गुरुवार, सितंबर 30, 2021

Hindushahi हिन्दूशाही भाग 1

 

भाग - 1

#हिन्दूशाही की लूट का माल जब गजनी में प्रदर्शित किया गया तो पड़ोसी मुल्कों के राजाओं की आंखें फटी की फटी रह गईं......

कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर को हम देखते हैं तो पता चलता है कि भारत गुप्तकाल में किस भव्यता के साथ खड़ा था। 7वीं सदी के पूर्व भारतीय लोग शांत और सुरक्षित जीवन जी रहे थे। युद्ध थे लेकिन युद्ध का स्वरूप अलग था। इससे पूर्व गुप्तकाल को भारत का स्वर्णकाल कहा जाता है। इससे पूर्व बौद्धकाल में भारत ने दर्शन, विज्ञान और ज्ञान की नई ऊंचाइयों को छूआ था, लेकिन हर्षवर्धन के जाने के बाद भारत का भाग्य पलट गया। विदेशी आक्रांताओं ने भारत को खंडहर में बदल दिया। भारत पर यूनानी, मंगोल, अरबी, ईराकी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, मुगल और अंग्रेज ने राज किया। ये सभी विदेशी थे। इनके शासनकाल में जहां भारतीय गौरव को नष्ट किया गया वहीं बड़े पैमाने पर धर्मांतरण भी हुआ। आज भी इन विदेशी आक्रांताओं के चिन्ह मौजूद हैं।

अफगानिस्तान (आर्याना) में हिन्दूशाही राजवंश राज करता था। अरब और तुर्कमेनिस्तान के लुटेरों और खलीफाओं ने सबसे पहले अफगानिस्तान पर हमला किया। अफगानिस्तान के बामियान, जलालाबाद, बगराम, काबुल, बल्ख आदि स्थानों पर हजारों मूर्तियों, स्तूपों, संघारामों, विश्वविद्यालयों और मंदिरों को तोड़ा गया और बेरहमी से कत्लेआम किया गया। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी, महान संस्कृत व्याकरणाचार्य पाणिनी और गुरु गोरखनाथ अफगानिस्तान के ही थे।

ईसा सन् 7वीं सदी तक गांधार के अनेक भागों में बौद्ध धर्म काफी उन्नत था। 7वीं सदी के बाद यहां पर अरब और तुर्क आदि जगह के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू किया और 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस ने अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया। इसके बाद यहां के हिन्दू और बौद्धों का जबरन धर्मांतरण अभियान शुरू ‍हुआ। कई महीनों-सालों तक लड़ाइयां चलीं और अंत में काफिरिस्तान को छोड़कर सारे अफगानी लोग मुसलमान बन गए और आज अपने ही अपनों के खिलाफ हैं।

मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हिन्दूशाही की लूट का माल जब गजनी में प्रदर्शित किया गया था तो पड़ोसी मुल्कों के राजाओं की आंखें फटी की फटी रह गईं। भीमनगर (नगरकोट) से लूटकर ले गए माल को गजनी तक लाने के लिए ऊंटों की कमी पड़ गई थी।

711 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्जा कर ब्राह्मण राजा दाहिर को पलायन करने पर मजबूर कर दिया था। 200 साल अंग्रेजों के शासन सहित भारतीय लोग लगभग 700 वर्षों से ज्यादा वर्ष तक विदेशी गुलामी में जीते रहे। कुल गुलामी का काल 1,236 वर्ष से भी ज्यादा रहा। अंग्रेजों ने संपूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया था जबकि विदेशी आक्रांता मुगल ऐसा नहीं कर पाए।

सिंध पर बहुत समय तक कभी हिन्दू तो कभी विदेशी मुस्लिम राजा राज करते रहे, लेकिन 1176 ईस्वी में शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने सभी को आसानी से उखाड़ दिया। इससे पूर्व सुबुक्तगीन के नेतृत्व में मुसलमानों ने हमले करके पंजाब छीन लिया था और गजनी के सुल्तान महमूद ने 997 से 1030 ई. के बीच भारत पर 17 हमले किए और हिन्दू राजाओं की शक्ति कुचल डाली।

12वीं सदी में इस्लामी आक्रमण बढ़ गए तब उत्तर और केंद्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत आ गया। बाद में अधिकांश भारत मुगल वंश के अधीन चला गया। लेकिन दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और राजस्थान के राजाओं ने कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की और वे लड़ते रहे। दक्षिण भारत में विजयनगरम साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था।

गजनवी और गौरी : महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी सबसे बड़े आक्रांता थे। महमूद गजनवी ने सिन्धु नदी के पूर्व में तथा यमुना नदी के पश्चिम में बसे साम्राज्यों पर आक्रमण कर कई बार इसे लूटा और यहां की हजारों स्त्रियों को बंदी बनाकर उन्हें अफगान और अरब भेजा। गोर वंश के सुल्तान मुहम्मद गौरी ने उत्तर भारत पर योजनाबद्ध तरीके से हमले किए। उसका उद्देश्य इस्लाम को बढ़ाना था। मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराईन के मैदान में दो युद्ध हुए। शहाब-उद-दीन मुहम्मद गौरी 12वीं शताब्दी का अफगान सेनापति था, जो 1202 ई. में गौरी साम्राज्य का शासक बना। मुहम्मद गौरी ने मुल्तान पर आक्रमण करने के बाद पाटन (गुजरात) पर आक्रमण किया, जहां उसे मुंह की खानी पड़ी। राजा भीम द्वितीय ने उसे बुरी तरह पराजित करके छोड़ दिया। मोहम्मद गौरी ने भारत में विजित साम्राज्य का अपने सेनापतियों को सौंप दिया और वह गजनी चला गया। बाद में गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम राजवंश की नींव डाली।

गुलाम वंश (1206-1526) : दिल्ली पर तुर्क वंश के 4 लोगों ने राज किया। अंतिम शासक अफगानी था। 5वें वंश को गुलाम वंश कहा गया। इसमें खिलजी, तुगलक, सैयद और लौधी वंश। मुहम्मद गौरी का गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक इस वंश का पहला सुल्तान था। ऐबक का साम्राज्य पूरे उत्तर भारत तक फैला था। इसके बाद खिलजी वंश ने मध्यभारत पर कब्जा किया। चूंकि गुलामों को अपनी योग्यता और अपने कार्यों को अच्छे से प्रदर्शित करना होता है तो उन्होंने भरत के महान स्तंभों, मंदिरों और स्तूपों को तोड़कर उनका इस्लामीकरण करने का कार्य अधिक किया। 1526 में मुगल सल्तनत द्वारा इस इस साम्राज्य का अंत हुआ।

