शनिवार, मार्च 30, 2019

दासता ए काफिर । सोच समझिये सोचिये । इस ब्लॉग की पोस्ट की बहुत रिपोर्टिंग हुई है। समर्थन कीजिये

 Soni Soni

ये तस्वीर है उन यजीदी महिलाओं की जिनके पति, पिता और भाइयों को मारकर जेहादियों ने सेक्स-स्लेव बनाकर
बच्चे पैदा करने के लिए अपने कैदखाने में रखा था।

जब अमेरिकी सेनाओं ने मोसुल नगर में ऐसे ही एक कैदखाने को अपने कब्जे में लेकर इन्हें आजाद कराया तो कोई भी महिला बिना बच्चों के न थी ,जेहादी हर दिन इन्हें अपनी हवश का शिकार बनाते थे और नए जेहादी पैदा करने के लिए इन्हें पालते थे।
यजीदी परिवारों के पुरुषों को मारने और इन्हें बंदी बनाने के पीछे की सोच मात्र यह है कि यजीदी काफ़िर हैं
और काफिरों के साथ उनका यह व्यवहार उनके इस्लामिक मजहब के अनुसार है।

उत्तरी इराक के दोहूक प्रान्त की रहने वाली 23 साल की यज़ीदी महिला फरीदा की शादी को अभी दो माह हुए थे कि एक रात जेहादियों ने उनके घर को घेर लिया और काफ़िर बताकर उनके सामने ही पांच भाइयो , पिता को मारकर
फरीदा और उसकी बहन को उठा ले गए थे ।
बाद में जब अमेरिकी सेना ने फरीदा को मोसुल के एक सेक्स-स्लेव सेंटर से आजाद कराया तो फरीदा ने बताया कि

‘मेरी बहन 16 साल की है. उसकी निकाह सात मर्दों से करा दी गई है. वह अभी भी सीरिया में ही है’. यह कहते हुए फरीदा फूट-फूट कर रोने लगती है. और फिर बताती है कि ‘मैंने एक आदमी को बारी-बारी से चार महिलाओं के साथ बलात्कार करते हुए देखा. और मैंने देखा कि इस्लामिक स्टेट के लोगों ने एक मां से उसके बच्चे को अलग कर दिया. वो भी तब जब वो अपने बच्चे को दूध पिला रही थी. उस बच्चे का मुंह उसकी मां के स्तन से लगा हुआ था. फिर उस औरत के साथ बलात्कार करने लगे. वहां एक बंदे से मेरा निकाह होने वाली था. फिर उसके दोस्त मुझे देखने आये. उसका एक दोस्त भी मुझे पसंद करने लगा. उसने मुझसे शादी का इरादा बना लिया. और बाद में मैं खुद पांच मर्दों को बेच दी गई.’

जब एक सेकुलर पत्रकार ने
फरीदा से पूछा कि ‘कई लोगों का ऐसा कहना है कि इस्लामिक स्टेट के लोग ड्रग लेते हैं. और इसलिए इस तरह हिंसा और बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देते हैं’. इस पर फरीदा ने बताया कि ‘वे लोग ये काम बिल्कुल स्वतंत्र रूप से और दिल से करते हैं. वो इस्लाम की ही सांस लेते हैं, खाते और सोते हैं. और इसी के लिए वो पागल हैं. ये एक सनक है. उनके बच्चे भी उनसे यही सीख रहे हैं. वो भी आगे जाकर उनके जैसे ही बनेंगे. मैंने वहां किसी को भी इस मानसिकता से अलग नहीं देखा’.

इस्लामिक जेहादियों के चंगुल से किसी तरह जान बचा कर भागी 25 वर्षीय यजीदी महिला नादिया मुराद को वर्ष 2018 में शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था

नादिया मुराद ने बताया कि इराक के सिंजर के निकट यजीदी समुदाय के गढ़ के गाँव कोचों में शांतिपूर्वक जीवन जी रहीं थी
वर्ष 2014 के
एक दिन काले झंड़े लगे जिहादियों के ट्रक उनके गांव कोचो में धड़धड़ाते हुए घुस आए। इन आंतकवादियों ने पुरूषों की हत्या कर दी, बच्चों को लड़ाई सिखाने के लिए और हजारों महिलाओं को यौन दासी बनाने और बल पूर्वक काम कराने के लिए अपने कब्जे में ले लिया।
छह भाइयों , पिता और वृद्ध माँ का कत्ल कर दिया और सैकड़ो गांवों के हजारों यजीदी लड़कियों के साथ
जेहादी मुराद को मोसुल ले आये ।
मोसुल आईएस की इस्लामिक खिलाफत की ‘राजधानी’थी। दरिंदगी की हदें पार करते हुए आतंकवादियों ने उनसे लगातार सामूहिक दुष्कर्म किया, यातानांए दी।

वह बताती हैं कि जिहादी महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए दास बाजार लगते हैं और यजीदी महिलाओं को धर्म बदल कर इस्लाम धर्म अपनाने का भी दबाव बनाते हैं। मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाई। हजारों यजीदी महिलाओं की तरह मुराद का एक जिहादी के साथ जबरदस्ती निकाह कराया गया।

इस्लामिक स्टेट एक समय एक बड़े भूभाग पर शासन करने लगा था ।
ईराक , लीबिया और सीरिया के अनेकों तेल कुओं पर उसका कब्जा था जिससे तेल बेचकर इस्लामिक स्टेट रोज करोड़ों का मुनाफ़ा कमाता था और बाकायदा अन्य इस्लामिक देशों की तरह सरिया कानून लागू कर इस्लामिक शासन स्थापित किया था , जिसके समर्थन में पूरी दुनिया से मुसलमान इस्लामिक स्टेट के किये लड़ने रक्का और मोसुल में पहुंचे थे।
वैचारिक, सैनिक सहयोग के साथ करोड़ों रुपये प्रतिदिक मुसलमानों का आर्थिक सहयोग पूरी दुनिया से मोसुल में पहुंचता था ।

सुन्नी मुसलमानों की पूर्ण सहानुभूति इस्लामिक स्टेट के साथ इसलिए थी क्योंकि सीरिया, लीबिया,ईराक और लेबनान में शिया मुसलमान और यजीदी समुदाय पर इस्लामिक स्टेट क्रूरतम कहर ढा रहे थे

मुराद बताती हैं कि मोसुल में उन्हें एकबार भागने का मौका मिला. वह बागीचे की चहारदिवारी फांदने में सफल रहीं. लेकिन मोसुल की गलियों में भटकते हुए उन्हें जब समझ में नहीं आया कि क्या करें तो उन्होंने एक अनजान घर के दरवाजे की घंटी बजा दी और मदद की गुहार लगाई , घर एक मुसलमान का था उसने मुराद को तत्काल इस्लामिक स्टेट की सेना के हवाले कर दिया । भगाने की कोशिश करने वाली हर लड़की को सजा के रूप में सामूहिक बलात्कार की पीड़ा मिलती है
मुझे छह लड़ाकों की अपनी सेंट्री को सौंप दिया. उन सभी ने मेरे साथ तब तक बलात्कार किया, जब तक मैं होशो-हवास न खो बैठी."

मुराद बताती हैं कि इराक और सीरिया में उन्होंने देखा कि सुन्नी मुस्लिम आम जीवन जीते रहे, जबकि यजीदियों को IS के सारे जुल्म सितम सहने पड़े. मुराद बताती हैं कि हमारे लोगों की हत्याएं होती रहीं, रेप किए जाते रहे और सुन्नी मुस्लिम जुबान बंद किए सब देखते रहे. उन्होंने कुछ नहीं किया.

मुराद ने अपनी पुस्तक 'द लास्ट गर्ल : माई स्टोरी ऑफ कैप्टिविटी एंड माई फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट' में अपने साथ हुई बर्बरता का दिल दहला देने वाला वर्णन किया है.

