बुधवार, जुलाई 31, 2013

1752 का एक दिलचस्प इतिहास.


ज्ञान
http://www.timeanddate.com/calendar/?year=1752&country=1
1752 का एक दिलचस्प इतिहास.
यहाँ एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य है.
सितंबर 1752 के महीने के कैलेंडर पर एक नजर डालें आप देखेंगे की महीने में से 11 दिन कम हैं

आइए हम आपको बताते ये कैसे हैं
यह वह महीना है जब इंग्लेंड रोमन जूलियन कैलेंडर से जॉर्जियन कैलेंडर में स्थानांतरित हुआ
जूलियन कॅलंडर जॉर्जियन कॅलंडर से 11 दिन ज़्यादा था , तब इंग्लेंड के राजा ने आदेश दिया की सितंबर महीने मे से 11 दिन कम कर दिए जाएँ और जो की आदेश का पालन हुआ और सितंबर महीने मे से 11 दिन कम कर दिए गये , जिसकी वजह से कर्मचारी भी 11 दिन के लिए काम कम किए लेकिन उनका भुगतान पूरा दिया गया ..........

यही कारण है कि "पेड लीव 'की अवधारणा का जन्म हुआ है. इंग्लेंड के राजा की जय हो!...........
रोमन जूलियन कैलेंडर में अप्रैल को वर्ष का प्रथम महीना माना जाता है जबकि जॉर्जियन कैलेंडर मे जनवरी महीना प्रथम माना जाता है लेकिन जब राजा ने देखा की जॉर्जियन कैलेंडर के स्थांतरित करने के बाद भी लोग जूलियन कैलेंडर के मुताबिक एप्रिल महीना ही प्रथम महीना मान रहें है तो राजा ने एप्रिल महीने की 1 तारीख को मूर्ख दिवस घोसित कर दिया जिसे आज हम फूल डे कहते हैं

तब से 1 अप्रैल, अप्रैल मूर्ख दिवस बन गया. इतिहास वास्तव में बहोत दिलचस्प है
http://www.timeanddate.com/calendar/?year=1752&country=1

नमो नमो ********* जय भैरवनाथ*********.

सोनिया गाँधी उर्फ़ ANTONIA MAINO का भारत को बर्बाद करने का षड्यंत्र

सोनिया गाँधी उर्फ़ ANTONIA MAINO का भारत को बर्बाद करने का षड्यंत्र जिसमे उसकी बहनें भी शामिल जरुर पढ़ें और शेयर करें !

सीबीआई ने सोनिया गाँधी के बहन के खिलाफ भारतीय पुरात्व और दुर्लभ चीजों की तस्करी के केस दर्ज किया था . लेकिन जाँच करने वाले चार अधिकारियो का या तो डिमोशन कर दिया गया या उन्हें हटा दिया गया

CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION
SPE/SIU (XII)
NEW DELHI
_________________________________
1. PROGRESS REPORT NO. : 1
AND DATE. : 23.02.1993

2. CASE NO. AND DATE : RC.1/93-SIU(XII)
OF REGISTRATION : Dt.08.07.1993

3. NAME OF THE ACCUSED : M/s . Southern Arts,
Exporters of Indian Handicrafts
10-D, First East Main Road,
Shenoy Nagar,
Madras and Unknown Others.

4. OFFENCES : U/s 120-B IPC and Sec.25 (1)
r/w Sec.3(1) of Antiquities and
Art Treasures Act, 1972

5. NAME OF THE IO. : Shri Hari Kumar, Inspr/SIU.
6. NO. OF WITNESSES :
EXAMINED

That, M/s. Southern Arts, Exporters of Indian Handicrafts, 10-D, First Main Road, Shenoy Nagar, Madras, exported 34 items from the port of Madras to Mr. Guide Zanderige Via 24 Maggie 437126 Verona, Italy, in connivance with the officials of Customs of Madras, Illegally against the provisions of the Antiquities & Art Treasures Act, 1972. On inspection of the aforesaid 34 items by Dr. C. Margbandhu, Director (Exploration), ASI, New Delhi at Pisa, Italy at the instance of Department of Culture, Ministry of Human Resources Development, New Delhi, 19 items were found to be “Antiquity”. In view of above, the instant case was registered against the Exporter (and unknown others).

9. DEVELOPMENTS:-

During the fortnight under review, the IO Submitt plan of Action in the case. A copy of the same is enclosed herewith. Special Look-out notices have also been sent to NCRB/New Delhi and to the Director General of Police of Southern States along with the photocopies of photographs of the items, which are lying presently at Pisa, Italy with the Customs Authorities, requesting them to check their records under their jurisdiction with a view to find out, if any report regarding the theft of any the item, is reputed, to them. Interpol/CBI/New Delhi has been requested to move to IP/Rome for the seizure of the consignment, in question, lying with Customs authorities in Pisa, Italy and restitution of the same to India thereafter. The matter has also been reported to Secretary, Department of Culture, Ministry of Human Resources & Development, Shastri Bhavan, New Delhi so that they may inform to the Embassy of India at Rome, Italy, for necessary direction to Customs Authorities in Pisa, Italy, for not releasing the consignment to the Importer. The IO has proceeded to Madras in connection with the investigation of this case and the progress shall be reported to HO on his return.