मुगल वंश के अंत के बाद तुर्क वंश के आक्रांताओं ने एक बार फिर भारत पर आक्रमण कर अपनी सत्ता कायम की। इस क्रम में बाबर (1526-1530), हुंमायूं (1530-1556), अकबर (1556-1605), जहांगीर (1605-1627), शाहजहां (1627-1658), औरंगजेब (1658-1707) और अंतिम मुगल बहादुरशाह जफर (1837-1858) ने क्रमश: शासन किया।

अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर के बाद ब्रिटेन का शासन शुरू हुआ। मैसूर के युद्ध के बाद संपूर्ण भारत ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया। 18वीं शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंबई (मुंबई), मद्रास (चेन्नई) तथा कलकत्ता (कोलकाता) पर कब्जा कर लिया। उधर फ्रांसीसियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने माहे, पांडिचेरी तथा चंद्रानगर पर कब्जा कर लिया। इस तरह ब्रिटेन ने धीरे-धीरे कई छोटी-बड़ी लड़ाइयां लड़कर संपूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया।

7वीं सदी से 1947 तक भारत के हिन्दू और हिन्दू से मुसलमान बने लोग भी गुलामी की जिंदगी जीते रहे हैं। इस दौरान गुलाम वंश के शासकों, मुगलों, अंग्रेजों आदि ने भारत की सांस्कृतिक अस्मिता व अभिमान को कुचलने के साथ ही सबसे बड़े धार्मिक, राजनीतिक और ज्योतिषी प्रतीकों को ध्वस्त करके उसकी जगह अपनी विजेता शक्ति का प्रतीक कायम ‍किया। ये ध्वस्त प्रतीक आज विवादित प्रतीक माने जाते हैं।

तुर्क और अरब के आक्रांताओं ने जब भारत पर आक्रमण किया तो उन्होंने सबसे पहले हिन्दू और बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रतीकों को ढहाना शुरू किया। उनमें अयोध्या, काशी, मथुरा और उत्तर भारत के तमाम मंदिर, स्मारक, स्थल और स्तंभ थे। इस दौरान उनको अधिक से अधिक संख्‍या में नमाज के लिए मस्जिदें और रहने के लिए महल भी बनवाने थे, इसलिए उन्होंने शुरुआत में अधिकतर मंदिरों को मस्जिद में बदल दिया, तो राजपूताना महलों को अपने रहने और सेना के रुकना का स्थान बना लिया। तुर्क और अरब के आक्रांता तो चले गए। बस मुट्ठीभर ही उनके वंश के लोग बचे होंगे, लेकिन वे अपने पिछे ध्वस्त किए हुए स्थान और धर्मान्तरित किए हुए हिन्दू छोड़ गए। आज भी उत्तर प्रदेश के ऐसे कई परिवार और गांव हैं जहां पर एक भाई हिन्दू है तो दूसरा मुसलमान है। लेकिन शहरों का माहौल बदल गया है। वैसे तो हजारों विवादित स्थल है उनमें से कुछ ध्वस्त स्थल है जैसे नालंदा और तक्षशिला के विश्‍वविद्यालय।

आओ जानते हैं कि भारत में ऐसे कौन कौन से 10 स्थल या स्मारक हैं जो पहले बौद्ध, गुप्त और राजपूत काल में बनवाए गए थे और जिन पर अब विवाद की‍ स्थिति बना दी गई है।

#ताजमहल : आगरा का ताजमहल भारत की शान और प्रेम का प्रतीक चिह्न माना जाता है। उत्तरप्रदेश का तीसरा बड़ा जिला आगरा ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय इतिहास के पन्नों में यह लिखा है कि ताजमहल को शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था। वह मुमताज से प्यार करता था। दुनियाभर में ताजमहल को प्रेम का प्रतीक माना जाता है, लेकिन कुछ इतिहासकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनका मानना है कि ताजमहल को शाहजहां ने नहीं बनवाया था वह तो पहले से बना हुआ था। उसने इसमें हेर-फेर करके इसे इस्लामिक लुक दिया था। दरअसल, यह हिन्दुओं का 'तेजोमहालय' था।

शब्द ताजमहल के अंत में आए 'महल' मुस्लिम शब्द है ही नहीं, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में एक भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से पुकारा जाता हो। बाद में यह प्रचारित किया गया कि मुमताज-उल-जमानी को ही मुमताज महल कहा जाता था।

प्रसिद्ध शोधकर्ता और इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी शोधपूर्ण पुस्तक में तथ्‍यों के माध्यम से ताजमहल के रहस्य से पर्दा उठाया है। ओक के अनुसार जयपुर राजा से हड़प किए हुए पुराने महल को शाहजहां ने मुमताज की कब्र के रूप में प्रचारित किया। कब्र होने के कारण किसी ने यह नहीं सोचा कि बादशाह ने दरअसल इसे अपनी दौलत रखने का स्थान बनाया था। शाहजहां ने वहां अपनी लूट की दौलत छुपा रखी थी इसलिए उसे कब्र के रूप में प्रचारित किया गया।

लेखकर के अनुसार शाहजहां के दरबारी लेखक 'मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी' ने अपने 'बादशाहनामा' में मुगल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज्यादा पृष्ठों मे लिखा है, जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 06 माह बाद, तारीख 15 जमदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया। फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) में पुनः दफनाया गया। लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस महला से बेहद प्यार करते थे, पर बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात की पुष्टि के लिए जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनों आदेश अभी तक रखे हुए हैं जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।

इतिहासकारों अनुसार प्रारंभिक दौर में मुस्लिम शासकों के समय प्रायः मृत दरबारियों और तुर्क राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था। हुमायूं, अकबर, सफदर जंग आदि ऐसे ही प्राचीन भारतीय भवनों में दफनाएं गए हैं। बाद में हिन्दू से मुसलमान बने लोगों के लिए कब्रिस्तान बनाए गए।

