बुधवार, फ़रवरी 13, 2013

भारत के सभी हिन्दुओ को मातृभूमि का आवाहन :

भारत के सभी हिन्दुओ को मातृभूमि का आवाहन : 



भारत मे मुस्लिम तकरीबन ३५ प्रतिशत की वृद्धिदर से बढ़ रहे है | जब की हिन्दुओ की
वृधि दर लगभग १९ प्रतिशत ही हैं | इस वृधि दर से भारत का इस्लामीकरण तय हैं | भारत
मे लोकतंत्र हैं और यही प्रणाली इसे इस्लामिक देश यानि दारुल इस्लाम बनाएगी २०३०
नहीं तो २०५० वरना २०६० तो निश्चित ही | पर अब भी समय हैं कुछ उपाय हैं जिनका हिंदू
समुदाय पालन करे तो देश को बचा पायेगा |

१. किसी भी कौम को अपना अस्तित्व बनाये
रखने के लिए २.१ की निषेचन दर चाहिए | यानि हर गैर मुस्लिम दंपत्ति को ३ बच्चे पैदा
करने होंगे अगर मुसलमानों के बराबर आबादी संतुलन रखना हैं |

२. जो बच्चे हो
उन्हें वैदिक धर्मं (हिंदू धर्मं) की मूलभूत जानकारी तो दे ही ताकि वे धर्मं निष्ठा
बने | सिर्फ आबादी ही काफी नहीं, अगर धर्मं के बारे मे जानकारी ना होगी तो जैसे की
आजकल के कथित धर्मनिरपेक्ष लोग हैं यानि हिंदू विरोधी वैसे ही बन जायेंगे |

३.
संगठित रहिये, क्योकि जंगल मे वही जीव बच पाते हैं जो संगठित रहते है. अपने परिवार,
मोहल्ला , रिश्तेदार, जाती और धर्मं के नाम पर संगठित रहिये. कमजोरी को ताकत बनाने
का यही तरीका हैं धर्मं के नाम पर एक होइए और विघटन को वर्गीकरण के तौर पर
लीजिए.

४. जातिवाद के विचार रखते हैं तो भी धर्मं को वरीयता दे. जब धर्मं ही
नहीं रहेगा तो जाती कहा बचेगी. कोई भी जाती हिंदू विरोधी याँ मुसलमानों की तलवे
चाटने वाला नेता ना रखे, ये धर्मं से भी द्रोह है और जाती से भी क्यों की धर्मं से
जाती है जाती से धर्मं नहीं.

५.समाज मे धर्मं रक्षा के प्रति जागरूकता फैलाये.
भारत का इस्लामीकरण हो रहा हैं और हमे उसे रोकना है ये बात अधिक से अधिक लोगो तक
पहुचाये.

६. मांसाहार का त्याग करे, पुनः उन्ही कारणों से. क्यों की मांस उद्योघ
मे हिंदू न्यून हैं, हिन्दुओ मे यादव एवं गुर्जर भाई अगर गाय का दूध बेचते हैं तो
मुस्लिम उसी गाये का मांस. इस लिए मांसाहार हर हालत में त्यागिये देश धर्मं और समाज
के लिए.

७. मुस्लिम लड़कियों से शादी करे. अगर खुद नहीं कर सकते तो दूसरों को
प्रेरित करे जो अविवाहित है. उन्हें रोजगार दीजिए जो मुस्लिम लड़कियों से शादी करते
हैं.

८. अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुस्लिम लड़के से शादी करने जा रही है क्या कैसे
भी संपर्क मे है तो तुरंत उसके घर वालो को सूचित करे. किसी भी तरह हिंदू लड़की को
मुस्लिम लड़के के प्यार के जाल से बचाए.

९. हिंदू विरोधी मीडिया का बहिष्कार करे.
हिंदू विरोधी अखबार को मत ख़रीदे जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया , हिन्दुस्थान टाइम्स ,
दैनिक हिन्दुस्थान इत्यादि. हिंदू विरोधी चैनल जैसे एन. डी. टी .वी इत्यादि मत
देखिये. दूसरों को भी यही करने को कहिये.

१०.हिंदू राष्ट्र का समर्थन करने वालो
का यथा संभव सहयोग करे. यानि तन-मन-धन जैसे हो सके.

११. द्रथ प्रतिज्ञ हो जाइये
की किसी भी हाल मे हमे भारत को दारुल इस्लाम (इस्लामिक देश) नहीं बनने देना
हैं.
उपरोक्त उपायों पर अमल करने का प्रयास करे. नए सुझाव समविचारों वालो को भी
दे.

जय हो मैय्या की !
जयति अखंड हिन्दू राष्ट्रं !
कृण्वन्तो विश्वमार्यम
हर हर महादेव !

माँ सरस्वती के प्राकट्य स्थल भोजशाला में नमाज पढने की जिद्द क्यों ?



भोज के उत्तराधिकारी जयसिंह तथा उदयादित्य दोनों ही कल्याणी के चालुक्य तथा गुजरात के चालुक्य शासकों से अपने राज्य की रक्षा के लिए युद्धरत रहे। उनके बाद लक्ष्मणदेव (जगद्देव), नरवर्मन, जयवर्मन, विन्ध्यवर्मन, सुभटवर्मन आदि शासक हुए। किन्तु धीरे-धीरे परमार-शक्ति का हृास होता गया। 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर कब्जा कर लिया। इस्लामीमूल के फकीर कमल मोलाना ने योजनापूर्वक इस्लाम का प्रचार प्रसार करके तोनो टोटको व् तबिजो के द्वारा सेकड़ो हिन्दुओ को मुसलमान बनाया तथा अलाउद्दीन खिलजी ने उसी की जानकारी के द्वारा धार पर कब्ज़ा कर लिया ! इसी भोजशाला को खंडित करने का घृणित कार्य 1401 ई. में दिलावर खां गोरी ने और 1514 ई. में महमूद खिलजी द्वितीय ने किया था। कमाल मौली की जन्नतनशीनी और अमदाबाद में उनके दफनाए जाने के 204 साल बाद भोजशाला के पास उसका मकबरा केसे बना , यह खोज का विषय है। औरंगजेब की मृत्यु के 66 साल बाद 1773 में जब धार मालवा पर मराठों का आधिपत्य हुआ तब के विवरणों में कमाल मौलाना का प्रसंग कहीं उल्लिखित नहीं है। जबकि इस स्थान का वर्णन निरंतर राजा भोज की भोजशाला और वाग्देवी मंदिर के रूप में किया जाता है। दिलावर खा गौरी ने सूर्य मार्तंड मंदिर का कुछ हिस्सा तोड़ कर उसे लाट मस्जिद में बदलने का घ्रणित कार्य किया !

