शनिवार, सितंबर 16, 2017

रोहिंग्या मुसलमानों पर पांचजन्य में प्रकाशित यह लेख कुछ वर्ष पहले का है लेकिन वर्तमान में काफी प्रासंगिक है।)

रोहिंग्या मुसलमानों पर पांचजन्य में प्रकाशित यह लेख कुछ वर्ष पहले का है लेकिन वर्तमान में काफी प्रासंगिक है।)
गजवा-ए-हिन्द यानी भारत को जीतने का पुराना स्वप्न, कुत्सित आंखों की विभिन्न चरणों की योजना सदियों से चल रही है। खासी सफल भी हुई है। वृहद् भारत की बहुत सारी धरती भारत से अलग की जा चुकी है। बंगलादेश को विराट भारत से अलग करने के षड्यंत्र के बारे में पिछले अंक में चर्चा हो चुकी है। उसी षड्यंत्र के एक और भाग म्यांमार की बातचीत आज करना चाहता हूं।
मूर्ति पूजक, प्रकृति पूजक, बौद्ध तंत्र तथा बौद्ध मत की महायान शाखा को मानने वाला म्यांमार या बर्मा भारत, थाईलैंड, लाओस, बंगलादेश और चीन से घिरा हुआ देश है। इसका क्षेत्र 6,76,578 वर्ग किलोमीटर का है। इसकी धरती रत्नगर्भा है। माणिक जैसे कीमत जवाहरात, तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध यह देश बहुत समय से उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। यहां सैन्य शासन लगातार उपस्थिति बनाये हुए है। सैन्य शासन समाप्त होने के बाद भी राजनीतिक दल सैन्य अधिकारियों से भरे हुए हैं।
बर्मा में भी मुस्लिम कन्वर्जन के साथ संसार के अन्य सभी देशों में होने वाली उथल-पुथल शुरू से है। सभी अमुस्लिम देशों, जिनमें इस्लाम का प्रवेश हो गया हो, में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने पर एक विशेष प्रवृत्ति पायी जाती है। हम मुसलमान अब अधिक संख्या में हैं और अन्य मतावालंबियों की जीवनशैली हमसे भिन्न है। अत: हम उनके साथ नहीं रह सकते। हमें अलग देश चाहिए। ये हाय-हत्या अन्य देशों में जैसे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने के साथ होने लगती है, वैसी ही बर्मा में भी होती आई थी। मगर इसकी स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के काल में विस्फोटक हुई। ब्रिटिश उपनिवेश रहे बर्मा पर द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सेना ने हमला बोला। ब्रिटेन के पांव उखड़ने लगे। पीछे हटते हुए ब्रिटिश राज ने बर्मा में जापानियों के खिलाफ अपने छिपे दस्ते बनाने की कोशिश में रोहिंग्या मुसलमानों को ढेरों शस्त्र उपलब्ध कराये। इन लोगों ने रोहिंग्या मुसलमानों को आश्वासन दिया कि इस युद्ध में यदि उन्होंने ब्रिटेन का साथ दिया तो उन्हें इस्लामी राष्ट्र दे दिया जाएगा।
हथियार पाकर रोहिंग्या मुसलमान भारत के मोपला मुसलमानों की तरह उपद्रव पर उत्तर आये और उन्होंने जापानियों से लड़ने की जगह अरकान के बौद्धों पर हमला बोल दिया। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा भारत में गांधी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन के समय हुआ। जैसे अंग्रेजों के खिलाफ और तुर्की के खलीफा के पक्ष में आंदोलन करते मोपला मुसलमान हिन्दुओं पर क्रोध उतारने लगे और उन्होंने लाखों हिन्दुओं की हत्या की, उसी तरह रोहिंग्या मुसलमान अंग्रेजों की कृपा से अपना राज्य पाने की जगह स्वयं ही बौद्धों को मिटा कर इस्लामिक राष्ट्र पाने की दिशा में चल पड़े । जिस तरह 1946 में कलकत्ता में किये गए डायरेक्ट एक्शन में एक दिन में मुस्लिम गुंडों ने 10,000 हिन्दुओं को मार डाला था, उसी तरह 28 मार्च 1942 को रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा के मुस्लिम-बहुल उत्तरी अराकान क्षेत्र में 20,000 से अधिक बौद्धों को मार डाला।
मई, 1946 में बर्मा की स्वतंत्रता से पहले अराकानी
मुस्लिम नेताओं ने भारत में मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और मायू क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कराने के लिए उनकी सहायता मांगी। इसके पूर्व अराकान में जमीयतुल उलेमा ए इस्लाम नामक एक संगठन की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य भी अराकान के सीमांत जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना था। स्वाभाविक था बर्मा सरकार ने मायू को स्वतंत्र इस्लामी राज्य बनाने या उस पुर्वी पाकिस्तान में शामिल करने से इनकार कर दिया। इससे क्रुद्ध उत्तरी अराकान के मुजाहिदों ने बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी। मायू क्षेत्र के दोनों मुस्लिम-बहुल शहरों ब्रथीडौंग एवं मौंगडाऊ में अब्दुल कासिम के नेतृत्व में लूट, हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का भयावह खेल शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में इन दोनों शहरों से बौद्धों को या तो मार डाला गया अथवा भगा दिया गया। अपनी जीत से उत्साहित होकर सन् 1947 तक पूरे देश के प्राय: सभी मुसलमान एकजुट हो गये एवं मुजाहिदीन मूवमेंट के नाम से बर्मा पर लगभग आंतरिक आक्रमण ही कर दिया गया। स्थिति इतनी भयानक हो गयी कि 1949 में तो बर्मा सरकार का नियंत्रण अराकान के केवल अकयाब शहर तक सीमित रह गया, बाकी पूरे अराकान पर जिहादी मुसलमानों का कब्जा हो गया। हजारों बंगाली मुस्लिम उस क्षेत्र में लाकर बसाए गए। इस घुसपैठ से क्षेत्र में मुस्लिम आबादी काफी बढ़ गई। मुजाहिदीन यहीं नहीं रुके। अराकान से सटे अन्य प्रांतों में भी यही नीति अपनायी जाने लगी और ये पूरा क्षेत्र म्यांमार के लिए कोढ़ बन गया।
बर्मा ने 1946 में स्वतंत्रता प्राप्त की और तभी से वहां उपद्रव प्रचंड हो गया। रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही बर्मा से अलग होकर पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बंगलादेश बन गया है) में शामिल होने का संघर्ष छेड़ दिया। रात-दिन हिंसा की घटनाएं होने लगीं। विवश होकर बर्मा सरकार ने सैन्य कार्रवाही के आदेश दिये। विश्व के लगभग प्रत्येक मुस्लिम देश ने बर्मा सरकार के इस अभियान की निंदा की परन्तु सरकार पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और सेना ने पूरे क्षेत्र में जबरदस्त रूप से आतंकवादियों को पकड़ना शुरू कर दिया। हजारों धावे किये गए। जिहादियों की कमर तोड़ दी गयी और अधिकतर जिहादी जान बचाकर पूर्वी पाकिस्तान भाग गये, कुछ भूमिगत हो गये और अन्दर ही अन्दर विश्व के कट्टरपंथी इस्लामी गुटों के सम्पर्क में रहे। अपनी शक्ति बढ़ाते रहे और जिहाद के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा करते रहे।
ये अवसर उन्हें 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश के रूप में उदय के बाद फिर से मिला। बचे खुचे जिहादियों में फिर छटपटाहट शुरू हुई और 1972 में जिहादी नेता जफ्फार ने रोहिंग्या लिबरेशन पार्टी (आऱएल़पी़) बनाई और बिखरे जिहादियों को इकट्ठा करना शुरू किया। हथियार बंगलादेश से मिल गए और जिहाद फिर शुरू हो गया। परन्तु 1974 में फिर से बर्मी सेना की कार्रवाई के आगे पार्टी बिखर गई और इसका नेता जफ्फार पिट-छित कर बंगलादेश भाग गया। इस हार के बाद पार्टी का सचिव मोहम्मद जफर हबीब सामने आया और उसने मुस्लिम जिहादियों के साथ रोहिंग्या पैट्रियाटिक फ्रंट का गठन किया। इसी फ्रंट के सी़ई़ओ़ रहे मोहम्मद यूनुस ने रोहिंग्या सोलिडेरिटी आर्गनाइजेशन (आऱएस़ओ़) बनाया और उपाध्यक्ष रहे नूरुल इस्लाम ने अराकान रोहिंग्या इस्लामिक फ्रंट (ए़आऱआई.एफ) का गठन किया।
इन जिहादी संगठनों की मदद के लिए पूरा इस्लामी जगत सामने आ गया। इनमें बंगलादेश एवं पाकिस्तान के सभी इस्लामी संगठन, अफगानिस्तान का हिजबे-इस्लामी, भारत के जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन, मलेशिया के अंकातन बेलिया इस्लाम मलेशिया ( ए़बी़आई़एम) तथा इस्लामिक यूथ आर्गनाइजेशन ऑफ मलेशिया मुख्य रूप से शामिल थे। पैसा अरब राष्ट्रों से आता रहा। पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आई़ एस़ आई़ ने रोहिंग्या मुसलमानों को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें अपने प्रशिक्षण केन्द्रों में उच्च स्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान किया। इसके बाद ये लड़ाई और भी हिंसक हो गयी। पूरे देश में बौद्धों पर हमले होने लगे। फिर भी बर्मा का सामान्य नागरिक अपनी सुरक्षा के प्रति उदासीन बना रहा। भारत की तरह वहां भी कायरतापूर्ण शान्ति और झूठी एकता का पाठ पढ़ाने वाले नेताओं का कुचक्र चल रहा था।

