सोमवार, अगस्त 06, 2012

संस्कृत है- ”भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” –डॉ.मधुसूदन

संस्कृत है- ”भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” –डॉ.मधुसूदन

प्रवेश:
ॐ —देववाणी संस्कृत: ”भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” A Cosmic Grand Opera –कहते हैं, ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” के निर्देशक प्रो. व्यास ह्युस्टन
ॐ —प्राचीन भारतीय ऋषि-मनीषियों ने, शब्द की अमरता का, गहन आकलन किया था।
ॐ—मानवीय चेतना की उत्क्रान्ति का क्रम-विकास, भाषा-विकास के साथ अटूट रूप से जुडा हुआ है; इस तथ्य को समझा था।
ॐ—संकरित वर्णों को विचार पूर्वक वर्जनीय समझा था।
ॐ–संस्कृत की स्पंन्दन क्षमता और सुसंवादी ऊर्जा भी एक भव्य अंतरिक्षी आयाम है।

(१)
भव्य ब्रह्मांडीय संगीत
देववाणी संस्कृत भाषा को, भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” A Cosmic Grand Opera इन शब्दों में वर्णन करने वाले विद्वान व्यक्ति कोई भारतीय नहीं, पर ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” के निर्देशक प्रो. व्यास ह्युस्टन है। ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” न्यु-योर्क के महा-नगर में, १९८९ में प्रारंभ हुआ था, जो संस्कृत शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है; जिस के निर्देशक है, संस्कृत भक्त ”प्रो. व्यास ह्युस्टन”।
”A great deal of thought went into the development of the Sanskrit alphabet.” वे कहते हैं, बडा गहरा चिन्तन हुआ था, संस्कृत के अक्षरों को विकसित करने में।
प्राचीन भारत के ऋषियों ने, शब्द की अमरता का, बडा गंभीर आकलन किया था। उन्हों ने मानव जीवन विकास में, और उस की उन्नति में, शब्द के योगदान पर चिन्तन किया था। जीवन को पुष्ट करने में भी शब्द की विस्मयकारक क्षमता का आसामान्य आकलन उन्हें था। हज़ारो वर्षों के बाद भी आज तक अन्य कोई संस्कृति ऐसी परिपूर्ण भाषा निर्माण करने में सफल नहीं हुयी है। भारत के लिए कितनी गौरवप्रद बात है; मैं सोचता हूँ।

(२)
भाषा विकास से जुडा है आध्यात्मिक उत्कर्ष
हज़ारों वर्षों तक, प्राचीन भारतीय ऋषि-मनीषि, भाषा के विकास कार्य में रत रहे। उस में परिपूर्णता लाने का निरन्तर प्रयास करते रहे। यह सारा परिश्रम केवल इस उद्देश्य से किया गया, कि वे अपने आप की (आत्मा की) दैवी प्रकृति का परिचय प्राप्त करे, उसे पहचाने।
इन वैय्याकरणियों की श्रद्धा थी, प्रोफ़ेसर व्यास ह्युस्टन कहते है, कि, –
”मानवीय चेतना की उत्क्रान्ति का क्रम-विकास, उसके भाषा-विकास के साथ अटूट रूप से जुडा हुआ है।”
उनके शब्दों में ”the evolution of human awareness is inextricably linked to the development of language.”
वाह ! वाह ! वाह !, क्या बात कही, आपने, प्रो. ह्युस्टन, अभी तो हम भारतीय भी इस सच्चाई को उपेक्षा के कारण भूल से गये हैं। कुछ सुशिक्षित भी इस सत्य को जानते प्रतीत नहीं होते, और अन्य भ्रांत-मति पढत-मूर्ख बची खुची संस्कृत की और संस्कृति की निरन्तर उपेक्षा करने में व्यस्त हैं।