ऐसा ही जेहादियों ने पिछले 1400 वर्षों में काफिरों के साथ किया है चाहे वह भारत की नारियों को अरब और अफगान की मंडियों में 2-2 दीनार में बेचना हो या कश्मीर में हिंदु पुरुषों को मारकर उनकी लड़कियों का बलात्कार करना हो
उनके लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है।
कल जब भारत में इनकी संख्या बढ़ेगी, ये थोड़े और तागतवर होंगें तब यही हिंदुओं की बहन बेटियों के साथ होगा इसमें शंका न पालना 🤔🤔🤔

जाग सको तो जागो और जगाओ

इस्लाम शान्ति, प्रेम और भाईचारे का मजहब है इसलिए एक इस्लामिक परंपरा पैगम्बर मोहम्मद के समय से निभाई जाती है कि वृद्ध काफ़िर महिलाओं को मंडी में नहीं ले जाया जाता बल्कि काफ़िर वृद्ध महिलाओं का बलात्कार कर और काफ़िर पुरुषों के साथ ही ह्त्या कर दी जाती है .....!

दाँस्ता-ए-काफ़िर , भाग-1
क्रमश: ........

✍️ Vivekanand Vinayजी

।। जय श्रीराम ।।

मंगलवार, जनवरी 15, 2019

मकर सक्रांति

मकर संक्रांति अकेला ही पश्चिम और अरब के सभी पर्वों पर भारी है: सूर्य की गति पर आधारित यह उत्सव भारत के लाखों वर्षों से खगोल विज्ञान का ज्ञाता होने का प्रमाण है।
(सबसे अंतिम पैराग्राफ में पढ़ें किस राज्य में किस नाम से मनाया जाता है यह उत्सव? और क्या क्या खाया जाता है इस मकर संक्रांति में?)
मकर संक्रांति में मकर शब्द आकाश में स्थित तारामंडल का नाम है जिसके सामने सूर्य के आने के दिन ही पूरे दिवस मकर संक्रांति मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में लोहड़ी के नाम से यह उत्सव मनाया जाता है सूर्य के मकर राशी में प्रवेश से एक दिन पूर्व। यह उत्सव सूर्य का उत्तरायण में स्वागत का उत्सव है। उत्तरायण का अर्थ है पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के सापेक्ष में स्थित आकाश का भाग अर्थात उत्तरी अयन। जब सूर्य उत्तरायण में आता है तो इसकी किरणें पृथ्वी पर क्रमशः सीधी होने लगती है। जिससे धीरे धीरे गर्मी बढ़ने लगती है। यह सर्दी के ऋतु का अंतकाल माना जाता है। इसीलिए इस उत्सव में सर्दी की बिदाई का भाव भी है। यह समय फसलों से घर भर जाने का है। फसलों से आई समृद्धि को मनाने का उत्सव है यह। ऋतु परिवर्तन के समय मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है। इसीलिए उसके बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में उस प्रकार के पदार्थों का सेवन किया जाता है जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि हो।
भारत के बाहर झांके तो आपको दुनियाँ के किसी भी प्राचीन सभ्यता में ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों, उपग्रहों का विस्तृत ज्ञान नहीं मिलेगा। हमारे सनातन धर्मियों को लाखों वर्षों से सूर्य संक्रांति का ज्ञान था। साथ ही सूर्य ग्रहण का ज्ञान भी था। हम सैकड़ों वर्ष पहले ही अपनी गणितीय क्षमता से जान लेते थे कि सूर्य ग्रहण कब, किस दिन, कितने घटी, कितने पल और कितने विपल पर होगा? कितने क्षण में ग्रहण का स्पर्श होगा और कितने निमेष पर ग्रहण का मोक्ष होगा? हमें चंद्र ग्रहण का ज्ञान भी था। चंद्र ग्रहण का विस्तृत ज्ञान हम बहुत समय पूर्व ही कर लिया करते थे। सूर्य की बारह महीनों में बारह संक्रांति होती है। उनको मेष संक्रांति, वृष संक्रांति, मकर संक्रांति, मीन संक्रांति इत्यादि नामों से जाना जाता है। सभी बारह राशियों में सूर्य कितने घटी कितने पल पर प्रवेश करेगा यह हमें ज्ञात था लाखों वर्षों से। सूर्य एक राशी के सामने एक महीना रहता है फिर दूसरे महीने दूसरी राशि के सामने चला जाता है। इस प्रकार पूरे एक वर्ष में बारह महीनों में बारह राशियों का भ्रमण करते हुए सूर्य अपना एक वर्ष पूर्ण कर लेता है।
यूरोप वालों को बड़े लंबे प्रयोग के बाद, बड़ी लंबी साधना के बाद सूर्य की गति का बहुत थोड़ा ज्ञान हुआ तो उनलोगों ने अपने आठ महीने के ग्रेगोरियन कैलेंडर को ठीक करके पहले दस महीने का किया। बाद में दो महीने और जोड़कर बारह महीनों का किया। इतने लंबे समय तक कि पूरी यूरोपियन यात्रा में उनको इतना ही पता चल पाया कि सूर्य की पूरी परिक्रमा 365 दिनों की है। बहुत बाद में उनको पता चला कि 365 दिनों के अतिरिक्त भी 6 घंटे का और समय होता है एक सौर वर्ष में। तब उनको लिप ईयर की परिकल्पना हुआ। किन्तु हिंदुओं को तो लाखों वर्षों से यह ज्ञान था कि सूर्य 365 दिन साढ़े 15 घटी में अपना एक वर्ष पूर्ण करता है। इसमें एक घटी को आप घंटा मिनट में बदलेंगे तो एक घटी का अर्थ होगा 24 मिनट।
अरब वालों को चांद के आगे का ज्ञान ही नहीं था। सूर्य का थोड़ा ज्ञान हुआ भी तो बड़ा भ्रमपूर्ण ज्ञान था। उन्होंने चंद्रमा की गति के आधार पर अपना कैलेंडर बनाया। यह इंदु अर्थात चंद्रमा की गति पर आश्रित था। इसी इंदु से इदु और इदु से शब्द इद्दत बना। किन्तु वो गिनती में गड़बड़ कर गए। और चंद्रमा की गति के आधार पर ईद देखकर अर्थात इंदु देखकर अर्थात चांद देखकर महीना गिनने लगे। बारह महीनों की बात भारत के व्यापारियों से उनको पता चली थी तो उन्होंने चांद के बारह महीने गिन लिए। अर्थात 28×12=336 दिनों का वर्ष बना लिया। परिणाम उनके वर्ष का तालमेल सूर्य से आज भी नहीं बैठ पाया। और हर सौर वर्ष में उनका त्योहार एक माह पीछे चला जाता है। क्योंकि उनका वर्ष है 336 दिनों का और सूर्य का वर्ष होता है 365 दिन 6 घंटों का। तो इस अनुसार उनका चांद्र वर्ष और पश्चिम के सौर वर्ष में 29 दिनों का अंतर आ जाता है।
किन्तु भारत के ऋषियों ने दोनो ही प्रकार के काल गणना को बड़े गहराई से समझा। तभी समझ लिया जब ईसाईयत और इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था। उनके लाखों वर्ष पूर्व ही समझ लिया। और जब सनातनी ऋषियों ने अपना कैलेंडर अर्थात अपना पञ्चाङ्ग बनाया तो उनलोगों न तो सौर पञ्चाङ्ग बनाया और न ही चांद्र पञ्चाङ्ग बनाया। हमारे ऋषियों ने जो पञ्चाङ्ग बनाया वह सौर पञ्चाङ्ग और चांद्र पञ्चाङ्ग का सम्मिलित स्वरूप है। दोनो का समन्वित स्वरूप है। दोनो का तालमेल ऐसा बिठाया है भारत के ऋषियों ने कि हिन्दू पञ्चाङ्ग के एक एक महीने का संबंध ऋतुओं से पूर्व निर्धारित सा प्रतीत होता है। केवल पृथिवी पर घट रही घटनाओं का ही समन्वय नहीं है तो ब्रह्मांड में घट रही घटनाओं का भी समन्वय है इसमें। सूर्य मकर राशी में प्रवेश कर रहा है आकाश में किन्तु उसकी भी गणना है भारतीय पञ्चाङ्ग में। सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण हो रहा है आकाश में किन्तु उन सब की गणना है भारतीय पञ्चाङ्ग में। चांद्र पञ्चाङ्ग और सौर पञ्चाङ्ग का साम्य बिठाने के लिए पञ्चाङ्ग में प्रत्येक दो वर्षों के उपरांत पुरुषोत्तम माह का प्रावधान भी किया गया जिसे मलमास भी कहा जाता है। इस माह को बहुत पवित्र कहा जाता है।
भारत में छः ऋतुओं की पूरी परिकल्पना आपको पञ्चाङ्ग में मिल जाएगा। तीन मौसम का ज्ञान तो पूरी दुनियाँ को हो गया है किंतु प्रकृति में घट रही एक एक घटना चाहे वो पृथिवी पर घटित हो या ब्रह्मांड में उन सब का विवरण मिलेगा आपको भारतीय पञ्चाङ्ग में। सूर्य के उत्सव अनेक हैं भारत में। चंद्रमा के उत्सव भी अनेक हैं भारत में। पूर्णिमा और अमावस्या का हिन्दू ज्ञान तो सर्वविदित है जो भारत के बाहर कहीं चर्चा भी नहीं होता। इसी आधार पर माह में दो पक्षों की बात भारतीय मनीषा ने कहा। और चंद्रमा की एक एक तिथि का व्रत आपको मिलेगा। एक एक दिन का राशिफल आपको मिलेगा। क्योंकि चंद्रमा एक नक्षत्र में एक ही दिन रहता है। और एक राशि में लगभग ढाई दिन। चंद्रमा की गति के आधार पर ही करवा चौथ होता है। चंद्रमा की गति के आधार पर ही तीज व्रत अर्थात हरितालिका व्रत होता है। चन्द्रायण व्रत तो बहुत कठिन साधना का अंग माना जाता है भारतीय पर्व परम्परा में।
भारत के बहुत बड़े हिस्से में इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों, सरोवरों में स्नान करते हैं। दान करते हैं। अन्न दान भी और द्रव्य दान भी। तिल और गुड़ से बने विभिन्न मिष्ठान्न का सेवन करते हैं। इसे पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में यह उत्सव एक सप्ताह का मनाया जाता है। मायके से पति के घर उपहार लेकर आती हैं बहुएँ इस दिन। इसी को कहते हैं लोहड़ी का आना। आसाम में इसे बिहू कहा जाता है। आसाम के कुछ क्षेत्रों में इसे माघ बिहू भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे भोगाली बिहू भी कहा जाता है। दक्षिण में इसे पोंगल के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में यह उत्सव चार दिनों का होता है। प्रथम दिवस इसे भोगी पांडीगई कहते हैं। दूसरे दिन थाई पोंगल कहा जाता है। तिसरे दिन माट्टू पोंगल के नाम से जाना जाता है तो चौथे दिन कानम पोंगल के नाम से मनाया जाता है। यह आंध्र में तीन दिन का उत्सव होता है।
कर्नाटक के किसानों का यह सुग्गी उत्सव है। कर्नाटक में इसे किछु हाईसुवुडडू के रूप में भी मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में शिमला के आसपास इसे माघ साज्जि कहा जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में इस उत्सव को घुघुटिया के रूप में मनाया जाता है और कौआ बुलाने की प्राचीन पद्धति के अवशिष्ट रूप में काले कौआ के आवाहन के गीत गाये जाते हैं। उड़ीसा में इसे मकर बासीबा कहकर मनाया जाता है। बंगाल में इसे मागे सक्राति के रुप में मनाते हैं। इस दिन तिल का सेवन स्वास्थ्य वर्द्धक होता है इसीलिए इसे तिल संक्रात भी कहते हैं। केरल में सबरीमाला पर मकर ज्योति जलाकर मकराविलाक्कू मनाया जाता है। गोआ में हल्दी कुमकुम मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दूसरे दिन को मंक्रात के रूप में भी मनाया जाता है।