ऐसे में मांडले के बौद्ध भिक्षु पूज्यचरण अशीन विराथु सामने आये। जिन्होंने अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को समझाया कि यदि अब भी वे नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसी दौरान कुछ हिंसक झड़पें हुईं कई बौद्ध मारे गये। शनै: -शनै: जनता इन झगड़ों का मूल कारण जिहाद और उसके कारण होने वाली दुर्दशा को समझने लगी। जब अपनी जिन्दगी पर प्रभाव पड़ता है तो स्वाभाविक ही नींद खुल जाती है। अंततोगत्वा जनता का धैर्य टूट गया और लोग भड़क उठे। यहां तक कि दुनिया में सबसे शान्तिप्रिय माने जाने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिया। फिर तो बर्मा की तस्वीर ही बदलने लगी। इस्लामी आतंकवाद की पैदावार हिंसक झड़पों एवं उनके भड़काऊ भाषणों पर पूज्य अशीन विराथु के तेजस्वी भाषणों से बर्मा की सरकार ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए विराथु को 25 वर्ष की सजा सुनायी थी। लेकिन देश जाग चुका था और विराथु के जेल जाने के बाद भी देश जलता रहा और जनता के जबरदस्त दबाव में सरकार को उन्हें उनकी सजा घटाकर केवल सात साल बाद 2011 में ही जेल से रिहा करना पड़ा। रिहा होने के पश्चात भी विराथु की कट्टर राष्ट्रवादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। और वे अनवरत रूप से अपने अभियान में लगे रहे।
28 मई, 2012 को मुस्लिम गुंडों ने एक बौद्ध महिला का बलात्कार करके हत्या कर दी। इसके बाद पूरे बर्मा के बौद्ध अत्यंत उग्र हो गये और फिर तो वहां ऐसी आग लगी कि पूरा देश जल उठा। म्यांमार के दंगों में विराथु के भड़काऊ भाषणों ने आग में घी का काम किया। उन्होंने साफ कहा कि अब यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो अब शांत रहने का समय नहीं है। उन्होंने बुद्ध के अहिंसा-शांति के उपदेशों के रास्ते को छोड़कर आक्रमण की नीति अपनाने के उपदेश दिए। मोक्ष की साधना आखिर शांतिमय वातावरण चाहती है। रात-दिन हमलों, बम विस्फोटों से देश को बचाना शांति-अहिंसा के पालन के लिए ही आवश्यक है।
उन्होने म्यांमार की जनता को साफ कहा कि अगर हमने इनको छोड़ा तो देश से बौद्धों का सफाया हो जाएगा और बर्मा मुस्लिम देश हो जायेगा।
विराथु ने जनगणना के आंकड़ों से तथ्यात्मक रूप से सिद्ध किया कि मुस्लिम अल्पसंख्यक बौद्ध लड़कियों को फंसाकर शादियां कर रहे हैं एवं बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करके पूरे देश के जनसंख्या-संतुलन को बिगाड़ने के मिशन में दिन-रात लगे हुए हैं। जिसके कारण बर्मा की आन्तरिक सुरक्षा के लिये भारी संकट पैदा हो गया है। इनका कहना है कि मुसलमान एक दिन पूरे देश में फैल जाएंगे और बर्मा में बौद्धों का नरसंहार शुरू हो जाएगा। विराथु के विचारों का जनसाधारण में प्रचंड समर्थन देखकर वहां की सरकार भी झुकी और वहां की राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से कहा- इस्लामी आतंकियों को अब अपना रास्ता देख लेना चाहिए।
मेरे लिए महत्वपूर्ण हमारे देश के मूलनिवासी हैं। मुस्लिम चाहें तो शिविरों में ही रहे या बंगलादेश जाएं।
विराथु ने अपने देश से लाखों आतंकवाद के समर्थकों, प्रेरकों को भागने पर मजबूर कर दिया। वे अपनी बातें अधिकांशत: डीवीडी और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं। धीर-गंभीर विराथु दृष्टि नीचे किए शांत स्वर में अपने हर उपदेश में बौद्धों के संगठित होने और हिंसा का जवाब हिंसा से देने का उपदेश देते हैं। मंडाले के अपने मासोयिन मठ से लगभग दो हजार पांच सौ भिक्षुओं की अगुआई करने वाले विराथु के फेसबुक पर हजारों फालोअर्स हैं और यूट्यूब पर उनके वीडियो को लाखों बार देखा जा चुका है। छह करोड़ की बौद्ध आबादी वाले म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना तेजी से गति पकड़ रही है। बौद्ध भिक्षुओं को शांति और समभाव का आचरण करने के लिए जाना जाता है किंतु म्यांमार के अधिकांश बौद्ध आत्मरक्षा के लिए अब जिहादियों का तौर-तरीका अपनाने में भी कोई संकोच नहीं कर रहे हैं।
म्यांमार में हुए कई सर्वेक्षणों के बाद ये प्रमाणित हो चुका है कि जनता एवं बौद्ध भिक्षु विराथु के साथ हैं। विराथु का स्वयं भी कहना है कि वह न तो घृणा फैलाने में विश्वास रखते हैं और न हिंसा के समर्थक हैं, लेकिन हम कब तक मौन रहकर सारी हिंसा और अत्याचार को झेलते रह सकते हैं? इसलिए वह अब पूरे देश में घूम-घूम कर भिक्षुओं तथा सामान्यजनों को उपदेश दे रहे हैं कि यदि हम आज कमजोर पड़े, तो अपने ही देश में हम शरणार्थी हो जाएंगे। म्यांमार के बौद्घों के इस नये तेवर से पूरी दुनिया में खलबली मच गई है। दुनिया भर के अखबारों में उनकी निंदा में लेख छापे जा रहे हैं परन्तु पूज्य चरण अशीन विराथु को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। वे पूर्ववत असली राष्ट्र आराधन में लगे हुए हैं।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