#कुतुबमीनार : कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था। इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था। इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है। इसके आसपास 27 नक्षत्र के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराहमिहिर की देखरेख में बनाया गया था। चंद्रगुप्त द्वितिय के आदेश से यह बना था। ज्योतिष स्तंभों के अलावा भारत में कीर्ति स्तम्भ बनाने की परंपरा भी रही है। खासकर जैन धर्म में इस तरह के स्तंभ बनाए जाते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई स्तंभ है, लेकिन तथाकथित कुतुब मीनार से बड़े नहीं। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में ऐसा ही एक स्तंभ स्थित है।

ऐसा भी कहते हैं कि समुद्रगुप्त ने दिल्ली में एक वेधशाला बनवाई थी, यह उसका सूर्य स्तंभ है। कालान्तर में अनंगपाल तोमर और पृथ्वीराज चौहान के शासन के समय में उसके आसपास कई मंदिर और भवन बने, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने दिल्ली में घुसते ही तोड़ दिया था। कुतुबुद्दीन ने वहां 'कुबत−उल−इस्लाम' नाम की मस्जिद का निर्माण कराया और इल्तुतमिश ने उस सूर्य स्तंभ में तोड़-फोड़कर उसे मीनार का रूप दे दिया था।

माना जाता है कि गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी शमशुद्दीन इल्तुतमिश ने 1368 में इसे पूरा किया था। लेकिन क्या यह सच है? मीनार में देवनागरी भाषा के शिलालेख के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे मुहम्मद बिन तुगलक ने ठीक करवाया था। इसके बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसकी ऊपरी मंजिल को हटाकर इसमें दो मंजिलें और जुड़वा दीं। इसके पास सुल्तान इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, बलबन व अकबर की धाय मां के पुत्र अधम खां के मकबरे स्थित हैं।

उसी कुतुब मीनार की चारदीवारी में खड़ा हुआ है एक लौह स्तंभ। दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तंभ 7 मीटर ऊंचा है। इसका वजन लगभग 6 टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1,600 वर्ष पूर्व बनवाया। यह लौह स्तंभ प्रारंभ से यहां नहीं था। सवाल उठता है कि क्या यह लौह स्तंभ भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था? इतनी बड़ी मीनार जब बनी होगी तो यदि यह स्तंभ पहले से यहां रहा होगा तो उसी समय में हट जाना चाहिए था।

गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तंभ विदिशा (विष्णुपदगिरि/उदयगिरि- मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने जैन मंदिर परिसर के 27 मंदिर तोड़े तब यह स्तंभ भी उनमें से एक था। दरअसल, मंदिर से तोड़े गए लोहे व अन्य पदार्थ से उसने मीनार में रिकंस्ट्रक्शन कार्य करवाया था। उनके काल में यह स्तंभ समय बताने का भी कार्य करता था। सम्राट अशोक ने भी कई स्तंभ बनवाए थे, उसी तरह चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी कई स्तंभ बनवाए थे। ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

जाट इतिहास के अनुसार ऐबक को मीनार तो क्या, अपने लिए महल व किला बनाने तक का समय जाटों ने नहीं दिया। उसने तो मात्र 4 वर्ष तक ही शासन किया। इस मीनार को जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (विक्रमादित्य) के कुशल इंजीनियर वराहमिहिर के हाथों चौथी सदी के चौथे दशक में बनवाया गया था। यह मीनार दिलेराज जाट दिल्ली के राज्यपाल की देखरेख में बनी थी।

हरिदत्त शर्मा ने अपनी किताब ज्योतिष विश्व कोष में लिखा है कि कुतुब मीनार के दोनों ओर दो पहाड़ियों के मध्य में से ही उदय और अस्त होता है। आचार्य प्रभाकर के अनुसार 27 नक्षत्रों का वेध लेने के लिए ही इसमें 27 भवन बनाए गए थे। 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्योदय तुगलकाबाद के स्थान पर और सूर्यास्त मलकपुर के स्थान पर होता देखा जा सकता है। मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है न कि इस्लामिक मान्यता के अनुसार पश्चिम की ओर। अंदर की ओर उत्कीर्ण अरबी के शब्द स्पष्ट ही बाद में अंकित किए हुए नजर आते हैं। मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के संस्थापक ने यह स्वीकार किया है कि यह हिन्दू भवन है। स्तंभ का घेरा 27 मोड़ों और त्रिकोणों का है। बाद के लोगों ने कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ दिया जबकि 'कुतुब मीनार' का अर्थ अरबी में नक्षत्रीय और वेधशाला होता है। इसका पुराना नाम 'ध्रुव स्तंभ' और 'विष्णु स्तंभ'था। मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदला और इस पर से कुछ हिन्दू चिह्न मिटा दिए जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं।

राजा विक्रमादित्य के समय में उज्जैन और दिल्ली की कालजयी बस्ती के बीच का 252 फुट ऊंचा स्तंभ है। वराह मिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से गुजरता है। पड़ोस में जो बस्ती है उसे आजकल महरौली कहते हैं जबकि वह वास्तव में वह मिहिरावली थी। इस मीनार के आसपास 27 नक्षत्र मंडप थे जिसे ध्वस्त कर दिया गया।

यह माना जाता है कि कुववत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताइस हिन्दू मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं। महरौली स्थित लौह स्तम्भ जंग लगे बिना विभिन्न संघर्षों का मूक गवाह रहा है और राजपूत वंश के गौरव और समृद्धि की कहानी को बयां करता है।

#लालकिला : कहते हैं कि इतिहास वही लिखता है, जो जीतता है या जो शासन करता है। लाल किला किसने बनवाया था? यदि यह सवाल भारतीयों से पूछा जाए तो सभी कहेंगे शाहजहां ने। मुगल लाल किले को कभी लाल किला नहीं लाल हवेली कहते थे। क्यों? कुछ इतिहासकारों के अनुसार इसे लालकोट का एक पुरातन किला एवं हवेली बताते हैं जिसे शाहजहां ने कब्जा करके इस पर तुर्क छाप छोड़ी थी। दिल्ली का लालकोट क्षेत्र हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान की 12वीं सदी के अंतिम दौर में राजधानी थी। लालकोट के कारण ही इसे लाल हवेली या लालकोट का किला कहा जाता था। बाद में लालकोट का नाम बदलकर शाहजहानाबाद कर दिया गया।

