस को मरणावस्था में मिले तो वहां के दक्षिणपंथियों मे इन मुस्लिम शरणार्थियों के प्रति आक्रोश उमड़ आया। इसी बीच एक अफवाह उड़ी की किसी ने आसमानी किताब को जला दिया है और इसी के साथ इन शरणार्थियों के धर्म खतरे में पड़ गया। ये लोग टिड्डी दल की तरह अपने अपने इलाकों से निकल पड़े और स्वीडन के शहर मलमो को आग के हवाले कर दिया।

यदि स्वीडन का नाम हटा दें तो इस घटना में और भारत मे दिल्ली और बेंगलुरु के दंगों में कोई अंतर नही है। यह शांतिदूतों का समुदाय, पहले घृष्टता करता है, उनको जब रोका जाता है तो उनका नेतृत्व एक ऐसी अफवाह को हवा देता है जो उनकी भावनाओं को आहत कर देता है और फिर पहले से तैयारी किये यह समुदाय, हर गैर मुस्लिम और उनकी संपत्ति को नष्ट कर देता है।

योरप कैसे इन शरणार्थियों से निपटेगा यह मेरी चिंता नही है लेकिन मेरी यह चिंता अवश्य है कि भारत मे आगामी महीनों में जब जगह जगह शांतिदूतों द्वारा दिल्ली, बेंगलुरु की पुनरावृत्ति की जाएगी, तब क्या हम उसका सामना करने को तैयार है?

मेरा यहां स्पष्ट मानना है कि भारत को सिर्फ सरकार या उसकी पुलिस के सहारे जलने से नही रोका जासकता है, इसके लिए शेष जनता को इन दंगाइयों का उनकी भाषा मे प्रतिकार करना होगा।

Mark My Words, India Is Inching Towards Great Fire. Manufacturing of Riots are in process. भारत के विभिन्न शहरों में शांतिदूत अपनी भावनाओं के आहत होने की प्रतीक्षा कर रहे है।

Pushker Awasthi

रविवार, अगस्त 30, 2020

क्या शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं?

क्या शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं?

हाँ १००% सच है!!

भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।

▪️ शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें।

▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।

▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।[1]

▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

▪️ ध्यान दें कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

▪️ जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।

▪️ आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गये हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडु का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79°E 41’54” Longitude की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

▪️ यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिवलिंगों को प्रतिष्टापित किया गया है।

जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है, 
आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है, 
हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है, 
पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम् में है और अतं में 
अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है!

वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

▪️ भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

▪️ इन मंदिरों का करीब पाँच हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं थी। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जानें।

▪️ केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं।आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, यह आज तक रहस्य ही है।

श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।
तिरुवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है। 
अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है। 
कंचिपुरम् के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और 
चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

▪️ अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच लिंगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीकी थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है। माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं। इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है। संभवतया यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हों जो 81.3119° E में पड़ता है!? उत्तर शिवजी ही जाने।

कमाल की बात है "महाकाल" से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच सम्बन्ध देखिये

उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी भी है रोचक-

▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी

▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी

▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी

हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था ।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले ।

और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।

🙏 हर हर महादेव 🙏

धन्यवाद 🙏

*स्त्रोत: वंदे मातृसंस्कृतम्*

2 हजार वर्ष पूर्व बना आधुनिक डैम आज भी सही सलामत है

 भारत में आज भी सही सलामत है विश्व का सबसे प्राचीन और आधुनिक डैम !

विश्व का सबसे प्राचीन बांध भारत में बना था.

…और इसे बनाने वाले भी भारतीय ही थे. सुनने में आपको थोड़ा अटपटा जरूर लग सकता है लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य है.

आज से करीब 2 हजार वर्ष पूर्व भारत में कावेरी नदी पर कल्लनई बांध का निमार्ण कराया गया था, जो आज भी न केवल सही सलामत है बल्कि सिंचाई का एक बहुत बड़ा साधन भी है.