कहीं तिल खाया जाता है तो कहीं खिंचड़ी खाने की प्रथा है। खिचड़ी के चार यार। दहि पापड़ घी अँचार। कई क्षेत्रों में तेहरी भी बनाया जाता है। कहीं गज्जक और रेवड़ी चखा जाता है तो कहीं पतंगबाजी का हुनर तरासा जाता है। कहीं गुड़ से बने अनेकानेक मिष्ठान्न खाये जाते हैं तो कहीं दहिं चूड़ा खाने की प्रथा है। तिल के लड्डू, तीसी के लड्डू, अलसी के लड्डू, धान का लावा तो कहीं जीनोर का लावा, मक्के का लावा, मूंगफली की पट्टी, बादाम की पट्टी, काजू की पट्टी, अखरोट की पट्टी खाया जाता है। अनेक क्षेत्रों में तिलकुट कूटा जाता है। खाने के अनेक व्यंजन विशेष रुप में इसी समय खाया जाता है। जितने भी प्रकार के व्यंजन इस समय बनाये जाते हैं उन सभी सामग्रियों का संबंध इस ऋतु विशेष में स्वास्थ्य रक्षा से है। कैसे इस समय में उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सके? इस आयुर्वेदिक चिंतन पर आधारित हैं ये सभी व्यंजन। इतना समग्र चिंतन केवल और केवल भारत में मिलता है। जिसमें फसल चक्र से लेकर अर्थ चक्र और स्वास्थ्य चक्र से लेकर आयुषचक्र तक का चिंतन भी समाहित है। इस सम्पूर्ण वांग्मय के समक्ष पूरा विश्व बौना है। और भारतीय मनीषा हिमालय से ऊँची ऊँचाई को स्पर्श करता हुआ प्रतीत होता है।
~मुरारी शरण शुक्ल।
मकर संक्रांति 2: "मकर संक्रांति का संबंध अँग्रेजी कैलेंडर की तिथि से न होकर सूर्य के रिलेटिव मोशन से है। इस संदर्भ में हिन्दू खगोलीय गणना अधिक परफेक्ट है। सूर्य के परिक्रमण गति का ज्ञान भारतीयों को था इसका प्रमाण है मकर संक्रांति।"
मकर संक्रांति की परफेक्ट गणना करने में अंग्रेजी कैलेंडर विफल रहा है। जबकि हिन्दू कैलेंडर इस गणना में परफेक्ट है। आप पूछेंगे कैसे? तो प्रस्तुत है उत्तर। स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था मकर संक्रांति को। उस दिन अंग्रेजी तिथि 12 जनवरी 1863 था। आपको विश्वास नहीं होता मेरी बातों का तो आप उनकी जीवनी पढ़ लीजिए एक बार। इससे यह स्पष्ट होता है कि 1863 में मकर संक्रांति मनाया गया था 12 जनवरी को। कुछ वर्षों तक मकर संक्रांति मनाया जाता था 14 जनवरी को। किन्तु अब मकर संक्रांति मनाया जाता है 15 जनवरी को। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि अंग्रेजी कैलेंडर बनाने वाले लोग इसका विचार करने में सक्षम नहीं थे। उनके कैलेंडर को मकर संक्रांति से कोई लेना देना न तब था न अब है। पूरे यूरोप में संक्रांति की न कोई कल्पना रही है और न ही सेलिब्रेशन। अब मकर संक्रांति विदेशों में सेलिब्रेट होता है तो भारतीयों के विदेश में होने के कारण। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मकर संक्रांति की तिथि प्रत्येक पचास वर्ष में एक तिथि खिसक जाती है। संक्रांति वहीं रहती है। अंग्रेजी कैलेंडर खिसक जाता है। अर्थात अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक दो वर्ष में लगभग एक घंटे का अन्तर आ जाता है संक्रांति के समय में। अब विवेकानंद के जन्म को 156 वर्ष हो चुके तो इसीलिये 156 वर्षों में संक्रांति की तिथि 12 से 15 जनवरी तक खिसक चुकी। इस वर्ष संक्रांति 14 जनवरी को रात्री 2 बजे के लगभग हुआ है।
हमारे सनातन पञ्चाङ्ग में न केवल मकर संक्रांति वरण सभी बारह संक्रांतियों का विस्तृत व सटीक विवरण उपलब्ध है। आप कहेंगे बारह संक्रांति? आश्चर्य मत करिए। आकाशमंडल में सौर मंडल के निकट बारह तारा समूह हैं जो हमारे सौर मंडल के सभी पिंडों के परिक्रमण पथ में सामने आते हैं। जैसे मकर राशी के सामने सूर्य के आते ही मकर संक्रांति होती है। अर्थात सूर्य का मकर राशी में संक्रमण होता है। वैसे मकर से जब सूर्य कुम्भ राशी के समीप के आकाश को स्पर्श करता है तब कुम्भ संक्रांति होती है। ऐसे ही मीन संक्रांति, मेष संक्रांति, वृष संक्रांति, मिथुन संक्रांति, कर्क संक्रांति होता है। कर्क संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन होने लगते हैं। तभी देवशयनी एकादशी होता है। और जैनियों का चतुर्मासा होता है। इसके पश्चात सिंह संक्रांति, कन्या संक्रान्ति, तुला संक्रान्ति, बृश्चिक संक्रान्ति, धनु संक्रान्ति और फिर मकर संक्रान्ति। यह है सभी बारह संक्रान्तियों का वर्ष भर का चक्र। सूर्य इसी प्रकार अपने परिक्रमा पथ पर राशियों से सापेक्षिक गति करता हुआ परिभ्रमण करता रहता है। इसी सापेक्षिक गति को अंग्रेजी में रिलेटिव मोशन कहा जाता है।
किन्तु हमारे हिन्दू पञ्चाङ्ग में इसके कालक्रम में चूक नहीं होती। हर वर्ष यह मकर संक्रांति पौष-माघ माह में ही होता है। और इसकी तिथि हमें काल गणना के गणित से ज्ञात हो जाता है जो पञ्चाङ्ग में वर्णित होता है। वैसे ही पूरे वर्षभर के सूर्य से जुड़े एक एक घटनाक्रम का हम आकलन गणितीय सूत्रों के आधार पर कर लेते हैं। चूँकि ब्रह्मांड के सभी पिंडो की एक निश्चित गति है। इसीलिए हम गणित के सूत्रों के आधार पर निश्चित गति को प्रतिमान मानकर सूर्य समेत सभी ग्रहों की स्थिति का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। उनकी परस्पर दूरी और स्थिति ज्ञात हो जाने से हमें एक एक आकाशीय पिंड से संबंधित सभी आकाशीय घटनाओं का ज्ञान हो जाता है। सूर्य, चंद्रमा और पृथिवी की परस्पर स्थिति का ज्ञान हो जाने से हम सहजता से सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण की घटनाओं का पल, क्षण और निमेष का ज्ञान भी प्राप्त कर लेते है।
सूर्य की अनेक घटनाओं में एक बात उसका घूर्णन और परिभ्रमण भी है। सूर्य के घूर्णन का ज्ञान हमें लाखो वर्षों से था। इसीलिए हम हरेक पूजा के बाद सूर्य का अनुसरण करते हुए घूर्णन की क्रिया करते हैं। और बड़े अनुष्ठान, यज्ञ इत्यादि में परिक्रमा भी करते हैं। बड़े महापुरुषों, गुरु इत्यादि की भी हम आदरपूर्वक परिक्रमा करते हैं। यह कुछ और नहीं वरण सूर्य की कर्मठता को जानकर उसका अनुसरण करने की क्रिया है। संक्रांति का ज्ञान भी यह प्रमाणित करता है कि हमें सूर्य की परिक्रमण गति का ज्ञान था। ग्रहण का ज्ञान भी सूर्य की घूर्णन और परिक्रमण गति के हमारे ज्ञान का परिणाम है। सूर्य की सभी ऊर्जा का स्रोत होने का ज्ञान भी हमें था। तभी सूर्य निकट आने से गर्मी बढ़ेगी और सूर्य दूर जाने से ठंढक बढ़ेगी यह हम जानते हैं। उत्तरायण होने पर सूर्य मानव जनसँख्या वाले सभी महादेशों के निकट होता है। दक्षिणी गोलार्ध में सागर ही अधिक है। अधिकांश मानव जनसँख्या उत्तरी गोलार्द्ध में है इसीलिए जीवन के लिए आवश्यक गर्मी सूर्य के उत्तरी गोलार्ध के ऊपर आने से ही मिलती है।
सूर्य के अंदर चल रहे संलयन और विलयन की प्रक्रिया का भी हमें ज्ञान था। सूर्य गर्म है यह तो हम जानते ही थे। सूर्य के अत्यधिक गर्म होने से होने वाली समस्याओं के बारे में हमारा ज्ञान प्रमाणित है। संज्ञा, यमी, यम, शनि और छाया की कथा का वर्णन और विश्वकर्मा द्वारा सूर्य का तेज कम करने के उपायों की प्रतीकात्मक कथा भी इस ज्ञान से हमारे अवगत होने का प्रमाण है। सूर्य के सात घोड़ों का वर्णन भी बहुत कुछ स्पष्ट करता है। सात घोड़े का अर्थ है वह साधन जिसके सहारे सूर्य की किरणें यात्रा करती हैं। अर्थात सूर्य किरणों के सात अवयव अर्थात सूर्य की किरणों में अंतर्निहित सात रंग। विभग्योर। ईनके सहारे ही तो सूर्य किरणे लंबी यात्रा कर पाती हैं और अत्यधिक ऊष्मा सन्निहित कर पाती हैं। केवल्य सूर्य की किरणों का ही नहीं तो ब्रह्मांड के विभिन्न पिंडों से आने वाली अनेकानेक प्रकार की किरणों का ज्ञान हमें था। और उन किरणों का धरती पर पड़ने वाले प्रभावों का भी ज्ञान हमे था।
ब्रह्मण्ड के अनेक पिंडो से निकलकर पृथिवी तक अनेक किरणों के आने का विस्तृत ज्ञान वर्णित है ज्योतिष शास्त्र में। आज के वैज्ञानिक विश्व को रेड से परे की कुछ गिनती के किरणों का ही ज्ञान हो पाया तो अपनी अज्ञानता को छुपाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक शब्द गढ़ा इंफ्रा रेड। वैसे ही एक और शब्द गढ़ा गया अल्ट्रा वायोलेट वायोलेट से इतर की सभी किरणों के लिए। और पूरा वैज्ञानिक विश्व अपनी नाकामी छुपा गया। दृश्य किरणों का ज्ञान भी पूरा पूरा नहीं है वैज्ञानिकों को। किन्तु हमारे ऋषियों ने एक लाख प्रकार की किरणों का पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों का विवरण प्रस्तुत किया। और उसे षोडशवर्ग के नाम से अभिव्यक्त किया। विभिन्न अंशात्मक विभाजन करके एक लाख प्रकार के स्टैंडर्ड आलेख तैयार किया जिनका विवरण भृगु संहिता में प्राप्त होता है। राहु केतु नाम के ग्रहों की कल्पना ही स्पष्ट करता है कि ब्रह्मांड से आने वाले विभिन्न प्रकार की किरणों को मोटा मोटी दो बड़े हिस्सों में बाँटकर समझने और समझाने का प्रयास किया था हमने।
सुर्य की ऊर्जा ही पृथ्वी की सभी प्रकार की ऊर्जाओं का अनंतिम श्रोत है यह हमें ज्ञात था। ईसका प्रमाण ऋग्वेद के प्रथम मंडल का प्रथम मंत्र है। अग्निमिळे पुरोहिताः का अर्थ ही है कि सृष्टि के आरम्भ में अग्नि के सभी स्वरूप एक साथ प्रकट होते हैं। अग्नि के सभी स्वरूप मिलकर सूर्य का स्वरूप लेते हैं। यह वर्णन सूर्य की ऊर्जा के विभिन्न स्वरूपों में परिवर्तित होने की क्षमता का दिग्दर्शन है। सूर्य की ऊर्जा के स्थानांन्ततरण (ट्रांसमिशन ऑफ हिट) का ज्ञान भी हमें था। उसके ऊर्जा स्थानांतरित करने की क्षमता का वर्णन सूर्य और संज्ञा की कथा में मिलता है। अग्नि सूक्त के अनेक मंत्र सूर्य की विभिन्न क्षमताओं का वर्णन करते हैं। अग्नि सूक्त का गायत्री छंद में लिखा होना भी बहुत कुछ कहता है। सूर्य की इन्ही क्षमताओं से नतमष्तक होकर हम सूर्य के आराधक हैं। और सूर्य के प्रतिनिधि रूप में हमारे सामने प्रकट होने वाली अग्नि के भी हम आराधक हैं। सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के अनेक उत्सव हैं जिनमे एक मकर संक्रांति भी हैं। आज के दिन विभिन्न जल पिंडों में स्नान करके हम अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। सूर्य का तेज धारण करने का प्रयत्न करते हैं। यही भाव कार्तिक स्नान की परम्परा में भी है और संक्रांति स्नान और माघी स्नान की परंपरा में भी। माघ मास के कल्पवास का संबंध भी इसी आयुर्वेदिक भाव से है। क्रमशः.................।
~मुरारी शरण शुक्ल।
त्योहारो की निश्चित तिथी.