मंगलवार, सितंबर 12, 2017

पाकिस्तान के पास जो सबसे बड़ा हथियार है वह उसका परमाणु बम नहीं, बल्कि वे बीस करोड़ मुसलमान हैं जो हमारे देश में रह रहे हैं.

Kuldeep Tiwari Mahanshar
# जयपुर_रामगंज_दंगा
पहले भी मैंने कहा कि पाकिस्तान के पास जो सबसे बड़ा हथियार है वह उसका परमाणु बम नहीं, बल्कि वे बीस करोड़ मुसलमान हैं जो हमारे देश में रह रहे हैं.
कुछेक मित्रों ने नाराजगी जताई. तो एक बात और साफ कर दूँ, यह मेरी कही बात नहीं है. यह स्ट्रेटेजिक डॉक्ट्राइन 80 के दशक में जनरल जिया-उल-हक ने दी थी. उसने कहा था कि जब भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं तो हमें अपने फौजी लड़ने के लिए भेजने की क्या जरूरत है? तब से पाकिस्तान ने भारत के मुसलमानों को रेडिकलाइज करने में इन्वेस्ट करना शुरू किया. भारत की अपनी सरकारों ने भी आगे इस आग में खूब घी डाला.
आज एक सबसे कन्जर्वेटिव आकलन से भी कम से कम दस प्रतिशत मुसलमानों का तो रेडिकलाइजेशन हो ही चुका है. संख्या में ये कितने हुए? दो करोड़. यानि पूरे भारत की फौजों से पंद्रह-बीस गुना ज्यादा.
अब अगर पाकिस्तान इन्हें भारत में दंगे-फसाद फैलाने का सिग्नल दे दे, तो आप कैसे संभालोगे? और बाकी के अठारह करोड़ आपके साथ खड़े होकर इसका विरोध करते नहीं दिखेंगे. वे या तो मूक दर्शक बनकर हवा का रुख भांपेंगे, या शोर मचाएँगे कि मुसलमानों के साथ कितना अत्याचार हो रहा है. अगर दो-चार प्रतिशत मुसलमान सचमुच इसके विरोध में भी होंगे तो वे वैसे ही अप्रासंगिक होंगे जैसे 1947 के पहले थे.
पिछले कुछ समय से भारत के अलग-अलग शहरों में किसी ना किसी बहाने से पचास हजार-एक लाख मुसलमान जुटे हैं, हिंसक प्रदर्शन किए हैं. कभी किसी हिन्दू त्योहार के मौके पर, या कहीं पैगम्बर से गुस्ताखी के विरोध के बहाने से. यह सब उसी मारक हथियार की मिकेनिज्म को टेस्ट करने की प्रक्रिया भर है... सोचिए, एक कदम भी आगे बढ़े हैं हम? या जो चेतावनी दी थी, वह समय अब आ गया लगता है?
यह मोदी सरकार की डेढ़ साल की नीतिगत विफलता है कि मुसलमानों का मनोबल इतना बढ़ा है कि केन्द्र और राज्यों में भाजपा सरकारों के रहते वे सड़कों पर जुलूस निकाल कर ISIS के झंडे लहराते हैं, और उन्हें किसी कारवाई का डर नहीं है. वे अपनी ताकत माप रहे हैं, आपकी विल पॉवर और Resolve को परख रहे हैं. अाज वो ISIS के झंडे लेकर सड़कों पर निकल रहे हैं, कल को अगर हथियार लेकर एक लाख दंगाई निकलेंगे सड़कों पर, भारत के हर शहर में, तो आप संभाल लोगे? है इतनी फौजें, इतनी पुलिस? इनसे आज अगर नहीं निबट सकते तो कल भी नहीं निबट पाओगे...
... बिल्ली का मुँह पहले दिन ही जलना चाहिए, कि कल वो दूध के आस-पास भी नहीं फटके. लंदन वाले डाक्टर साहब कहे हैं ,अब भी वक्त है सम्भल जाओ,!!