लाल कोट अर्थात लाल रंग का किला, जो कि वर्तमान दिल्ली क्षेत्र का प्रथम निर्मित नगर था। इसकी स्थापना तोमर शासक राजा अनंगपाल ने 1060 में की थी। साक्ष्य बताते हैं कि तोमर वंश ने दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में लगभग सूरज कुण्ड के पास शासन किया, जो 700 ईस्वी से आरम्भ हुआ था। फिर चौहान राजा, पृथ्वी राज चौहान ने 12वीं सदी में शासन ले लिया और उस नगर एवं किले का नाम किला राय पिथौरा रखा था। राय पिथौरा के अवशेष अभी भी दिल्ली के साकेत, महरौली, किशनगढ़ और वसंत कुंज क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

इतिहासकार मानते हैं कि शाहजहां (1627-1658) ने जो कारनामा तेजोमहल के साथ किया वही कारनामा लाल कोट के साथ। लाल किला पहले लाल कोट कहलाता था। दिल्ली का लाल किला शाहजहां के जन्म से सैकड़ों साल पहले 'महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय' द्वारा दिल्ली को बसाने के क्रम में ही बनाया गया था। महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय अभिमन्यु के वंशज तथा परमवीर पृथ्वीराज चौहान के नानाजी थे।

शाहजहां ने 1638 में आगरा से दिल्ली को राजधानी बनाया तथा दिल्ली के लाल किले का निर्माण प्रारंभ किया। अनेक मुस्लिम विद्वान इसका निर्माण 1648 ई. में पूरा होना मानते हैं। लेकिन ऑक्सफोर्ड बोडिलियन पुस्तकालय में एक चित्र सुरक्षित है जिसमें 1628 ई. में फारस के राजदूत को शाहजहां के राज्याभिषेक पर लाल किले में मिलता हुआ दिखलाया गया है। यदि किला 1648 ई. में बना तो यह चित्र सत्य का अनावरण करता है।

इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि तारीखे फिरोजशाही में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल (लाल प्रासाद/महल ) की ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया।

कई भारतीय विद्वान इसे लाल कोट का ही परिवर्तित रूप मानते हैं। इसमें संदेह नहीं कि लाल किले में अनेक प्राचीन हिन्दू विशेषताएं-किले की अष्टभुजी प्राचीर, तोरण द्वार, हाथीपोल, कलाकृतियां आदि भारतीयों के अनुरूप हैं। शाहजहां के प्रशंसकों तथा मुस्लिम लेखकों ने उसके द्वारों, भवनों का विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया है।

इतिहास के अनुसार लाल किले का असली नाम 'लाल कोट' है जिसे महाराज अनंगपाल द्वितीय द्वारा सन् 1060 ईस्वी में बनवाया गया था। बाद में इस लाल कोट को पृथ्वीराज चौहान ने ‍जीर्णोद्धार करवाया था। लाल किले को एक हिन्दू महल साबित करने के लिए आज भी हजारों साक्ष्य मौजूद हैं। यहां तक कि लाल किले से संबंधित बहुत सारे साक्ष्य पृथ्वीराज रासो में मिलते हैं।

तारीखे फिरोजशाही के लेखक के अनुसार सन् 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल (लाल प्रासाद/ महल) की ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया। सिर्फ इतना ही नहीं, अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात के वर्णन हैं कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और आलीशान दिल्ली का निर्माण करवाया था। शाहजहां से 250 वर्ष पहले 1398 ईस्वी में आक्रांता तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया हुआ है।

लाल किले के एक खास महल में सूअर के मुंह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं। इस्लाम के अनुसार सूअर हराम है। साथ ही किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है, क्योंकि राजपूत राजा हाथियों के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे। इसी किले में दीवाने खास में केसर कुंड नामक कुंड के फर्श पर कमल पुष्प अंकित है। दीवाने खास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 ईस्वीं के अंबर के भीतरी महल (आमेर/पुराना जयपुर) से मिलती है, जो कि राजपुताना शैली में बनी हुई है। आज भी लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने हुए देवालय हैं जिनमें से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकर मंदिर है, जो कि शाहजहां से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं के बनवाए हुए हैं। लाल किले के मुख्य द्वार के ऊपर बनी हुई अलमारी या आलिया इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यहां पहले गणेशजी की मूर्ति रखी होती थी। पुरानी शैली के हिन्दू घरों के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर या मंदिरों के द्वार के ऊपर एक छोटा सा आलिया बना होता है जिसके अंदर गणेशजी की प्रतिमा विराजमान होती है।

11 मार्च 1783 को सिखों ने लाल किले में प्रवेश कर दीवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया था। नगर को मुगल वजीरों ने अपने सिख साथियों को समर्पित कर दिया। उसके बाद इस पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया।

#आगराकाकिला : उत्तरप्रदेश के आगरा में स्थित आगरा का किला यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में दर्ज है। इस किले में मुगल बादशाह बाबर, हुंमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां व औरंगजेब रहते थे। यहीं से उन्होंने आधे भारत पर शासन किया। ये सभी विदेशी थे जिन्हें भारत में तुर्क कहा जाता था।

आगरा का किला मूलतः एक ईंटों का किला था, जो चौहान वंश के राजपूतों के पास था। इस किले का प्रथम विवरण 1080 ईस्वी में आता है, जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्जा कर लिया था। पुरुशोत्तम नागेश ओक की किताब 'आगरे का लाल किला हिन्दू भवन है।' में भी इसका जिक्र है।

सिकंदर लोधी (1487-1517) ने भी इस किले में कुछ दिन गुजारे थे। लोधी दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था। उसकी मृत्यु भी इसी किले में 1517 में हुई थी। इसके बाद उसके पुत्र इब्राहीम लोधी ने गद्दी संभाली।

पानीपत के युद्ध के बाद यह किला मुगलों के हाथ में आ गया। यहां उन्हें अपार संपत्ति मिली। फिर इस किले में इब्राहीम के स्थान पर बाबर आया और उसने यहीं से अपने क्रूर शासन का संचालन किया।

इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा है कि यह किला एक ईंटों का किला था जिसका नाम बादलगढ़ था। यह तब खस्ता हालत में था। अकबर ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। हिन्दू शैली में बने किले के स्तंभों में बाद में तुर्क शैली में नक्काशी की गई। बाद में अकबर के पौत्र शाहजहां ने इसे अपने तरीके से रंग-रूप दिया। उसने किले के निर्माण के समय राजपुताना समय की कई पुरानी इमारतों व भवनों को तुड़वा भी दिया था।