भारत के इस गौरवशाली इतिहास को पहले अंग्रेज और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर लोगों से इस तथ्य को छुपाया.

दक्षिण भारत में कावेरी नदी पर बना यह कल्लनई बांध वर्तमान में तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में है. इसका निमार्ण चोल राजवंश के शासन काल में हुआ था.राज्य में पड़ने वाले सूखे और बाढ़ से निपटने के लिए कावेरी नदी को डायवर्ट कर बनाया गया यह बांध प्राचीन भारतीयों की इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है.

कल्लनई बांध को चोल शासक करिकाल ने बनवाया था.यह बांध करीब एक हजार फीट लंबा और 60 फीट चौड़ा है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस बांध में जिस तकनीक का उपयोग किया गया है वह वर्तमान विश्व की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसकी भारतीयों को आज से करीब 2 हजार वर्ष पहले ही जानकारी थी.

कावेरी नदी की जलधारा बहुत तीव्र गति से बहती है, जिससे बरसात के मौसम में यह डेल्टाई क्षेत्र में भयंकर बाढ़ से तबाही मचाती है.

पानी की तेज धार के कारण इस नदी पर किसी निर्माण या बांध का टिक पाना बहुत ही मुश्किल काम था. उस समय के भारतीय वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और और नदी की तेज धारा पर बांध बना दिया जो 2 हजार वर्ष बीत जाने के बाद आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है.

इस बांध को आप कभी देखेंगे तो पाएंगे यह जिग जैग आकार का है. यह जिग जैग आकार का इस लिए बनाया गया था ताकि पानी के तेज बहाव से बांध की दीवारों पर पड़ने वाली फोर्स को डायवर्ट कर उस पर दवाब को कम कर सके. देश ही नहीं दुनिया में बनने वाले सभी आधुनिक बांधों के लिए यह बांध आज प्रेरणा का स्रोत है.

यह कल्लनई बांध तमिलनाडू में सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत है.

आज भी इससे करीब 10 लाख एकड़ जमीन की सिंचाई होती है.

यदि आप भारत की इस अमूल्य तकनीकी विरासत कल्लनई बांध के दर्शन करना चाहते हैं तो आपको तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में आना होगा. मुख्यालय तिरूचिरापल्ली से इसकी दूरी महज 19 किलोमीटर है.


अजमेर शरीफ चिश्ती दरगाह बलात्कार काण्ड

 

अजमेर शरीफ चिश्ती दरगाह बलात्कार काण्ड
देश का सबसे बड़ा बलात्कार कांड का घिनोना सच जिसका कोर्ट ने फैसला अब सुनाया।

सन् 1992 लगभग 25 साल पहले सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप जिन्हें लव जिहाद/प्रेमजाल में फंसा कर, न केवल सामूहिक बलात्कार किया बल्कि एक लड़की का रेप कर उसकी फ्रेंड/भाभी/बहन आदि को लाने को कहा, एक पूरा रेप चेन सिस्टम बनाया, जिसमें पीड़ितों की न्यूड तस्वीरें लेकर उन्हें ब्लैकमेल करके यौन शोषण किया जाता रहा !

फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती, इस बलात्कार रेप कांड के मुख्य आरोपी थे, तीनों अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के खादिम (केयरटेकर) के रिश्तेदार/वंशज तथा कांग्रेस यूथ लीडर भी ! फारूक चिश्ती ने सोफिया गर्ल्स स्कूल की 1 हिन्दू लड़की को प्रेमजाल में फंसा कर एक दिन फार्म हाउस पर ले जा कर सामूहिक बलात्कार करके, उसकी न्यूड तस्वीरें लीं और तस्वीरो से ब्लैकमेल कर उस लड़की की सहेलियों को भी लाने को कहा, एक के बाद एक लड़की के साथ पहले वाली लड़की की तरह फार्म हाउस पर ले जाना बलात्कार करना न्यूड तस्वीरें लेना, ब्लैकमेल कर उसकी भी बहन/सहेलियों को फार्म हाउस पर लाने को कहना और उन लड़कियों के साथ भी यही घृणित कृत्य करना इस चेन सिस्टम में लगभग 250 से ज्यादा लडकियों के साथ भी वही शर्मनाक कृत्य किया !
उस जमाने में आज की तरह डिजिटल कैमरे नही थे। रील वाले थे। रील धुलने जिस स्टूडियो में गयी वह भी चिश्ती के दोस्त और मुसलमान समुदाय का ही था। उसने भी एक्स्ट्रा कॉपी निकाल लड़कियों का शोषण किया। ये भी कहा जाता है कि स्कूल की इन लड़कियों के साथ रेप करने में नेता, सरकारी अधिकारी भी शामिल थे ! आगे चलकर ब्लैकमैलिंग में और भी लोग जुड़ते गये । आखिरी में कुल 18 ब्लैकमेलर्स हो गये। बलात्कार करने वाले इनसे तीन गुने। इन लोगों में लैब के मालिक के साथ-साथ नेगटिव से फोटोज डेवेलप करने वाला टेकनिशियन भी था । यह ब्लैकमेलर्स स्वयं तो बलात्कार करते ही, अपने नजदीकी अन्य लोगों को भी "ओब्लाइज" करते इसका खुलासा हुआ तो हंगामा हो गया । इसे भारत का अब तक का सबसे बडा सेक्स स्कैंडल माना गया । इस केस ने बड़ी-बड़ी कोंट्रोवर्सीज की आग को हवा दी । जो भी लड़ने के लिए आगे आता, उसे धमका कर बैठा दिया जाता । अधिकारियों ने , कम्युनल टेंशन न हो जाये, इसका हवाला दे कर आरोपियों को बचाया। अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम(केयरटेकर) चिश्ती परिवार का खौफ इतना था, जिन लड़कियों की फोटोज खींची गई थीं, उनमें से कईयों ने सुसाइड कर लिया । एक समय अंतराल में 6-7 लड़कियां ने आत्महत्या की । न सोसाइटी आगे आ रही थी, न उनके परिवार वाले। उस समय की 'मोमबत्ती गैंग' भी लड़कियों की बजाय आरोपियों को सपोर्ट कर रही थी । डिप्रेस्ड होकर इन लड़कियों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया । एक ही स्कूल की लड़कियों का एक साथ सुसाइड करना अजीब सा था।

सब लड़कियां नाबालिग और 10वी, 12वी में पढने वाली मासूम किशोरियां । आश्चर्य की बात यह कि रेप की गई लड़कियों में आईएएस, आईपीएस की बेटियां भी थीं। ये सब किया गया अश्लील फोटो खींच कर। पहले एक लड़की, फिर दूसरी और ऐसे द्वारा लूटी जा रही थी तब वे कहाँ थे ? किसकी मन्नत पूरी कर रहे थे ? ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मन्नतें मांगने वालों को विचार करना चाहिए कि कहीं वे वहां जा कर पाप तो नहीं कर रहे ?

वन्दे मातरम्...🚩 #साभार

हम इसको मृत्यु भोज ना कहें इसको पगड़ी रस्म या तेरी मी कहे यही हमारा सनातन धर्म है