विगत कुछ वर्षॊ से हिंदू तीज त्योहारॊ के समय उहापोह की स्तिथि उत्पन्न हो जाती है कि अमुक त्योहार किस दिन है और वर्तमान काल मे धार्मिक ग्रन्थो से दुर होता हुआ सामान्य मानव यह निश्चित नही कर पाता परिणामस्वरुप कइ त्योहारो को दो अलग अलग दिनो मे मनाया जाता है.
और ऐसा ही आज पुनः हुआ जब मकर संक्रांति को मनाने के लिये मन्दिरो मे भी दोनो दिन अर्थात 14 और 15 जनवरी को मकर संक्रांति बता कर मनाने के लिये कहा गया. मकार सक्रांति को सामान्य भाषा मे समझाया जाये तो कहा जा सकता है कि जिस दिन सुर्य देवता धनु राशि से निक़ल कर मकर राशि मे प्रवेश करते है तो मकर संक्रांति मनायी जाती है परंतु अबकी बार सुर्य देवता 14जनवरी की रात आठ बजे मकर राशि मे प्रवेश करेगे और भुमन्डल पर मकर राशि के सुर्य का आगमन 15 जनवरी को ही होगा अत: मकर संक्रांति 15 जनवरी की ही होगी.
धार्मिक रिति रिवाजो के पीछे छिपे खगोलिय या वैज्ञानिक कारणो से अनजान सामान्य मानव के लिये यदि इतना समझना कठिन है तो इसी से अनुमान लगा लेना था कि पोन्गल भी कल 15 जनवरी को और कुम्भ पर्व मे होने वाला प्रथम शाही स्नान भी 15 जनवरी को है नाकि 14 जनवरी को...

