बुधवार, अप्रैल 25, 2012

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता


कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

रघु ठाकुर


पिछले कई माह से थल सेना अध्यक्ष बीके सिंह का विवाद समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में प्रमुखता से छाया रहा है. थल सेना अध्यक्ष ने पहले अपने जन्म को 1950 के बजाय 1951 से गणना करने का आरोप रक्षा मंत्रालय पर लगाया जबकि उन्होंने स्वतः ही अपनी आयु दर्शाते समय अपना जन्म वर्ष 1950 लिखा था तथा उसी के आधार पर तीन पदोन्नतियॉं भी प्राप्त की थी. ’’सेना कानून ’’ के अनुसार अगर किसी अधिकारी की उम्र के संबंध में कोई त्रुटि हो तो वह अपने सेवाकाल के एक वर्ष के अंदर उसे सुधार हेतु प्रस्तुत कर सकता है. परन्तु हमारे देश के जनरल को 40 वर्ष की सेवा पूरी होने तक अपने आयु वर्ष का ज्ञान नहीं हुआ तथा ना ही उन्होंने आयु वर्ष सुधरवाने हेतु कुछ पहल की.
वी के सिंह

पिछले कई वर्षों से हथियारों की खरीद आवश्यकता की तुलना में कम हुई थी क्योंकि 1988 के बोफोर्स कांड ने स्व. राजीव गांधी के ऊपर राजनैतिक संकट ला दिया था और बाद में एनडीए शासनकाल में जार्ज फर्नाडीस के रक्षा मंत्रित्वकाल में भी हथियारों तथा सैन्य सामग्री की खरीद विवादित रही. इसलिये आम तौर पर पिछले व वर्तमान रक्षामंत्री हथियार खरीद से लगभग बचने का प्रयास करते रहे हैं.

अभी पखवाड़े भर में दो महत्वपूर्ण घटनायें घटीं. एक- इन्हीं जनरल बीके सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा हुआ पत्र, समाचार पत्रों में लीक हुआ था. इस पत्र में यह कहा गया था कि भारतीय सेना के पास जो हथियार व गोला बारूद है, वह पुराना पड़ चुका है तथा सामरिक आवश्यकताओं की तुलना में अपर्याप्त है.

इस समाचार से भी देश में एक चिंता व भय का वातावरण बना है और राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़े हुये हैं. इसी बीच यह भी समाचार आया कि भारत से ज्यादा हथियार चीन खरीदता है. चूंकि आम भारतीय 1962 के बाद से चीन को भारत का शत्रु जैसा मानता है तथा चीन से भारत की सीमाओं को ज्यादा खतरा मानता है और जो है भी. अतः राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता बढ़ना और स्वाभाविक था. 1962 में चीनी हमले के समय भी हथियार व गोला बारूद पुराने थे अतः इन दोनों समाचारों को देश के आम नागरिकों ने लगभग साथ जोड़कर पढ़ा व चिंता, भय में तब्दील होने लगी.

अब इस कड़ी में एक और घटना घटी कि इंडियन एक्सप्रेस जैसे सत्ता प्रतिष्ठानों एवं सत्ता क्षेत्रों में प्रतिष्ठित अखबार ने एक सनसनीखेज कहानी छापी जिसमें कहा गया कि 16-17 जनवरी 2012 को जब सेना अध्यक्ष जनरल बीके सिंह ने अपनी उम्र के विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, उसी रात हिसार और आगरा से सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली की ओर कूच कर गई थीं.

इसके बाद सेना सचिव श्री शर्मा को विदेश से बुलाया गया और सेना के बड़े अधिकारियों को बुलाया गया तथा विस्तृत पूछताछ व जांच के बाद इस घटना को तथ्यहीन पाया गया. अगले दिन इस समाचार को देश के अन्य समाचार पत्रों ने भी प्रमुखता से छापा और सरकार की ओर से सफाई भी छपी कि यह एक प्रकार की मोकड्रिल यानी कृत्रिम अभ्यास थी, जो सेना के अभ्यासों का एक आम हिस्सा है.

