मंगलवार, फ़रवरी 10, 2015
शनिवार, जनवरी 24, 2015
“हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है?
“हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है?
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जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाईट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक “निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह” अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा, और ठीक वैसा ही हुआ भी. एक तो वैसे ही पिछले बारह वर्ष से नरेंद्र मोदी इस “गिरोह” की आँखों में कांटे की तरह चुभते आए हैं, ऐसे में यदि विज्ञान काँग्रेस का उदघाटन मोदी करने वाले हों, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में “प्राचीन वैमानिकी शास्त्र” पर आधारित कोई रिसर्च पेपर पढ़ा जाने वाला हो तो स्वाभाविक है कि इस बौद्धिक गिरोह में बेचैनी होनी ही थी. ऊपर से डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह कहकर माहौल को और भी गर्मा दिया कि पायथागोरस प्रमेय के असली रचयिता भारत के प्राचीन ऋषि थे, लेकिन उसका “क्रेडिट” पश्चिमी देश ले उड़े हैं.
सेकुलरिज़्म, प्रगतिशीलता एवं वामपंथ के नाम पर चलाई जा रही यह “बेईमानी” कोई आज की बात नहीं है, बल्कि भारत के स्वतन्त्र होने के तुरंत बाद से ही नेहरूवादी समाजवाद एवं विदेशी सेकुलरिज़्म के विचार से बाधित वामपंथी इतिहासकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अकादमिक विशेषज्ञों ने खुद को न सिर्फ सर्वश्रेष्ठ के रूप में पेश किया, बल्कि भारतीय इतिहास, आध्यात्म, संस्कृति एवं वेद-आधारित ग्रंथों को सदैव हीन दृष्टि से देखा. चूँकि अधिकाँश पुस्तक लेखक एवं पाठ्यक्रम रचयिता इसी “गिरोह” से थे, इसलिए उन्होंने बड़े ही मंजे हुए तरीके से षडयंत्र बनाकर, व्यवस्थित रूप से पूरी की पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया. “आधुनिक वैज्ञानिक सोच”(?) के नाम पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि को पिछड़ा हुआ, अनगढ़, “कोरी गप्प” अथवा “किस्से-कहानी” साबित करने की पुरज़ोर कोशिश चलती रही, जिसमें वे सफल भी रहे, क्योंकि समूची शिक्षा व्यवस्था तो इसी गिरोह के हाथ में थी. बहरहाल, इस विकट एवं कठिन पृष्ठभूमि तथा हो-हल्ले एवं दबाव के बावजूद यदि वैज्ञानिक बोडस जी विज्ञान काँग्रेस में प्राचीन वैमानिक शास्त्र विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर पाए, तो निश्चित ही इसका श्रेय “बदली हुई सरकार” को देना चाहिए.
यहाँ पर सबसे पहला सवाल उठता है, कि क्या विरोधी पक्ष के इन “तथाकथित बुद्धिजीवियों” द्वारा उस ग्रन्थ में शामिल सभी बातों को, बिना किसी विचार के, अथवा बिना किसी शोध के सीधे खारिज किया जाना उचित है? दूसरा पक्ष सुने बिना, अथवा उसके तथ्यों एवं तर्कों की प्रामाणिक जाँच किए बिना, सीधे उसे नाकारा या अज्ञानी साबित करने की कोशिश में जुट जाना “बौद्धिक भ्रष्टाचार” नहीं है? निश्चित है. यदि इन वामपंथी एवं प्रगतिशील लेखकों को ऐसा लगता है कि महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित “वैमानिकी शास्त्र” निहायत झूठ एवं गल्प का उदाहरण है, तो भी कम से कम उन्हें इसकी जाँच तो करनी ही चाहिए थी. बोडस द्वारा रखे गए विभिन्न तथ्यों एवं वैमानिकी शास्त्र में शामिल कई प्रमुख बातों को विज्ञान की कसौटी पर तो कसना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं किया गया. किसी दूसरे व्यक्ति की बात को बिना कोई तर्क दिए सिरे से खारिज करने की “तानाशाही” प्रवृत्ति पिछले साठ वर्षों से यह देश देखता आया है. “वैचारिक छुआछूत” का यह दौर बहुत लंबा चला है, लेकिन अंततः चूँकि सच को दबाया नहीं जा सकता, आज भी सच धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से सामने आ रहा है... इसलिए इस “प्रगतिशील गिरोह” के दिल में असल बेचैनी इसी बात की है कि जो “प्राचीन ज्ञान” हमने बड़े जतन से दबाकर रखा था, जिस ज्ञान को हमने “पोंगापंथ” कहकर बदनाम किया था, जिन विद्वानों के शोध को हमने खिल्ली उड़ाकर खारिज कर दिया था, जिस ज्ञान की भनक हमने षडयंत्रपूर्वक नहीं लगने दी, कहीं वह ज्ञान सच्चाई भरे नए स्वरूप में दुनिया के सामने न आ जाए. परन्तु इस वैचारिक गिरोह को न तो कोई शोध मंजूर है, ना ही वेदों-ग्रंथों-श ास्त्रों