परन्तु जब लोग पंचांग से दुर होकर सुनी सुनायी बातो पर ही अल्पज्ञान और अज्ञानता स्वरुप शुभकामनाये दे तो दशहरे वाले नवरात्रि की नवमी को राम नवमी बताने पर भी अचरज नही होता .

मंगलवार, दिसंबर 25, 2018

एक चिता तैयार की गई थी... लकड़ी की नहीं,,,,, हिन्दू धर्मग्रंथों की...

गोवा के बीचोबीच एक चिता तैयार की गई थी... लकड़ी की नहीं,,,,,
हिन्दू धर्मग्रंथों की... पिछले छह महीने में हर हिन्दू के घर का कोना कोना छान कर,मिट्टी कोड़ कोड़ कर इन धर्मग्रंथों को निकाला गया था...
संस्कृत भाषा में लिखे गए इन महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थों की चिता, और उसके ऊपर हाथ पैर बाँध कर डाले गए हिन्दू... कुछ किताबें कहती हैं पाँच सौ लोग थे,,, कुछ कहती हैं हजार... कुछ किवदन्तियां कई हजार बताती हैं। ईश्वर जाने कितने थे....
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▪️ निकट खड़े पादरी ने अपनी पवित्र पुस्तक पढ़ी,,,,, और फिर सैनिक की ओर संकेत किया,,,,, सैनिक ने चिता में अग्नि प्रवाहित की और भारत धू-धू कर जल उठा,,,,, अग्नि की लपटें बढ़ीं, और उनके साथ ही बढ़ती गयीं दो प्रकार की ध्वनियां... एक जीवित जल रहे हिंदुओं के चीत्कार की ध्वनि, और दूसरी निकट खड़े ईसाइयों के अट्ठहास की ध्वनि...
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सन 1510
गोवा के तात्कालिक मुश्लिम शासक यूसुफ आदिल शाह को पराजित कर पुर्तगालियों ने(Portuguese)गोवा में अपनी सत्ता स्थापित की। अगले पच्चीस तीस वर्षों में गोवा पर पुर्तगाली पूरी तरह स्थापित हो गए। फिर शुरू हुआ गोवा का ईसाईकरण...
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कुछ लोग उनकी कथा के प्रभाव में आ कर
धर्म बदल लिए और ईसाई हुए।
जो धन ले कर बदले उन्हें धन दिया गया,
जो भय से बदल सकते थे उन्हें भयभीत कर बदला गया।
और जो नहीं बदले..?
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गांव के बीच मे एक हिन्दू को खड़ा करा कर उसे आरा से चीरा जाता, हिन्दू युवतियों को नग्न कर सँड़सी से उनके स्तन नोचे जाते.. स्त्रियों को नग्न कर उनकी दोनों टांगो में दो रस्सी बाँध दी जाती और दोनों रस्सियां दो घोड़ों से जोड़ दी जातीं। दोनों घोड़े दो ओर दौड़ाये जाते और पल भर में एक शरीर दो भाग में बंट जाता।
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अरे रुकिए..! यह कार्य केवल पुर्तगाली सैनिक(Portuguese) नहीं करते थे, उनके साथ एक पादरी रहता था जो बाइबल पढ़ कर अपनी देख-रेख में कार्य प्रारम्भ कराता था। पुर्तगाली ईसाइयों को किसी गाँव मे यह खेल दो बार खेलने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि जिस गाँव मे एक बार यह आयोजन हो जाता, उस गाँव की सारी प्रजा उसी दिन ईसाई हो जाती थी।
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पर भारत तो भारत है न..! यहाँ के हिन्दू इतनी जल्दी कैसे हार मान लेते..?
ऊपर से सारा गोवा ईसाई हो गया था, पर अंदर ही अंदर फिर अधिकांश जन हिन्दू हो गए थे। घर में मिट्टी के नीचे दबा कर सनातन धर्मग्रंथ रखे जाने लगे। बच्चों को धर्म का ज्ञान दिया जाने लगा। रामायण-महाभारत, वेद-पुराण पढ़े-पढ़ाने जाने लगे।
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पर ईसाई भी तो ईसाई थे न..! वे भी इतनी शीघ्रता से
कैसे पराजय स्वीकार कर लेते...? तो सन 1560...
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गोवा के बीचोबीच एक चिता तैयार की गई थी।
लकड़ी की नहीं, हिन्दू धर्मग्रंथों की। पिछले छह महीने में हर हिन्दू के घर का कोना कोना छान कर,मिट्टी कोड़ कोड़ कर इन धर्मग्रंथों को निकाला गया था। संस्कृत भाषा में लिखे गए इन महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थों की चिता, और उसके ऊपर हाथ पैर बाँध कर डाले गए हिन्दू...
कुछ किताबें कहती हैं पाँच सौ लोग थे,,, कुछ कहती हैं हजार...
कुछ किवदन्तियां कई हजार बताती हैं। ईश्वर जाने कितने थे।
निकट खड़े पादरी ने अपनी पवित्र पुस्तक पढ़ी,,,,, और फिर सैनिक की ओर संकेत किया,,,,, सैनिक ने चिता में अग्नि प्रवाहित की और भारत धू-धू कर जल उठा,,,,, अग्नि की लपटें बढ़ीं, और उनके साथ ही बढ़ती गयीं दो प्रकार की ध्वनियां... एक जीवित जल रहे हिंदुओं के चीत्कार की ध्वनि, और दूसरी निकट खड़े ईसाइयों के अट्ठहास की ध्वनि...
सनातन जल रहा था, और अग्नि की लपटों के साथ ऊपर उठता जा रहा था चर्च! और वहाँ से हजारों कोस दूर रोम में बैठा सेंटा-क्लॉज मुस्कुरा उठा था।
यह भारत मे ईसाई धर्म के प्रारम्भ का सत्य था।
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अपने बच्चों को सेंटा क्लॉज की पोशाक पहना कर खुश होने वाले हिन्दुओं...! तुम्हारा सेंटा जब मुस्कुराता है तो लगता है कि वह गोआ की बेटियों की नोची गयी छातियों पर मुस्कुरा रहा है, एक वहशी दैत्य की तरह! तुम नहीं जानते कि क्रिसमस का जो केक तुम खा रहे हो वह गोवा की उन माओं के रक्त से सना हुआ है जिनके नग्न शरीर को घोड़े से चीरवा दिया गया था।
क्रिसमस की तुम्हारी शुभकामनाओं में मुझे अपने उन पूर्वजों की चीखें सुनाई देती हैं जिन्हें उनके धर्मग्रन्थों के साथ जीवित ही जला दिया गया था। क्यों? केवल इसी लिए कि वे हिन्दू थे।
गोवा एक उदाहरण मात्र है। भारत मे अंग्रेजी सत्ता के काल मे हिंदुओं-मुसलमानों पर ऐसे असंख्य अत्याचार ईसाइयों ने किए हैं। गिनने लगेंगे तो घृणा अपने चरम पर पहुँच जाएगी।
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सेंटा क्लॉज गिफ्ट नहीं देता। सेंटा ने जब भी दिया, भारत को नरसंहार, अत्याचार, शोषण का ही गिफ्ट दिया है। सेंटा क्लॉज भारत पर हुए अत्याचार का प्रतीक है। इसका सम्मान करना, इसका त्योहार मनाना अपने पूर्वजों के अपमान जैसा है।
तुम इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हो? शत्रु-परम्पराओं का सम्मान धर्मनिरपेक्षता नहीं, मूर्खता है मित्र, वे झारखण्ड के जंगलों में तुम्हारे देवी-देवताओं को गाली देते हैं और तुम उनके पर्वों को उत्साह से मनाते हो...?
वे तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, गोवा केरल में तुम्हारे पूर्वजों को गाली देते हैं और तुम उनका सम्मान करते हो? वे आसाम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश में सनातन धर्म का लगभग-लगभग नाश कर चुके और तुम इससे अनभिज्ञ प्रेम के गीत गा रहे हो?
तनिक सोचो तो, क्या हो तुम...?
मित्रों... तुम अनजाने में अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने राष्ट्र, अपनी परम्पराओं, अपने पूर्वजों की प्रतिष्ठा की हत्या में सहयोग कर रहे हो। मित्र! तुम हत्या कर रहे हो...
और सेक्युलरिज्म...?
इसे भारत को क्या ईसाइयों से सीखना होगा? एक उदाहरण देता हूँ,,,,,
सातवीं शताब्दी में भारत के एक हिन्दू शासक अनंगपाल ने
राय पिथौरा किले के पास एक ही प्रांगण में 'हिन्दू,बौद्ध और जैन' तीनो धर्मों के सत्ताईस मन्दिरों का निर्माण कराया था। यहाँ जाने वाला हर श्रद्धालु तीन धर्मों के आराध्यों की एक ही साथ पूजा करता था।
भारत का वह मन्दिर कुतुबुद्दीन ऐबक ने तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही तोड़ दिया, पर क्या कोई आज भी मुझे पूरी दुनिया मे ऐसा कोई दूसरा स्थान दिखा सकता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ किसी ईसाई ने किसी दूसरे धर्म का धर्मस्थल बनवाया हो? नहीं न?
मित्रों.. इस धरा पर धर्मनिरपेक्षता हमसे ही प्रारम्भ हो कर हम पर ही समाप्त हो जाती है। पर यह याद रहे, धर्मनिरपेक्षता के भ्रम में आत्महंता बनना केवल और केवल मूर्खता है।
स्वतन्त्रता के बाद वामपंथियों द्वारा थोपी गयी षड्यंत्रपूर्ण परिभाषा के अनुसार मेरी बातें साम्प्रदायिक दिख रही होंगी, पर मुझे गर्व है अपने साम्प्रदायिक होने पर.. मैं अपने पूर्वजों के हत्यारों को क्षमा नहीं कर सकता। मेरे अंदर यदि किसी को घृणा भरी हुई दिखती है तो गर्व है मुझे अपनी घृणा पर। अपने शत्रुओं के प्रति इसी घृणा ने भारत की रक्षा की है, नहीं तो यूनान, मिस्र, रोम कबके मिट गए।
शुभकामनाएं देनी हैं तो मेरे उस मित्र गंगा महतो को जन्मदिन की शुभकामना दीजिये जो झारखण्ड में ईसाइयों के प्रहार के विरुद्ध सनातन का ध्वज लिए अकेले खड़ा है। संता-बंता सब मूर्खता है।