#ढाई_दिन_का_झोपड़ा : माना जाता है कि ख्‍वाजा साहब (1161 ईस्वी) की दरगाह से एक फर्लांग आगे त्रिपोली दरवाजे के पार पृथ्वीराज चौहान के एक पूर्वज द्वारा बनवाए गए 3 मंदिरों के परिसर में एक संस्कृत पाठशाला थी जिसकी स्थापना पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज विग्रहराज तृतीय ने लगभग 1158 ईस्वी में की थी। वह साहित्य प्रेमी था और स्वयं नाटक लिखता था। उनमें से एक हरकेली नाटक काले पत्थरों पर उत्कीर्ण किया गया, जो अजमेर स्थित अकबर किला के राजपुताना संग्रहालय में आज भी संग्रहित है।

इसी संग्रहालय में उक्त परिसर में लाई गई लगभग 100 सुंदर मूर्तियां एक पंक्ति में रखी हुई हैं। ऐसा ही एक नाटक और मिला, जो राजकवि सोमदेव द्वारा रचित था। बलुआ पत्थर की मूर्तियां लगभग 900 वर्षों से सुरक्षित हैं लेकिन सभी मूर्तियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़ दिए गए हैं। मंदिर परिसर के अहाते में भी विशाल भंडारगृह है जिसमें और भी अनेक सुंदर मूर्तियां हैं। अपेक्षाकृत कम महत्व के अवशेष अहाते में इस प्रकार पड़े हैं कि जो चाहे उन्हें ले जाए। पिछले 800 वर्षों से यह परिसर अढ़ाई दिन का झोपड़ा नाम से विख्यात है। यह नाम इसलिए रखा गया है, क्योंकि पहले परिसर के 3 मंदिरों को ढाई दिन के भीतर मस्जिद के रूप में बदल दिया गया था।

यह मस्जिद वर्तमान में राजस्थान के अजमेर में स्थित है। पहले यह संस्‍कृत पाठशाला थी। इसे मोहम्‍मद गौरी ने मस्जिद में तब्‍दील कर दिया। इसे मस्जिद का लुक देने के लिए अबु बकर ने डिजाइन तैयार किया था। अब लोग इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहते हैं। क्यों? इसलिए कि कट्टरपंथियों ने यह प्रचार किया कि इस मस्जिद का निर्माण ढाई दिन में किया गया है। मस्जिद का अंदरुनी हिस्‍सा किसी मस्जिद की तुलना में मंदिर की तरह दिखता है।

तराईन के दूसरे युद्ध (1192) के बाद मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया था, तब वह विजेता के रूप में अजमेर से गुजरा था। वह यहां मंदिर से इतना भयभीत हुआ कि उसने उसे तुरंत नष्ट करके उसके स्थान पर मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की। उसने अपने गुलाम सेनापति को सारा काम 60 घंटे में पूरा करने का आदेश दिया ताकि लौटते समय वह नई मस्जिद में नमाज अदा कर सके। ढाई दिन के झोपड़े को बाद में पूरा किया गया और उसमें सुंदर नक्काशीदार दरवाजा लगाया गया।

#काशी_विश्वनाथ : द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।

इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।

डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज ब्राह्मण है।

सन् 1752 से लेकर सन् 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए। 7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।

अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।

सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मं‍डप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया।

इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक (1325) के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब 'विविध कल्प तीर्थ' में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोजशाह तुगलक के समय कुछ मंदिर मस्जिद में तब्दील हुए थे। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही लिंग है।

#कृष्णजन्मभूमि : मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि है और उसी जन्मभूमि के आधे हिस्से पर बनी है ईदगाह। औरंगजेब ने 1660 में मथुरा में कृष्ण मंदिर को तुड़वाकर ईदगाह बनवाई थी।

जन्मभूमि का इतिहास : जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, वहां पहले वह कारागार हुआ करता था। यहां पहला मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी 'वसु' नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था। इसके बहुत काल के बाद दूसरा मंदिर विक्रमादित्य के काल में बनवाया गया था।

इस भव्य मंदिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला।

क्रमशः......

गुरुवार, सितंबर 09, 2021

कहानी की मांग पर अभिनेत्रियों की जिस्म की नुमाइश।

उद्योगपति कुछ भी नहीं बनाते हैं। वह सिर्फ जोखिम उठाना जानता है। उद्योगपति सिर्फ गाली खाने के लिए बना जाता है। इसकी ही वजह से आज जयपुर और राजस्थान के व्यापारी अपने बच्चों को पढा लिखा कर नौकरी के लिए भेज देता है। हो सकता है देश के अन्य हिस्सों में भी यह बदलाव धीमे धीमे आ रहा हो। जैसे जैसे वामपंथ और समाजवाद की दादागिरी बढ़ रही है व्यापार धंधे चौपट हो रहे है।

उद्योगपति सिर्फ पूँजी लगाते है, सरकार की सारी शर्तें पूरी करते है और बैंक से अपनी जिम्मेदारी पर लोन लेते हैं । किस लिए??

जोमाटो हो या paytm या कोई भी अन्य स्टार्टअप ,उनमें से 98% स्टार्टअप , जो कि तथाकथित उद्योगपतियों द्वारा चलाये जाते है घाटे में चले जाते है और 2–3 साल में बंद हो जाते है। मजदूर या कर्मचारी उसके बाद अपनी सैलरी इत्यादि लेकर दूसरी जगह चला जाता है काम करने। रह जाता है सिर्फ एक उद्योगपति। पिछले 25 सालों में कई उद्योगपतियों को घाटा खाने के बाद फिर से नौकरी शुरू करते देखा है।

घाटे के बाद घर, बार फैक्ट्री बिकने का , फैक्टरी में वामपंथी समाजवादी मजदूर नेताओ के द्वारा बेमतलब हड़ताल होने का, फैक्ट्री जलाए जाने का सारा जोखिम उद्योगपति अपने सर लेते हैं। फैक्ट्री में किसी भी दुर्घटना के कारण होने वाले जान माल के नुकसान का जोखिम उद्योगपति का होता है।

मजदूर सुबह 9 बजे फैक्ट्री आता है एक टिफिन बॉक्स लेकर और शाम को 5 बजते ही चला जाता है। उसको कोई लेना देना नही है कि कच्चे माल की कीमत बढ़ रही है या घट रही हैं। टैक्स बढ़ रहा है या घट रहा है। BS4 आया है या BS6 उसको किसी से मतलब नहीं है। कौन सा नया कानून आया कौन सा बदला उससे मतलब नही है।

