गुरुवार, सितंबर 08, 2011

भाजपा, हिंदुत्वा, आगामी चुनाव और अतीत की गलतियाँ

भाजपा, हिंदुत्वा, आगामी चुनाव और अतीत की गलतियाँ

Lovy Bhardwaj द्वारा
2014 के आम चुनाव के लिए भाजपा की तैयारी दिखने लगी है. पार्टी अध्यक्ष श्री नितिन गडकरी जी ने 2009 में मिले मत से 10 प्रतिशत अधिक मत प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारण किया है.
ऐसे में मैं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समर्पित कार्यकर्ता के रूप में भाजपा कि संभावनाओं और कमियों  पर एक नजर डालना चाहता हूँ.
पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे मेरे धृष्टता न समझें.

2004 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा तो मीडिया से लेकर पार्टी के भीतर तक हार के कारणों पर विचार शुरू हुआ.
मीडिया ने तो मतगणना के दुसरे हीं दिन फतवा जारी कर दिया कि सांप्रदायिक नीतियों के कारण भाजपा की हार हुई है.
लेकिन कुछ दिनों बाद हीं शिमला में हुए चिंतन शिविर में पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपयी जी ने भी मीडिया के सामने कहा कि नरेन्द्र मोदी और गुजरात दंगो के कारण भाजपा कि हार हुई है.
यद्यपि तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष श्री वेंकैया नायडू ने तथा बाद में स्वयं वाजपयी जी ने भी इसका खंडन किया किन्तु पार्टी के समर्थकों और जनता में जो सन्देश नहीं जाना था वो जा चुका था, लगे हाथ कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए कि पार्टी गैरसंघी पृष्ठभूमि के नेताओं के नियंत्रण में जाती दिखी.
हमने भी अपने स्तर पर यह विचार किया कि क्या सचमुच नरेन्द्र मोदी और गुजरात के कारण हीं भाजपा हारी है?
यदि ऐसा होता तो गुजरात में तो भाजपा कि जमानत जब्त होनी चाहिए थी, क्योंकि दंगे तो वहीँ हुए थे ना.
लेकिन गुजरात में तो गोधरा के ठीक बाद हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने भाजपा का परचम हीं लहराया था और 2004 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने 14 सीटे जीतीं, शायद ऐसा कहने वाले यह बात भूल गए की नरेंद्र मोदी को आज गुजरात का मुस्लमान भी वोट देता है, दंगों के कारण जो चरित्र हनन की कोशिश की गई विरोधी पार्टियों द्वारा उसे गुजरात की जनता ने सार्थक नहीं होने दिया.
कहीं ऐसा तो नहीं है कि गुजरात के बाहर जो हिन्दू हैं वे हिंदुत्व  से अधिक छद्म धर्मनिरपेक्षता 'SICKULARISM' में विश्वास रखते हैं और वे गुजरात कि सजा यहाँ दे रहे हैं?
लेकिन जो मेरी विवेचना रही वो ये कि पार्टी गुजरात के कारण नहीं डूबी, बल्कि डूबने के कारण अलग थे.
पार्टी की हार का कारण यह था कि लोगों का विश्वास  टूटा था. इस विश्वास के टूटने ने समर्पित कार्यकर्ताओं  को वोटर बना दिया. वोटर तो वे अब भी हैं क्योंकि स्नेह का रिश्ता टूटा नहीं है.
याद है चुनाव जब वाजपयी जी ने कहा था कि समाजवादी पार्टी कि विचारधारा हमसे मिलाती है. उत्तर प्रदेश में भाजपा नेता प्रायः कहा करते थे कि हमें वोट नहीं दे सकते तो मुलायम सिंह यादव को वोट  दीजिये. भाजपाई हतप्रभ थे कि भला सपा और भाजपा कि विचारधारा एक कबसे  हुई? 
क्या नदी के दो किनारे भी मिलने लगे हैं?
कहाँ भाजपा  कार्यकर्ता  मुलायम को मौलाना मुलायम कहते फिरते थे, कहाँ अब उसी मुलायम को वोट देने की अपील उन्ही के बड़े नेता कर रहे हैं.
निष्ठ्वान कार्यकर्ताओं को जोड़ का झटका लगा और इसका नतीजा - भाजपा 1998 के 57 और 1999 के 29 से 2004 के 11 पर सिमट गयी, ऊपर से दलील यह कि हिंदुत्व  के कारण हारे हैं.
कार्यकर्ताओं को समझ आ गया कि भाजपा सड़कें बनवा सकती है, बिजली और रोजगार भी ला सकती है लेकिन राष्ट्रवाद अब नहीं!
अब हिंदुत्व छोड़ने से हारे या पकड़ने से हारे यह तो आप हीं बताएं.
मुझे आश्चर्य  होता है कि उनलोगों ने ये क्यों ना सोचा कि यदि हिंदुत्व हार का कारण बना है तो भला पार्टी के उद्भव का कारण क्या है.
अब सोचे भी कैसे, जो लोग इम्पोर्टेड थे या फिर जमीं पर उतरे बिना हीं सत्ता के हिस्सेदार बन बैठे थे उन्हें कैसे समझ आये कि पार्टी बनी कैसे है.
जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि श्री वेंकैया नायडू  और स्वयं वाजपेयी जी ने भी अपने गुजरात सम्बन्धी बयान का खंडन किया था.
लेकिन पार्टी में यह विचार जगह बनाने लगा था कि शायद हिंदुत्व ने हीं हराया है और उदार अर्थात छद्म धर्मनिरपेक्षता कि धोती पहनने कि कोशिश जारी हुई.
इसी कारण जिन्ना धर्मनिरपेक्ष हुए. ठीक यही कारण 2009 में भी पार्टी के हार का कारण बनी. वरना महंगाई, सुरक्षा, विकाश, भ्रष्टाचार और नेतृत्व के स्तर पर देव गौड़ा और गुजराल से भी घटिया प्रदर्शन करने वाले और बकरी कि तरह मिमियाने वाले अमेरिका के दलाल को सत्ता क्यों कर मिलती.
जिस पार्टी में एक भी नेता ढंग की हिंदी नहीं बोल पाता उस पार्टी को उत्तर प्रदेश में बिना किसी लहर के वापसी का मौका मिला और भाजपा वहीँ की वहीँ रह गयी.
अब जब पार्टी पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह कह रहे हों कि मंदिर का मसाला न्यायलय निपटाए अथवा आपसी बातचीत से हो तो कार्यकर्ता क्या करने सड़क पर उतरे.
वर्षों बाद संघ के हस्तक्षेप के कारण अब जब कि भाजपा सर के बजाये पैर के बल खरी है तो आशा भी जगी है और उर्जा भी मिली है, कार्यकर्ताओं को.
गडकरी जी ने 10 प्रतिशत मत वृद्धि की बात की है हम कहते हैं २० प्रतिशत तो यूँ हीं बढ़ जायेंगे. यदि संभव हो तो मेरी बातों पर गौर करें:

1) सबसे पहले महाराष्ट्र जो कि गडकरी जी का गृह राज्य है वहां कि बात करते हैं. महाराष्ट्र में भाजपा और शिव सेना में गठजोड़ है.
कहने को तो शिव सेना हिंदुत्व कि बात करती है लेकिन हिंदुत्व से इस पार्टी को चाहे जितना प्रेम हो उससे कहीं अधिक घृणा उत्तर भारतीयों से है.
यह कहने कि जरूरत नहीं कि शिव सेना अपनी हीं जुड़वाँ पार्टी मनसे के कारण महाराष्ट्र में अब लगभग समाप्त प्राय हो चुकी है.
मेरे विचार से तो शिव सेना और मनसे दोनों किसी भी दृष्टी से महबूबा मुफ्ती की पीडीपी से कम नहीं है.
एक दुखद बात यह भी है कि महाराष्ट्र के विधानसभा  चुनाव में जब श्री गडकरी जी महारष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे, शिव सेना और भाजपा के साझा घोषणापत्र में गैर मराठियों के महाराष्ट्र में प्रवेश को वर्जित करने के लिए कानून बनाने की बात कही गयी था.
मेरे विचार से तो देशहित में भाजपा को शिव सेना से गठजोड़ तोड़कर वहन अपनी ताकत बढ़ानी चाहिए. इसका लाभ बिहार और उत्तर प्रदेश में भी मिलेगा.

2) इसके बाद बात करें देश के सबसे बड़े और राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की. कहाँ 1998 के 57 लोकसभा सीट और 2004 और 2009 के 11  सीट.
राम मंदिर आन्दोलन ने उत्तर प्रदेश हीं सम्पूर्ण गाय पट्टी में हिन्दुओं को जाती से ऊपर उठकर वोट  करने के लिए प्रोत्साहित किया था.
अब फिर वहां जाति का खेल जारी है.
गाय पट्टी में भाजपा को तभी सफलता मिलेगी जब वहां लोग जाति से ऊपर उठकर वोट करेंगे. 
दरअसल जातिवादी राजनीती भी भावनाओं के अधर पर हीं होती है और जाति तोड़ने के लिए उससे भी बड़ी भावना कि जरूरत है.
और वो है राम और गाय. ये दोनों चीजे हीं उत्तर भारत के हिन्दुओं को जोड़ने में सक्षम है.