सोमवार, दिसंबर 17, 2018

‘चंडी दी वार’ गुरु गोबिन्द सिंह जी का सैनिकों को संबोधन है। पढ़ें उसमें क्या लिखा है - ‘हिन्दू सिक्ख ..

‘चंडी दी वार’ गुरु गोबिन्द सिंह जी का सैनिकों को संबोधन है।
पढ़ें उसमें क्या लिखा है -
‘हिन्दू सिक्ख ..
दशमेश पिता गुरू गोविंद सिंह जी सैनिको में उत्साह भरने के लिये जो भाषण देते थे, उनका संग्रह 'चंड़ी दी वार' कहलाता है । उसमें लिखे दोहे पर सेक्युलर गौर करें :-
मिटे बाँग सलमान सुन्नत कुराना ।
जगे धमॆ हिन्दुन अठारह पुराना ॥
यहि देह अँगिया तुरक गहि खपाऊँ ।
गऊ घात का दोख जग सिऊ मिटाऊँ ॥
अर्थात :- हिंदुस्तान की धरती से बाँग (अजान), सुन्नत (इस्लाम) और कुरान मिट जाये, हिन्दू धर्म का जागरण होकर अट्ठारह पुराण आदर को प्राप्त हों। इस देह के अंगों से ऐसा काम हो कि सारे तुर्कों को मारकर खत्म कर दूँ और गोवध का दुष्कृत्य संसार से नष्ट कर दूँ ।
देही शिवा बर मोहे
शुभ कर्मन ते कभुं न टरूँ।
न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं
निश्चय कर अपनी जीत करौं ॥
अर्थात :-
हे परमशक्ति माँ(शिवा) ऐसा वरदान दो कि मैं अपने शुभ कर्मपथ से कभी विचलित न हो पाऊँ । शत्रु से लड़ने में कभी न डरूँ और जब लड़ूं तब उन्हें परास्त कर अपनी विजय सुनिश्चित करूँ ।।
गुरु का स्वप्न है..
सकल जगत में खालसा पंथ गाजै। जगै धर्म हिन्दू तुरक भंड भाजै।।
अर्थात् दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी कहते हैं - सम्पूर्ण सृष्टि में खालसा पंथ की गर्जना हो। हिन्दू धर्म का पुनर्जागरण सारे संसार में हो और पृथ्वी पर से सारी अव्यवस्था, पाप और असत्य के प्रतीक इस्लाम का नाश हो।।
सतनाम वाहे गुरु
।।सत् श्री अकाल।।’

शनिवार, दिसंबर 08, 2018

उद्धव गीता

आज मुझे एक अत्यंत सुन्दर लेख प्राप्त हुआ पढ़कर आनंद विभोर हो उठा ! आप भी पढ़े और सत्य से रूबरू भी हों!
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*"उद्धव-गीता"*
उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने *अवतार काल* को पूर्ण कर *गौलोक* जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-
"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।
तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।
उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-
"भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!
आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा!
क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"
श्री कृष्ण बोले-
“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह *"भगवद्गीता"* थी।
आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह *"उद्धव-गीता"* के रूप में जानी जाएगी।
इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।
तुम बेझिझक पूछो।
उद्धव ने पूछना शुरू किया-
"हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"
कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"
उद्धव-
"कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।
कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।
किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?
आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?
चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!
आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!
आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!
उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!
अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!
इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!
लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?
उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!
एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?
अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?
क्या यही धर्म है?"
इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!
उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-
"प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।
उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।
यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"
उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।
जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?
पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?
चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!
और वह यह-
उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!
क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।
वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!
इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!
इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!
अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!
तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!
उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!
जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-
*'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम'*-
की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।
जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।
अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"
उद्धव बोले-
"कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!
क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?"
कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-
"इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"
कृष्ण मुस्कुराए-
"उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।
न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।
मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ।
मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।
यही ईश्वर का धर्म है।"
"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!
तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?
हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?
आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?"
उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-
"उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।
जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?
तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।
जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!
अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"
भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले-
प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।
गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।
सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।
सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।
अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।
वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!
यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!
तत-त्वम-असि!
अर्थात...
वह तुम ही हो।।