 वर्तमान समय में तथाकथित स्वयंभू बुद्धिजीवी सनातन हिंदू परंपराओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर इन्हें सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक सिद्ध करने में लगे रहते हैं इन परंपराओं को ढोंग ढकोसला बताकर अंधविश्वास का बड़ा कारण बताते हैं लेकिन यही लोग अन्य धर्म जैसे इस्लाम ईसाई के रीति-रिवाजों पर कुछ नहीं बोलते । ऐसी ही एक हिंदू सनातन धर्म की धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा मृत्युभोज है जिसे कुरीति के रूप में प्रचारित किया गया है लेकिन यह कुरीति नहीं है. समाज और रिश्तों को सँगठित करने के अवसर की पवित्र परम्परा है. हमारे पूर्वज हमसे ज्यादा ज्ञानी थे. आज मृत्युभोज का विरोध है, कल विवाह भोज का भी विरोध होगा, होली मत खेलो पानी व्यर्थ बहेगा, पटाखे मत जलाओ प्रदूषण फैलेगा, हर उस सनातन परंपरा का विरोध होगा जिससे रिश्ते और समाज मजबूत होता है. इसका विरोध करने वाले ज्ञानियों हमारे बाप-दादाओ ने रिश्तों को जिंदा रखने के लिए ये परम्पराएं बनाई हैं. ये सब बंद हो गए तो रिश्तेदारों, सगे संबंधियों, शुभचिंतकों को एक जगह एकत्रित कर मेल-जोल का दूसरा माध्यम क्या है? पहले जो दुःख में शामिल होते थे दूर-दूर से बैलगाड़ी जैसे साधनों से आते थे तब कोई होटल आदि खाने-पीने के साधन नहीं थे, तब भोजन आदि व्यवस्था उनके लिए कौन करेगा? आज भी सगे रिश्तेदार क्या दूसरों के यहाँ भोजन करेंगे? दुख की घड़ी में भी रिश्तों को कैसे प्रगाढ़ किया जाये ये हमारे पूर्वज अच्छे से जानते थे. हमारे बाप-दादा बहुत समझदार थे. वो ऐसे आयोजन रिश्तों को सहेजने और जिंदा रखने के किए करते थे. हाँ ये सही है की कुछ लोगों ने मृत्युभोज को हेकड़ी और शान-शौकत दिखाने का माध्यम बना लिया, कुछ समाजों में तो इसे अनिवार्य कर सामाजिक प्रतिष्ठा का मान बिंदु बना दिया गया मृत्यु भोज संपूर्ण समाज गांव के निवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया आप पूड़ी सब्जी ही खिलाओ. कौन कहता है की 56 भोग परोसो. कौन कहता है कि 4/5 हजार लोगों को ही भोजन कराओ और दम्भ दिखाओ। परम्परा तो केवल सगे संबंधियों व यह कर्मकांड करवाने वाले ब्राह्मण को भोजन करवाने की थी। अगर आप की आर्थिक शक्ति मजबूत है तो पास पड़ोस के लोगों भी इसमें निमंत्रित किया जाता था क्योंकि यही वह लोग थे जिन्होंने ऐसे दुखद समय में दुखी परिवार की तन मन और धन से सहायता की थी उनके इस कार्य के प्रति सम्मान को दर्शाने के रूप में उन्हें भोजन पर निमंत्रित करना यह एक परंपरा बन गई थी। जिस घर में मृत्यु हुई है वह उसके दुख में दुखी हैं अर्थात उनका मुंह कड़वा है इसलिए इस मृत्यु भोज में मीठा बनाकर उस कड़वे मुख मीठा करना अर्थात उस दुख को भूल कर फिर से सामान्य जीवन जीना यह उसका निहितार्थ था। सामान्य तौर पर मृत्यु का कारण व्याधि, बीमारी या संक्रमण होता था, इसलिए जिस घर में मृत्यु होती थी वहां रसोई नहीं की जाती थी कुछ दिनों तक (३,५,१० या १३ दिन)।