संघर्ष

पुण्य स्थल पर सन 1269 इसवी से ही इस्लामी आक्रंताओ ने अलग अलग तरीको से योजना पूर्वक हमला करके भोजशाला पर आक्रमणों को तत्कालीन हिन्दू राजाओ ने विफल कर दिया! राजा महालक देव के स्वर्गवास के बाद भोजशाला के कुछ हिस्से को ध्वस्त कर उसमे मस्जिद बनाने का प्रयास किया गया ! 1200 प्रकांड विद्वानों की हत्या भोजशाला के यज्ञ कुंण्ड में कर दी गई की गई ! राजा मेदनीराय ने वनवासी धर्मयोधाओ को साथ ले कर मुस्लिम अक्रंतोओं को मार भगाया गया!


तत्पश्चात 1902 में भोजशाला से वाग्देवी की प्रतिमा को चुरा कर लार्ड कर्जन अपने साथ इंग्लेंड ले गया , जो आज लन्दन संग्रहालय में कैद है !मुस्लिम अक्रान्ताओ को विगत सेकड़ो वर्षो से बार बार भोजशाला पर आक्रमण करने के बाद भी नमाज नहीं पड़ने दी गई थी १९३० में मुसलमानों ने यहाँ नमाज पड़ने का प्रयास किया ! जिसे आर्य समाज और हिन्दू महासभा ने विफल कर दिया !


किन्तु ! 12 मई 1997 तत्का लीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक आदेश से भोजशाला हिन्दुओ के लिए प्रतिबंधित कर मुस्लिमो के लिए नमाज पड़ने की अनुमति दे दी गई !
दिग्विजय सिंह के इस निर्णय का सम्पूर्ण हिन्दू समाज ने भारी विरोध किया नगर बंद धरना अन्धोलन सहित कई बार शासन को ज्ञापन दिए गए !


सन २००० में भोजशाला में यज्ञ और महा आरती का आयोजन किया गया जिसमे ५००० श्रद्धालु उपस्थित हुए ! २००१ से लगा कर २००३ तक तत्कालीन मुक्यमंत्री द्वारा वसंत उत्सव के कार्यक्रमों को विफल करने के लिए कई षड़यंत्र रचे , वर्ष में एक दिन होने वाली पूजा पर जबरन प्रतिबन्ध लगाया गया तथा हिन्दू कार्यकर्ताओ की गिरफ्तारी हुई !इसके विरोध स्वरुप हिन्दू समाज ने थानों का घेराव किया |


बाद में प्रत्येक मंगलवार को भोजशाला के सामने सत्याग्रह प्रारंभ किया गया ! इसके बाद ही ब्यापक जन जागरण हुआ प्रतेक ग्राम में धर्मं सभा का आयोजन हुआ तथा जिसके फलस्वरूप ग्राम स्तर पर धर्म रक्षा समिति का गठन हुआ ! रथ यात्रा का जो धार जिले के प्रयेक ग्राम से हो कर गुजरी ! शासन द्वारा धर्मसभा को रोकने के लिए पोस्टर फाड़े उन पर कालिख पोती गयी ! ग्रामवासियों को धमकाया गया ,बसंत पंचमी के दिन प्रयेक ग्राम में समस्या निवारण शिविर भोजन की यवस्था हुई जिससे की ग्राम में रहने वाले लोग उस दिन ग्राम में ही रहे और भोजशाला ना आये ,परन्तु सभी हथकंडो से हिन्दू समाज भयभीत नहीं हुआ और भोजशाला की और हजारो लोगो की भीड़ बसंत पंचमी को आई ! धर्मं सभा को प्रवीन भाई तोड्ग्दिया ने सम्भोधित करते हुए १८ फरवरी का समय दिया अगर भोजशाला हिन्दुओ के लिए नहीं खोली गई तोह भोजशाला के ताले तोड़ दिए जावेंगे १८ फरवरी को प्रात से ही हिन्दू कार्यकर्ताओ की गिरफ़्तारी शुरू हो गई १२.३९ पर हजारो हिन्दू वीर भोजशाला की और आ गए इन पर निर्ममता से लाठी चार्ज किया गया ! उनको गिरफ्तार किया ५० से अधिक महिलाओ को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया २३ लोग गंभीर घायल हुए , इस घटना के विरोध स्वरुप सम्पूर्ण धर जिला बंद का आव्हान किया गया ! २३५ जगहों पर १८ घंटे चक्काजाम हुआ ४० हजार से अधिक लोगो ने गिरफ्तारी दी !१९ फरवरी को गोली चालन कर भोजशाला की ओर जाने वाली महिलाओ को रोका गया ! २९ कार्यकर्ताओ पर ३०२ तथा ४५० कार्यकर्ताओ पर ३०७ और १४०० कार्यकताओ पर मुक़दमे दर्ज किये गए कर्यकर्ताओ के परिवार जनो को शासकीय सेवा से निलंबित कर दिया गया !