10. CD (S) NO. & DATE (S) : C.D. No.1 dated .07.1993
ON WHICH PR BASED : C.D. No.1 dated .07.1993
C.D. No.1 dated .07.1993
C.D. No.1 dated .07.1993
11. PENDING ACTION : A detailed Plan of Action
Submitted by the IO, is
Enclosed herewith.
DETAILED PLAN OF ACTION SUBMITTED IN CASE RC.1/93-SIU(XII) FOR PERUSAL.
_______
1. To take immediate steps for retrieval of the case property from Italy by moving the Interpol as well as Indian Embassy in Rome.
2. To send reference to Interpol for conducting part investigation in Italy regarding the examination of the Importer.





इटली मे सोनिया गाँधी के जन्म स्थान अल्ब्सनो मे स्थित उसकी बहन के स्टोर "गणपति " का बिजनस कार्ड .. इस स्टोर मे भारत से स्मगलिंग करके बहुमूल्य चीजे बेचीं जाती है


इटली मे सोनिया गाँधी के जन्म स्थान अल्ब्सनो मे स्थित उसकी बहन के स्टोर "गणपति " का बिजनस कार्ड .. इस स्टोर मे भारत से स्मगलिंग करके बहुमूल्य चीजे बेचीं जाती है

अब सोनिया गाँधी का इससे भी बड़ा फ्राड क्या हों सकता है ? इसने 1983 मे भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन दिया फिर इसका नाम 1980 के वोटर लिस्ट मे कैसे शामिल हों गया ?

देखिये कितनी झूठी है ये सोनिया . आज ये आपने आपको भारतीय बताती है लेकिन आज भी ये इटली की नागरिकता के लिए हर 10 साल मे आवेदन देती है ..और ये अपना असली नाम हम भारतियो से छुपाती है .

ये फोटो सोनिया गाँधी के बहन के स्टोर का है जिसमे भारतीय बहुमूल्य मुर्तिया बेचीं जा रही है

मित्रों सोनिया गाँधी और उसके पूरे खानदान के काले कारनामो को जानने के लिए इटली के जाने माने पत्रकार जोविय्र मोरो की लिखी किताब द अल सारी रोजो " द रेड साडी " जरुर पढे .. भारत मे ये किताब प्रतिबंधित है लेकिन आप इसे पोस्ट से इटली से मंगा सकते है . http://www.scribd.com/doc/32475652/The-Red-Sari

अब कुछ इस तरह से होगा कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र

इस झूठी महिला सोनिया ने लोकसभा सचिवालय को अपने बारे मे बताया था कि वो केम्ब्रिज से ग्रेजुएट है !! इसके पूरे खानदान मे पहले किसी ने केम्ब्रिज मे झाड़ू पोता तक नहीं किया होगा .. इसकी पोल तो खुद केम्ब्रिज ने खोल दी !! ये खानदान अब तक सिर्फ झूठ के बुनियाद पर ही भारत मे है !

ये गाँधी खानदान असल मे विदेशी ताकतों का जासूस है जो धीरे धीरे इस देश को खोखला करना चाहता है .. ये रिपोर्ट किसी मामूली अखबार मे नहीं छपा है बल्कि "द हिंदू " मे छपा है

देखिये इस मक्कार और महा झूठी महिला ने लोकसभा को अपने बारे मे तमाम झूठी बाते बताई थी .. लेकिन एक कहावत है ना कि सियारिन ज्यादा देर तक शेरनी के खाल मे नहीं छुप सकती > https://www.facebook.com/photo.php?fbid=336853626341943&set=a.139450329415608.21011.100000519267347&type=1&theater
ये है मोड्स ओप्रेन्डिंग सोनिया गाँधी के कुकर्मो का !
साभार :- Rameshwar Arya

रविवार, जुलाई 21, 2013

नासा ने माना, अंतरिक्ष में केवल संस्कृत की ही चलती है

नासा ने माना, अंतरिक्ष में केवल संस्कृत की ही चलती है

नई दिल्ली। आजकल हर तरफ अंग्रेजी का बोलबाला है। विज्ञान से लेकर कार्यालयी भाषा के रूप में अपनी जगह बना चुकी अंग्रेजी अब वक्त की जरूरत बन चुकी है। लेकिन अगर हम कहें कि इस जरूरत की भी अपनी कुछ कमजोरियां हैं। जिनका निदान केवल संस्कृत के पास है, तो निश्चित तौर पर आप पूछेंगे कैसे? वह ऐसे कि देवताओं की भाषा संस्कृत अंतरिक्ष में कोई भी मैसेज भेजने के लिए सबसे उपयोगी भाषा के रूप में सामने आई है।space
नासा के वैज्ञानिकों की मानें तो जब वह स्पेस ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे तो उनके वाक्य उलटे हो जाते थे। इस वजह से मेसेज का अर्थ ही बदल जाता था। उन्होंने दुनिया के कई भाषा में प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या आई। आखिर में उन्होंने संस्कृत में मेसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उलटे हो जाने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते हैं। यह रोचक जानकारी हाल ही में एक समारोह में दिल्ली सरकार के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के निदेशक डॉ. जीतराम भट्ट ने दी।
दिल्ली सरकार की संस्कृत अकादमी ने दिल्ली के करोलबाग, मयूर विहार और गौतम नगर में लोगों को संस्कृत सिखाने के उद्देश्य से तीन शिक्षालयों के उद्धाटन के अवसर पर यह समारोह आयोजित किया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए स्वामी प्रणवानन्द महाराज ने कहा कि संस्कृत में सभी प्रकार के उपयोगी विषय हैं, जरूरत उनके प्रसार की है। समारोह में अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और व्यवसायी भी उपस्थित थे।
http://www.republichind.com/?p=4070#.UeuJepmvQ4w.facebook