गुड़गाव में मारुति के प्लांट में दंगा होता है और उद्योगपति के प्रतिनिधि ह्यूमन रिसोर्स अवनीश कुमार देव को मारने पीटने के बाद जिंदा जला दिया जाता है, मज़दूरों के द्वारा।

बंगाल में एक जमाने के उद्योग धंधों का गढ़ हुआ करता था, जूट की फैक्टरियां और बहुत सारे अन्य उद्योग धंधे थे। फिर वामपंथ का भूत चढ़ा सब पर और बंगाल में उद्योग धंधों के नाम पर चील कव्वे उड़ने लगे।

वँहा का मजदूर बंगाल से निकल कर जंहा जंहा उद्योगधन्धे है वँहा जा कर काम कर रहा है। पूरे देश मे बंगाली मजदूर क्यों है क्योंकि बंगाल में पिछले 100 साल में वामपंथ और समाजवाद का भूत लोगो के सर पर चढ़ कर बहुत जोर से नाचा।

धन्यवाद ज्ञापित करें बंगाल के सारे वामपंथी नेताओं को जिन्होंने उद्योगपतियों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया और बंगाल से उद्योग धंधों को खत्म करने में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया।

यदि मजदूर उद्योगधन्धे चलाता तो आज बंगाल के वामपंथी मजदूरों के गढ़ में सबसे ज्यादा उद्योग धंधे होते , लेकिन धरातल की हक़ीक़त ममता बनर्जी और अन्य वामदलों को पता हैं। सरकार आज अपने उद्योग धंधे बेच रही है तो वो सिर्फ इसीलिए क्योंकि मजदूर काम नहीं करना चाह रहा है। चाहे BSNL हो या अन्य सरकारी कंपनियां या सरकारी स्कूल।

नक्सल वामपंथी विचारधारा के ही मानस पुत्र है। जो आदिवासी इनको नजदीक से जानते है वो बताते है कि नक्सली अपने क्षेत्र में वसूली की अर्थव्यवस्था चलाते है। हज़ारो करोड़ो की उगाही है इनकी छतीसगढ झारखंड बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में।

तालिबान के नृशंस हत्याकांड भी शर्मा जाए ऐसे कांड होते है वामपंथी नक्सलियों के । बंगाल की घटना शायद कुछ लोगों को याद हो जिसमें दो भाइयों को काटा गया और उनके खून से सना चावल उनकी माँ को खिलाया गया। यह सिर्फ एक घटना है , हज़ारों ऐसी घटनाएं हुई है नक्सल प्रभावित जगहों पर जंहा ISIS और तालिबान वालो की भी रूह कांप जाए।

जब वामपंथ इतना खतरनाक है मजदूरों के लिए तो क्यों भारत मे वामपंथ इतना प्रसिध्द है?? पूरे भारत मे छोड़िये पूरे विश्व में वामपंथ का कोई भी सकारात्मक योगदान नही है फिर भी कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़े लड़के , पत्रकार , अभिनेता व बुद्दिजीवी क्यों पागल है इसके पीछे?

जो धर्म में विश्वास करता है वो अपने धर्म के उत्थान के लिए काम करके आत्म संतुष्टि प्राप्त करता है।

जो जाति , उपजाति में विश्वास रखता है वह अपनी जाति उपजाति के लिए काम करके आत्म संतुष्टि प्राप्त करता है।

जिसको पैसा अच्छा लगता है वो मेहनत करके दिमाग लगाकर पैसे कमाने में आत्मसंतुष्टि हासिल करता है।

फिर आते है राष्ट्र की रक्षा करने वाले जो राष्ट्र के लिए कुछ करने में आत्मसंतुष्टि प्राप्त करते हैं।

कुछ गाय के लिए तो कुछ कुत्तों के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं और आत्मसंतुष्टि हासिल करते हैं।

एक विशेष तबका जब स्कूल कॉलेज में आधा अधूरा विज्ञान पढ़कर धर्म से अलग हो जाता है , दया से अलग हो जाता है और उसके हाँथ कार्ल मार्क्स की विचारधारा लगती है तो उसको लगता है यह बढ़िया है। हम सब वामपंथ की विचारधारा को अपना धर्म बना लेते हैं। शराब भी पी सकते है, कोई धर्म नही करना, हर तरीके का नशा और व्यभिचार भी वामपंथ और उदारवाद की आड़ में स्वतंत्रता के नाम पर किया जा सकता है।

बढ़िया गरीबो के लिए धरना देंगे ,नारे लगाएंगे, हड़ताल करेंगे, देश की सीमाओं के परे लोगों से दोस्ती करेंगे पूरा विश्व बंधुत्व कायम करेंगे। खुद ही सोचिये एक क्रांतिकारी की नज़रों से कितना बढ़िया है यह सब जो कार्ल मार्क्स ने किया था वो सब करने को मिलेगा। अंडरग्राउंड होकर चुपके चुपके सरकार विरोधी कार्य किसी को पता भी नही पड़ेगा।

कला , थियेटर ,नृत्य संगीत अभिनय के नाम पर स्कूल के बच्चों को CAA और NRC जैसे विषयों पर सरकार के प्रति नफरत भरने का सुख।

किताबी ज्ञान शब्द मुझे लगता है कि शायद इन्ही वामपंथी और उदारवादी विचारधाराओं के अनुगामियों के लिए ही खोजा गया होगा बुर्जुआ लोगों द्वारा।

वामपंथी विचारधारा आदर्शवादी और कल्पनाओं की दुनिया मे रहने में ही आंनद मानती है और व्यवहारिक ज्ञान के नाम पर शून्य होती है। वो भी वामपंथी और उदारवादी विचारधारों के अनुयायियों पर फिट बैठती है।

यह कोई संयोग नहीं है कि शराब और नशे की दुनिया मे रहने वाले पंजाबी युवा आजकल वामपंथ की और ज्यादा झुक रहे हैं।

जो वामपंथी देश की सीमाओं को नही मानते हैं वो घर मे मोटे मोटे ताले लगा कर घूमते हैं, उद्योगपतियों के खिलाफ नारे लगवाने वाले वामपंथी नेता पत्रकार कंपनियों के करोड़ो के शेयर लेकर बैठे होते हैं। परम सत्यवादी हरिश्चंद्र लोकतंत्र रक्षक वामपंथी उदारवादी समाजवादी श्री श्री श्री रवीश कुमार जी की सालाना तनख्वाह 3 करोड़ और कुल सम्प्पति लगभग 145 करोड़ है।