२ धर्मं रक्षक को की मृत्यु हो गई! जिले भर में १० थाना क्षेत्रो में कर्फ्यू लगा दिया गया ! महिलाओ को जेल में मारा पिटा गया पिने को पानी तक नहीं दिया गया ! दिग्विजय सिंह यही नहीं रुका उसने देश के इतिहास में पहली बार जजिया कर के रूप में ३१५ लोगो पर १ करोड़ १६ लाख रुपये का सामूहिक जुर्माना लगाया ! इसकी वसूली के लिए स्वयं कलेक्टर ने गाव में जा कर गाव में जा कर कार्यकर्ताओ को अपमानित करते हुए उनकी चल अचल सम्पति का ब्व्योरा तेयार किया गया|


स्वाभिमानी हिन्दुओ के सतत प्रयास से अंततः ८ अप्रेल २००३ को हिन्दुओ को वर्ष में १ बार पूजा का अधिकार प्रति मंगलवार को दर्शन व पुष्प ले जाने का अधिकार मिला वर्ष २००४ , में बसंत पंचमी हर्षौल्लास से मनाई गई! हिन्दू समाज का जागरण हेतु समय समय पर भोजशाला में कार्यक्रम होते रहे जिसमे कवाड यात्रा तथा दीपावली मिलान समारोह आदि हुए ! २००४ में भोजशाला के बाहर अखण्ड संकल्प ज्योति जो मेहर से भोजशाला निरन्तर पैदल चलते हुए ली गई थी की स्थापना हुई जो आज भी उस संकल्प को याद दिला रही है की हमें भोजशाला में लन्दन से वाग्देवी की प्रतिमा को ला कर पुनः भोजशाला में स्थापित करना है ! २७ जनवरी २००४ को विशाल मात्रशक्ति सम्मलेन हुआ जिसमे जिले भर से ४०००० माँ बहनो ने भाग लिया ! इसी जागरण को २००५ में भी जारी रखते हुए भोजशाला प्रांगण में साध्वी रितुम्भरा की भागवत कथा हुई जिसमे हजारो लोगो ने भाग ले कर भोजशाला के गोरव के पुनर्स्थापना का संकल्प फिर से दोहराया !


सन २००६ में बसंत पंचमी पर हिन्दू संघटनो के आव्हान पर सम्पूर्ण जिले से हिन्दू कार्यकर्ता धार पहुंचे ! मुख्यमंत्री शिवराज की सरकार ने प्रबल हिन्दू जन्भाव्नाओ का सम्मान नहीं करते हुए वर्ष में १ बार मिले हुए हिन्दूओ को मिले पूजा के अधिकार को नहीं मानते हुए उस दिन भी नमाज पडवा दी गई ! तथा वहा उपस्थित हिन्दू समाज को बर्बरता पूर्वक आसुगैस गोलियों का प्रयोग करते हुए २०-२० किलोमीटर दूर तक खदेड़ा गया जिसमे सेकड़ो हिन्दू जन गंभीर रूप से घायल हुए तथा हजारो हिन्दुओ को चोटे आई , अपने आप को हिन्दुओ का पुरोधा कहने वाले संघटनो का यवहार भी संग्धिगता के घेरे में आ गया ! आम हिन्दू समाज भोजशाला आन्दोलन से पूरी तरह कट गया 

गुरुवार, जनवरी 24, 2013

शुक्रवार, जनवरी 18, 2013

आखिर कब तक सोएगी देश की भोली भाली जनता। इन्तहा हो गई अब तो जग जाओ।

जब भी किसी के सामने कांग्रेस के बारे में बताता हु तो वो सबसे पहले यही बोलता है की कांग्रेस ने ही देश को आजाद करवाया था। गाँधी परिवार ने भारत के लिए बहुत कुर्बानियां दी है। आखिर कब तक सोएगी देश की भोली भाली जनता। इन्तहा हो गई अब तो जग जाओ।
आइयें म आपको बताता हु कांग्रेस की सच्चाई जिस पार्टी का गठन एक अंग्रेज ने किया हो और वो भी अपने ही देश के खिलाप वो भारत की क्या भलाई सोचेगा। उसने तो कांग्रेस का गठन ही इस लिए किया था ताकि देश के कुछ कमजोर नेताओं को शामिल करके भारत को जायदा दिन तक गुलाम रखे। इस काम में वो पूरी तरह सफल भी रहा। उसी का नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है और तब तक भुगतेगा जब तक कांग्रेस को खत्म नही किया जायेगा। कांग्रेस ने अपने गठन से ले के देश की आजादी तक एक ही काम किया है देश भक्त क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बिच की कड़ी के रूप में। जब भी कोई आन्दोलन देश के आजादी की तरफ बढ़ता था कांग्रेस गाँधी का इस्तेमाल करके उसे ख़तम करवा देती थी। देश की आजादी तक गाँधी ने यही सब किया उसके बाद नेहरु ने भारत के कभी भी कांग्रेस के चंगुल से नही निकलने दिया। 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद गाँधी ने कहा था की कांग्रेस का काम देश को आजाद करवाना था भारत अब आजाद है तो कांग्रेस को खत्म कर देना चाहिए। नेहरु ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए पहले तो भारत माँ के दो टुकड़े करवा दिए उसके बाद गाँधी की बात को ना मानकर भारत के उपर कांग्रेस को थोप दिया।

जवाहर लाल नेहरु ने या इंदिरा गाँधी ने अपने जीवन में देश के लिए या देश के विकास के लिए कुछ नही किया। अगर किया होता देश की ये हालत न होती। 1945 के अमेरिकी हमले में जापान बर्बाद हो गया था उसके दो साल बाद1947 में भारत आजाद हुआ उसके दो साल बाद 1949 में चाइना आजाद हुआ था। ऐशिया के इन तीनो देशो का जन्म जैसे एक ही साथ हुआ था। पर आज हमारा पडोसी देश चाइना (हमसे जयादा आबादी का बोझ लेकर भी) और एक छोटा सा देश जापान हमसे 50 साल आगे निकल गए। हम अभी तक वही के वही खड़े है जहा से सबने एक साथ चलना शुरु किया था। हमारे देश को आजाद हुए 65 साल हो गए। इन 65 सालो में देश की सत्ता लगभग 57 सालो तक कांग्रेस के पास रही। पर आज भी देश का नागरिक भूख से मरता है, उनके पास रहने को घर नही है पीने को पानी नही है। लोग बिना इलाज के मर जाते है किसान अपना कर्ज नही चूका पाता इस लिए उसे आत्महत्या करनी पड़ती है। गरीब परिवार का बच्चा बिना शिक्षा के मजदूरी करने को मजबूर है। इतना सब होने के बाद भी क्या कोई कहेगा की कांग्रेस ने या गाँधी/नेहरु परिवार ने देश के लिए देश के नागरिकों के लिए कुछ किया है।