बुधवार, सितंबर 06, 2017

गौरी लंकेश (धर्मान्तरित ) ::जाँच शुरू ही उन लोगों से होनी चाहिए जो हत्या के आधे घंटे के भीतर बैनर/पोस्टर छपवा चुके थे

बंगलुरु में 'वामपंथी झुकाव' वाली एक पत्रकार की हत्या कर दी गयी. मिनटों में ये ख़बर आग की तरह फैली और पत्रकार के वैचारिक आकाओं ने फ़ैसला सुना दिया कि पनसारे, दाभोलकर की तरह कट्टर हिंदूवादी संगठनों ने हत्या की क्योंकि पत्रकार कट्टर हिंदूवाद की विरोधी थी.
पत्रकार के अपने आख़री ट्वीट्स साफ़ इशारा करते हैं कि जिस भी संगठन से उनका वैचारिक प्रेम रहा है, उसके साथ उनके सम्बंध अच्छे नहीं चल रहे थे. कॉमरेड्ज़ को आपस में लड़ने की बजाय असली दुश्मन से लड़ने की नसीहत इन ट्वीट्स में दी गयी थी. शायद ऐसी ही साज़िश पे ध्यान ना जाए, इस लिए बड़े कॉमरेड्ज़ ने बिना वक़्त गँवाए हिंदूवादी संगठनों का शिगूफ़ा छोड़ दिया.
हेमंत यादव, राजदेव रंजन, संजय पाठक, ब्रजेश कुमार जैसे पत्रकारों ने पहले भी जान गँवाई है- वैचारिक झंडाबरदारी करते हुवे नहीं, ख़बरों के पीछे भागते हुवे. लेकिन अफ़सोस, उनके लिए ना तो राजनीतिक पार्टियों को शर्मिंदगी हुई ना ही उनकी क़ौम के कथित ठेकेदार पत्रकारों को जो गौरी लंकेश की शव यात्रा में ट्विटर और फ़ेसबुक पे ही शामिल हो कर लाइक्स और रीट्वीट्स कमाने की जुगत में लगे हैं.
कर्नाटक में सरकार सिद्धरमैया की है. लेकिन क़ानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार वो नहीं हैं. हिंदूवादी संगठनों के नाम ठीकरा फोड़ कर और प्रधानमंत्री से जवाब माँग कर, सिद्धरमैया को इशारा दे दिया गया है कि आपका इस्तीफ़ा नहीं माँगेंगे, बशर्ते आप जाँच कॉमरेड्ज़ की आपसी खींचतान की ओर ना ले जाएँ. वैसे एक ख़बर ये भी है कि वो सिद्धरमैय्या की सरकार के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ही ख़बर पर काम कर रही थी.
गौरी लंकेश का अपने भाई से भी विवाद था. मामला थाने तक जा चुका था. बीजेपी के एक नेता की शिकायत पर उनके ख़िलाफ़ मानहानि के मामले में वो ज़मानत पर थी. जाति व्यवस्था और एक सूफ़ी दरगाह के मामले में हिंदूवादी संगठनों से उनका टकराव भी हुआ.
लेकिन ये सारी बातें तब बेमानी हो जाती हैं जब मौत के आधे घंटे में कुछ लोग ये तय कर देते हैं कि हत्या किसने की और किस लिये की.
क़ायदे से तो जाँच शुरू ही उन लोगों से होनी चाहिए जो हत्या के आधे घंटे के भीतर बैनर/पोस्टर छपवा चुके थे और एक सुर, एक ताल, एक लय में सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी वैचारिक लड़ाई पे पर्दा डाल कर मामले का भगवाकरण करने में जुट गए थे.

मियांमार औ श्रीलंका भारत जैसे शक्तिशाली देश का मुहं चिढ़ा रहे हैं,श्रीलंका ने लिट्टे आतंकवाद को बिना किसीकी (UNO और मानवाधिकारों के ठेकेदारों) परवाह किये समाप्त कर दिया और अब मियांमार भी श्रीलंका के नक्शेकदम पर चलते हुए रोहंगिया उग्रवाद को समाप्त कर रहा है

Upendra Vishwanath
दो छोटे से देश मियांमार औ श्रीलंका भारत जैसे शक्तिशाली देश का मुहं चिढ़ा रहे हैं,श्रीलंका ने लिट्टे आतंकवाद को बिना किसीकी (UNO और मानवाधिकारों के ठेकेदारों) परवाह किये समाप्त कर दिया और अब मियांमार भी श्रीलंका के नक्शेकदम पर चलते हुए रोहंगिया उग्रवाद को समाप्त कर रहा है
और एक हम हैं की कश्मीर में अभी पैलेट गन का विकल्प ही ढूंढ रहे हैं सांपो के फन कुचलने पड़ते हैं घायल करके छोड़ने पर तो ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं
श्रीलंका में सैन्य कारवाई के दौरान एक बारह वर्ष का बच्चा सेना को मिला सेना ने उसे चाय और बिस्कुट खाने को दिया और अपने कैंप में रखा लेकिन जैसे ही ये पता लगा और पुष्टि हुई की वो लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन का बीटा है उसके सर में गोली मार कर काम तमाम कर दिया ,अगर बीमारी को जड़ से हमेशा के लिए समाप्त करना हो तो क्रूर और निर्दयी तो बनना पड़ता है
" विनय ना मानत जलधि जड़ ,गए तीन दिन बीत !"
" बोले राम सकोप तब , भय बिनु होई न प्रीत !!
" भय के बिना प्रेम नहीं होता ,शठ और अहंकारी के साथ विनय निवेदन की नीती व्यर्थ है ,कुटिल के साथ प्रेम का मार्ग व्यर्थ है ,खानदानी कंजूस को दान की महिमा बतानी व्यर्थ है और अति लोभी को वैराग्य का उपदेश वैसे ही व्यर्थ है जैसे बंजर भूमि में बीज बोना"

