गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

तीस्ता सीतलवाड के मुँह पर पड़ा “बूमरैंग”

तीस्ता सीतलवाड के मुँह पर पड़ा “बूमरैंग” – क्यों न पद्मश्री वापस छीन ली जाये? Teesta Setalvad Gujrat Riots Supreme Court of India

Vineet Kumar Singh

“शर्मनिरपेक्षता” के खेल की धुरंधर खिलाड़ी, सेकुलर गैंगबाजों की पसन्दीदा अभिनेत्री, झूठे और फ़र्जी NGOs की “आइकॉन”, यानी सैकड़ों नकली पद्मश्रीधारियों में से एक, तीस्ता सीतलवाड के मुँह पर सुप्रीम कोर्ट ने एक तमाचा जड़ दिया है। पेट फ़ाड़कर बच्चा निकालने की जो कथा लगातार हमारा सेकुलर मीडिया सुनाता रहा, आखिर वह झूठ निकली। सात साल तक लगातार भाजपा और मोदी को गरियाने के बाद उनका फ़ेंका हुआ “बूमरेंग” उन्हीं के थोबड़े पर आ लगा है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत गठित “स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम” (SIT) ने सुप्रीम कोर्ट में तथ्य पेश करते हुए अपनी रिपोर्ट पेश की जिसके मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

1) कौसर बानो नामक गर्भवती महिला का कोई गैंगरेप नहीं हुआ, न ही उसका बच्चा पेट फ़ाड़कर निकाले जाने की कोई घटना हुई।

2) नरोडा पाटिया के कुँए में कई लाशों को दफ़न करने की घटना भी झूठी साबित हुई।

3) ज़रीना मंसूरी नामक महिला जिसे नरोडा पाटिया में जिंदा जलाने की बात कही गई थी, वह कुछ महीने पहले ही TB से मर चुकी थी।

4) ज़ाहिरा शेख ने भी अपने बयान में कहा कि तीस्ता ने उससे कोरे कागज़ पर अंगूठा लगवा लिया था।

5) तीस्ता के मुख्य गवाह रईस खान ने भी कहा कि तीस्ता ने उसे गवाही के लिये धमकाकर रखा था।

6) सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सारे एफ़िडेविट एक ही कम्प्यूटर से निकाले गये हैं और उनमें सिर्फ़ नाम बदल दिया गया है।

7) विशेष जाँच दल ने पाया कि तीस्ता सीतलवाड ने गवाहों को धमकाया, गलत शपथ-पत्र दाखिल किये, कोर्ट में झूठ बोला।

कुल मिलाकर कहानी में जबरदस्त मोड़ आया है और धर्मनिरपेक्षता के झण्डाबरदार मुँह छिपाते घूम रहे हैं। NGO नामक पैसा उगाने वाली फ़र्जी संस्थाओं को भी अपने विदेशी आकाओं को जवाब नहीं देते बन रहा, गुजरात में उन्हें बेहतरीन मौका मिला था, लेकिन लाखों डॉलर डकार कर भी वे कुछ ना कर सके।हालांकि देखा जाये तो उन्होंने बहुत कुछ किया, नरेन्द्र मोदी की छवि खराब कर दी, गुजरात को बदनाम कर दिया, “भगवा” शब्द की खूंखार छवि बना दी… यानी काफ़ी काम किया।

अब समय आ गया है कि विदेशी मदद पाने वाले सभी NGOs की नकेल कसना होगी। इन NGOs के नाम पर जो फ़र्जीवाड़ा चल रहा है वह सबको पता है, लेकिन सबके अपने-अपने स्वार्थ के कारण इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हाल ही में रूस ने एक कानून पास किया है और उसके अनुसार विदेशी पैसा पाने वाले NGO और अन्य संस्थाओं पर रूसी सरकार का नियन्त्रण रहेगा। पुतिन ने साफ़ समझ लिया है कि विदेशी पैसे का उपयोग रूस को अस्थिर करने के लिये किया जा रहा है, जॉर्जिया में “गुलाबी क्रांति”, यूक्रेन में “ऑरेंज क्रांति” तथा किर्गिस्तान में “ट्यूलिप क्रांति” के नाम पर अलगाववाद को हवा दी गई है। रूस में इस समय साढ़े चार लाख NGO चल रहे हैं और अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार इन संगठनों को 85 करोड़ डॉलर का चन्दा “रूस में लोकतन्त्र का समर्थन”(?) करने के लिये दिये गये हैं। ऐसे में भारत जैसे ढीले-ढाले देश में ये “विदेशी पैसा” क्या कहर बरपाता होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि इस प्रकार के NGO पर भारत सरकार का नियन्त्रण हो भी जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि जब “माइनो सरकार” का पीछे से समर्थन है तो उनका क्या बिगड़ेगा?

हमेशा की तरह हमारा “सबसे तेज” सेकुलर मीडिया इस मामले को दबा गया, बतायें इस खबर को कितने लोगों ने मीडिया में देखा है? पहले भी कई बार साबित हो चुका है कि हमारा मीडिया “हिन्दू-विरोधी” है, यह उसका एक और उदाहरण है। बड़ी-बड़ी बिन्दियाँ लगाकर भाजपा-संघ के खिलाफ़ चीखने वाली महिलायें कहाँ गईं? अरुंधती रॉय, शबाना आजमी, महेश भट्ट, तरुण तेजपाल, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई आदि के फ़टे हुए मुँह क्यों नहीं खुल रहे?

अब सवाल उठता है कि जिस “गुजरात के दंगों” की “दुकान” लगाकर तीस्ता ने कई पुरस्कार हड़पे उनका क्या किया जाये? पुरस्कारों की सूची इस प्रकार है –

1) पद्मश्री 2007 (मजे की बात कि पद्मश्री बरखा दत्त को भी कांग्रेसियों द्वारा ही मिली)

2) एमए थॉमस मानवाधिकार अवार्ड

3) न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क के साथ मिला हुआ डिफ़ेंडर ऑफ़ डेमोक्रेसी अवार्ड

4) न्यूरेनबर्ग ह्यूमन राईट्स अवार्ड 2003

5) 2006 में ननी पालखीवाला अवार्ड।

अब जबकि तीस्ता सीतलवाड झूठी साबित हो चुकी हैं, यानी कि ये सारे पुरस्कार ही “झूठ की बुनियाद” पर मिले थे तो क्या ये सारे अवार्ड वापस नहीं लिये जाने चाहिये? हालांकि भारत की “व्यवस्था” को देखते हुए तीस्ता का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, वह अपने इन नकली कामों में फ़िर से लगी रहेगी…

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