अब हमारे उपर एक और प्रधानमंत्री को थोपने की कोशिश की जा रही है जिसके पास एक छोटे बच्चे तक का दिमाग नही है जिसे ये भी नही पता की तुझे कहा पे क्या बोलना है और क्या नही बोलना। मुझे तरस आता है उन बेचारों की सोच पे जो कहते है की राहुल गाँधी तो देश पीम होना चाहिए ये बहुत स्मार्ट है। बहुत दिनों तक देश के लोगो ने एक नाटक भी देखा अपने इस कथित युवराज का जिसमे वो गरीबों की झोपडी में रुकता था और उनके साथ ही खाना भी खाता था। इस नाटक को देश की मीडिया ने भी बहुत अच्छे से हमें दिखाया पर किसी ने भी इस नाटक के पीछे का सच नही दिखाया। विदर्भ की जिस महिला के घर पे राहुल ने खाना खाया था और देश की मीडिया ने तब बहुत जोर शोर से इसे दिखाया था। उसकी गरीब महिला कलावती की लड़की सविता ने जब आत्महत्या की तब न तो राहुल का पता चला वो कहाँ है और न ही मीडिया ने इसे दिखाया। गरीब के घर रोटी खाई ये तो पुरे देश ने देखा पर जब एक इंसान गरीबी से तंग आके मर गया उसे किसी ने नही देखा। ******अमित चौधरी******

सोमवार, जनवरी 14, 2013

चर्च के भीतर समानता नहीं बाहर से दलितों की भलाई का रचते हैं ढोंग

चर्च के भीतर समानता नहीं बाहर से दलितों की भलाई का रचते हैं ढोंग

श्री राजीव दिक्षित को सुने जरुर 
https://www.youtube.com/watch?v=txfHt7O3ou8
कैथोलिक और प्रटोस्टेंट चर्चो ने देश के दलितों ईसाइयों की मुक्ति के लिए 9 दिसम्बर को ‘दलित मुक्ति संडे’ मनाने का एलान किया है। कैथोलिक बिशप कांफ्रेस आॅफ इंडिया और नेशनल कौंसल फार चर्चेज इन इंडिया नामक इन संगठनों को दलितों की दशा पर चिन्ता सताने लगी है। यह दोनों ही चर्च संगठन ‘वेटिकन’ और जनेवा स्थित ‘वल्र्ड चर्च कौंसिल’ के दिशा-निर्देशों के तहत अपने कार्यो को विस्तार देते है।

इसी वर्ष अक्टूबर महीने में पूरे विश्व के कैथोलिक चर्च की एक महासभा वेटिकन टू के नाम से पोप बेडिक्ट सोहलवें के नेतृत्व में हुई है जिसमें बदलते विश्व की परस्थितियों को ध्यान में रखते हुए धर्म-प्रचार को आगे बढ़ाने का आह्रवान किया गया है। इसी आह्रवान को अमली जामा पहनाते हुए चर्च ने ‘मानवाधिकार दिवस’ के मद्दे-नजर भारतीय दलितों के लिए नारा लगाया है कि ‘रुकवटे तोड़ों, विश्व में समानता का निर्माण करो’’!

‘दलित मुक्ति संडे’ के बहाने चर्च नेतृत्व ने अपना वही पुराना राग ‘धर्मांतरित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों’ की श्रेणी में शामिल करने की मांग उठाई है। चर्च ने डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार पर वायदा तोड़ने का आरोप लगाते हुए दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने पर जोर दिया है।

चर्च के अंदर धर्मांतरित ईसाइयों की दशा चर्च के इस लिबरेशन संडे की पोल खोल देती है। ‘रुकवटे तोड़ों, विश्व में समानता का निर्माण करो’ का नारा ऊपर से भले ही सुहवना दिखाई देता हो पर स्वाल खड़ा होता है कि जो चर्च नेतृत्व ढाई-तीन करोड़ दलित ईसाइयों के लिए अपने ढांचे (चर्च) के अंदर रुकावटे तोड़ कर समानता का महौल नही बना पाया वह गैर ईसाई दलितों का भला कैसे कर सकता है?

स्वाल खड़ा होता है कि सैकड़ों साल पहले हिन्दू समाज से टूटकर ईसाई बन गए धर्मांतरितों के वंशज आज भी ईसाइयत के अंदर ऐसी स्थिति में क्यों है कि उन्हें पुनः हिन्दू दलितों की श्रेणी में रखा जाये। चर्च का हिस्सा बन जाने के बाद भी यदि उन्हें सामाजिक, आर्थिक विषमताओं से छुटकारा नही मिल पाया तो उनके जीवन में चर्च का योगदान ही क्या है। हालांकि चर्च यह मानता है कि भारत की 70 प्रतिशत ईसाई आबादी दलितों की श्रेणी से आती है। परन्तु इसके बावजूद चर्च ढाचें में उनका कोई खास स्थान नही है। चर्चो के अंदर उनके साथ लगातार भेदभाव बढ़ रहा है। भारतीय चर्च अपनी नकामियों का ठीकरा हिन्दू व्यवस्था के सिर फोड़ते हुए अपने अनुयायियों के लिए वही दर्जा पाने की लालसा रखता है जो हिन्दू व्यवस्था में दलितो को मिला हुआ है।

ईसाइयत जाविाद में विश्वास नही करती इसी कारण जातिवाद से छुटकारे के लिए करोड़ों दलितों ने चर्च का दामन थामा था। खुद कैथोलिक बिशप कांफ्रेस आॅफ इंडिया ने अपने वर्ष 1981 में पारित एक प्रस्ताव में कहा है कि ‘ईसाइयत में जातिप्रथा का कोई स्थान नही है…यह प्रथा मनुष्यों को विभाजित करने वाली भेदभाव कारक है। यह प्रथा ईश्वर द्वारा प्रदत्त समानता और महत्ता जो मनुष्य को मिली है, उसका विनाश करने वाली कुप्रथा है।