गुरुवार, अगस्त 31, 2017

अमृता देवी और खेजड़ली

जब राजमहल बन रहा है और उसका चूना पकाने के लिए लकड़ियाँ चाहिए, तो राजा अपने राज्य में चाहे जहां से लकड़ी कटवाए! बिश्नोई कौन होते हैं रोकने वाले ?दीवान गिरधरदास ने राजा अभयसिंह को उसकी शक्तियाँ याद दिलाई।राजा असमंजस में खड़ा रहा!दीवान ने उसे अपनी युक्तियों पर विश्वास करने को कहा। बिश्नोईयों को डराने धमकाने के लिए सेना साथ ले जाने की अनुमति मांगी और फिर से खेजड़ली की ओर चला आया।दीवान दो दिन पहले भी आया था। तब उसने कहा था कि अगर गांव के लोग मिल कर उसे कुछ पैसे दे देते हैं तो वो लकड़ियों की व्यवस्था कहीं और से कर लेगा।दीवान को लगा कि अपने पेड़ बचाने के लिए गांव वाले उसे इतनी सी भेंट तो चढ़ा ही देंगे।लेकिन गांव वालों के लिए तो ये सिद्धांतों का संघर्ष था। सिद्धांतों के संघर्ष में साध्य और साधन दोनों की पवित्रता बने रहना अनिवार्य होता है। ऐसे में खेजड़ली गांवकी ही एक बिश्नोई नारी अमृता ने आगे बढ़ दीवान को दो टूक जवाब दे दिया-दाम दिया दाग लगे, टको नी देवां डाँण।रिश्वत क्यों दें ? रिश्वत के लिए एक टका भी नहीं मिलेगा!दीवान भड़क उठा। राजपुरुष होने की धौंस जमाई और सबक सिखाने की धमकी दे वापिस चला गया। कहा- दशमी को सेना सहित आऊंगा। देखता हूँ कैसे बचा लोगे वृक्ष!कहाँ जोधपुर रियासत का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति दीवान और कहाँ ढ़ाणियों में रहने वाले निर्बल और शक्तिहीन बिश्नोई!लेकिन धर्म का बल धनबल और बाहुबल से बहुत अधिक होता है। बिश्नोई लोग अपने आदर्शों के लिए लड़ रहे थे। इसलिए उन्हें डर लगा ही नहीं। चिंता जरूर हुई, पर वो भी अपनी नहीं, वृक्षों की।शमी वृक्ष मरुभूमि का कल्प वृक्ष कहा जाता है। आर्थिक दृष्टि से लाभदायक। धार्मिक महत्व भी अत्यधिक। "शमी शमयतेपापं" "रामस्य प्रियवादिनी" "अमंगलानां शमनीं"। बिश्नोईयों के लिए तो खेजड़ी माँ है, बहन है, बेटी है। खेजड़ापितृवत है, भ्रातृवत है, मित्रवत है, पुत्रवत है। उसे कोई चूना पकाने के लिए काट ले जाएगा ?84 गांव खेड़ों में सन्देश भेजा गया- दीवान दशमी को सेना सहित आने की धमकी दे गया है। पेड़ काटेगा। उसे येन केन प्रकरेण रोकना है।लोग नवमी की शाम को ही पहुंचने लगे थे। रात्रि जागरण हुआ। दशमी की सुबह हवन हुआ। सबदवाणी का पाठ हुआ। धर्म-नियम-संकल्प दोहराए गए। खेजड़ी तो बचानी ही है। हर हाल में। चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए।उधर दीवान नवमी की रात निश्चिन्त सोया और दशमी को सुबह होते ही सेना सहित चल पड़ा। आरे-कुल्हाड़े साथ लिए। बैल-घोड़े-गाड़ियाँ। पेड़ काट कर ले कर ही आना है। हर हाल में। चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए।खेजड़ली गांव में प्रवेश करते ही दीवान को सामने सहस्रों बिश्नोईयों का समूह दिखा। बिश्नोईजन हवनादि अनुष्ठान संपन्न कर दीवान की प्रतीक्षा में ही बैठे थे। शत्रु को सम्मुख देख उठ खड़े हुए। लेकिन साथ ही राजपुरुष आया जान अभिवादन भी किया। गुरु जाम्भोजी का कहा सबद है- " जे कोई आवे हो हो कर तो आप जे हुईए पाणी "। बिश्नोई जनों ने ऐसा ही किया। हाथ जोड़ खेजड़ी के वृक्षों के समीप मानव श्रृंखला बना दीवान के समक्ष खड़े हो गए।दीवान ने उपेक्षापूर्वक सरसरी तौर पर नजर डाली,घोड़ा आगे बढ़ाया और एक घने बड़े खेजड़े की छांव में रुक गया।अनगिनत बार भिड़ चुकने के बाद भी अधर्म फिर से धर्म के समक्ष संघर्ष को प्रस्तुत था। सदा की तरह- धर्म शांत, नम्र लेकिन उन्नत माथा लिए और अधर्म अट्टाहास करता हुआ।दीवान ने देखा- रिश्वत की मांग पर अपमानित करने वाली नारी अमृता सबसे आगे खड़ी है। दीवान प्रतिशोध के भाव ले कर तो आया ही था, इसे चुनौती समझ और अधिक चिढ़ गया।उसने सिपाहियों को कुल्हाड़ी ले आगे आने को कहा और सबसे पहले अमृता के समीप के खेजड़े को काट गिराने का हुक्म दे दिया।अमृता के मन में झंझावात चल उठे।उसने कातर दृष्टि से खेजड़े की ओर देखा और हाथ जोड़े हुए ही दो कदम आगे बढ़ आई।मद में चूर दीवान बोला- अगर उस दिन पैसे दे दिए होते तो आज ये दिन न देखना पड़ता। अब तो सारे पेड़ कटेंगे।देखता हूँ मुझे कौन कैसे रोकता है!सिपाही आगे बढ़ा और कुल्हाड़ा तान खड़ा हो गया।सुख दुःख के साथी खेजड़े पर तना कुल्हाड़ा देख अमृता का गला भर आया। आंखों से अश्रुधार बही। कुछ सम्भली, फिर बोली- दीवान जी, ये खेजड़ियाँ हमारे जीवन का आसरा है। इन्हीं की सूखी समिधाएँ बीन कर चूल्हा जलाया, इन की सांगरियों के सागसे हम दोपायों का और लूंग से चौपायों का पेट भरा, हर चौमासेकी दोपहरी में उस घने खेजड़े की छांव में भरतार के साथ भाता किया, मुश्किल से महीना बीता होगा - अब के सावन में ही इस बांकी खेजड़ी की झुकी डाल पर झूला झूली, ये सब मैं कैसे भूलूँ ?दीवान उपहास की दृष्टि से देखता रहा।अमृता का स्वर शनैः शनैः आरोहित हुआ-मैंने तो छोटी अंगुली के नख से भी कभी इनकी छाल तक न उतारी, तुम कहते हो काट ले जाऊंगा!