देखा जाए तो दोनों वामपंथी पत्रकार कई उद्योगपतियों से कई गुना ज्यादा सम्पत्ति रखे हुए हैं और भारत के 0.1% शीर्ष धनवानों में आते हैं।

गाली देना उद्योगपतियों को तो वैसा ही है जैसे कहानी की मांग पर अभिनेत्रियों की जिस्म की नुमाइश। फिर जैसे ही पैकअप होता है चार बॉउंसरो के बीच में सीधे अपनी कार में बैठ कर निकल जाती हैं अभिनेत्रियां।
Pradeep Tarar

शुक्रवार, सितंबर 03, 2021

प्रेम अन्धा होता है यह कहने वाले मूर्ख एक बार विचार करें--

 प्रेम अन्धा होता है यह कहने वाले मूर्ख एक बार विचार करें--

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प्रेम विवाह करने वाली युवतियाँ एक आर विचार जरूर करे।
सभी धर्म समान हैं यह कहने से पहले विचार कर ले।

(1) जेमिमा मार्सेल गोल्डस्मिथ और इमरान खान – ब्रिटेन के अरबपति सर जेम्स गोल्डस्मिथ की पुत्री (21), पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान (42) के प्रेमजाल में फ़ँसी, उससे 1995 में शादी की, इस्लाम अपनाया (नाम हाइका खान), उर्दू सीखी, पाकिस्तान गई, वहाँ की तहज़ीब के अनुसार ढलने की कोशिश की, दो बच्चे (सुलेमान और कासिम) पैदा किये… नतीजा क्या रहा… तलाक-तलाक-तलाक। अब अपने दो बच्चों के साथ वापस ब्रिटेन। फ़िर वही सवाल – क्या इमरान खान कम पढ़े-लिखे थे? या आधुनिक(?) नहीं थे? जब जेमिमा ने इतना “एडजस्ट” करने की कोशिश की तो क्या इमरान खान थोड़ा “एडजस्ट” नहीं कर सकते थे? (लेकिन “एडजस्ट” करने के लिये संस्कारों की भी आवश्यकता होती है)…

(2) 24 परगना (पश्चिम बंगाल) के निवासी नागेश्वर दास की पुत्री सरस्वती (21) ने 1997 में अपने से उम्र में काफ़ी बड़े मोहम्मद मेराजुद्दीन से निकाह किया, इस्लाम अपनाया (नाम साबरा बेगम)। सिर्फ़ 6 साल का वैवाहिक जीवन और चार बच्चों के बाद मेराजुद्दीन ने उसे मौखिक तलाक दे दिया और अगले ही दिन कोलकाता हाइकोर्ट के तलाकनामे (No. 786/475/2003 दिनांक 2.12.03) को तलाक भी हो गया। अब पाठक खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि चार बच्चों के साथ घर से निकाली गई सरस्वती उर्फ़ साबरा बेगम का क्या हुआ होगा, न तो वह अपने पिता के घर जा सकती थी, न ही आत्महत्या कर सकती थी…

अक्सर हिन्दुओं और बाकी विश्व को मूर्ख बनाने के लिये मुस्लिम और सेकुलर विद्वान(?) यह प्रचार करते हैं कि कम पढ़े-लिखे तबके में ही इस प्रकार की तलाक की घटनाएं होती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। क्या इमरान खान या नवाब पटौदी कम पढ़े-लिखे हैं? तो फ़िर नवाब पटौदी, रविन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से रिश्ता रखने वाली शर्मिला से शादी करने के लिये इस्लाम छोड़कर, बंगाली क्यों नहीं बन गये? यदि उनके “सुपुत्र”(?) सैफ़ अली खान को अमृता सिंह से इतना ही प्यार था तो सैफ़, पंजाबी क्यों नहीं बन गया? अब इस उम्र में अमृता सिंह को बच्चों सहित बेसहारा छोड़कर करीना कपूर से इश्क की पींगें बढ़ा रहा है, और उसे भी इस्लाम अपनाने पर मजबूर करेगा, लेकिन खुद पंजाबी नहीं बनेगा (यही है असली मानसिकता…)।

शेख अब्दुल्ला और उनके बेटे फ़ारुख अब्दुल्ला दोनों ने अंग्रेज लड़कियों से शादी की, ज़ाहिर है कि उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद, यदि वाकई ये लोग सेकुलर होते तो खुद ईसाई धर्म अपना लेते और अंग्रेज बन जाते…? और तो और आधुनिक जमाने में पैदा हुए इनके पोते यानी कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक हिन्दू लड़की “पायल” से शादी की, लेकिन खुद हिन्दू नहीं बने, उसे मुसलमान बनाया, तात्पर्य यह कि “सेकुलरिज़्म” और “इस्लाम” का दूर-दूर तक आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और जो हमें दिखाया जाता है वह सिर्फ़ ढोंग-ढकोसला है। जैसे कि गाँधीजी की पुत्री का विवाह एक मुस्लिम से हुआ, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री का निकाह विदेश सचिव सलमान हैदर के पुत्र से हुआ है, प्रख्यात बंगाली कवि नज़रुल इस्लाम, हुमायूं कबीर (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने भी हिन्दू लड़कियों से शादी की, क्या इनमें से कोई भी हिन्दू बना? अज़हरुद्दीन भी अपनी मुस्लिम बीबी नौरीन को चार बच्चे पैदा करके छोड़ चुके और अब संगीता बिजलानी से निकाह कर लिया, उन्हें कोई अफ़सोस नहीं, कोई शिकन नहीं। ऊपर दिये गये उदाहरणों में अपनी बीवियों और बच्चों को छोड़कर दूसरी शादियाँ करने वालों में से कितने लोग अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं? तब इसमें शिक्षा-दीक्षा का कोई रोल कहाँ रहा? यह तो विशुद्ध लव-जेहाद है।

वहीदा रहमान ने कमलजीत से शादी की, वह मुस्लिम बने, अरुण गोविल के भाई ने तबस्सुम से शादी की, मुस्लिम बने, डॉ ज़ाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति) की लड़की ने एक हिन्दू से शादी की, वह भी मुस्लिम बना, एक अल्पख्यात अभिनेत्री किरण वैराले ने दिलीपकुमार के एक रिश्तेदार से शादी की और गायब हो गई।