इस सारे घटनाक्रम में कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण ढंग से उभरकर आते हैं जिनकी विस्तृत जॉंच होना चाहिये-

1. थल सेना अध्यक्ष अपना कार्यकाल एक वर्ष क्यों बढ़ाना चाहते हैं ? इस वर्ष जो हथियारों की खरीद का निश्चय हुआ है, जिसके लिये वर्ष 2012-13 के आम बजट में रक्षा के लिये 1 लाख 92 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि रखी गई है, इस खरीदी और उम्र विवाद के बीच कहीं कोई संबंध तो नहीं है ?

2. पिछले दिनों भारत ने लगभग 55 हजार करोड़ का हथियार फ्रांस से खरीदना तय किया है. यह सौदा आखिर तक लगभग 1 लाख करोड़ तक जा सकता है. यह एक सुविदित तथ्य है कि फ्रांस के मुकाबले अमेरीका इन हथियारों की बिक्री के लिये अत्यधिक उत्सुक था और प्रयासरत भी था. यहां तक कि जब यह ठेका भारत ने फ्रांसीसी कम्पनी को दिया तब अमरीकी सरकार के मंत्री ने जाहिर तौर पर घोर निराशा व्यक्त की थी और इसे अपने राजदूत की असफलता माना था. यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जिसकी जांच होनी चाहिये कि भारत सरकार की सामरिक सामग्री की खरीदी के ताजे निर्णयों और उपरोक्त घटनाओं के बीच कहीं कोई संबंध तो नहीं है ?

3. सर्वोच्च न्यायालय ने थल सेना अध्यक्ष की याचिका को न केवल नकारा है बल्कि उनके वकील को लगभग डांटते हुये कहा कि इस याचिका में कोई दम नहीं है. या तो आप वापिस करें अन्यथा हम इसे खारिज करते हैं. यह भी एक प्रकार का सर्वोच्च न्यायालय का उच्च वर्गीय और उच्च पदीय शिष्टाचार ही था कि उन्होंने याचिका को खारिज करने के बजाय वापिस करने का सुझाव दिया परन्तु जनरल ने इसके बावजूद भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित नहीं किया और बयान दिया कि वे ’’ सेना के सम्मान के लिये लड़ रहे है’.’’ जनरल की उम्र कितनी है, कौन सी सही है, कौन सी गलत है, यह सेना अध्यक्ष का निजी मसला हो सकता है, निजी मान सम्मान का हो सकता है पर इसका सेना के सम्मान से क्या संबंध ? वैसे भी सेना का सम्मान तो जनरल ने गिराया है, जिन्होंने अपनी जन्मतिथि बदलवाने को न केवल मुद्दा बनाया बल्कि झूठी लड़ाई लड़ने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे. क्या सेनाध्यक्ष की जन्मतिथि नहीं बदलने से सेना झूठी हो गई या फिर सेनाध्यक्ष झूठे साबित हुये?

4. इंडियन एक्सप्रेस ने इस कहानी को छापा परन्तु इस बात को दृष्टि ओझल कर दिया कि वह एक खतरनाक औेर उत्प्रेरक समाचार भी हो सकता है. प्रथमतः तो यह है कि 16 - 17 जनवरी की घटना का रहस्योद्घाटन अचानक 50 दिनों के बाद कैसे हुआ व क्यों हुआ ? ऐसी सूचनायें स्वतः जनरल के अलावा कौन दे सकता है ? व क्यों देगा ? अब यह समाचार आये हैं कि किसी केन्द्रीय मंत्री का हाथ इसे छपवाने में है. इस सूचना की भी जांच कर प्रधानमंत्री को तत्काल कार्यवाही करना चाहिये तथा ऐसा कोई गद्दार मंत्री अगर है तो उसे न केवल बर्खास्त करना चाहिये, बल्कि उसके विरूद्ध राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिये.
इस समाचार को लेकर भी जनरल का बयान चालाकी भरा है. उन्होंने मीडिया का जिक्र करते हुये कहा ’’ एक अखबार में यह खबर है कि यह एक केन्द्रीय मंत्री के इशारे पर किया गया.’’ हो सकता है कि नौकरशाही का एक वर्ग गलत इनपुट दे रहा हो. जनरल का यह बयान चालाकीपूर्ण बर्ताव है. आखिर ऐसे समाचार के बारे में पता कराना क्या जनरल का वैधानिक दायित्व व काम का हिससा नहीं है ? कहीं वे अपने बचाव के लिये तो विषय से नहीं हटना चाह रहे. 

5. भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी इतने अधिक सत्ता उन्मुख हो रहे हैं कि वे हर घटना को केवल चुनावी लाभ हानि की दृष्टि से देखते हैं. उन्होंने इसे सेना व सरकार के बीच के संबंध ‘निकृष्टतम’ के रूप में व्यक्त किया है. जबकि इस प्रकरण में सेना कहीं नहीं है, केवल जनरल एक व्यक्ति हैं. फिर एनडीए शासनकाल में तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस व एडमिरल श्री भागवत के बीच की सार्वजनिक बहस क्या उन्हें याद नहीं है. सेना के उच्च अधिकारियों को क्या ऐसे बयान देना या सरकार की सार्वजनिक आलोचना, लोकतंत्र के भविष्य के लिये चिंताजनक नहीं है ? 

उपरोक्त घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि उम्र और सेवानिवृत्ति की अवधि न बढ़ पाने से जनरल इतने हताश हो चुके हैं कि वे स्वतः राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. अपनी सेवा निवृत्ति के मात्र तीन माह पहले उन्हें दिव्य ज्ञान होता है कि हथियार पुराने पड़ गये हैं, जबकि वे उसी सेना के प्रमुख हैं. 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक उपदेशक बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी. दरअसल प्रधानमंत्री एक गैर राजनैतिक नौकरशाह हैं, जिन्हें राष्ट्रीय चिंताओं से कोई सरोकार नहीं है. पिछले उ.प्र. के चुनाव अभियान में उन्हें केवल कानपुर में एक सभा को संबोधित करने को आमंत्रित किया गया था और वह भी सिक्ख बाहुल्य इलाके में. हालांकि उस क्षेत्र में भी कांग्रेस हार गई. पंजाब में भी वे प्रभावहीन ही रहे. 

उन्हें वर्ल्ड बैंक की चाकरी की ज्यादा चिंता है, बजाय राष्ट्रीय चिंताओं की. परन्तु ऐसी घटनायें भारतीय लोकतंत्र के लिये ठीक नहीं हैं. भारतीय सेना में विद्रोह एक अकल्पनीय सपना है परन्तु इंडियन एक्सप्रेस जैसे समाचार पत्र ने इस सपने की कल्पना देने की पहल कर दी है. प्रेस की आजादी में हमारा पूरा विश्वास है परन्तु क्या प्रेस की आजादी का मतलब झूठे और अस्पष्ट समाचारों द्वारा अपने ही लोकतंत्र को क्षति पहुंचाना है? क्या प्रेस का कोई राष्ट्रीय दायित्व नहीं है. प्रेस की आजादी की ओट में विदेशी हथियार कंपनियों का खेल रोका जाना चाहिये. यह कुछ ऐसा होगा जैसे कोई बंदर अपने हाथ में उस्तरा लेकर कहे कि अपनी गर्दन काटना हमारी आजादी है. 

हमारे देश में सेनाध्यक्ष को कुछ ज्यादा बोलने की बीमारी है. जनरल करियप्पा, जनरल थिमैया, फील्डमार्शल मानिक शा जैसे सेनाध्यक्ष हुये हैं परन्तु उन्होंने कभी भी सार्वजनिक या नीतिगत बयानबाजी नहीं की. यह सेना के चरित्र के लिये उचित नहीं है. परन्तु हमारे सेनाध्यक्ष तो आजकल भारत के प्रधानमंत्री को भी विदेश नीति पर सलाह देते हैं. 

अपनी नेपाल यात्रा में उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री से मुलाकात में कहा कि “मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि नेपाल के हित में जो कुछ होगा, वह भारत के भी हित में होगा’’. उनका यह कथन 6 अप्रैल 2012 के अखबारों ने छापा है. उनके बयान से ऐसा लगता है जैसे कोई विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बोल रहा हो. 

प्रधानमंत्री को या तो अकर्मण्यता छोड़ना चाहिये या फिर कुर्सी का मोह छोड़ देना चाहिये क्योंकि प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हुये व्यक्ति की अकर्मण्यता गलतियों से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है. देश की जनता को अगर प्रधानमंत्री लोकतंत्र और राष्ट्र में से चयन करना हो तो लोकतंत्र और अपने राष्ट्र को ही चयन करना होगा. प्रधानमंत्री तो आते जाते रहते हैं.