ये वृक्ष मेरे भाई हैं। मैंने अपना पूरा जीवन इन के संग जिया है। मैं अपनी आँखों से इनका संहार नहीं देख सकती। तुमइन वृक्षों को अवश्य काट लेना, परन्तु- पहले कुल्हाड़ी मेरेऊपर चलेगी, पश्चात पेड़ों पर।इतना कह अमृता ने आंखें बंद की, अपने गुरु को स्मरण किया, आगे बढ़ी और उस बड़े 'भाई' को भुजाओं में भर कर खड़ी हो गई।भादो का महीना था, घेरा बनाए बादल हौले हौले रिसने लगे। मेह में भीग कर झूम जाने वाली खेजड़ियाँ आज भय से कांप उठी। पेड़ों ने साँय साँय कर अनिष्ट की आशंकाओं के संदेश इक दूजेतक पहुंचाए।दीवान अट्टाहास कर बोला- री मूर्ख! रूंख के लिए सर कटाएगी ?शांत स्वर में उत्तर मिला- सर साँटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण!सिर कट जाए और वृक्ष बच जाए तो भी सस्ता ही सौदा है!दीवान इस दिव्यता को सह नहीं पाया और मस्तिष्क पर तीव्र आघात से पागल हुए हाथी की तरह चीख उठा। बोला- काट डालो इसे!सिपाही ठिठक गया। दीवान फिर चीखा- रे खड़ा क्यों है, हुकुम बजा, काट दे इस मूर्खा को! ये मुझे रोकेगी ?चला कुल्हाड़ी और काट डाल !आदेश की पालना हो गई!वफादार सैनिक की कुल्हाड़ी ने सीधे गर्दन पर वार किया। अमृता का सिर कट कर धरती माँ की गोद में जा गिरा। उसके धन्यकबन्ध से लोहित की एक तीव्र धार फूटी और लोहितकण्टका शमी का अभिषेक करती हुई शांत हो गई।इस घटना से पूर्व भी बिश्नोई समाज में वृक्ष रक्षा हेतु तीन खड़ाणे हो चुके थे। 6 लोग अपने प्राण पर्यावरण को अर्पित कर चुके थे। उनकी कथाएं सुन सुन बड़ी हुई बिश्नोईयों की उस पीढ़ी ने बलिदान का अवसर समक्ष पा स्वयं को धन्य समझा। गुरु जम्भेश्वर, आराध्य देव विष्णु और अमृतादेवी की जय जयकार होने लगी। सर साँटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण के नारों से रोंए खड़े होते थे।अमृता की तीन बेटियाँ- आसी, रतनी और भागू आगे बढ़ी और वृक्ष रक्षा हित मां के पद चिह्नों पर चल पड़ी। निर्दयी कुल्हाड़े के प्रहार से बच्चियों के सुकोमल अंग छिन्न भिन्न हो भूशायी हुए। उनके पिता, अमृता के पति रामोजी की देह भी कुठाराघात से निष्प्राण हुई।फिर तो जैसे हरीतिमा शमी को लहू से सींचने की होड़ लग गई। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री, क्या पुरुष! जय जय कार किये आते थे और वृक्षों को बांहों में जकड़ कर खड़े हो जाते थे। रक्त पिपासु दीवान हतप्रभ चीखता जाता था, सिपाही यंत्रवत आघात किये जाते थे और मुख पर सौम्य स्मिता धारण किये बिश्नोईजन कटते जाते थे।एक युवक पहली बार पत्नी को मायके से ले आ रहा था। वो भी सपत्नीक पर्यावरण रक्षा के यज्ञ में आहूत हुआ। आबालवृद्ध।नर नारी। कुल 294 पुरुष और 69 महिलाएं बलिदान हुए। 363 मनुष्य !!हा! कैसा विकट दृश्य। मरुधरा पर मनुज के गाढ़े लहू की सरिता बहती थी। लोथों से मैदान पटा पड़ा था। लेकिन "जांडी हिरण संहार देख सिर दीजिये" जैसी पंक्तियां गाने वाले इन भावों को जी बैठे तो क्या ही आश्चर्य!चतुर्दिक या तो कटे हुए बिश्नोई दृष्टिगोचर होते या कटने को तत्पर बिश्नोई।तब तक भूमि पर बहते रुधिर में अपना रक्तरंजित प्रतिबिम्ब देख सिपाही सिहर उठे। अंदर का राम जग गया। और अधिक हत्याएंकरने का साहस नहीं रहा। पश्चाताप की ज्वाला में झुलस रहे सैनिकों ने कुल्हाड़े-कुल्हाड़ी फेंक दिए। घुटने टेक बैठ कर रोने लगे।सिपाहियों के प्रतिरोध करते ही दीवान भी डर गया। घोड़े को ले जोधपुर की ओर भागा। लेकिन महाभारत काल में अर्जुन के बाणों को धारण करने वाली "धारिण्यर्जुन बाणानां" शमी अपने प्रियजनों के संहारक को भला बच कर कैसे जाने देती। दीवान का घोड़ा खेजड़ी से टकरा गया और दीवान विक्षिप्त हो यमलोक कोप्राप्त हुआ।अगले दिन अभयसिंह तक इस नरसंहार का संदेश पहुंचा। जाम्भोजी के अनन्य भक्त जोधे के जोधपुर में ऐसा अनर्थ ! दीवान के बहकावे में आ वृक्ष काटने का आदेश देने वाले राजाको अपनी भूल का अहसास हुआ। भागा भागा खेजड़ली आया। उपस्थित पंचों के पगों में पगड़ी रखी, हाथ जोड़े, माफी मांगी और सरकारकी ओर से लिखित में ताम्रपत्र दिया कि भविष्य में जोधपुर राज्य में हरे वृक्ष नहीं काटे जाएंगे।वर्तमान में भारत में केंद्र एवं राज्य सरकारें पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को अमृता देवी स्मृति पर्यावरण पुरस्कार भी प्रदान करती हैं।खेजड़ली में उस बलिदान स्थल पर उन पर्यावरण योद्धाओं की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। प्रति वर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को उनकी पुण्य स्मृति में मेला भरता है। जहां बिश्नोई समाज के लोग अपने पितृ पुरुषों को श्रद्धांजलि देते हुए अपने संकल्पों को दोहराते हैं।–------------------------आइए, खेजड़ली बलिदान दिवस पर हम सब पर्यावरण की बेहतरी के लिए वृक्षारोपण, वृक्ष संवर्द्धन और वृक्ष संरक्षण का संकल्प लें। यही हमारी ओर से उन विश्व नायक पर्यावरण ऋषियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बुधवार, अगस्त 30, 2017