फादर एन्टोनी राज का अध्ययन भी यह सिद्व करता है कि तमाम बाइबलीय प्रतिबंधों, वेटिकन के आदेशों और संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत चर्च में जातिवाद और छूआछूत को एक अपराध माना गया है। इसके बावजूद पग-पग पर धर्मांतरित ईसाइयों को चर्च के अंदर अपमान सहना पड़ रहा है। चर्च संसाधनों पर मुठ्ठीभर उच्च जातिय कर्लजी वर्ग का एकाधिकार बना हुआ है। विशाल संसाधनों से लैस और साम्राज्यवाद से ग्रस्त चर्च अपना संख्याबल बढ़ाने के चक्र में अपने ढांचें में जातिवाद और छूआछूत को समाप्त करने की अपेक्षा अपने अनुयायियों पर जातिवाद का संवैधानिक टैग लगना चाहता है। कई दलित इसाई विचारकों का मत है कि इससे चर्च को दोहरा लाभ प्राप्त होता है। एक-उसने चर्च के प्रति दलित ईसाइयों में पनपते आक्रोश को बड़ी ही होशयारी से सरकार की तरफ मोड़ दिया है। दूसरा-उसे जनजातियों की तरह दलितों में अपनी गहरी पैठ बनाने का सुअवसर मिलेगा।

दलित ईसाइयों का विकास भारतीय चर्च का कभी लक्ष्य नही रहा उन्होंने चर्च के कारोबार को बढ़ाने में ही उनका इस्तेमाल किया है। इसे एक छोटे से उदाहरण से ही समझा जा सकता है मौजूदा समय में कैथोलिक चर्च के 168 बिशप है (ईसाई समाज में सर्वाधिक ताकतवर पद) इनमें केवल 4 दलित बिशप है। तेरह हजार डैयसेशन प्रीस्ट, चैदह हजार रिलिजयस प्रीस्ट, पँाच हजार बर्दज और एक लाख के करीब नन है जिनमें से केवल कुछ सौ ही दलित पादरी है और वह भी चर्च ढांचे में हाशिए पर पड़े हुए है। हालही में दिल्ली कैथोलिक आर्चडायसिस के एक मात्र दलित ईसाई पादरी फादर विल्यम प्रेमदास चैधरी ने अपनी आत्मकथा ‘ऐन अन्वाटेंड प्रीस्ट’ में दलित पादरियों की व्यथा पेश की है।

आम धारणा है कि भारत सरकार के बाद चर्च के पास भूमि है वह भी शहरी क्षेत्रों के पाश इलाकों में। भारत में चर्च को कुछ संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। भाषा और संस्कृति को संरक्षण देने वाली संवैधानिक धराओं का दुरुपयोग करते हुए चर्च ने भारत में कितनी संपति इकट्ठी की है इसकी निगरानी करने का कोई नियम नही है। चर्चो और उनके संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए कानून लाया जाना चाहिए। अकेले कैथोलिक चर्च के पास 480 काॅलेज, 63 मैडीकल और नर्सिग काॅलेज, 9,500 सकेंडरी स्कूल, 4,000 हाई स्कूल, 14,000 प्रईमरी स्कूल, 7,500 नर्सरी स्कूल, 5,00 टेªनिग स्कूल, 9,00 टेकिनिकल स्कूल, 2,60 प्रोफेशनल इंसीट्यूट, 6 इंजिनरिंग काॅलेज और 3,000 होस्टल है। कैथोलिक चर्च 1,000 के करीब अस्पताल भी चला रहा है। अगर प्रोटेस्टेंट चर्चो के संस्थानों को भी मिला लिया जाये तो यह संख्या 50,,000 के करीब करीब है।

भारतीय चर्च के इस विशाल साम्राज्यवाद में दलित ईसाइयों की कितनी हिस्सेदारी है। कितने स्कूलों में ईसाई प्रंसीपल और अध्यापक है, कितने काॅलजों में वह प्रोफसर या डीन है। कितने अस्पतालों में वह डाक्टर है। शिक्षा का डंका बजाने वाले चर्च की कृपा से पढ़-लिखकर कितने उच्च पदों पर है और हजारों करोड़ के विदेशी अनुदान से गरीबों का उद्वार करने वाले चर्च के सामाजिक संगठनों में कितनो के निर्देशक दलित ईसाई है। दलित लिबरेशन संडे मनाने से पहले चर्च को यह सब बताना चाहिए। उसे यह भी बताना चाहिए कि चर्च द्वारा चलाये जाते हजारों कान्वेेट स्कूलों में दलित ईसाई बच्चों का कितना प्रतिशत है। क्योंकि दलित ईसाई लगातार आरोप लगाते रहे है कि चर्च के यह स्कूल अल्पसंख्यक अधिकारों की आड़ में मोटा मुनाफा कमाने के अड्डे बन गए है। देश की राजधानी दिल्ली में ऐसे स्कूलों में दलित ईसाइयों की भागीधारी आधा प्रतिशत भी नही है। चाहे तो चर्च इस पर श्वेत पत्र जारी कर सकता है।

यह सच है कि जिन दलितों ने ईसाइयत को अपनाया वह हिन्दू दलितों के मुकाबले जीवन की दौड़ में पीछे छूट गए है। जहां हिन्दू समाज ने विकास की दौड़ में पीछे छूट गए अपने इन अभाव-ग्रस्त भाई-बहनों को आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध करवाये, वही भारतीय चर्च ने अपना साम्राज्य बढ़ाने को प्रथमिकता दी। आगे बढ़ गए हिन्दू दलितों ने हालही में ‘दलित इंडियन चेम्बर आफ काॅमर्स एण्ड इण्डस्ट्री’ की शुरुआत करके पीछे छूट गए दलित बंधुवों को सस्ते कर्ज देकर अपने रोजगार शुरु करने की पहल की है। लेकिन चर्च नेतृत्व ने दलित ईसाइयों के लिए आज तक विकास का कोई माडल ही नही बनाया। ऐसे लिबरेशन संडे मना कर दलित ईसाइयों का उपहास उड़ाने तथा दूसरो को दोष देने की अपेक्षा ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि दलित ईसाइयों का चर्च संसाधनों पर पहला अधिकार हो, तांकि उनके विकास का मार्ग खुल सके।