19.04.2012, 09.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित  http://raviwar.com/news/694_bk-singh-and-indian-express-raghu-thakur.shtml

नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??



नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??  By  Shripad Kulkarni 



























एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क मियां लूटेरा था ....बख्तियार खिलजी. इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.

किसी ने उसको सलाह दी... नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय वैद्य ...उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी... मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...

उसको बड़ी झुंझलाहट हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!

बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के राख कर दिया...!

वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले.

आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!

बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया

आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान लेते है

यह प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण

इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
स्वरूप

यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
परिसर

अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।
प्रबंधन

समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य

इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम

प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और उसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति

इस विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी। शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर में अध्ययन तथा शंका समाधान चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र

यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय

नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर' नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था। 'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से अनेक पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने साथ ले गये थे।

शनिवार, मार्च 24, 2012

खत्म होता असम Part - 2 : बलबीर पुंज


खत्म होता असम Part - 2 : बलबीर पुंज
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अमरनाथ प्रकरण को लेकर कश्मीर घाटी में अलगाववादियों ने जिस तरह विरोध प्रदर्शन किया उसकी एक झलक अब असम के मुस्लिम बहुल इलाके-उदलगिरी, दरांग और रीता गांव में दिख रही है। पाकिस्तानी झंडा लहराते हुए घाटी के अलगाववादियों ने यदि भारत विरोधी नारे लगाए थे तो असम के उदलगिरी जिले के सोनारीपाड़ा और बाखलपुरा गांवों में बोडो आदिवासियों के घरों को जलाने के बाद बांग्लादेशी मुसलमानों द्वारा पाकिस्तानी झंडे लहराए गए। इससे पूर्व कोकराझार जिले के भंडारचारा गांव में अलगाववादियों ने स्वतंत्रता दिवस के दिन तिरंगे की जगह काला झंडा लहराने की कोशिश की थी, जिसे स्थानीय राष्ट्रभक्त ग्रामीणों ने नाकाम कर दिया था।
असम के 27 जिलों में से आठ में बांग्लाभाषी मुसलमान बहुसंख्यक बन चुके है। बहुसंख्यक होते ही उनका भारत विरोधी नजरिया क्या रेखांकित करता है? भारत द्वेष का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन कश्मीर घाटी का एक कड़वा सच बन चुका है और इसे भारत विभाजन से जोड़कर न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी होती रही है, किंतु भारत के वैसे इलाके जहां धीरे-धीरे मुसलमान बहुसंख्यक की स्थिति में आ रहे हैं, वहां भी ऐसी मानसिकता दिखाई देती है। क्यों? मैं कई बार अपने पूर्व लेखों में इस कटु सत्य को रेखांकित करता रहा हूं कि भारत में जहां कहीं भी मुसलमान अल्पसंख्यक स्थिति में हैं वे लोकतंत्र, संविधान और भारतीय दंड विधान के मुखर पैरोकार के रूप में सामने आते है, किंतु जैसे ही वे बहुसंख्या में आते है, उनका रवैया बदल जाता है और मजहब के प्रति उनकी निष्ठा अन्य निष्ठाओं से ऊपर हो जाती है। विडंबना यह है कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति को नष्ट करने पर आमादा ऐसी मानसिकता का पोषण सेकुलरवाद के नाम पर किया जा रहा है।