पर कोई चर्चा मंजूर है और संस्कृत भाषा के ज़िक्र करने भर से इन्हें गुस्सा
आने लगता है. यह गिरोह चाहता है कि “हमने जो कहा, वही सही है... जो हमने
लिख दिया, या पुस्तकों में लिखकर बता दिया, वही अंतिम सत्य है.. शास्त्रों
या संस्कृत द्वारा इसे कोई चुनौती दी ही नहीं जा सकती”. इतनी लंबी
प्रस्तावना इसलिए दी गई, ताकि पाठकगण समस्या के मूल को समझें, विरोधियों की
बदनीयत को जानें और समझें. बच्चों को पढ़ाया जाता है कि भारत की खोज
वास्कोडिगामा ने की थी... क्यों? क्या उससे पहले यहाँ भारत नहीं था? यह
भूमि नहीं थी? यहाँ लोग नहीं रहते थे? वास्कोडिगामा के आने से पहले क्या
यहाँ कोई संस्कृति, भाषा नहीं थी? फिर वास्कोडिगामा ने क्या खोजा?? वही ना,
जो पहले से मौजूद था.
खैर... बात हो रही थी वैमानिकी शास्त्र की... सभी विद्वानों में कम से कम इस बात को लेकर दो राय नहीं हैं कि महर्षि भारद्वाज द्वारा वैमानिकी शास्त्र लिखा गया था. इस शास्त्र की रचना के कालखंड को लेकर विवाद किया जा सकता है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि जब भी यह लिखा गया होगा, उस समय तक हवाई जहाज़ का आविष्कार करने का दम भरने वाले “राईट ब्रदर्स” की पिछली दस-बीस पीढियाँ पैदा भी नहीं हुई होंगी. ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में विमान भी था, दूरदर्शन भी था (महाभारत-संजय प्रकरण), अणु बम (अश्वत्थामा प्रकरण) भी था, प्लास्टिक सर्जरी (सुश्रुत संहिता) भी थी। यानी वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन सवाल तो यह है कि वह सब कहां चला गया? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों साल पहले जिन बातों की “कल्पना”(?) की गई थी, ठीक उसी प्रकार एक के बाद एक वैज्ञानिक आविष्कार हुए? अर्थात उस प्राचीन काल में उन्नत टेक्नोलॉजी तो मौजूद थी, वह किसी कारणवश लुप्त हो गई. जब तक इस बारे में पक्के प्रमाण सामने नहीं आते, उसे शेष विश्व द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी. “प्रगतिशील एवं सेकुलर-वामपंथी गिरोह” द्वारा इसे वैज्ञानिक सोच नहीं माना जाएगा, “कोरी गप्प” माना जाएगा... फिर सच्चाई जानने का तरीका क्या है? इन शास्त्रों का अध्ययन हो, उस संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिसमें ये शास्त्र या ग्रन्थ लिखे गए हैं. चरक, सुश्रुत वगैरह की बातें किसी दूसरे लेख में करेंगे, तो आईये संक्षिप्त में देखें कि महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिकी शास्त्र” पर कम से कम विचार किया जाना आवश्यक क्यों है... इसको सिरे से खारिज क्यों नहीं किया जा सकता.
जब भी कोई नया शोध या खोज होती है, तो उस आविष्कार का श्रेय सबसे पहले उस “विचार” को दिया जाना चाहिए, उसके बाद उस विचार से उत्पन्न हुई आविष्कार के सबसे पहले “प्रोटोटाइप” को महत्त्व दिया जाना चाहिए. लेकिन राईट बंधुओं के मामले में ऐसा नहीं किया गया. शिवकर बापूजी तलपदे ने इसी वैमानिकी शास्त्र का अध्ययन करके सबसे पहला विमान बनाया था, जिसे वे सफलतापूर्वक 1500 फुट की ऊँचाई तक भी ले गए थे, फिर जिस “आधुनिक विज्ञान” की बात की जाती है, उसमें महर्षि भारद्वाज न सही शिवकर तलपदे को सम्मानजनक स्थान हासिल क्यों नहीं है? क्या सबसे पहले विमान की अवधारणा सोचना और उस पर काम करना अदभुत उपलब्धि नहीं है? क्या इस पर गर्व नहीं होना चाहिए? क्या इसके श्रेय हेतु दावा नहीं करना चाहिए? फिर यह सेक्यूलर गैंग बारम्बार भारत की प्राचीन उपलब्धियों को लेकर शेष भारतीयों के मन में हीनभावना क्यों रखना चाहती है?