इस कड़ी में सबसे आश्चर्यजनक नाम है भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का। मेदिनीपुर से 37 वर्षों तक सांसद रहने वाले कम्युनिस्ट (जो धर्म को अफ़ीम मानते हैं), जिनकी शिक्षा-दीक्षा सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज दिल्ली तथा किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में हुई, 62 वर्ष की आयु में एक मुस्लिम महिला सुरैया से शादी करने के लिये मुसलमान (इफ़्तियार गनी) बन गये। सुरैया से इन्द्रजीत गुप्त काफ़ी लम्बे समय से प्रेम करते थे, और उन्होंने उसके पति अहमद अली (सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा अली के पिता) से उसके तलाक होने तक उसका इन्तज़ार किया। लेकिन इस समर्पणयुक्त प्यार का नतीजा वही रहा जो हमेशा होता है, जी हाँ, “वन-वे-ट्रेफ़िक”। सुरैया तो हिन्दू नहीं बनीं, उलटे धर्म को सतत कोसने वाले एक कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त “इफ़्तियार गनी” जरूर बन गये।

इसी प्रकार अच्छे खासे पढ़े-लिखे अहमद खान (एडवोकेट) ने अपने निकाह के 50 साल बाद अपनी पत्नी “शाहबानो” को 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया, जो 5 बच्चों की माँ थी… यहाँ भी वजह थी उनसे आयु में काफ़ी छोटी 20 वर्षीय लड़की (शायद कम आयु की लड़कियाँ भी एक कमजोरी हैं?)। इस केस ने समूचे भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अच्छी-खासी बहस छेड़ी थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता देने के लिये सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी ने अपने असाधारण बहुमत के जरिये “वोटबैंक राजनीति” के चलते पलट दिया, मुल्लाओं को वरीयता तथा आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिम को दरकिनार किया गया… तात्पर्य यही कि शिक्षा-दीक्षा या अधिक पढ़े-लिखे होने से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, शरीयत और कुर-आन इनके लिये सर्वोपरि है, देश-समाज आदि सब बाद में…।

(यदि इतना ही प्यार है तो “हिन्दू” क्यों नहीं बन गये? मैं यह बात इसलिये दोहरा रहा हूं, कि आखिर मुस्लिम बनाने की जिद क्यों? इसके जवाब में तर्क दिया जा सकता है कि हिन्दू कई समाजों-जातियों-उपजातियों में बँटा हुआ है, यदि कोई मुस्लिम हिन्दू बनता है तो उसे किस वर्ण में रखेंगे? हालांकि यह एक बहाना है क्योंकि इस्लाम के कथित विद्वान ज़ाकिर नाइक खुद फ़रमा चुके हैं कि इस्लाम “वन-वे ट्रेफ़िक” है, कोई इसमें आ तो सकता है, लेकिन इसमें से जा नहीं सकता… लेकिन चलो बहस के लिये मान भी लें, कि जाति-वर्ण के आधार पर आप हिन्दू नहीं बन सकते, लेकिन फ़िर सामने वाली लड़की या लड़के को मुस्लिम बनाने की जिद क्योंकर? क्या दोनो एक ही घर में अपने-अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते? मुस्लिम बनना क्यों जरूरी है? और यही बात उनकी नीयत पर शक पैदा करती है)

एक बात और है कि धर्म परिवर्तन के लिये आसान निशाना हमेशा होते हैं “हिन्दू”, जबकि ईसाईयों के मामले में ऐसा नहीं होता, एक उदाहरण और देखिये –

पश्चिम बंगाल के एक गवर्नर थे ए एल डायस (अगस्त 1971 से नवम्बर 1979), उनकी लड़की लैला डायस, एक लव जेहादी ज़ाहिद अली के प्रेमपाश में फ़ँस गई, लैला डायस ने जाहिद से शादी करने की इच्छा जताई। गवर्नर साहब डायस ने लव जेहादी को राजभवन बुलाकर 16 मई 1974 को उसे इस्लाम छोड़कर ईसाई बनने को राजी कर लिया। यह सारी कार्रवाई तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की देखरेख में हुई। ईसाई बनने के तीन सप्ताह बाद लैला डायस की शादी कोलकाता के मिडलटन स्थित सेंट थॉमस चर्च में ईसाई बन चुके जाहिद अली के साथ सम्पन्न हुई। इस उदाहरण का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी माहौल में पढ़े-लिखे और उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले डायस साहब भी, एक मुस्लिम लव जेहादी की “नीयत” समझकर उसे ईसाई बनाने पर तुल गये। लेकिन हिन्दू माँ-बाप अब भी “सहिष्णुता” और “सेकुलरिज़्म” का राग अलापते रहते हैं, और यदि कोई इस “नीयत” की पोल खोलना चाहता है तो उसे “साम्प्रदायिक” कहते हैं। यहाँ तक कि कई लड़कियाँ भी अपनी धोखा खाई हुई सहेलियों से सीखने को तैयार नहीं, हिन्दू लड़के की सौ कमियाँ निकाल लेंगी, लेकिन दो कौड़ी की औकात रखने वाले मुस्लिम जेहादी के बारे में पूछताछ करना उन्हें “साम्प्रदायिकता” लगती है…

मुझे यकीन है कि, मेरे इस लेख के जवाब में मुझे सुनील दत्त-नरगिस से लेकर रितिक रोशन-सुजैन खान तक के (गिनेचुने) उदाहरण सुनने को मिलेंगे, लेकिन फ़िर भी मेरा सवाल वही रहेगा कि क्या सुनील दत्त या रितिक रोशन ने अपनी पत्नियों को हिन्दू धर्म ग्रहण करवाया? या शाहरुख खान ने गौरी के प्रेम में हिन्दू धर्म अपनाया? नहीं ना? जी हाँ, वही वन-वे-ट्रैफ़िक!!!!

सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसा प्रेम है? यदि वाकई “प्रेम” ही है तो यह वन-वे ट्रैफ़िक क्यों है? इसीलिये सभी सेकुलरों, प्यार-मुहब्बत-भाईचारे, धर्म की दीवारों से ऊपर उठने आदि की हवाई-किताबी बातें करने वालों से मेरा सिर्फ़ एक ही सवाल है, “कितनी मुस्लिम लड़कियों (अथवा लड़कों) ने “प्रेम”(?) की खातिर हिन्दू धर्म स्वीकार किया है?” मैं इसका जवाब जानने को बेचैन हूं।