इंडियन एक्सप्रेस को आरटीआई के तहत अखिलेश यादव के कार्यकाल में यश भारती पाने वाले 142 लोगों का ब्योरा मिला है.

Jitendra Pratap Singh
जब यूपी में अखिलेश सरकार थी तो करीब 200 लोगों को ‘यश भारती’ सम्मान दिए गए, जिसको ये सम्मान मिलता था उसे 11 लाख रुपए नकद और 50 हजार रुपए की हर महीने पेंशन दी गई. राइट टू इनफार्मेशन (आरटीआई) नाम तो सुना ही होगा. कमाल की चीज़ है. अब उसी ने ऐसी जानकारी सामने लाकर रख दी है जिससे आपको पता चल जाएगा कि ये सम्मान आपको क्यों नहीं मिला. आरटीआई के ज़रिए से ऐसे-ऐसे सीवी (curriculum vitae) के सैंपल सामने आ गए हैं कि उनकी काबिलियत देखकर आपको समझ नहीं आएगा कि आप उनके सीवी पर हंसे या फिर अपने सीवी पर.
इंडियन एक्सप्रेस को आरटीआई के तहत अखिलेश यादव के कार्यकाल में यश भारती पाने वाले 142 लोगों का ब्योरा मिला है. जिसमें ये जानकारी सामने आई है कि कैसे किसी के भी नाम प्रपोज़ कर देने पर यश भारती सम्मान दे दिया गया. यानी सिर्फ भाई भतीजावाद में यश भारती पुरस्कार बांट दिए गए.
यूपी में यश भारती पुरस्कार की शुरुआत अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने 1994 में सीएम रहते हुए की थी. बाद में बसपा और बीजेपी सरकारों ने ये पुरस्कार बंद कर दिए थे, जिन्हें अब अखिलेश यादव सरकार ने दोबारा शुरू किया था. एक अनुमान के मुताबिक ये सम्मान 200 लोगों को मिल चुका है.
जिन लोगों का ब्योरा इंडियन एक्सप्रेस को मिला है उस लिस्ट को देखकर आप समझ जायेंगे कि ये सम्मान पाने के लिए आपको किसी क़ाबिलियत की ज़रूरत नहीं थी, बस किसी समाजवादी नेता से आपका जुड़ा होना काफी था. कई लोगों ने तो सपा सरकार के कसीदे पढ़ते हुए खुद ही सीएम ऑफिस अपने सीवी भेज दिए और मिल गया सम्मान. जबकि ये पुरस्कार आधिकारिक तौर पर स्टेट का संस्कृति मंत्रालय देता है. पहले कुछ लोगों के बारे में जान लो कि कैसे उन्हें ये सम्मान मिल गया.
ये कुछ सीवी के सैंपल हैं, देख लो
1. शिखा पांडे : दूरदर्शन की एक्सटर्नल कोऑर्डिनेटर. 2016 में यश भारती के लिए उनके नाम को लखनऊ के उस वक़्त के एडीएम जय शंकर दुबे ने भेज दिया था. शिखा के सीवी में लिखा था कि उन्होंने चार साल तक सीएम आवास पर हुए प्रोग्राम का आयोजन किया, जिसकी तारीफ खुद सीएम ने भी की.
(ये उपलब्धि सबको नहीं मिलती. तो क्या समझे आप. बिना कुछ किए शिखा को यश भारती मिल गया. चार साल तक सीएम आवास पर प्रोग्राम किया है.)
2. अशोक निगम : इन्हें साल 2013 में यश भारती मिला. अशोक के सीवी में लिखा था, ‘संप्रति समाजवादी पार्टी की पत्रिका समाजवादी बुलेटिन का कार्यकारी संपादक.’ अशोक ने खुद को समाजवादी विचारधारा का राइटर बताया था.
(मियां पता नहीं आप कैसे अपने आप को लेखक कहते हैं. समाजवादी विचारधारा पर लिखा होता तो हर महीने 50 हज़ार आ रहे होते.)
3. रतीश चंद्र अग्रवाल : मुख्यमंत्री के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) ने 3 सितंबर 2016 को अपना नाम खुद ही पेश कर दिया. और यश भारती मिल भी गया.
(क्या सम्मान के लिए इतना काफी नहीं था कि वो सीएम के ओएसडी थे)
4. नवाब जफर मीर अब्दुल्लाह : नवाब को खेल कैटेगरी में यश भारती दिया गया. वो अवध रियासत के वजीर रहे नवाब अहमद अली खान के वंशज हैं. नवाब के सीवी में लिखा है कि वो ‘कारोबारी’ हैं और उनका आवास ‘लखनऊ और पूरा भारत’ है.
5. काशीनाथ यादव : ये जनाब समाजवादी पार्टी के सांस्कृतिक सेल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. उन्होंने 27 अप्रैल 2016 को पार्टी के लेटरहेड पर अपनी सीवी भेजी. उनकी सीवी में लिखा है कि उन्होंने कई कल्चरल प्रोग्राम किए. गीत गाए और समाजवादी पार्टी की योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया. इसके अलावा ये भी लिखा कि उन्होंने 1997 में सैफई महोत्सव में भोजपुरी लोकगीत गाया था.