असम में बोडो आदिवासियों और बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच हिंसा चरम पर है। अब तक बोडो आदिवासियों के 500 घरों को जलाने की घटना सामने आई है। करीब सौ लोगों के मारे जाने की खबर है, जबकि एक लाख बोडो आदिवासी शरणार्थी शिविरों में रहने को विवश है। सेकुलरिस्ट इसे बोडो आदिवासी और स्थानीय मुसलमानों के बीच संघर्ष साबित करने की कोशिश कर रहे है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी सच को सामने लाने से कतरा रहा है। आल असम स्टूडेट्स यूनियन के सलाहकार रागुज्ज्वल भट्टाचार्य के अनुसार प्रशासन पूर्वाग्रहग्रस्त है। बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है, वहीं बोडो आदिवासियों को हिंसा फैलाने के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है। इससे पूर्व गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी विगत जुलाई माह में यह कड़वी टिप्पणी की थी, ''बांग्लादेशी इस राज्य में 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गए है।'' यह एक कटु सत्य है कि और इसके कारण न केवल असम के जनसांख्यिक स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है, बल्कि देश के कई अन्य भागों में भी बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए कानून एवं व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बने हुए है। हुजी जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियां इन्हीं बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद से चलने की खुफिया जानकारी होने के बावजूद कुछ सेकुलर दल बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देने की मांग कर रहे है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रभावी मंत्री रामविलास पासवान इस मुहिम के कप्तान है।
अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देना और उनके वोट बैंक का दोहन नई बात नहीं है। असम में पूर्वी बंगाली मुसलमानों की घुसपैठ 1937 से शुरू हुई। इस षड्यंत्र का उद्देश्य जनसंख्या के स्वरूप को मुस्लिम बहुल बनाकर इस क्षेत्र को पाकिस्तान का भाग बनाना था। पश्चिम बंगाल से चलते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार और असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में इन अवैध घुसपैठियों के कारण एक स्पष्ट भू-पट्टी विकसित हो गई है, जो मुस्लिम बहुल है। 1901 से 2001 के बीच असम में मुसलमानों का अनुपात 15.03 प्रतिशत से बढ़कर 30.92 प्रतिशत हुआ है। इस दशक में असम के बंगाईगांव, धुबरी, कोकराझार, बरपेटा और कछार के इलाकों में मुसलमानों की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और यह तीव्रता से बढ़ रही है। असम सेकुलरिस्टों की कुत्सित नीति का एक और दंश झेल रहा है। यहां छल-फरेब के बल पर चर्च बड़े पैमाने पर मतांतरण गतिविधियों में संलग्न है। यहां ईसाइयों का अनुपात स्वतंत्रता के बाद करीब दोगुना हुआ है। कोकराझार, गोआलपारा, दरंग, सोनिपतपुर में ईसाइयों का अनुपात अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। कार्बी आंग्लांग के पहाड़ी जनपदों में ईसाइयों का अनुपात करीब 15 प्रतिशत है, जबकि उत्तर कछार जनपद में वे 26.68 प्रतिशत हैं।
असम की कुल आबादी में 1991 से 2001 की अवधि में ईसाइयों की आबादी 0.41 से बढ़कर 3.70 प्रतिशत हुई है। उड़ीसा और कर्नाटक में चर्च की दशकों पुरानी मतांतरण गतिविधियों से त्रस्त आदिवासियों का क्रोध ईसाई संगठनों पर फूट रहा है, जिसके लिए सेकुलरिस्ट बजरंग दल और विहिप को कसूरवार बताकर उन पर पाबंदी लगाने की मांग कर रहे है। भविष्य में यदि असम के आदिवासियों का आक्रोश भी उबल पड़े तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? अवैध घुसपैठियों की पहचान के लिए 1979 में असम में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ। इसी कारण 1983 के चुनावों का बहिष्कार भी किया गया, क्योंकि बिना पहचान के लाखों बांग्लादेशी मतदाता सूची में दर्ज कर लिए गए थे। चुनाव बहिष्कार के कारण केवल 10 प्रतिशत मतदान ही दर्ज हो सका। शुचिता की नसीहत देने वाली कांग्रेस पार्टी ने इसे ही पूर्ण जनादेश माना और सरकार का गठन कर लिया गया। 10 प्रतिशत मतदान करने वाले इन्हीं अवैध घुसपैठियों के संरक्षण के लिए कांग्रेस सरकार ने जो कानून बनाया वह असम के बहुलतावादी स्वरूप के लिए नासूर बन चुका है। कांग्रेस ने 1983 में अवैध आव्रजन अधिनियम के अधीन बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसने का अवसर उपलब्ध कराया था। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को निरस्त कर अवैध बांग्लादेशियों को राज्य से निकाल बाहर करने का आदेश भी पारित किया, किंतु वर्तमान कांग्रेसी सरकार भी पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारों के अनुरूप पिछवाड़े से इस कानून को लागू रखने पर आमादा है।

========Must Watch Report by Sh. Mayank Jain ========
# http://youtu.be/9FeKuE5TsFM
# http://youtu.be/Gk3YU_Ll9Fk=

क्या एक हिन्दू होने के नाते जवानो का खून नहीं खौलता , जब उनकी आँखों के सामने गौ माता को कत्ल के लिए ले जाया जाए