अंग्रेज शोधकर्ता डेविड हैचर चिल्द्रेस ने अपने लेख Technology of the Gods – The Incredible Sciences of the Ancients (Page 147-209) में लिखते हैं कि हिन्दू एवं बौद्ध सभ्यताओं में हजारों वर्ष से लोगों ने प्राचीन विमानों के बारे सुना और पढ़ा है. महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित “यन्त्र-सर्वस्व ” में इसे
बनाने की विधियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है. इस ग्रन्थ को चालीस
उप-भागों में बाँटा गया है, जिसमें से एक है “वैमानिक प्रकरण, जिसमें आठ
अध्याय एवं पाँच सौ सूत्र वाक्य हैं. महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिक
शास्त्र” की मूल प्रतियाँ मिलना तो अब लगभग असंभव है, परन्तु सन 1952 में
महर्षि दयानंद के शिष्य स्वामी ब्रह्ममुनी परिव्राजक द्वारा इस मूल ग्रन्थ
के लगभग पाँच सौ पृष्ठों को संकलित एवं अनुवादित किया गया था, जिसकी पहली
आवृत्ति फरवरी 1959 में गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित हुई थी. इस आधी-अधूरी
पुस्तक में भी कई ऐसी जानकारियाँ दी गई हैं, जो आश्चर्यचकित करने वाली हैं.
इसी लेख में डेविड हैचर लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने विभिन्न विमानों के प्रकार, उन्हें उड़ाने संबंधी “मैनुअल”, विमान प्रवास की प्रत्येक संभावित बात एवं देखभाल आदि के बारे में विस्तार से “समर सूत्रधार” नामक ग्रन्थ में लिखी हैं. इस ग्रन्थ में लगभग 230 सूत्रों एवं पैराग्राफ की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं. डेविड आगे कहते हैं कि यदि यह सारी बातें उस कालखंड में लिखित एवं विस्तृत स्वरूप में मौजूद थीं तो क्या ये कोरी गल्प थीं? क्या किसी ऐसी “विशालकाय वस्तु” की भौतिक मौजूदगी के बिना यह सिर्फ कपोल कल्पना हो सकती है? परन्तु भारत के परम्परागत इतिहासकारों तथा पुरातत्त्ववेत्त ाओं
ने इस “कल्पना”(?) को भी सिरे से खारिज करने में कोई कसर बाकी न रखी. एक
और अंग्रेज लेखक एंड्रयू टॉमस लिखते हैं कि यदि “समर सूत्रधार” जैसे वृहद
एवं विस्तारित ग्रन्थ को सिर्फ कल्पना भी मान लिया जाए, तो यह निश्चित रूप
से अब तक की सर्वोत्तम कल्पना या “फिक्शन उपन्यास” माना जा सकता है. टॉमस
सवाल उठाते हैं कि रामायण एवं महाभारत में भी कई बार “विमानों” से आवागमन
एवं विमानों के बीच पीछा अथवा उनके आपसी युद्ध का वर्णन आता है. इसके आगे
मोहन जोदड़ो एवं हडप्पा के अवशेषों में भी विमानों के भित्तिचित्र उपलब्ध
हैं. इसे सिर्फ काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए था. पिछले चार सौ
वर्ष की गुलामी के दौर ने कथित बौद्धिकों के दिलो-दिमाग में हिंदुत्व,
संस्कृत एवं प्राचीन ग्रंथों के नाम पर ऐसी हीन ग्रंथि पैदा कर दी है,
उन्हें सिर्फ अंग्रेजों, जर्मनों अथवा लैटिनों का लिखा हुआ ही परम सत्य
लगता है. इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि दुनिया में सिर्फ ऑक्सफोर्ड और
हारवर्ड दो ही विश्वविद्यालय हैं, जबकि वास्तव में हुआ यह था कि प्राचीन
तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय जहाँ आक्रान्ताओं द्वारा भीषण अग्निकांड
रचे गए अथवा सैकड़ों घोड़ों पर संस्कृत ग्रन्थ लादकर अरब, चीन अथवा यूरोप ले
जाए गए. हाल-फिलहाल इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा बिना किसी शोध अथवा सबूत
के संस्कृत ग्रंथों एवं लुप्त हो चुकी पुस्तकों/ विद्याओं पर जो हाय-तौबा मचाई जा रही है, वह इसी गुलाम मानसिकता का परिचायक है.