नया अविष्कार

वेद ज्ञान को आधार मान कर न्यूलैंड के एक वैज्ञानिक स्टेन क्रो ने एक डिवाइस विकसित कर लिया। ध्वनि पर आधारित इस डिवाइस से मोबाइल की बैटरी चार्ज हो जाती है। इस बिजली की आवश्यकता नहीं होती है।
भारत के वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक ओमप्रकाश पांडे ने वेदों में निहित ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए दैनिक भास्कर प्रतिनिधि से बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस डिवाइस का नाम भी ओम डिवाइस रखा गया है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत को अपौरुष भाषा इसलिए कहा जाता है कि इसकी रचना ब्रह्मांड की ध्वनियों से हुई है।
उन्होंने बताया कि गति सर्वत्र है। चाहे वस्तु स्थिर हो या गतिमान। गति होगी तो ध्वनि निकलेगी। ध्वनि होगी तो शब्द निकलेगा। सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारों और से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती है तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।

उन्होंने बताया कि ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को नासा ने भी माना है। इसलिए यह बात साबित होती है कि वैदिक काल में ब्रह्मांड में होने वाली ध्वनियों का ज्ञान ऋषियों को था।

सनातन परमो धर्मा 

 

शनिवार, जुलाई 20, 2013

ब्राह्मणों से मिलते हैं मुसलमानों के जीन्‍स, यूपी में रिसर्च से हुआ खुलासा!

लखनऊ. कभी मंदिर कभी मस्जिद, कभी आरक्षण  कभी शिक्षा, तो कभी सरकार की सहूलियतों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां हिन्‍दू और मुसलमानों को अलग-अलग करने की कोशिश करती रहती हैं। लेकिन सच यह है कि हिन्‍दू और मुसलमान आपस में भाई-भाई ही हैं। उनके खून का रंग ही नहीं बल्कि उनके जीन्‍स भी एक जैसे हैं।
 
लखनऊ के एसजीपीजीआई के वैज्ञानिकों ने फ्लोरिडा और स्‍पेन के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किए गए अनुवांशिकी शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। शोध लखनऊ, रामपुर, बरेली और कानपुर जैसे शहरों के करीब 2400 मुसलमानों और हिंदुओं पर किया गया था। वैज्ञानिक इस शोध को चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य की दिशा में बड़ी सफ़लता मान रहे हैं। 
 
इस शोध के बाद चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी तमाम बीमारियों के इलाज को लेकर रिसर्च शुरू हो गई है। वहीं सामाजिक तौर पर बात करें तो इस शोध का व्‍यापक असर लगातार सांप्रदायिक दंगों से जूझ रहे यूपी पर भी पड़ने की उम्‍मीद की जा रही है।
 