सिर्फ स्नान नहीं, विज्ञान है मकर सक्रान्ति:: जाने इसका महत्व ::

सिर्फ स्नान नहीं, विज्ञान है मकर सक्रान्ति:: जाने इसका महत्व ::

मकर सक्रान्ति का पर्व आया और चला गया। नदी में एक डुबकी लगाई; खिचड़ी खाई और आगे बढ़ गये। क्या हमारे त्यौहारों का इतना ही मायने है अथवा इनका भी कोई विज्ञान है? मकर सक्रान्ति सूर्य पर्व है या नदी पर्व? हर सूर्य पर्व में नदी स्नान की बाध्यता है और हर नदी पर्व में सूर्य को अर्घ्य की। क्यों? कुल मिलाकर माघ का महीना, सूर्य, मकर राशि, संगम का तट, नदी का स्नान और खिचड़ी खाना-ये पांच मुख्य बातें मकर सक्रान्ति की तिथि से जुड़ी हैं। इनके विज्ञान उल्लेख हमारे उन पुरातन ग्रंथों में दर्ज है, जिन्हें हमने अंधकार के पोथे कहकर खोलने से ही परहेज मान लिया है। क्या है इनका विज्ञान? मकर सक्रान्ति माघ के महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का पर्व है। आइये! जानते हैं कि क्या है सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का मतलब? सभी जानते हैं कि इस ब्रह्मांड में दो तरह के पिण्ड हैं। ऑक्सीजन प्रधान और कार्बन डाइऑक्साइड प्रधान। ऑक्सीजन प्रधान पिण्ड ‘जीवनवर्धक’ होते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड प्रधान ‘जीवनसंहारक’। बृहस्पति ग्रह जीवनवर्धक तत्वों का सर्वश्रेष्ठ स्रोत है। शुक्र सौम्य होने के बावजूद आसुरी है। रवि यानी सूर्य का द्वादशांश यानी बारहवां हिस्सा छोड़ दें, तो शेष भाग जीवनवर्धक है। सूर्य पर दिखता काला धब्बे वाला भाग मात्र ही जीवन सहांरक प्रभाव डालता है। वह भी उस क्षेत्र में, जहां उस क्षेत्र से निकले विकिरण पहुंचते हैं।

अलग-अलग समय में पृथ्वी के अलग-अलग भाग इस नकारात्मक प्रभाव में आते हैं। अमावस्या के निकट काल में जब चंद्रमा क्षीण हो जाता है, तब संहारक प्रभाव डालता है। शेष दिनों में, खासकर पूर्णिमा के दिनों में चंद्रमा जीवनवर्धक होता है। इसीलिए चंद्रमा और सूर्य के हिसाब से गणना के दो अलग-अलग विधान हैं। मंगल रक्त और बुद्धि... दोनों पर प्रभाव डालता है। बुध उभयपिण्ड है। जिस ग्रह का प्रभाव अधिक होता है, बुध उसके अनुकूल प्रभाव डालता है। इसीलिए इसे व्यापारी ग्रह कहा गया है। व्यापारी स्वाभाव वाला। छाया ग्रह राहु-केतु तो सदैव ही जीवनसंहारक यानी कार्बन डाइऑक्साइड से भरे पिण्ड हैं। इनसे जीवन की अपेक्षा करना बेकार है। जब-जब जीवनवर्धक ग्रह संहारक ग्रहों के मार्ग में अवरोध पैदा करते हैं। संहारक ग्रहों की राशि में प्रवेश कर उनके जीवनसंहारक तत्वों को हम तक आने से रोकने का प्रयास करते हैं; ऐसे संयोगों को हमारे शास्त्रों ने शुभ तिथियां माना। ऐसा ही एक संयोग मकर सक्रान्ति है।

शनि जीवनसंहारक शक्तियों का पुरोधा है। अलग-अलग ग्रह अलग-अलग राशि के स्वामी होते है। शनि मकर राशि का स्वामी ग्रह है। जिस क्षण से जीवनवर्धक सूर्य, जीवनसहांरक शनि की राशि में प्रवेश कर उसके नकरात्मक प्रभाव को रोकता है। वह पल ही मकर संक्रान्ति का शुभ संदेश लेकर आता है। तीसरा वैज्ञानिक संदर्भ संगम का तट, नदी का स्नान और सूर्य अर्घ्य के रिश्ते को लेकर है। हम जानते हैं कि नदियां सिर्फ पानी नहीं होती। हर नदी की अपनी एक अलग जैविकी होती है।...एक अलग पारिस्थितिकी। जहां दो अलग-अलग मार्ग से आने वाले जीवंत प्रवाह स्वाभाविक तौर पर मिलते हैं, उस स्थान का हम संगम व प्रयाग के नाम से पुकारते हैं। प्रयाग पर प्रवाहों के एक-दूसरे में समा जाने की क्रिया से नूतन उर्जा उत्पन्न होती है। लहरें उछाल मारती हैं। जिसका नतीजा ऑक्सीकरण की रासायनिक क्रिया के रूप में होता है। ऑक्सीकरण की क्रिया में पानी ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाती है। यह प्रक्रिया बी.ओ.डी. यानी बायो ऑक्सीजन डिमांड को कम करती है। जाहिर है कि प्रयाग स्थल पर पानी की गुणवत्ता व मात्रा दोनों ही बेहतर होती है। अतः हमारे पुरातन ग्रंथ प्रयाग में स्नान को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