इन लुप्त हो चुके शास्त्रों, ग्रंथों एवं अभिलेखों की पुष्टि विभिन्न शोधों द्वारा की जानी चाहिए थी कि आखिर यह तमाम ग्रन्थ और संस्कृत की विशाल बौद्धिक सामग्री कहाँ गायब हो गई? ऐसा क्या हुआ था कि एक बड़े कालखण्ड के कई प्रमुख सबूत गायब हैं? क्या इनके बारे में शोध करना, तथा तत्कालीन ऋषि-मुनियों एवं प्रकाण्ड विद्वानों ने यह “कथित कल्पनाएँ” क्यों की होंगी? कैसे की होंगी? उन कल्पनाओं में विभिन्न धातुओं के मिश्रण अथवा अंतरिक्ष यात्रियों के खान-पान सम्बन्धी जो नियम बनाए हैं वह किस आधार पर बनाए होंगे, यह सब जानना जरूरी नहीं था? लेकिन पश्चिम प्रेरित इन इतिहासकारों ने सिर्फ खिल्ली उड़ाने में ही अपना वक्त खराब किया है और भारतीय ज्ञान को बर्बाद करने की सफल कोशिश की है.
ऑक्सफोर्ड विवि के ही एक संस्कृत प्रोफ़ेसर वीआर रामचंद्रन दीक्षितार अपनी पुस्तक “वार इन द एन्शियेंट इण्डिया इन 1944” में लिखते हैं कि आधुनिक वैमानिकी विज्ञान में भारतीय ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने बताया कि सैकड़ों गूढ़ चित्रों द्वारा प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पौराणिक विमानों के बारे में लिखा हुआ है. दीक्षितार आगे लिखते हैं कि राम-रावण के युद्ध में जिस “सम्मोहनास्त्र” के
बारे में लिखा हुआ है, पहले उसे भी सिर्फ कल्पना ही माना गया, लेकिन आज की
तारीख में जहरीली गैस छोड़ने वाले विशाल बम हकीकत बन चुके हैं. पश्चिम के कई
वैज्ञानिकों ने प्राचीन संस्कृत एवं मोड़ी लिपि के ग्रंथों का अनुवाद एवं
गहन अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि निश्चित रूप से भारतीय
मनीषियों/ ऋषियों को वैमानिकी
का वृहद ज्ञान था. यदि आज के भारतीय बुद्धिजीवी पश्चिम के वैज्ञानिकों की
ही बात सुनते हैं तो उनके लिए चार्ल्स बर्लित्ज़ का नाम नया नहीं होगा.
प्रसिद्ध पुस्तक “द बरमूडा ट्राएंगल” सहित अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखने
वाले चार्ल्स बर्लित्ज़ लिखते हैं कि, “यदि आधुनिक परमाणु युद्ध सिर्फ कपोल
कल्पना नहीं वास्तविकता है, तो निश्चित ही भारत के प्राचीन ग्रंथों में
ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे समय से कहीं आगे है”. 400 ईसा पूर्व लिखित
“ज्योतिष” ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड में धरती की स्थिति, गुरुत्वाकर्षण नियम,
ऊर्जा के गतिकीय नियम, कॉस्मिक किरणों की थ्योरी आदि के बारे में बताया जा
चुका है. “वैशेषिका ग्रन्थ” में भारतीय विचारकों ने परमाणु विकिरण, इससे
फैलने वाली विराट ऊष्मा तथा विकिरण के बारे में अनुमान लगाया है. (स्रोत :-
Doomsday 1999 – By Charles Berlitz, पृष्ठ 123-124).