अमेरिका की फ्लोरिडा अंतरराष्‍ट्रीय यूनिवर्सिटी के डिर्पाटमेंट ऑफ बायोलॉजिकल साइंस के डॉ. मारिया सी टेरेरोस, डेयान रोवाल्ड, रेने जे हेरेरा, स्‍पेन की यूनिवर्सिटी डि विगो के डिपार्टमेंट ऑफ जेनटिक्स के डॉ.ज़ेवियर आर ल्यूस और लखनऊ स्थित संजय गांधी पीजीआई के अनुवांशिकी रोग विभाग की प्रोफ़ेसर सुरक्षा अग्रवाल और डॉ. फैज़ल खान ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के जीन पर लंबे शोध के बाद यह निष्‍कर्ष निकाला है। 
इनके शोध को अमेरिकन जर्नल ऑफ़ फिजिकल एंथ्रोपॉलॉजी ने भी स्वीकार किया है। प्रोफ़ेसर सुरक्षा अग्रवाल बताती हैं कि रिसर्च शुरू करने से पहले
उन्‍होंने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही एसजीपीजीआई से नीतिगत सहमति हासिल की। इसके बाद उन्होंने उत्‍तर प्रदेश के विभिन्‍न जिलों में रहने वाले मुस्लिम परिवारों का एक डेटा बेस तैयार किया। उसे एक्‍सेल शीट पर लिस्‍टेड किया गया। इसके बाद स्‍टेटिस्टिकल टेबल के माध्‍यम से रैडमली नामों और जानकारियों को सेलेक्‍ट किया गया।
इसके बाद टीम ने सेलेक्‍ट किए गए लोगों से मुलाकात की। उनके साथ इंटरव्‍यू किया। साथ ही उन्‍हें इस रिसर्च के बारे में पूरी जानकारी दी गई। उन्‍हें बताया गया कि इस रिसर्च से उन्‍हें कोई फायदा नहीं होगा। लेकिन मेडिकल की दुनिया में आगे के रास्‍ते ज़रूर खुल सकते हैं। इसके बाद उनकी सहमति होने के बाद ब्‍लड सैंपल्‍स इकट्ठा किए और उनमें से डीएनए अलग किए गए।
रिसर्च में पता चला कि प्रदेश के शिया और सुन्नी मुसलमान और हिंदुओं के जीन में कोई अंतर नहीं है। इतना ही नहीं विज्ञानियों ने तुलनात्मक अध्ययन में भारतीय हिंदुओं, अरब देशों, सेंट्रल एशिया, नॉर्थ ईस्ट अफ्रीकी देशों के मुसलमानों के जीन के बीच भी किया तो पाया कि भारतीय मुसलमानों के जीन
भारतीय हिंदुओं से पूरी तरह मेल खाते हैं। इनके जीन विदेशी मुसलमानों से मेल ही नहीं खाते।
 चूंकि ये सैंपल उत्‍तर प्रदेश के ही मुस्लिमों के लिए गए, इसलिए यह साफ़ हो गया कि भारतीय खास तौर पर प्रदेश के मुसलमान की जड़े यहीं है। किसी दूसरे मुल्क से में नहीं।
इसके अलावा हिन्‍दुओं में ब्राह्मण, कायस्थ, खत्री, वैश्य और अनसूचित जाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों के जीन का तुलनात्मक अध्ययन किया गया तो पाया इन सभी जातियों के जीन आपस में एक होने के साथ ही मुसलमानों के जीन से भी मिलते हैं। 
 
शोध में यह भी पता चला कि शिया मुस्लिमों के और सुन्‍नी मुसलमानों के डीएनए में भिन्‍नताएं हैं, लेकिन इससे यह साबित नहीं हो सका कि इनका संबंध देश से बाहर के किसी मुसलमान से हैं।
इस रिसर्च के आधार पर किसी बीमारी या इलाज को लेकर शोध होने के सवाल पर प्रोफ़ेसर सुरक्षा कहती हैं कि उन लोगों का लक्ष्‍य जीन्‍स के रिलेशन का  पता लगाना था। वह इस रिसर्च में पता चल गया। ज़ाहिर है कि रिसर्च पूरी तरह से कम्‍प्‍लीट हो गई और काम हो गया। इसके बाद कई लोग इस रिपोर्ट के आगे भी रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन फि‍लहाल वह इसमें शामिल नहीं हैं।
http://www.bhaskar.com/article-ht/UP-LUCK-genes-of-up-muslims-match-with-hindus-4325730-PHO.html?seq=1

अफ्रीका में 6 हजार वर्ष पूर्व प्रचलित था हिंदू धर्म

भगवान शिव कहां नहीं हैं? कहते हैं कण-कण में हैं शिव, कंकर-कंकर में हैं भगवान शंकर। कैलाश में शिव और काशी में भी शिव और अब अफ्रीका में शिव। साउथ अफ्रीका में भी शिव की मूर्ति का पाया जाना इस बात का सबूत है कि आज से 6 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीकी लोग भी हिंदू धर्म का पालन करते थे।

साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा में पुरातत्वविदों को महादेव की 6 हजार वर्ष पुरानी शिवलिंग की मूर्ति मिली जिसे कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता हैरान हैं कि यह शिवलिंग यहां अभी तक सुरक्षित कैसे रहा।हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची शिवशक्ति की प्रतिमा का अनावरण दक्षिण अफ्रीका में किया गया। इस प्रतिमा में भगवान शिव और उनकी शक्ति अर्धांगिनी पार्वती भी हैं। बेनोनी शहर के एकटोनविले में यह प्रतिमा स्थापित की गई। हिन्दुओं के आराध्य शिव की प्रतिमा में आधी आकृति शिव और आधी आकृति मां शक्ति की है।

10 कलाकारों ने 10 महीने की कड़ी मेहनत के बाद इस प्रतिमा को तैयार किया है। ये कलाकार भारत से आए थे। इस 20 मीटर ऊंची प्रतिमा को बनाने में 90 टन के करीब स्टील का इस्तेमाल हुआ है।


http://hindi.webdunia.com/religion-sanatandharma-history/%E0%A4%85%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-6-%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%82-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-1130720004_1.htm

गुरुवार, जुलाई 18, 2013

प्रधानमंत्री राहत कोष एक प्राइवेट संस्था है जिसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है