मकर सक्रान्ति के दिन लाखों लोगों द्वारा एक साथ स्नान से नदियों में होने वाले वाष्पन का वैज्ञानिक महत्व है। इस दिन से भारत में सूर्य के प्रभाव में अधिकता आनी शुरू होती है। सूर्य के प्रभाव में अधिकता का प्रारंभ और ठीक उसी समय नदियों में एक साथ वाष्पन की क्रिया एक-दूसरे के सहयोगी हैं। दोनों मौसम के तापमान को प्रभावित करते हैं। इससे ठीक एक दिन पहले एक साथ-समय पूरे पंजाब में लोहड़ी मनाते हैं। इन क्रियाओं के आपसी तालमेल का प्रभाव यह होता है कि उत्तर भारत के मैदानों में मकर सक्रान्ति से ठंड उतरनी शुरू हो जाती है। ध्यान देने की बात है कि इस ठंड की विदाई भी हम होली पर पूरे उत्तर भारत में एक खास मुहुर्त पर व्यापक अग्नि प्रज्वलन से करते हैं।

मकर सक्रान्ति को खिचड़ी भी कहते हैं। इस दिन खिचड़ी आराध्य को चढ़ाने, खिलाने व खाने का प्रावधान है। मकर सक्रान्ति से मौसम बदलता है। जब भी मौसम बदले, मन व स्वास्थ्य की दृष्टि से खानपान में संयम जरूरी होता है। वर्षा से सर्दी आने पर पहले श्राद्ध का संयम और फिर नवरात्र के उपवास। इधर पौष की शांति और फिर मकर सक्रान्ति को खानपान की सादगी। सर्दी से गर्मी ऋतु परिवर्तन का महीना चैत्र का खरवास फिर रामनवमी। इनके बहाने ये संयम कायम रखने का प्रावधान है। न सिर्फ शारीरिक संयम बल्कि मानसिक संयम भी। ऐसे ही संयम सुनिश्चित करने के लिए कमोबेश इन्ही दिनों इस्लाम में रोजा और ईसाई धर्म में गुड फ्राइडे के दिन बनाये गये हैं है। विज्ञान धार्मिक आस्था में विभेद नहीं करता है। अलग-अलग धर्मिक आस्थायें अलग-अलग भूगोल में स्वरूप लेने के कारण थोड़ी भिन्न जरूर होती हैं, लेकिन इनका विज्ञान एक ही है।... सर्वकल्याणकारी।

लेखक: अरुण तिवारी

सोमवार, जनवरी 07, 2013

पुनर्जन्म का सिद्धांत :-

पुनर्जन्म का सिद्धांत :-

यह विचारणीय बात है कि निसर्गतः अज्ञानी कृमिकीटों (कीड़े मकौड़ों) को भी अपने मृत्यु के पता कैसे लगा, और उस स्थान से दूसरे स्थान तक भाग जाने का उत्साह उसे किसने सिखाया ? इसका विचार करते करते विचारी मनुष्य पुनर्जन्म पर विशवास करने लगता है, और समझता है, कि प्रत्येक प्राणिमात्र के अन्दर जो यह मृत्यु का भय लगा हुआ है , वह मृत्यु के अनुभव के कारण ही है । पहले कई बार इसने स्वयं मृत्यु का अनुभव किया और देखा कि मृत्यु के समय क्या आपत्ति होती है । मृत्यु के अनिष्ट अनुभव का गुप्तज्ञान उसकी सूक्ष्मबुद्धि में छिपा हुआ है और यही उसे प्रेरणा करता है कि तुम मृत्यु से बचने का यत्न करो । अर्थात् पुनर्जन्म सत्य है , इसीलिए प्रत्येक प्राणी मृत्यु से भयभीत होता है ; यदि पूर्व मृत्यु का अनुभव न होता तो इस देह में आने के पश्चात मृत्यु कि कलप्ना भी किसी प्राणी को न होती और जिसकी कलप्ना भी नहीं होती उसके विषय में भय का होना सर्वथा असम्भव है ।


जीव अल्पज्ञ है त्रिकालदर्शी नहीं इसीलिए स्मरण नहीं रहता और जिस मन से ज्ञान करता है , वह भी एक समय में दो ज्ञान नहीं रख सकता । भला पूर्वजन्म की बात तो दूर रहने दीजिये , इसी देह में जब गर्भ में जीव था, शरीर बना, पश्चात जन्मा , पांचवें वर्ष से पूर्व तक जो भी बातें हुई हैं, उनका स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और जाग्रत वा स्वप्न में बहुत सा व्यवहार प्रत्यक्ष में करके जब सुषुप्ति अथवा गाढ़ निद्रा होती है ,तब जाग्रत आदि का व्यवहार क्यों नहीं कर सकता ? और तुनसे कोई पूछे कि बारह वर्ष से पूर्व तेहरवें वर्ष के पांचवें दिन दस बजे पर पहली मिनट में तुमने क्या किया था ? तुम्हारा मुख , कान, हाथ , नेत्र , शरीर , किस ओर किस प्रकार का था ? और मन में क्या विचार था ? जब इसी शरीर में ऐसा है तो पूर्वजन्म की बातों में स्मरण में शंका करना केवल लड़कपन की बात है और जो स्मरण नहीं होता इसी से जीव सुखी है , नहीं तो सब जन्मों के दुखों को देख देख दुखित होकर मर जाता ।


जब पाप बढ़ जाता और पुन्य कम हो जाता है तब मनुष्य का आत्मा पश्वादि नीच शरीर और जब धर्म अधिक तथा आधर्म कम होता है तब देव अर्थात् विद्वानों का शरीर मिलता है और जब पुन्य पाप बराबर होता है तब साधारण मानव जन्म होता है ।इसमें भी पुण्य पाप के उत्तम, मध्यम,निकृष्ट शरीर आदि सामग्री वाले होते हैं और जब अधिक पाप का फल पश्वादि शरीर में भोग लिया है पुनः पाप पुुण्य के तुल्य रहने से मनुष्य शरीर में आता और पुण्य के फल भोग कर फिर भी मध्यस्त पुरुष के शरीर में आता है जब शरीर से निकलता है उसी का नाम मृत्यु और शरीर के साथ संयोग होने का नाम ही जन्म है । तो यह जीवन मृत्यु का चक्र इसी प्रकार से चलता रहता है । यदी कोई कहे कि मृत्यु के बाद क्या ? तो यही उत्तर होगा कि "जीवन" । फिर जीवन के पश्चात मृत्यु का वही क्रम होता है । ईश्वर ने यही नियम अपनी हर रचना में भी दे रखा है,जैसे कि पृथ्वी सूर्य की एक निश्चित रूप में परिक्रमा करती है , और पूरा सौरमण्डल आकाश गंगा की निश्चित मार्ग और निश्चित समय में परिक्रमा करता है ।