(३)
संस्कृत की घोर उपेक्षा
एक ऐसे ही, भारतीय मूल के प्रमाण पत्र धारी विद्वान(?) हैं। वे, ऐसे ही बात बात में अपना अधकचरा ज्ञान प्रदर्शित करते करते कहने लगे, कि ”संस्कृत तो डेड लॅंग्वेज है। इस से जितना शीघ्र छुटकारा भारत पाएगा, उतना आगे बढ जाएगा।”
उन की आयु देख लोग उन से भिडते नहीं है। पर कोई विरोध न देख, वे अपने आप को कल्कि अवतार समझ बैठे, और भारत का उद्धार करने की भाव दशा में आ गए। फिर आगे बोले, कि सारा भारत यदि अंग्रेज़ी सीख जाएं, तो चुटकी में उन्नति हो सकती है। { मन ही मन मैं बोला। वाह ! वाह ! चुटकी में उन्नति?} वे बोले, नए शब्द तो संस्कृत स्वीकार करती नहीं, और पुराने दकियानूसी शब्दों से भारत आगे कैसे बढ पाएगा?
तो मैं ने उन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत शब्द का प्रयोग किए बिना आप की अपनी भाषा का एक वाक्य भी बोल सकते हैं? उन्हें भी शायद अज्ञान ही था, कि उनकी भाषा में भी ७० से ८० प्रतिशत तक शब्द संस्कृत मूल के हैं। पर उन्हें तत्सम और तद्-भव शब्दों के बीच भी भ्रम ही था। वे, तद्-भव शब्दों को संस्कृत के बाहर मानते थे।
मुझे विवेकानन्द जी का कथन स्मरण हो आया। कहते हैं, कि हमारा समाज पागल हो गया है, और ऐसा पागल?, कि, उस पागल को औषधि पिलानेवाले को ही थप्पड मारता है। अब ऐसे पागल समाज की थप्पड खाकर भी औषधि पिलानी है; तो आओ मुन्ना भाई, आपका स्वागत है, लगे रहो।

(४)
व्यास ह्युस्टन
अब इन पढत मूर्ख, भारतीय नमूनों के सामने अमरिकन ”व्यास ह्युस्टन” भी है। जो जानते हैं , कि हजारों वर्षों तक भाषा और लिपि, और वर्णाक्षर विकास का, सारा परिश्रम केवल इस उद्देश्य से किया गया, कि वे ऋषि मनीषी अपने आप की (आत्मा की) दैवी प्रकृति का परिचय प्राप्त करे, उसे पहचाने।
व्यास ह्युस्टन को, संस्कृत का ऊपर बताया वैसा ज्ञान हैं। जिनके प्रति, आपका आदर जाग्रत हुए बिना नहीं रह सकता। एक आंग्ल भाषी अमरिकन के लिए, संस्कृत का ऐसा ज्ञान होना, जो ऊपरि परिच्छेदों में व्यक्त किया गया है, असामान्य है।
कितनी लगन से उन्हों ने संस्कृत पढी होगी? और फिर पातन्जल योग दर्शन भी पढा है।
पर, मैं ने आज तक किसी भी संस्कृतज्ञ के लेखन में या भाषण में व्यास ह्युस्टन के कथन जैसा गूढ सत्य, जो विचार करने पर सहज बुद्धि गम्य ही नहीं पर ग्राह्य भी प्रतीत हो, ऐसे परम सत्य को परिभाषित करनेवाला विधान सुना नहीं था, या पढा नहीं था।
जानने पर आज तक मैं ने संस्कृत की जो उपेक्षा की, उस कारण पलकों के पीछे आंसू आ कर खडे हो गए।

(५)
वर्णाक्षरों की परिशुद्ध वैज्ञानिकता।
आगे व्यास ह्युस्टन कहते हैं, कि, इन प्राचीन भारतीय ऋषियों ने, एकाग्रता से, ध्यान दे कर, बार बार मुख से अलग अलग ध्वनियों का उच्चारण करते हुए, जानने का प्रयास किया, कि ध्वनि मुख-विवर के, किस सूक्ष्म अंग से, कैसे और कहाँ से जन्म लेती है?
उन्हों ने मुख-विवर का वैज्ञानिक अध्ययन किया, और ध्वनियों के मूल स्थानों को ढूंढ निकाला।