#‎PMO‬ प्रधानमंत्री राहत कोष दरअसल एक प्राइवेट संस्था है. देश में कोई भी सरकार हो, कांग्रेस का अध्यक्ष इसकी मैनेजिंग कमेटी का मेंबर होगा. ऐसा नियम 1948 में बनाया गया था. इस फंड से किसे पैसा मिला और क्यों, इस बारे में आप तो क्या, संसद भी सवाल नहीं पूछ सकती. भारत की सबसे बड़ी न्यूज मैगजीन 'इंडिया टुडे' का सनसनीखेज खुलासा...
नन्हे तीन वर्षीय रिषु और उसकी मां संगीता को उसके पिता ने घर से बाहर निकाल दिया था क्योंकि रिषु के दिल में सुराख था. संगीता बचपन में ही अपने मां-बाप को खो चुकी थी. सो, मजबूरन मां-बेटे ने लखनऊ के एक छोटे से मस्जिद में शरण ली. तब सपा सांसद अखिलेश यादव (अब मुख्यमंत्री) ने रिषु के इलाज के खर्च के लिए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी. जिसके बाद प्रधानमंत्री राहत कोष से 50,000 रुपये की सहायता जारी की गई. लेकिन हार्ट सर्जरी के लिए रिषु को पीएम राहत कोष से मिली मामूली सहायता की खबर आरटीआइ एक्टिविस्ट अजय कुमार गोयल के दिल को छलनी कर गई. आखिर पीएमओ ने किस आधार पर मामूली राशि मंजूर की? निर्णय के लिए क्या तरीका अपनाया गया? अगर पीएमओ ने रिषु के परिवार को गरीब माना तो उसे इलाज के लिए उन अस्पतालों में क्यों नहीं भेजा जहां गरीबों का मुफ्त इलाज करना अस्पतालों की कानूनी बाध्यता है?
जेहन में घुमड़ते सवालों को गोयल ने फौरन आरटीआइ आवेदन की शक्ल दी और रिषु को मिली मामूली मदद का आधार जानने के लिए फौरन प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत फाइल दिखाने की मांग की. लेकिन पीएमओ ने इसे थर्ड पार्टी मामला और रिषु की निजता में दखल करार देते हुए आरटीआइ कानून की धारा 8(1) के तहत फाइल दिखाने से इनकार कर दिया. इस धारा के तहत किसी व्यक्ति से जुड़ी निजी सूचना नहीं दी जा सकती. लेकिन गोयल कहते हैं, 'जब रिषु को मिली मदद की खबर सार्वजनिक हो चुकी थी, तो यह थर्ड पार्टी मामला कैसे है?'
यह मामला केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा, लेकिन गोयल का आरोप है, 'तत्कालीन केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने मेरिट पर फैसला नहीं दिया था, क्योंकि वे खुद पीएमओ में संयुक्त सचिव रह चुके हैं.' लेकिन इंडिया टुडे से बातचीत में हबीबुल्ला उदाहरण देते हुए कहते हैं, 'अभी उत्तराखंड में सैलाब आया और राहत कोष से राशि दी गई. यह जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है कि राहत के लिए कितनी राशि दी गई, लेकिन उस पैसे से किसका घर बना इसकी जानकारी नहीं दी जा सकती.' देश के पहले मुख्य सूचना आयुक्त हबीबुल्ला जो खुद पीएमओ में संयुक्त सचिव के तौर पर राहत कोष का प्रभार संभाल चुके हैं, मानते हैं, 'इस फंड में पारदर्शिता होनी चाहिए. किस मुद्दे के लिए राशि दी गई, उसे बताया जा सकता है. मैंने सीआइसी के तौर पर अपने फैसले में कहा था कि राहत कोष भी लोक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) के दायरे में आता है.' लेकिन पीएमओ इसे नहीं मानता.
कैसे और किसके लिए है कोष?
यह सवाल जितना सीधा है, जवाब उतना ही पेचीदा. इस कोष की स्थापना देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की जनवरी 1948 में जारी अपील से हुई थी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से आए विस्थापितों की सहायता के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष बनाया था. उस अपील के मुताबिक फंड का संचालन एक कमेटी करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, उप प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, टाटा न्यासियों का, प्रतिनिधि और प्रधानमंत्री राहत कोष की प्रबंध समिति में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा नामित सदस्य होंगे. लेकिन पीएमओ की वेबसाइट के मुताबिक, सारे निर्णय पीएम ही विवेक से करते हैं. अब इस कोष का इस्तेमाल बाढ़, चक्रवात, भूकंप, दुर्घटनाओं-दंगों के पीडि़तों को राहत देने के अलावा दिल की सर्जरी, गुर्दा प्रत्यारोपण, कैंसर जैसी गंभीर और महंगे