ठीक वैसे ही जन्म मृत्यु का यह चक्र इसी तरह से चलता है, परन्तु जीवात्मा किस शरीर में जायेगा यह निरधारण केवल उसके कर्मों के आधार पर किया जाता है, क्योंकि जैसा बीजोगे वैसा पाओगे । अगर हम यह मानें भी कि यही जन्म केवल आधुनिक है तो इससे प्रकृति नियम चक्र का ही उलंघन होगा । क्योंकि अगर जिवात्माओं को उनके कर्मों का यथायोग्य फल देना ही ईश्वर का न्याय है । यह पुनर्जन्म की बात तो हमारे अनुभव की भी है, कभी हमने TV , समाचार पत्रों में अनेकों बार यह सुना है कि अमुक गाँव के एक बालक को अपने पूर्व जन्म की बातोंं का स्मरण है , उसे अपने पूर्व जन्म के माता पिता, भाई , पत्नि आदि भी याद हैं और वह स्थान भी जहाँ वह पिछले जन्म में रहता था जहाँ कि वह इस जन्म में कभी गया तक नहीं था । तो इस तरह के समाचार अकसर ही सुनने को मिलता है और यही बात जान पड़ती है कि पुनर्जन्म सत्य है और शाशवत है ।

अब जो सिद्धांत इस विषय को गम्भीरता से समझाते हैं उनका विज्ञान महर्षि कपिल के सांख्यशास्त्र के अनुसार इस प्रकार है :-

जीव शरीर का निर्माण इस रीति से हुआ कि :-
त्रिगुणात्मक प्रकृति से बुद्धि, अहंकार,मन,
सात्विक अहंकार से पाँच ज्ञानेंद्रिय (चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण, त्वचा),
ताम्सिक अहंकार से पाँच कर्मेंन्द्रिय (वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ, पायु),
पंच तन्मात्र (पृथ्वि, अग्नि, जल, वायु, आकाश )
पाँच विषय (रूप,रस,गंध,स्पर्श,दृष्य)
और इस चौबिस प्रकार के अचेतन जगत के अतिरिक्त पच्चीसवाँ चेतन पुरुष (आत्मा) ।

शरीर के दो भेद हैं :-

सूक्ष्म शरीर जिसमें :- [बुद्धि ,अहंकार, मन ]
स्थूल शरीर जिसमें :-[ पाँच ज्ञानेंद्रिय (चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण, त्वचा), पाँच कर्मेंन्द्रिय (वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ, पायु), पंच तन्मात्र (पृथ्वि, अग्नि, जल, वायु, आकाश ) ]

जब मृत्यु होती है तब केवल स्थूल शरीर ही छूटता है, पर सूक्ष्म शरीर पूरे एक सृष्टि काल (4320000000 वर्ष) तक आत्मा के साथ सदा युक्त रहता है और प्रलय के समय में यह सूक्ष्म शरीर भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है । बार बार जन्म और मृत्यु का यह क्रम चलता रहता है शरीर पर शरीर बदलता रहता है पर आत्मा से युक्त वह शूक्ष्म शरीर सदा वही रहता है जो कि सृष्टि रचना के समय आत्मा को मिला था , पर हर नये जन्म पर नया स्थूल शरीर जीवात्मा को मिलता रहता है ।

जिस कारण हर जन्म के कुछ न कुछ विषय हमारी शूक्ष्म बुद्धि में बसे रहते हैं और कोई न कोई किसी न किसी जन्म में कभी न कभी वह विषय पुनः जागृत हो जाते हैं जिस कारण वह लोग जिनको कि शरीर परिवर्तन का वह विज्ञान नहीं पता वह लोग इसको भूत बाधा या कोई शैतान आदि का साया समझ कर भयभीत होते रहते हैं । कभी किसी मानव की मृत्यु के बाद जब उसे दूसरा शरीर मिलता है तब कई बार किसी विषय कि पुनावृत्ति होने से पुरानी यादें जाग उठती हैं , और उसका रूप एकदम बदल जाता है और आवाज़ भारी हो जाने के कारन लोग यह सोचने लगते हैं कि इसको किसी दूसरी आत्मा ने वश में कर लिया है , या कोई भयानक प्रेत इसके शरीर में प्रवेश कर गया है ।

परन्तु यह सब सत्य ना जानने का ही परिणाम है कि लोग भूत प्रेत, डायन, चुड़ैल,परी आदि का साया समझ भय खाते रहते हैं । पृथ्वी के सभी जीवों में यह बात देखी जाती है कि जिस विषय का अनुभव उनको होता है उस विषय कि जब पुनावृत्ति का आभास जब उन्हें होता है तब उनकी बुद्धि उस विषय में सतर्क रहती है । और देखा गया है कि पृथ्वी का हर जीव मृत्यु नामक दुख से भयभीत होता है और बचने के लिये यत्न करता है , वह उस स्थान से दूर चला जाना चाहता है जहाँ पर मृत्यु की आशंका है , उसे लगता है कि कहीं और चले जाने से उसका इस मृत्यु दुख से छुटकारा हो जायेगा ।

अब यहाँ समझने वाली बात यह है कि किसने उस जीव को यह प्रेरणा दी यह सब करने कि? तो यही तथ्य सामने आता है कि यह सब उसके पूर्व मृत्यु के अनुभव के कारनण ही है, क्योंकि मृत्यु का अनुभव उसे पूर्व जन्म में हो चुका है जिस कारण वह अनुभव का ज्ञान जो उसकी सूक्ष्म बुद्धि में छुपा था वह उस विषय कि पुनावृत्ति के होने से दुबारा जाग्रत हो गया है । जैसा कि पहले भी कहा गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की हुआ करती है , तो सूक्ष्म शरीर तो वही है जो पहले था और अब भी वही है । जिस कारण यह सिद्ध होता है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध है ।