कमलेश तिवारी की हत्या का असली गुनहगार गांधी है

ईशनिंदा के नाम पर हत्या करने की परंपरा भारत में गांधी ने ही शुरू करवाई थी

- रंगीला रसूल का संपादन करने वाले महाशय राजपाल की हत्या 6 अप्रैल 1929 को हुई थी

- रंगीला रसूल का प्रकाशन 1923 में लाहौर से हुआ था

- लगभग डेढ़ साल तक ये किताब पूरे पंजाब में बिकती रही जहां ना सिर्फ मुसलमानों का बहुमत था बल्कि इस्लाम की गतिविधियों का केंद्र भी था

- इस पुस्तक के विरोध में किसी भी मुसमलान ने डेढ़ सालों तक एक लाइन भी नहीं लिखी थी और ना किसी अखबार में प्रकाशित की थी

- ना मुसलमानों ने तब तक इस किताब के खिलाफ सरकार को कोई शिकायत ही भेजी थी

- फिर किसी ने इस किताब की एक प्रति महात्मा गांधी के पास भिजवा दी । महात्मा गांधी ने 24 मई 1924 को अपने अंग्रेजी साप्ताहिक यंग इंडिया के अंक में इस किताब पर मुसलमानों को उकसाने वाली एक टिप्पणी की

- गांधी ने लिखा...'स्थानीय नेताओं को चाहिए कि वो इसका प्रकाशन बंद कराने या इसे निन्दित ठहराने का उपाय खोज निकालें'

- गांधी के उकसाने के बाद मुसलमानों ने किताब के खिलाफ जिहाद का प्लान बनाया

- इसके बाद भी गांधी ने जलती आग पर घी डालने का काम किया और महाशय राजपाल की पुस्तक के खिलाफ यंग इंडिया में 27 जून 1924, 1 जुलाई 1924, 10 जुलाई 1927, 1 सितंबर 1927, 22 सितंबर 1927, 7 अगस्त 1929 और 11 अगस्त 1929 को भी लेख लिखे ।

- महात्मा गांधी ने मुसलमानों के गुस्से को खूब हवा दी । मामला इतना ज्यादा भड़क गया कि एक पूरा आंदोलन खड़ा हो गया । इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने महाशय राजपाल जी की किताब पर मुकदमा चलाया ।

- 4 सालों से अधिक समय तक ये मुकदमा चलता रहा लेकिन अंत में महाशय राजपाल जी को निर्दोष मानकर सेशन कोर्ट द्वारी पहले दी गई गई उनकी 6 महीने की सजा को भी रद्द कर दिया । अंग्रेजों की अदालत ने उनकी पुस्तक को भी बरी कर दिया गया । जज ने महाशय राजपाल को निर्दोष इसलिए ठहराया क्योंकि किताब में जो कुछ भी प्रकाशित किया गया था उसमें सिर्फ इस्लामिक ग्रंथों को ही कोट किया गया था ।

- महाशय राजपाल जी की हत्या कैसे हुई ? ये बाद में बताएंगे लेकिन पहले ये समझिए कि आखिर ये किताब लिखने की नौबत क्यों आई और इसके लेखक कौन थे ? महाशय राजपाल तो सिर्फ इस किताब के प्रकाशक थे ।

- उन दिनों मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें प्रकाशित की गईं- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’। उन दोनों पुस्तकों में योगेश्वर श्रीकृष्ण और महर्षि दयानन्द पर बहुत ही भद्दे और अश्लील शब्दों में कीचड़ उछाला गया था ।

- इन दोनों पुस्तकों के जवाब में महाशय राजपाल जी ने ‘रंगीला रसूल’ नाम की पुस्तक सन् 1923 में प्रकाशित की । इस पुस्तक के लेखक के नाम के स्थान पर ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ लिखा था ।

- वास्तव में इसके लेखक आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान पं. चमूपति थे, जो अपना नाम नहीं देना चाहते थे । उन्होंने महाशय राजपाल जी से ये वचन ले लिया था कि चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां क्यों न बनें, आप किसी को भी पुस्तक के लेखक के रूप में मेरा नाम नहीं बताएंगे

- मुसलमान लगातार कई लेख लिखकर महाशय राजपाल से ये पूछ रहे थे कि आपने तो सिर्फ प्रकाशन किया है लेखक का नाम बता दो हम आपको बख्श देंगे लेकिन महाशय राजपाल ने अपने वादे को निभाया ना तो पंडित चंमूपति का नाम ही किसी को बताया और ना ही प्रकाशन रोका । वो अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के परम समर्थक थे ।

- 1927 से 1929 के बीच महाशय राजपाल पर तीन बार कातिलाना हमले हुए थे । जिसमें अंतिम जानलेवा हमला 6 अप्रैल 1929 को हुआ था । इल्मदीन नाम के एक 19 साल के मुसलमान ने सोते हुए महाशय राजपाल के सीने में चाकू भोंक कर कत्ल किया था ।

- गांधी की वजह से ही मुसलमानों ने महाशय राजपाल की हत्या की । लेकिन इसके बावजूद भी गांधी को संतोष नहीं हुआ क्योंकि महाशय राजपाल भारत के लोगों के दिलों में महान बलिदानी की तरह स्थापित हो गए । और महाशय राजपाल का कद गांधी से भी बहुत ऊंचा हो गया

- दुखी होकर गांधी ने लिखा.. 'राजपाल की हत्या ने उन्हें शहीद बना दिया है और उन्हें वो कीर्ति प्राप्त हो गई है जिसके योग्य वो नहीं थे'

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- बात सिर्फ यहीं पर खत्म नहीं होती है... महाशय राजपाल की हत्या करने वाले इल्मदीन की अर्थी को कंधा देने के लिए पाकिस्तान का संस्थापक कवि मुहम्मद इकबाल आया था जो आज भी भारत के मुसलमान और सेकुलर हिंदुओं में सम्मानित है । इतना ही नहीं उसका लिखा सारे जहां से अच्छा... आज भी भारत में गाया जाता है... जो इस कवि की छद्म रचना है ।

- इसीलिए अब तक भारत में जितनी भी ईशनिंदा को लेकर हत्याएं हुई हैं उसके लिए सिर्फ और सिर्फ गांधी जिम्मेदार है । गांधी का तुष्टीकरण जिम्मेदार है ।

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(ये लेख प्रोफेसर राजेंद्र जिज्ञासु की किताब धर्म की बलिवेदी पर आधारित है)

(भाषाई व इस्लामी जानकार इस लेख पर तर्क-वितर्क के लिए आमंत्रित हैं जिससे सही विचारों तक पहुंचा जा सके।)