इलाज के लिए भी होता है. यह फंड बजटीय प्रावधान से नहीं, बल्कि नागरिकों, कंपनियों, संस्थाओं से मिले दान से संचालित होता है. इसमें दान करने वालों को अंशदान पर इनकम टैक्स भुगतान में छूट मिलती है. लेकिन इस फंड से मिलने वाली सहायता के पात्र व्यक्तियों के चयन की कोई प्रक्रिया नहीं है. सहायता पूरी तरह से प्रधानमंत्री के विवेक और उनके निर्देशों के अनुसार दी जाती है. इस कोष का काम पीएमओ के संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी राहत कोष के सचिव के तौर पर देखता है, जबकि उनकी सहायता के लिए निदेशक स्तर का अधिकारी तैनात होता है.
आपदा के समय प्रधानमंत्री राहत राशि का ऐलान करते हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों के लिए गरीब व्यक्ति एक सादे कागज पर आवेदन दे सकता है. लेकिन इस कोष से हर किसी को सहायता मिल जाती है, ऐसा सोचना नासमझी होगी. पीएमओ से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2000 से 21 सितंबर, 2008 तक 2,14,558 आवेदन आए, लेकिन इस दौरान सिर्फ 82, 310 लोगों को ही राहत कोष से सहायता मिल पाई. ये लोग कैसे चुने गए यह कोई नहीं जानता. न आप यह पूछ सकते हैं. यानी यहां घोटाले का पूरा सामान तैयार है.
यहां एक और बात दिलचस्प है कि जब रिषु को दिल की सर्जरी के लिए पीएमओ ने 50,000 रुपये की मामूली सहायता दी, उस वित्तीय वर्ष 2008-09 में पीएम राहत कोष में कुल 1,611 करोड़ रुपये शेष थे, जबकि 2011-12 में 1,698 करोड़ रुपये. रिषु मामले पर अजय गोयल सवाल उठाते हैं, 'पीएमओ ने वित्तीय मदद की बजाए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की, जिससे रियायती दर पर सरकार से जमीन लेने वाले अस्पतालों में उसका मुफ्त इलाज हो सके. आखिर पीएमओ ने उन अस्पतालों को गरीबों के इलाज के लिए धनराशि क्यों जारी की, जो कानूनी तौर पर गरीबों का इलाज करने के लिए बाध्य हैं.' इस कोष का ऑडिट संवैधानिक संस्था कैग नहीं, बल्कि बाहरी चार्टर्ड एकाउंटेंट करता है.
छुपाने के लिए सुर्खियों में कोष
2005 में सूचना के अधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष सूचना छिपाने को लेकर ही सुर्खियों में रहा है. हालांकि केंद्रीय सूचना आयोग प्रधानमंत्री कार्यालय की उन दलीलों को खारिज कर चुका है कि वह आरटीआइ के दायरे में नहीं आता. प्रथम सूचना आयुक्त हबीबुल्ला ने शैलेष गांधी बनाम पीएमओ केस में फैसला दिया था, चूंकि इस राहत कोष का संचालन पीएमओ करता है, इसलिए सूचना मुहैया कराई जानी चाहिए. हालांकि वही शैलेष गांधी बाद में केंद्रीय सूचना आयुक्त बना दिए गए, जिन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष की जानकारी सार्वजनिक कराने के लिए लंबे समय तक मोर्चा खोल रखा था. आयुक्त बनने से पहले 2006 में गांधी ने राहत कोष से दो साल में जारी की गई कुल राशि, संस्थाओं की संख्या, सहायता पाने वाले संस्थाओं के नाम, उद्देश्य, कितनी राशि दी गई और बैलेंस शीट मांगा था. लेकिन पीएमओ ने गांधी को स्पष्ट जवाब भेजने के बजाए पीएमओ की आधिकारिक वेबसाइट देखने का निर्देश दिया. शैलेष गांधी ने सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाद इस मामले में ऐसी कोई पहल नहीं की है जो सार्वजनिक जानकारी में हो.
यह मामला जब केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा तो पीएमओ ने दो-टूक कहा कि पीएम राहत कोष चूंकि लोक प्राधिकरण नहीं है इसलिए वह इस कोष के बारे में कोई भी सूचना देने के लिए बाध्य नहीं है. सीआइसी को दिए लिखित जवाब में पीएमओ ने कहा, 'पीएम राहत कोष की स्थापना संविधान, संसद-विधानसभा के बनाए कानून या किसी उपयुक्त सरकार की अधिसूचना के तहत नहीं हुई है. इस कोष पर सरकार का नियंत्रण नहीं है.' पीएमओ के मुताबिक, ‘यह एक प्राइवेट फंड है जो स्वैच्छिक रूप से मिलने वाले दान से चलता है, जिसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है.' पीएमओ ने संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही नियमों का हवाला भी दिया, जिसके मुताबिक राहत कोष से