गुरुवार, दिसंबर 06, 2018

वामपंथ का गढ़ा हुआ महान



 आपको बॉक्सिग में तनिक भी दिलचस्पी न हो तब भी आप मोहम्मद अली के नाम से परिचित होंगे ! जिन्हे महानतम मुक्केबाज़ के रूप में दुनिया भर में प्रचारित किया गया और तो और वह स्वयं भी अपने आप को महानतम ही मानते रहे थे ! अस्सी के दशक में तब कोर्स में हमें एक सहायक वाचन किताब होती थी जिसमे एक चैप्टर मोहम्मद अली का भी रहता था !
इसमें कोई शक नहीं की मोहम्मद अली बेहतरीन बॉक्सर रहे हैं ! लेकिन उन्हें महानतम बना कैसे थोपा गया अगर इसको थोड़ा समझा जाए तो महसूस हो जाएगा की वामपंथ की प्रचार ताकत क्या हैं ?
कैशियस क्ले 1964 में वर्ल्ड चैम्पियन बने थे ! 25 फरवरी 65 को उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार लिया! और नया नाम भी क्या चुन कर रखा, मोहम्मद अली ! यानि शिया और सुन्नी दोनों को बैलेंस करते हुए ! उनके मुताबिक उनसे अश्वेत होने के कारण एक होटल में दुर्व्यवहार किया गया जिससे आहत हो कर उन्होंने अपना मैडल नदी में फेंक दिया और इस्लाम धर्म अपना लिया ! यहाँ यह बात समझ से परे हैं की विश्व चैम्पियन होने के बाद वह संपन्न सेलिब्रेटी बन चुके थे और लोग उन्हें जानने पहचानने लगे थे फिर उनसे कैसे कोई रंगभेद कर सकता था ?
65 में उन्होंने विएतनाम युध्द में अनिवार्य सेना भर्ती के लिए इंकार कर दिया और इसका कारण अपनी धार्मिक मज़बूरी बताया ! और तो और उन्होंने अपनी ही सरकार पर युध्द के लिए ऊँगली उठा कर आलोचना भी शुरू कर दी 
वास्तव में वह देश के बजाये धन दौलत शोहरत को बनाये रखना चाहता था ! कल्पना कीजिये भारत पाकिस्तान युध्द में कोई भारतीय ऐसा करे तो आपको कैसा महसूस होंगे ? जिस वजह से इनसे मैडल छीन कर गिरफ्तार कर लिया था !
चार साल वह रिंग से बाहर रहे! 71 में सर्वोच्च न्यायलय से इन्हे राहत मिली ! लेकिन तब तक यह वामपंथी मीडिया और युवाओ में अपनी जगह बना चुके थे ! पूंजीवादी अमेरिका की आलोचना कर वह वामपंथी देशो की मीडिया का हीरो बन चूका था ! तिस पर उसका अश्वेत होना और मुस्लिम बनना उसे धारदार हथियार बना देता था !
इसी तरह इन्हे एक बार धोखा धड़ी के आरोप में 5 साल और दस हजार डॉलर की सजा भी सुनाई जा चुकी हैं जिसे बाद में महज दस दिन की सजा में तब्दील कर दिया गया था !
एक अच्छे सच्चे मुस्लिम की तरह उसके 4 निकाह से 9 बच्चे हुए थे !
इस मीडिया पोषित महानतम बड़बोले बॉक्सर को अपने कैरियर में 56 जीत के लिए 5 बार हारना भी पड़ा था ! लेकिन उस दौर में एक अन्य अमेरिकी बॉक्सर रॉकी मर्सियानो जिसका बेहतरीन रिकार्ड 49-0 था और जिसक नॉक आउट एवरेज 87 के आसपास हैं उसे वाम मीडिया ने कभी वह स्थान नहीं दिया जो उसका प्रदर्शन कहता था !
और इसकी वजह जानते हो ? क्योकि रॉकी श्वेत था उसने विएतनाम युध्द में अमेरिकी सेना ज्वाइन की थी और वह धार्मिक राष्ट्रवादी था !
एक तथ्य छूट गया 
की एक और मशहूर बॉक्सर माइक टाइसन का जब बुरा समय शुरू हुआ और उस पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए तब इसी मोहम्मद अली ने उसे प्रेरित कर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए राजी किया था !