क्या एक हिन्दू होने के नाते जवानो का खून नहीं खौलता , जब उनकी आँखों के सामने गौ माता को कत्ल के लिए ले जाया जाए
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आपको शायद याद होगा 2001 मे बांग्लादेश राइफल ने हमारे 16 जवानो के सिर काट कर उन्हे भारतीय सीमा मे फेंक दिया था

"इस पर हमारी विदेशी शासक श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा था की जिस बर्बरता से जवानों की हत्याएँ की गई और जैसा अमानवीय व्यवहार किया गया उससे पूरा इंडिया स्तब्ध है। लेकिन इसका असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ सकता है"

अब जरा आज की इस खबर की और देखे भारतीय जवानों ने एक बंगलादेशी को भारतीय सीमा से गाय ले जाते हुए पकड़ लिया और पीट पीट कर मार दिया तो इस पर हमारे मुर्दे "गांधी वादी सिद्धान्त" जाग गए है अब देखना हमारी मीडिया कैसा हाय तौबा मचाती है
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सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के 8 जवानों पर एक वीडियो के सामने आने के बाद गाज गिरी है। इस वीडियो में इन जवानों को गायों की तस्करी करने वाले एक बांग्लादेशी नागरिक को नंगा कर पीटते हुए दिखाया गया है। खबरों के मुताबिक बेरहमी से हुई पिटाई के बाद तस्कर की मौत हो गई। मौत के बाद बीएसएफ के जवानों ने उसे बांग्लादेश की सीमा में फेंक दिया। यह घटना पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेहरामपुर के बांग्लादेश से लगी कहरापारा सीमा पर हुई। वीडियो के सामने आने के बाद सीमा सुरक्षा बल ने आरोपी जवानों की पहचान कर उन्हें निलंबित कर दिया है।

वीडियो में बीएसएफ के जवानों को शेख के हाथ बांस के साथ बांधकर मोड़ते और बेंत से पीटते हुए दिखाया गया है। वीडियो में आवाज़ भी सुनाई देती है, जिसमें कोई शख्स तस्कर को पीटते जवानों से कहता है कि घुटने पर मारो। यह वीडियो तब सामने आया जब बीएसएफ जवान ने अपने सेलफोन में रिकॉर्डिंग करने के बाद एक दुकान पर रिंगटोन डाउनलोड करवाने गया। दुकानदार ने इस दौरान तस्कर पर किए गए अत्याचार का वीडियो मोबाइल फोन में देख लिया। इसके बाद दुकानदार उसे कॉपी कर लिया और उसकी सीडी पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों को सौंप दी। गायों का तस्कर बांग्लादेश के नवाबगंज का सलीम शेख है, जिसे तस्करी करते हुए पद्मा नदी पर चार मुरुशी द्वीप से गिरफ्तार किया गया।

=== क्या एक हिन्दू होने के नाते जवानो का खून नहीं खौलता , जब उनकी आँखों के सामने गौ माता को कत्ल के लिए ले जाया जाए ? ====


विडियो http://youtu.be/ebwfiRZLc7Y
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क्या सच में "आजादी बिना खड़क बिना ढाल" के मिली ? पुनर्विचार


क्या सच में "आजादी बिना खड़क बिना ढाल" के मिली ? ....
कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िये:-
1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।
2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।
3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।
4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।
5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।
6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?
हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।
(प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।)
यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की ईच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।
(प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!)
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लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।
इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।
फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ “भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।
फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है।* कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।
यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है।
जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!
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बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आव्हान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।
इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि-
1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और
2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है।
ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।
इसके भी कारण हैं।
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।
दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।
तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)
चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।)
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
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खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।
वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।
लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय।




लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है!
(लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम एट मिडनाईट” में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)
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बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-
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सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन:
“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”
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अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।
प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-
1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और
2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
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यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:
“... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म!” ”
(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)
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निष्कर्ष के रुप में यह कहा जा सकता है कि:-
1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।
2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।
3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा।

सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजियेगा। - Abhishek Pandey

हिन्दुत्व की आलोचना सुनने वाले और करने वाले दोनों यहाँ पढे !!

हिन्दुत्व की आलोचना सुनने वाले और करने वाले दोनों यहाँ पढे !!