जुड़े सवाल को संसद में उठाने की अनुमति नहीं दी जाती है. लेकिन तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त हबीबुल्ला ने 15 मार्च, 2007 को अपने फैसले में कहा है, 'भले पीएम राहत कोष ट्रस्ट या वैधानिक संस्था नहीं है, लेकिन यह फंड प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में है और वही क्रियान्वयन करता है. यह स्वतंत्र लोक प्राधिकरण नहीं हो सकता, लेकिन चूंकि इसकी सूचना पीएमओ रखता है, इसलिए लोक प्राधिकरण के रूप में आरटीआइ के तहत वे सारी सूचनाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो कानून की धारा 8 के तहत नहीं आती.' लेकिन इस फैसले में आयोग ने लाभार्थियों के नाम को गुप्त रखने की पीएमओ की दलील मान ली.
हरियाणा निवासी और आरटीआइ एक्टिविस्ट असीम तकयार ने 2009 से 2011 की बीच पीएम राहत कोष में दान देने वालों और लाभार्थियों का ब्यौरा मांगा, लेकिन आदतन पीएमओ ने फिर धारा-8 की दुहाई दी. लेकिन 6 जून, 2012 को अपने फैसले में मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा, 'यह सच है कि इस राहत कोष में सरकारी फंड नहीं आता. लेकिन यह भी तथ्य है कि पीएमओ इसका संचालन करता है. अक्सर देखा गया है कि कई दानकर्ता अपना नाम मीडिया में प्रचारित करते हैं, इसलिए अगर दानकर्ता अपना नाम गुप्त रखने की मांग नहीं करता, तो समय-समय पर सूची जारी करना एक अच्छा विचार हो सकता है. कम से कम दान देने वाली संस्था का नाम तो जारी किया ही जाना चाहिए.' हालांकि आयोग ने लाभार्थियों के मामले में नाम न बताने के निर्णय को जारी रखा. इस मामले में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट में अपील की. जुलाई, 2012 को सूचना आयोग के आदेश पर कोर्ट ने स्टे लगा दिया. पीएम राहत कोष आखिर पारदर्शिता के मामले में इतना अडिय़ल क्यों है. नाम गुप्त रखना मजबूरी है या माजरा कुछ और है?
विशेषज्ञ की रायः सुभाष चंद्र अग्रवाल सार्वजनिक कोष या निजी जागीर? प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष को लेकर काफी विवाद रहा है क्योंकि इसमें दान देने वालों और लाभार्थियों के नाम गुप्त रखे जाते हैं. केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने फैसले में इस कोष को प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रशासित कोष माना है, जिसे अन्य लोगों के अतिरिक्त कई सार्वजनिक प्राधिकरणों से भी धन प्राप्त होता है. यह बड़ा विवाद अब भी बना हुआ है कि प्रधानमंत्री राहत कोष से अनुदान प्राप्त करने वाले लोगों के नाम सार्वजनिक किए जाएं या नहीं. केंद्रीय सूचना आयोग ने दानकर्ता का नाम जाहिर करने को कहा है, अगर वह गुप्त न रखना चाहे तो.
मगर पीएम राहत कोष के लाभार्थियों के नामों का खुलासा अवश्य किया जाना चाहिए क्योंकि ये लाभार्थी एक सार्वजनिक प्राधिकरण से धन प्राïप्त कर रहे हैं. जनता को यह भी जानने का हक है कि पीएम राहत कोष से मदद पाने के आवेदनों को किस ढंग से निस्तारित किया जाता है. शहनाई वादक भारत रत्न बिस्मिल्ला खान ने मीडिया के माध्यम से आर्थिक मदद तथा अपने परिवार के लिए आजीविका के साधन (गैस एजेंसी) का इंतजाम किए जाने के अनुरोध को सार्वजनिक किया. यदि किसी को सरकार की मदद की दरकार हो तो उसे इसमें शर्म नहीं महसूस करनी चाहिए. लाभार्थियों के नामों को सार्वजनिक किया जाना किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा अपने अधिकार के दुरुपयोग किए जाने को भी रोकेगा जो अवसरवादी राजनीति के वर्तमान युग में किसी तरह प्रधानमंत्री का महत्वपूर्ण पद हासिल करने में कामयाब हो गया हो. इससे उच्च पदस्थ लोगों द्वारा किसी को इस कोष से मदद देने की सिफारिश पर लिए जाने वाले पक्षपातपूर्ण निर्णयों पर भी अंकुश लगेगा. पीएम राहत कोष सार्वजनिक निधि है और लोगों को अनुदान लाभार्थियों की वास्तविक जरूरतों के हिसाब से दिया जाना चाहिए न कि सिफारिश करने वाले लोगों के हिसाब से.
(लेखक आरटीआइ एक्टिविस्ट हैं.)
http://aajtak.intoday.in/story/secret-of-pm-relief-fund-1-735426.html