3) बिहार में पिछले लोकसभा चुनाव में  भाजपा का प्रदर्शन अपूर्व रहा था. लेकिन कहना  ना होगा कि पार्टी सांगठनिक रूप से कमजोड हुई है.
बिहार में भाजपा सबसे अधिक मजबूत है सिमांचल क्षेत्र में. यह वो क्षेत्र है जहाँ मुस्लिम 35 प्रतिशत हैं और यादव जाति  के साथ अजेय समीकरण बनती  है.
लेकिन भाजपा ने वहां हिन्दू वोट गोलबंद करके राजद की नकेल कस दी है.
अब नितीश ने सिमांचल के गुंडे तस्लीमुद्दीन को अपनी पार्टी में ले लिया है.
भाजपा जनसंघ के दिनों से इस नर-पिशाच से लड़ती  आ रही है.
अब तो उसका विरोध भी नहीं कर सकती क्योंकि वह अपने साथ हीं खड़ा है.
इसका नतीजा होगा कि हिन्दू वोटो की गोलबंदी टूटेगी और भाजपा कमजोर होगी.
नितीश ने मुस्लमान को खुश करने के लिए बिहार में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय  खोला है जिसके विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं ने पुलिस से मार भी खाई हैं.
चुन चुन कर नितीश ने वही किया है जो भाजपा के वोट बैंक को प्रभावित कराती है. और जिस विकास का हल्ला मचाया है उसने वो भी भाजपा के कारण हीं है.
जिन मंत्रालयों को भाजपाई संभाल रहे हैं वहीँ कुछ काम हुआ है.
लेकिन विकास का सारा श्री वह खुद ले गए. असल में वह भाजपा को कमजोड कार के प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं.
उनका  अनुमान है कि भाजपा अगर 60- 70 सीटों में सिमट गयी तो वह 2014 में प्रधानमंत्री भी बन सकते है. 
ऐसे में भाजपा को नितीश से बेहद सवधान रहने कि जरूरत है.
अगर दूर-दर्शिता दिखाई जाए तो नितीश & Co. को जय राम जी की कह कर अकेले ही चला जाए.

4) पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल ऐसे राज्य  हैं. जहाँ भाजपा लगभग नहीं है.
लेकिन मेरे विचार से यदि  6-7 वर्षों  में भाजपा सम्पूर्ण  उत्तर भारत  में विस्तार  कर सकती है तो  फिर हिंदुत्व के मदद से इन राज्यों में क्यों नहीं.
जहाँ पार्टी है सत्ता में, वहां विकाश और जहाँ नहीं है वहां हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मदद से हीं शक्ति प्राप्त की जा सकती है.

5) श्री राम मंदिर मुद्दे का निर्णय आने वाला है, और समस्त पेटीयाँ मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रख कर आगे की नीतियाँ बनायेंगी.
तो आवश्यक है की भाजपा को अब श्री राम मंदिर मुद्दे को गंभीरता से लेकर अतीत में हुई गलतियों को सुधारना चाहिए,
सनातन धर्मी सदैव भाजपा के साथ हैं ऐसा मेरा मानना है बस विश्वास जगाने की देर है,
जय श्री राम का उद्घोष किया जाए और श्री राम मंदिर के साथ साथ मथुरा और कशी के मंदिरों के लिए भी मुहीम तेज कर दी जानी चहिये....
ताज महल को भी शिव मंदिर तेजो महालय में बदल देना चाहिए.
समस्त सनातन धर्मी इस कार्य में एकजुट होकर आगे आयंगे... ऐसा मेरा मानना है ...विश्वास भी है

मैं  आशा करता हूँ  कि बकरी प्रधानमंत्री का यह अंतिम कार्यकाल हो और देश को विदेशी माता के संतानों के नेतृत्व में ना रहना हो.
यदि  भाजपा 2014 में नहीं जित सकी तो 2019 तक बहुत देर हो जाएगी.
क्योंकि अगर ITALIAN RULE 2014 के बाद 5 साल और चल गया तो अखंड भारत तो खंड खंड होगा ही साथ ही साथ मुल्सिम बहुल द्वारा वैश्विक इस्लामीक प्रसार भी चरम पर पहुँच जायेगा.

समस्त राजनीतिक पार्टियों से अपना गठजोड़ तोड़कर अकेले आगे बढ़ा जाये और भविष्य में किसी भी पार्टी से हाथ न मिलाया जाए, जो बिना शर्त समर्थन दे या साथ चलने की बात करे वो चले .... अन्यथा किसी के पीछे भागने या किसी को खुश करने के लिए पार्टी की विचारधारा को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है ...

सनातन धर्म में हमेशा शरण में आये हुए को गले लगाया जाता है और यही हमारी सभ्यता, संस्कृति और धर्म है.
उन समस्त कार्यकर्ताओं को वापिस लाना चाहिए जिन्होंने पार्टी को मजबूत करने में अपना विशेष योगदान दिया है. उनकी भूमिका आज भी महत्वपूर्ण और अतुलनीय है 
भाजपा को दोबारा हिंदुत्व का दामन थाम कर आगे बढ़ना चाहिए और ऐसी समस्त नीतियों पर विराम लगा देना चाहिए जो अतीत में पार्टी के विघटन का कारण बनी हैं l 
निश्चय ही समस्त हिंदुत्व-वादी दोबारा पार्टी को मजबूत करने में सहायक होंगे..... 
तो आवश्यक है की पार्टी अपनी गलतियों से सबक ले और भविष्य कि तयारी में लगे. किन्तु कार्यकर्ताओं की भावनाओं को आहत ना करे .


जय श्री राम 
हर हर महादेव

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