6. ओमा उपाध्याय : इन्होने अपने सीवी में लिखा है कि उन्होंने 2010 में ज्योतिष और मनोविज्ञान आधारित विशेष वस्त्र बनाने की युगांतकारी तकनीकी डेवलप थी. 2016 में यश भारती मिल गया.
7. अर्चना सतीश : ये वो नाम है जिसको 27 अक्टूबर 2016 को यश भारती पुरस्कार समारोह में ही मंच पर अखिलेश यादव ने मंजूरी दे दी. उस वक़्त अर्चना सतीश कार्यक्रम का संचालन कर रही थीं. उनकी सीवी में लिखा है, ‘प्रतिष्ठित सैफई महोत्सव का पिछले तीन सालों से संचालन’, और ‘4-5 जनवरी 2016 को आगरा में यूपी सरकार के अतिप्रतिष्ठित एनआरआई दिवस कार्यक्रम का संचालन.’
8. सुरभि रंजन : उस समय यूपी के चीफ सेक्रेटरी आलोक रंजन की पत्नीउन्हें एक प्रतिष्ठित गायिका बताया गया है. इनका नाम लखनऊ डिवीज़न के कमिश्नर महेश कुमार गुप्ता ने पेश किया था.
9. शिवानी मतानहेलिया : दिवंगत कांग्रेसी नेता जगदीश मतानहेलिया की बेटी. साल 2016 में यश भारती मिला. शिवानी प्रतापगढ़ के एक कॉलेज में संगीत पढ़ाती हैं. सीवी में लिखा, अब तक 8 अवॉर्ड मिल चुके हैं, जिनमें सात प्रतापगढ़ के स्थानीय संगठनों से मिले हैं.
10. हेमंत शर्मा : सीनियर जर्नलिस्ट, जिन्होंने हाल ही में इंडिया टीवी से इस्तीफा दिया. सीवी में लिखा है, ‘पहले लेखन को गुजर बसर का सहारा माना, अब जीवन जीने का.’ सीवी में ये भी दावा किया गया है कि वो 1989, 2001 और 2013 का महाकुम्भ कवर करने वाले अकेले पत्रकार हैं.
11. मणिन्द्र कुमार मिश्रा : सपा नेता मुरलीधर मिश्रा के बेटे हैं. आईआईएमसी से जर्नलिज्म की पढ़ाई की. सीवी में लिखा है कि उन्होंने साल 2010 में मेघालय के खासी जनजाति के बीच रहकर दो महीने तक फील्डवर्क किया था. मणिन्द्र कुमार मिश्रा ने अखिलेश यादव पर ‘समाजवादी मॉडल के युवा ध्वजवाहक’ किताब भी लिखी है.
इन सीवी से ही आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि आपको क्यों यश भारती पुरस्कार नहीं मिला होगा. क्योंकि आपने ऐसा सीवी नहीं बनाया होगा. या फिर आपको कोई ऐसा गॉड फादर नहीं मिला होगा, जो आपके नाम को यश भारती के लिए पेश कर देता. कम से कम छह पुरस्कार विजेता ऐसे हैं जिनका नाम समाजवादी पार्टी नेताओं ने बढ़ाया था. दो नाम तो अखिलेश यादव के चाचा और उनकी सरकार में मंत्री रहे शिवपाल यादव ने भेजे. एक नाम सपा नेता आजम खान ने और सरकार में मंत्री रहे राजा भैया ने भी दो नामों की अनुशंसा की थी, जिन्हें यश भारती मिला.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि हिन्दुस्तान टाइम्स के लखनऊ एडिशन की रेज़ीडेंट एडिटर सुनीता एरोन ने भी सीएम ऑफिस को ईमेल किया और जिसका नाम अनुशंसित किया था, उसे भी यश भारती मिला था.
अब योगी आदित्यनाथ सरकार यश भारती पुरस्कारों की समीक्षा कर रही है, खासतौर पर साल 2015 में बनाए गए आजीवन 50 हज़ार रुपए हर महीने पेंशन देने वाले प्रावधान की. यूपी के संस्कृति विभाग की संयुक्त निदेशक अनुराधा गोयल ने बताया कि फाइनेंस ईयर 2017-18 में यश भारती के तहत आजीवन पेंशन मद में कुल 4.66 करोड़ रुपये आवंटित हैं, लेकिन अभी तक एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया है. पुरस्कारों की समीक्षा का आदेश दिया गया है. यश भारती को बंद करने पर यूपी के संस्कृति मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने कहा, ‘यश भारती पुरस्कार और पेंशन के बारे में सरकार अभी विचार कर रही है, अभी कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है.’
वहीं सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है,
‘बीजेपी हमारी सरकार के हर अच्छे काम को बंद कर देना चाहती है. यश भारती अलग-अलग क्षेत्र के लोगों को दिया जाता था. सभी नाम उच्च-स्तरीय कमेटी द्वारा तय प्रक्रिया के तहत चुने गए थे.’
हालांकि ये क्लियर नहीं है कि यश भारती पुरस्कार देने की वो ‘तय प्रक्रिया’ क्या थी? ऊपर दिए गए नामों से तो ऐसा लगता है जैसे कि वो कहावत है न- ‘अंधा बांटे रेवड़ी, और अपनों अपनों के दे.’
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