बुधवार, जुलाई 10, 2013

मुसलमानों की इस्लामी सेना तैयार हो चुकी है

केरल और दक्षिण भारत के इस्लामी संगठन "पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI)" द्वारा भारत के खिलाफ लड़ने के लिये मुसलमानों की इस्लामी सेना तैयार हो चुकी है ! ये सेना भारत कों इस्लामी राष्ट्र बनाने की तैयारी कर रही है ! कांग्रेस ने PFI पर पाबंदी लगाने से इनकार कर दिया है !

http://newindianexpress.com/thesundaystandard/Kerala-Police-unmasks-PFI’s-terror-face/2013/04/28/article1564744.ece

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/20889189.cms?google_editors_picks=true

Islamic Muslim Organization "Popular Front of India (PFI)" has formed an Army of Muslims in Kerala and South India to fight against India. PFI is planning to make India an Islamic nation. Congress has denied to impose ban on PFI.

http://articles.economictimes.indiatimes.com/2013-07-03/news/40352140_1_the-iuml-indian-union-muslim-league-malappuram

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गुरुवार, जुलाई 04, 2013

कांग्रेस ने देश आज़ाद नहीं टुकड़े करबाए ..

कांग्रेस ने देश आज़ाद नहीं टुकड़े करबाए ..
क्या आप जानते हैं पिछले 100 वर्षों में भारत के कितनी बार टुकडे किये गए और उसके पीछे किसकी सरकार और सोच रही है ......
सन 1911 में भारत से श्री लंका अलग हुआ ,जिसको तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था
सन 1947 में भारत से बर्मा -म्यांमार अलग हुआ ,
सन 1947 में भारत से पाकिस्तान अलग हुआ । कारण कांग्रेस ही थी
सन 1948 में भारत से आज़ाद कश्मीर काटकर अलग कर दिया गया और नेहरु जी की नीतियों ने सरदार पटेल के हाथ बांधे रखे
सन 1950 में भारत से तिब्बत को काटकर अलग कर दिया गया और नेताओं ने मुह बंद रखा
सन 1954 में बेरुबादी को काट कर अलग कर दिया गया
सन 1957 में चीन ने भारत के कुछ हिस्से हड़प लिए और नेहरु ने कहा की यह घास फूंस वाली जगह थी
सन 19262 में चीन ने अक्साई चीन का 62000 वर्ग मिल क्षेत्र भारत से छीन लिया ,और नेहरु जी हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे । जब हमारी सेनाओं ने चीन से लड़ाई लड़ने का निर्णय किया और कुछ मोर्चों पर जीत की स्थिति में थी तो इन्ही नेहरु ने सीज फायर करा दिया
सन 1963 में टेबल आइलैंड पर बर्मा ने कब्ज़ा कर लिया ,और हम खामोश रहे । वहां पर म्यामांर ने हवाई अड्डा बना रखा है
सन 1963 में ही गुजरात का कच्छ क्षेत्र छारी फुलाई को पाकिस्तान को दे दिया गया
सन 1972 में भारत ने कच्छ तिम्बु द्वीप सर लंका को दे दिया
सन 1982 में भारत के अरुणांचल के कुछ हिस्से पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया , और हम बात करते रहे
सन 1992में भारत का तीन बीघा जमीनी इलाका बांगला देश ने लेकर चीन को सौंप दिया ।
सान 2012 मे भी बांग्लादेश को कुछ वर्गमील इलाका कॉंग्रेस ने दिया और कहा की ये दल दली इलाका था
इसके अलावा भी अनेक छोटी बड़ी घटनाएं होती रहती हैं जिनका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है , जैसे कि हाल ही की चीन की घटना है , जिस पर कोई अधिकारिक दस्तावेज अभी जारी नहीं किया गया है।
वैसे एक बात और ध्यान देने वाली है की जब भारत की धरती यूंही बंजर, घास-फूस वाली तथा दलदली है तो इन कोंग्रेसियों को हमारी इस धरती मे इतनी दिलचस्पी क्यूँ है। या जैसे अमुक सारे देशों से ये कोंग्रेसी खतम हो चुके हैं वैसे ही यहाँ से भी खतम हो कर ही मानेंगे।

सोमवार, जुलाई 01, 2013

The Origins of Plastic Surgery

INTERNATIONAL SCIENTIFIC CORRESPONDENCE/PROOF
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Brain Surgery
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First Evidence of Brain Surgery in Bronze age Harappa in ancient India

http://www.currentscience.ac.in/Volumes/100/11/1621.pdf

The Origins of Plastic Surgery
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In fact, the first documented accounts of reconstructive surgery go back as far as 600 B.C. to ancient India.

http://utmj.org/archive/82-3/HIST.pdf

urinary bladder stone
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Extraction of stones from the urinary bladder is one of the oldest surgical operations in the history. The operation was carried out through a perineal incision down to, then through, the bladder neck to reach the stone and extract it. Comparing the description of the
operative technique as carried out during ancient Indian civilization (Charaka in the first century and Susruta in the fifth century AD11) and during the Greek Civilization in Aegean Sea Greece (Paulus Aegineta, 625-690 AD11)
check page number 2 paragraph number 6
http://www.rabieabdelhalim.com/zahrawiBladderStoneExtraction.pdf

Caesarean section operation
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The mother of Bindusara (born c. 320 BCE, ruled 298 – c.272 BCE), the second Mauryan Samrat (emperor) of India, accidentally consumed poison and died when she was close to delivering him. Chanakya, the Chandragupta's teacher and adviser, made up his mind that the baby should survive. He cut open the belly of the queen and took out the baby, thus saving the baby's life.
And The first Caesarean section to be performed in America took place in what was formerly Mason County, Virginia (now Mason County, West Virginia), in 1794.

http://link.springer.com/article/10.1007%2Fs00404-005-0724-4

Fracture/Artificial limbs surgery
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In traditional Ayurveda practice, the fracture of bones and their treatment was first mentioned in SUSHRUTA SAMHITA chikitsa sthana from the view of surgical management. Among the different types of fractures, ancient Indian surgeons gave importance to the fractures of thigh, spines, shafts of long bones, and the pelvic region.

For detail on fracture management please refer the book in which there is a explanation of about 6 types of dislocations, and 12 types of fractures.---
Bhagna Chikitsa – A chapter in treatise Sushruta samhita, which deals with Fracture treatment.
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