कुछ दिन पहले rNDTV पर दलाल पत्रकार बुर्का दत्त एक कार्यक्रम मे हिंदुत्व का जम कर मजाक उड़ा रही थी ...

इस प्रोग्राम मे दो मुस्लिम मौलवी और दो पादरी और अग्निवेश था ..
ये सब हिंदू धर्म मे जातिवाद को लेकर हिंदू धर्म का मजाक बना रहे थे ..
तथाकथित "जातिवाद" (इस्लामिक शासन के बाद आए ) पर चर्चा कर रहे थे
और दूर बैठे अपने आकाओ को खुश कर रहे थे ....
अक्सर हिन्दू द्रोही हिन्दुत्व का मखौल उड़ाते है की इसमे छुआछूत है जात पात है
अगर ऐसा होता तो महाभारत और रामायण हिन्दुओ के पवित्र ग्रंथ नहीं होते
यहाँ जाती व्यवस्था हमेशा कर्म आधारित थी ....

लेकिन जरा यहाँ नजर डालिए

अब आप जरा इनकी भी सच्चाई देखिये :=
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क्या आप जानते हैं कि......

================ईसाई धर्म में=================
- - - - एक मसीह....एक बाइबल..... और एक ही धर्म है ... - - - -
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लेकिन मजे कि बात ये कि...
...

ये रोमन कैथेलिक और प्रोटेस्टेंट मे बंटे हुए है ..
आयरलैंड और बेलफास्ट मे अब तक सिर्फ पचास साल मे ही बीस हज़ार ईसाई आपसी दंगो मे मरे ..

ये कहते है कि युशु इंसान मे कोई फर्क नहीं करता ..
लेकिन गोरे ईसाइयों ने काले ईसाइयों पर भयानक पैशाचिक जुल्म ढाए और आज भी अमेरिका का सबसे खतरनाक आतंकी संगठन कोई मुस्लिम संगठन नहीं बल्कि "द व्हाइट सुपर " है जो गोरो का ग्रुप है और कालो और नीग्रो का दुश्मन है ..

किसी गोरे लोगो के चर्च मे कोई काला ईसाई नहीं जा सकता .

लैटिन कैथोलिक, सीरियाई कैथोलिक चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये दोनों, मर्थोमा चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये तीनों, Pentecost के चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

और, ये चारों... साल्वेशन आर्मी चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

इतना ही नहीं, ये पांचों, सातवें दिन Adventist चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

ये छह के छह, रूढ़िवादी चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

अब ये सातों जैकोबाइट चर्च में प्रवेश नहीं करेगा.

और, इसी तरह से........ ईसाई धर्म की 146 जातियां सिर्फ केरल में ही मौजूद हैं,

इतना शर्मनाक होने पर भी ये .... चिल्लाते रहेंगे कि.. एक मसीह, एक बाइबिल, एक धर्म(??)

=============== अब देखिए मुस्लिमों को===========

अल्लाह एक , एक कुरान, एक .... नबी ! और महान एकता......... बतलाते हैं ?

जबकि, मुसलमानों के बीच, शिया और सुन्नी सभी मुस्लिम देशों में एक दूसरे को मार रहे हैं .

और, अधिकांश मुस्लिम देशों में.... इन दो संप्रदायों के बीच हमेशा धार्मिक दंगा होता रहता है..!

इतना ही नहीं... शिया को.., सुन्नी मस्जिद में जाना मना है .

इन दोनों को.. अहमदिया मस्जिद में नहीं जाना है.

और, ये तीनों...... सूफी मस्जिद में कभी नहीं जाएँगे.

फिर, इन चारों का मुजाहिद्दीन मस्जिद में प्रवेश वर्जित है..!
किसी बोहरा मस्जिद मे कोई दूसरा मुस्लिम नहीं जा सकता .
कोई बोहरा का किसी दूसरे के मस्जिद मे जाना वर्जित है ..
आगा खानी या चेलिया मुस्लिम का अपना अलग मस्जिद होता है .

सबसे ज्यादा मुस्लिम किसी दूसरे देश मे नही बल्कि मुस्लिम देशो मे ही मारे गए है ..

आज भी सीरिया मे करीब हर रोज एक हज़ार मुस्लिम हर रोज मारे जा रहे है .