रविवार, दिसंबर 02, 2018

डा भीमराव अम्बेडकर दलित नहीं “महार जाति” के क्षत्रीय योद्धाओं के वंशज थे ।

डा भीमराव अम्बेडकर दलित नहीं “महार जाति” के क्षत्रीय योद्धाओं के वंशज थे ?
oपेशवा रियासत को कमजोर करने के लिये अंग्रेजो ने “महार जाति” को “शूद्र” घोषित किया था |
शायद ही कुछ लोग यह जानते हैं कि “महार” और “राष्ट्र” शब्द से ही “महाराष्ट्र” राज्य की उत्पत्ति हुई है | महार पेशे से अंगरक्षक (क्षत्रीय) थे, इसलिए निर्भीक, साहसी, विश्वसनीय और लड़ाकू हुआ करते थे। बजीराव पेशवा (ब्राह्मण)की सेना में सबसे ज्यादा उन्नत लड़ाकू नश्ल के 28,000 सैनिक मात्र महार ही थे | यह एक लड़ाकू जाति (मार्शल रेस) है | यह बात ब्रिटिश लोगों ने पहचानी और लड़ने के लिये महार रेजिमेंट बनाई । जो आज भी भारतीय सेना का गौरव बढ़ा रही है |
नवम्बर 1817 में बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में संगठित मराठा सेना ने पूना की 'अंग्रेज़ी रेजीडेन्सी' को लूटकर जला दिया और खड़की स्थिति अंग्रेज़ी सेना पर हमला कर दिया, लेकिन वह पराजित हो गया। तदनन्तर वह दो और लड़ाइयों – 1 जनवरी 1818 में भीमा कोरेगाव की लडाई जिसमे अंग्रेजो ने पेशवा के 28,000 मराठा सैनिकों को पराजित किया था और उसके एक महीने के बाद आष्टी की लड़ाई में बाजीराव पेशवा द्वितीय पराजित हुआ।
उसने भागने की कोशिश की लेकिन उन्हें 3 जून, 1818 ई. को उसे अंग्रेज़ों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा । अंग्रेज़ों ने इसके बार पेशवा का पद ही समाप्त कर दिया और बाजीराव पेशवा द्वितीय को अपदस्थ करके बंदी के रूप में कानपुर के निकट बिठूर भेज दिया जहाँ 1853 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
पेशवा पद की समाप्ति के बाद पेशवा की सेना में भरी असंतोष था | अन्ग्रेजों को बराबर यह भय था कि बाजीराव पेशवा द्वितीय की मृत्यु के बाद भी कभी भी पेशवा के वफादार सैनिक उनके ऊपर हमला कर सकते हैं अतः उन्होंने पेशवा सेना को तोड़ने के लिये विभिन्न लाभों की घोषणा करते हुये महार जाति के योद्धाओं को शूद्र घोषित कर दिया | जिस नीति से पेशवाओं की सेना में फूट पड़ गई और वह हमेशा के लिये ख़त्म हो गये |
लेकिन महार की इस योद्धा शक्ति का उपयोग अंग्रेजों ने महार रेजिमेंट बना कर किया गया और प्रथम विश्व युद्ध में सर्वाधिक मरने वाले महार रेजिमेंट के ही सैनिक थे | लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद मरे सैनिकों का हर्जा खर्च न देना पड़े इसलिये महार रेजिमेंट भंग कर दी गई और बढ़ते असंतोष को शान्त करने के लिये "इण्डिया गेट" का दिल्ली में निर्माण करवाया गया | द्वतीय विश्व युद्ध में पुनः महार रेजिमेंट बनी जो आज तक भारतीय सेना का सम्मान है |
जबकि पूर्व में जब भी व्यापारी अपना कारवां लेकर कहीं दूर व्यापार करने जाते थे | तब महारो को उनकी रक्षा के लिए नियुक्त किया जाता था । महार ही गाँव की रक्षा करते थे, किसानो के ज़मीनों की रक्षा करते थे | गाँव की सीमा बतलाना, व्यापारियों को एक जगह से दूसरी जगह जाते वक़्त सुरक्षा देना, खेत से होने वाली फसल और राज्य के खजाने की रक्षा आदि करने का काम महार जाति का था |
शादी विवाह में बहू बेटियों को, महिलाओं बच्चों को, सम्पन्न व्यक्तियों को, सुरक्षित लाना ले जाना आदि कार्यों के लिये महार जाति के लोग सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाते थे | चोरी करने वालो का पता लगाना , गाँव में आने जाने वालो के बारे में जानकारी रखना, संदिग्ध लोगो को गाँव के बाहर रोक के रखना, आदि आदि सुरक्षा का कार्य महार ही के काम थे। इनकी गवाही अंतिम और विश्वसनीय होती थी | खेत और गाँव की सीमा निर्धारित करते समय महारो की बात अंतिम होती थी।
महार समाज बड़े बड़े घरानों में आना जाना था इन्हें अस्पृश्य कभी नहीं माना गया था। यह लोग पुलिस, गुप्तचर विभाग और राजस्व विभाग संबंधित कार्य करते थे । लड़ाकू होने के नाते इनकी खुराक सामान्य मनुष्य से ज्यादा हुआ करती थी | महाआहारी (बहुत खाने वाले ) होने के नाते इन्हें “महार” बोला गया | यह बात रोबेर्टसन ने अपनी किताब “दि महार फोल्क में भी कही है |
भीमराव अम्बेडकर जी का जन्म सन 14 अप्रैल 1891 को ब्रिटिश भारत के मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश में) में स्थित नगर सैन्य छावनी महू में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की १४ वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी मूल का महार जाति से सम्बन्ध रखता था और वो आंबडवे गांव जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में है के मूल निवासी थे। लड़ाकू नश्ल के नागवंशी क्षत्री होने के नाते भीमराव आम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कई पीड़ियों से कार्यरत थे और उनके पिता रामजी सकपाल जी भारतीय सेना की महू छावनी में सुबेदार के पद पर थे |
उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी।
जब वह चौथी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण हुए, तब उन्हें लेखक दादा केलुस्कर द्वारा खुद की लिखी 'बुद्ध की जीवनी' उन्हें भेंट दी गयी। इसे पढकर उन्होंने पहली बार गौतम बुद्ध व बौद्ध धर्म को जाना एवं उनकी शिक्षा से प्रभावित हुए।
माध्यमिक शिक्षा हेतु वह 1897 में मुंबई चले गये | जहां एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाईस्कूल में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थे। 1907 में उन्होंने अपनी मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और अगले वर्ष उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया जो कि बॉम्बे विश्वविद्यालय से संबद्ध था | 1912 तक, उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में अपनी डिग्री प्राप्त की, और बड़ौदा राज्य सरकार में नौकरी करने लगे ।
उनकी योग्यता को देख कर बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़ ने अपने खर्चे पर 1913 में मात्र 22 साल की उम्र में संयुक्त राज्य अमेरिका, न्यू यॉर्क शहर में कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए तीन साल के लिए 11.50 डॉलर प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति देकर भेजा । वहां पहुंचने के तुरंत बाद वह लिविंगस्टन हॉल में पारसी मित्र नवल भातेना के साथ बस गये । जून 1915 में उन्होंने अपनी एमए परीक्षा पास कर ली, जिसमें अर्थशास्त्र प्रमुख, और समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शनशास्त्र और मानव विज्ञान यह अन्य विषय भी थे।
1916 में, उन्होंने अपना दूसरा थीसिस, नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया - ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी दुसरे एमए के लिए पूरा किया, और आखिरकार उन्होंने लंदन के लिए छोड़ने के बाद, 1916 में अपने तीसरे थीसिस इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया के लिए अर्थशास्त्र में पीएचडी प्राप्त की, अपने थीसिस को प्रकाशित करने के बाद 1927 में अधिकृप रुप से पीएचडी प्रदान की गई। 9 मई को, उन्होंने मानव विज्ञानी अलेक्जेंडर गोल्डनवेइज़र द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भारत में जातियां: उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास नामक एक पेपर लेख प्रस्तुत किया, जो उनका पहला प्रकाशित काम था।
डॉ॰ आम्बेडकर ने 3 वर्ष तक की मिली हुई छात्रवृत्ति का उपयोग उन्होंने केवल दो वर्षों में अमेरिका में पाठ्यक्रम पूरा किया और अक्टूबर 1916 में वह लंदन गए और वहाँ उन्होंने ग्रेज़ इन में बैरिस्टर कोर्स (विधि अध्ययन) के लिए दाखिला लिया, और साथ ही लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में दाखिला लिया जहां उन्होंने अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट थीसिस पर काम करना शुरू किया।
इनकी मेधा शक्ति से कई अंग्रेज प्रोफ़ेसर बहुत प्रभावित हुये | उन्होंने इनके विषय में ब्रिटेन के राजनीतिज्ञों से चर्चा की | काफी लम्बे समय से ब्रिटेन के राजनीतिज्ञों को भारत में अपने अत्याचारों की कमी को छिपाने के लिये दलितों के मसीहा के रूप में एक भारतीय मूल के अंग्रेजी वक्ता की आवश्यकता थी | अत: उन ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने इन्हें दलितों के मसीहा के रूप में भारत की सामाजिक स्थिती की सार्वजनिक मंच पर अंग्रेजी भाषा में निन्दा करने के लिये खूब प्रयोग किया |
बड़े बड़े लेख और इन्टरव्यू फोटुओं के साथ समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने लगे | सेमिनार में विशेषज्ञ के रूप में जाने आने लगे | पिता 2 फरवरी 1913 को मर चुके थे | परिवार वाले इनकी इन हरकतों के कारण इन्हें पूछते तक नहीं थे | मन चाहा अनाब शनाब पैसा इन्हें अंग्रेज दलालों के माध्यम से मिलने लगा था | अंग्रेजों के साथ मांसाहारी पार्टी और शराब की दावतें प्रायः रोज ही होने लगी थी | जब यह पूरी तरह अंग्रेजों के प्रभाव में आ गये तो यहीं से अंग्रेजों ने इनका राजनैतिक दुरुपयोग शुरू कर दिया |
अंग्रेजों की कृपा से इन्हें भारत में दलितों के मसीहा घोषित होने में ज्यादा देर नहीं लगी | दलितों के मसीहा होने के बाद भी कभी भी यह दलित बस्ती में नहीं रहे | डा॰ अम्बेडकर बम्बई के ब्राह्मण बहुल मोहल्ले मेँ अपना स्थायी आवास “राजगृह” बना कर रहते थे और इनकी पहली पत्नी रमाबाई महार (क्षत्रिय) परिवार से थीं । 27 मई 1935 को उनकी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी भी मराठी ब्राह्मण ही थीं |
इनकी कोई भी पत्नी शूद्र नहीं थी | इनको ब्राह्मण नेता सम्मान भी देते थे | बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, मोहनदास करमचंद गाँधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, वल्लभ भाई पटेल, गोविन्द बल्लभ पंत, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, इत्यादि इनकी मित्र सूची में शामिल थे। कानून के इन्हीं विशेषज्ञों के सहयोग से 26 जनवरी 1950 एक महार (क्षत्रीय) डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर ने भारत के सविधान का निर्माण कर मजबूत भारत की नींव रखी।
किन्तु इनका उपयोग करके अंग्रेजों के इशारे पर इनका सामाजिक व राजनैतिक बहिष्कार शुरू हुआ जिससे क्षुब्द होकर डा भीमराव रामजी आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को अपने लगभग 3,80,000 अनुयायीयों के साथ हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। इसके बाद भी आज महारष्ट्र की कुल जनसंख्या का 9 % लगभग एक करोड़ महार हैं |
योगेश कुमार मिश्र
अधिवक्ता
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