इस दौरान पड़ोसी, मित्र और अन्य परिजन भोजन की व्यवस्था करते थे। (आज भी होता है)
दशगात्र या तेरहवीं के बाद जब रसोई खुलती थी तब कृतज्ञता स्वरूप सभी संबंधियों, मित्रों और पड़ोसियों को भोजन पर बुलाया जाता था।
इस भोज में दिवंगत आत्मा की पसंद के पकवान बनाए जाने का भी रिवाज है। इस प्रकार उस व्यक्ति को स्मरण करते हुए सामान्य जीवन की शुरुआत होती थी जिसे आज प्रार्थना सभा भी कहते हैं। और ये सब स्वेच्छा और क्षमता के अनुसार होता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। यह कोई ढोंग ढकोसला नहीं था । ऐसी अनेक परंपराएं जो हमारे जीवन के पारिवारिक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक ताने-बाने को समृद्ध करती थी परी पुष्ट करती थी एसी अपनी उन परंपराओं का कट्टर समर्थक हूँ, जिनसे आपसी प्रेम, मेल-जोल और भाईचारा बढ़ता हो. कुछ कुतर्कों की वजह से हमारे बाप-दादाओं ने जो रिश्ते सहजने की परंपरा दी उसे मत छोड़ो, यही वो परम्पराएँ हैं जो दूर-दूर के रिश्ते-नाते को एक जगह लाकर फिर से समय-समय पर जान डालते हैं. सुधारना हो तो लोगों को सुधारो जो आयोजन रिश्तों की बजाय हेकड़ी दिखाने के लिए करते हैं. किसी परंपरा की कुछ विधियां यदि समय सम्मत नहीं हैं तो उसका सुधार किया जाये ना की उस परंपरा को ही बंद कर दिया जाये. हमारे बाप-दादा जो परम्पराएं देकर गए हैं रिश्ते सहेजने के लिए दे गये हैं. उसको बन्द करने का ज्ञान मत बाँटिये, वरना तरस जाओगे मेल-जोल को, बंद बिल्कुल मत करो, समय-समय पर शुभचिंतकों ओर रिश्तेदारों को एक जगह एकत्रित होने की परम्परा जारी रखो. ये संजीवनी है रिश्ते नातों को जिन्दा करने की। इसलिए इन परंपराओं के मूल कारणों को समझो समय अनुसार उन्हें बदलाव करना है तो बदलाव कर लो क्योंकि जो बातें प्राचीन समय में सही थी वह इस वर्तमान समय में सही हो यह आवश्यक नहीं है इसलिए समय अनुकूल बदलाव कर उन्हें जारी रखना हमारा परम कर्तव्य है।

Comment
सनातन धर्म में मृत्यु भोज की होता ही नहीं है मृत्यु भोज नाम की चर्चा ना वेदों में है ना उपनिषद में है सनातन सनातन परंपरा में मृत्यु के 13 में दिन पगड़ी रस्म अवश्य होती है और परिवार के लोग दसमा करते हैं पगड़ी रस्म इसलिए की जाती है जिस घर में मृत्यु होती है वह परिवार शोकाकुल रहता है उसको कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें क्या ना करें इसलिए शोक में शामिल होने के लिए रिश्तेदार आते हैं और गांव के लोगों को भी बुलाया जाता है पगड़ी वाले दिन उस घर के मुखिया को जो मरने वाले व्यक्ति का स्थान लेता है उसको पगड़ी पहनाई जाती है कि आज से तुम इस घर के मुखिया हुए क्योंकि रिश्तेदार बाहर से आते हैं उनके खाने-पीने की व्यवस्था करना पड़ेगी और पंडित जी को बुलाया जाता है सनातन धर्म के अनुसार वैदिक रीति से सभी कार्य कराए जाते हैं इसमें मृत्यु भोज का कहीं भी विधान नहीं है क्योंकि लोग बाहर से आते हैं पहले गाड़ी बसें चलती नहीं थी इसलिए मजबूरी में सबको रुकना पड़ता था और उस परिवार को उनके खाने-पीने की व्यवस्थाएं करना पड़ती थी इसे पकड़ी रस्म में कहते हैं या फिर तेरवा कहते है और संसार के सभी धर्मों में यह व्यवस्थाएं हैं मुसलमानों में 40 में दिन होते हैं इसी प्रकार ईसाइयों में भी यही सब होता है इसलिए हम इसको मृत्यु भोज ना कहें इसको पगड़ी रस्म या तेरी मी कहे यही हमारा सनातन धर्म है जय श्री कृष्णा जय श्री राम वंदे मातरम