अपने आपको इस्लाम जगत का हीरों बताने वाला सद्दाम हुसैन ने करीब एक लाख कुर्द मुसलमानों को रासायनिक बम से मार डाला था ...

पाकिस्तान मे हर महीने शिया और सुन्नी के बीच दंगे भड़कते है .

और इसी प्रकार से मुस्लिमों में भी 13 तरह के मुस्लिम हैं., जो एक दुसरे के खून के प्यासे रहते हैं और आपस में बमबारी और मार-काट वगैरह... मचाते रहते हैं.

*****अब आइये ... जरा हम अपने हिन्दू/सनातन धर्म को भी देखते हैं.

हमारी 1280 धार्मिक पुस्तकें हैं, जिसकी 10,000 से भी ज्यादा टिप्पणियां और १,00.000 से भी अधिक उप-टिप्पणियों मौजूद हैं..! एक भगवान के अनगिनत प्रस्तुतियों की विविधता, अनेकों आचार्य तथा हजारों ऋषि-मुनि हैं जिन्होंने अनेक भाषाओँ में उपदेश दिया है..

फिर भी, हम सभी मंदिरों में जाते हैं, इतना ही नहीं.. हम इतने शांतिपूर्ण और सहिष्णु लोग हैं कि सब लोग एक साथ मिलकर सभी मंदिरों और सभी भगवानो की पूजा करते हैं .

और तो और.... पिछले दस हजार साल में धर्म के नाम पर हिंदुओं में "कभी झगड़ा नहीं" हुआ .

इसलिए इन लोगों की नौटंकी और बहकावे पर मत जाओ... और.... "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं"
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जरा यहाँ भी पढे :
भारत की जाती व्यवस्था के
बारे मे संक्षिप्त वर्णन और तथ्य है
http://alturl.com/ehem9
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शादी के नाम पर हुआ विश्वासघात ... साथ में हुआ खतना और धर्म परिवर्तन...

शादी के नाम पर हुआ विश्वासघात ... साथ में हुआ खतना और धर्म परिवर्तन....
विजय पंड्या, नाडियाद। (गुजरात)। नाडियाद जिले, कपडवंज तहसील के आतरसुंबा गांव में रहने वाले एक ब्राह्मण युवक के धर्म परिवर्तन का मामला सामने आया है। ब्राह्मण युवक के अनुसार उसने धर्म परिवर्तन अपनी मुस्लिम प्रेमिका से शादी करने के लिए किया था, लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद उसके साथ प्रेमिका के परिजनों ने धोखा करते हुए उसका विवाह किसी अन्य जगह कर दिया। युवक की शिकायत पर पुलिस ने आठ व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

कपडवंज तहसील के आतरसुंबा गांव में रहने वाले हिमांशु प्रसन्न कुमार पाठक के गांव की ही एक मुस्लिम लड़की रेहाना (परिवर्तित नाम) से प्रेम संबंध थे। जब इस प्रेम संबंध की बात रेहाना के परिजनों को पता चली तो उन्होंने हिमांशु से कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद ही तुम्हारी शादी हो सकती है।

आखिरकार हिमांशु ने अपना प्यार पाने के लिए धर्म परिवर्तन की बात स्वीकार ली। रेहाना के परिजन हिमांशु को अहमदाबाद ले गए और उसकी ‘सुन्नत’ करा दी। इसके बाद कलमा पढ़ाकर धर्म परिवर्तन करवाया गया। धर्म परिवर्तन के बाद हिमांशु ने रेहानाके घरवालों से शादी की बात कही। इस पर परिजनों ने कहा कि रमजान के बाद शादी करवा देंगे।

लेकिन इसी बीच हाल ही में रेहाना के परिजनों ने उसका निकाह किसी अन्य युवक के साथ करवा दिया। शादी के कुछ दिनों बाद ही हिमांशु और रेहाना फिर से एक-दूसरे से मिलने लगे। इसकी खबर रेहाना के पति को लग गई और उसने व रेहाना के परिजनों ने हिमांशु को जान से मारने की धमकी दे दी।

इस घटना के बाद आखिरकार हिमांशु को पुलिस की शरण में आना पड़ा। हिमांशु ने 8 व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस ने 326, 120 (बी), 506 (2), 504 तथा धर्म परिवर्तन अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच की कार्रवाई शुरू कर दी है।
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source : Bhaskar.com news