(६)
संकरित वर्ण संस्कृत में क्यों वर्ज्य़ है?
फिर और एक महत्व पूर्ण सत्य का स्फोट प्रो. ह्य़ुस्टन करते हैं; वे कहते हैं, कि उन—-
”ऋषियों ने उन्हीं ध्वनियों को भाषा के लिए चुना, जिनकी परिपूर्णता के विषय में कोई संदेह नहीं था; और जिन में शुद्धता थी, स्पष्टता थी, निःसंदिग्धता थी, और अनुनाद क्षमता थी।”
उदाहरणार्थ: च छ ज झ ञ यह सारे स्वतंत्र व्यंजन है। पर नुक्ता वाला ज़ उच्चारण और नुक्ता रहित ज के उच्चारण में स्पष्ट भेद सुनने में स्पष्ट नहीं होता, और न उन की पूरी स्वतंत्र, निःसंदिग्ध पहचान है। इस लिए ऐसे वर्णों को संकरित कहा गया। और, इन्हें, बिना स्वतंत्र पहचान के वर्ण मान कर, वर्जित समझा गया। इस लिए, आज कल चलन में आए हुए नुक्ता सहित ज़, फ़, जैसे अन्य वर्ण भी संकरित (संदिग्ध ) माने गए थे। इसी लिए उनका चयन नहीं किया गया।
कितनी महत्व पूर्ण बात है यह? इस लिए संस्कृत में ऐसे संकरित वर्ण नहीं है। ऐसी मिश्रित उच्चारण वाली प्रक्रिया को भी उन्हों ने ”वर्ण संकर” ही कहा था। इसका मूल कारण किसी भी प्रकार के संदेहात्मक उच्चारण से जो भ्रम को पुष्ट करने की क्षमता रखता हो, उस से दूर रहना था। अर्थका अनर्थ ना हो, इस शुद्धिवादी दृष्टिकोण से उनका चिन्तन हुआ था। किसी भी प्रकार की राज नीति से वे प्रेरित नहीं थे।

(७)
गुजराती मराठी दोनो में नुक्ता नहीं।
वैसे, गुजराती में नुक्ता नहीं है, मराठी के शब्द कोश में भी, किसी शब्द के साथ नुक्ता नहीं है।
आज भी गुजराती में नुक्ता रहित ”जरूर” ही पढा, बोला और लिखा जाता है। नुक्ता (या नुक्ते) को किसी भी शब्द में स्वीकारा नहीं जाता। यही परिस्थिति अन्य व्यंजनो या स्वरों की भी है। ”बृहद्‌ गुजराती कोश” किसी भी शब्द को नुक्ता सहित लिखता नहीं है। ”मराठी शब्द रत्नाकर” में भी नुक्ता कहीं, मुद्रित नहीं है। पर बोलचाल में, मैं ने कहीं कहीं पर शब्दों के उच्चारण में नुक्ता सुना हुआ है। कहीं कहीं गलत रीति से भी नुक्ता सुना है, जहां वह नहीं होना चाहिए।

(८)
भाषा से खिलवाड़
आज भाषा को लेकर जिस प्रकारका खिलवाड निकट दृष्टि के आधार पर चल रहा है, उसके लिए यह चेतावनी है। हजारों वर्षों तक जो लिपि और भाषा परिमार्जन का काम हमारे पूरखों ने किया, और जो धरोहर हमें देकर गए, उसे विकृत कर हम अगली पीढियों के लिए कौनसा भालाई का काम कर रहें हैं?
यह भाषा से खिलवाड केवल लिपि तक ही सीमित नहीं है। हिन्दी को भ्रष्ट करने का काम जिस गति से हो रहा है, वह उसे कुछ दशकॊ में नष्ट कर सकता है।
केल्टिक भाषा इसी प्रकारसे नष्ट हुयी थी। कभी आगे उसका इतिहास लिखा जाएगा।

संदर्भ:भाषा विज्ञान की भूमिका, Yoga Journal,Hinduism to day, शब्द रत्नाकर, गुजराती कोश

http://www.pravakta.com/sanskrit-the-grand-cosmic-music

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