इसी प्रकार कलकत्ता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफ़ेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में Ancient Astronaut Society की म्यूनिख (जर्मनी) में सम्पन्न छठवीं काँग्रेस के दौरान उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उदबोधन दिया एवं पर्चा प्रस्तुत किया था (सौभाग्य से उस समय वहाँ सतत खिल्ली उड़ाने वाले, आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी नहीं थे). प्रोफ़ेसर कांजीलाल के अनुसार ईसा पूर्व 500 में “कौसितकी” एवं “शतपथ ब्रह्मण” नामक कम से कम दो और ग्रन्थ थे, जिसमें अंतरिक्ष से धरती पर देवताओं के उतरने का उल्लेख है. यजुर्वेद में उड़ने वाले यंत्रों को “विमान” नाम दिया गया, जो “अश्विन” उपयोग किया करते थे. इसके अलावा भागवत पुराण में भी “विमान” शब्द का कई बार उल्लेख हुआ है. ऋग्वेद में “अश्विन देवताओं” के विमान संबंधी विवरण बीस अध्यायों (1028 श्लोकों) में समाया हुआ है, जिसके अनुसार अश्विन जिस विमान से आते थे, वह तीन मंजिला, त्रिकोणीय एवं तीन पहियों वाला था एवं यह तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम था. कांजीलाल के अनुसार, आधे-अधूरे स्वरूप में हासिल हुए वैमानिकी संबंधी इन संस्कृत ग्रंथों में उल्लिखित धातुओं एवं मिश्रणों का सही एवं सटीक अनुमान तथा अनुवाद करना बेहद कठिन है, इसलिए इन पर कोई विशेष शोध भी नहीं हुआ. “अमरांगण-सूत्रध ार”
ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर एवं इंद्र के अलग-अलग पाँच
विमान थे. आगे चलकर अन्य ग्रंथों में इन विमानों के चार प्रकार रुक्म,
सुंदरा, त्रिपुर एवं शकुन के बारे में भी वर्णन किया गया है, जैसे कि
“रुक्म” शंक्वाकार विमान था जो स्वर्ण जड़ित था, जबकि “त्रिपुर विमान” तीन
मंजिला था. महर्षि भारद्वाज रचित “वैमानिकी शास्त्र” में यात्रियों के लिए
“अभ्रक युक्त” (माएका) कपड़ों के बारे में बताया गया है, और जैसा कि हम
जानते हैं आज भी अग्निरोधक सूट में माईका अथवा सीसे का उपयोग होता है,
क्योंकि यह ऊष्मारोधी है
भारत के मौजूदा मानस पर पश्चिम का रंग कुछ इस कदर चढ़ा है कि हममें से अधिकांश अपनी खोज या किसी रचनात्मक उपलब्धि पर विदेशी ठप्पा लगते देखना चाहते हैं. इसके बाद हम एक विशेष गर्व अनुभव करते हैं. ऐसे लोगों के लिए मैं प्राचीन भारतीय विमान के सन्दर्भ में एरिक वॉन डेनिकेन की खोज के बारे में बता रहा हूँ उससे पहले एरिक वॉन डेनिकेन का परिचय जरुरी है. 79 वर्षीय डेनिकेन एक खोजी और बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं. उनकी लिखी किताब 'चेरिएट्स ऑफ़ द गॉड्स' बेस्ट सेलर रही है. डेनिकेन की खूबी हैं कि उन्होंने प्राचीन इमारतों और स्थापत्य कलाओं का गहन अध्ययन किया और अपनी थ्योरी से साबित किया है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल में एलियंस (परग्रही) पृथ्वी पर आते-जाते रहे हैं. एरिक वॉन डेनिकेन 1971 में भारत में कोलकाता गए थे. वे अपनी 'एंशिएंट एलियंस थ्योरी' के लिए वैदिक संस्कृत में कुछ तलाशना चाहते थे. डेनिकेन यहाँ के एक संस्कृत कालेज में गए. यहाँ उनकी मुलाकात इन्हीं प्रोफ़ेसर दिलीप कंजीलाल से हुई थी. प्रोफ़ेसर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का आधुनिकीकरण किया है. देवताओं के विमान यात्रा वृतांत ने वोन को खासा आकर्षित किया. वोन ने माना कि ये वैदिक विमान वाकई में नटबोल्ट से बने असली एयर क्राफ्ट थे. उन्हें हमारे मंदिरों के आकार में भी विमान दिखाई दिए. उन्होंने जानने के लिए लम्बे समय तक शोध किया कि भारत में मंदिरों का आकार विमान से क्यों मेल खाता है? उनके मुताबिक भारत के पूर्व में कई ऐसे मंदिर हैं जिनमे आकाश में घटी खगोलीय घटनाओ का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है. वॉन के मुताबिक ये खोज का विषय है कि आख़िरकार मंदिर के आकार की कल्पना आई कहाँ से? इसके लिए विश्व के पहले मंदिर की खोज जरुरी हो जाती है और उसके बाद ही पता चल पायेगा कि विमान के आकार की तरह मंदिरों के स्तूप या शिखर क्यों बनाये गए थे? हम आज उसी उन्नत तकनीक की तलाश में जुटे हैं जो कभी भारत के पास हुआ करती थी.
By: Suresh Chiplukar
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जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाईट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक “निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह” अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा, और ठीक वैसा ही हुआ भी. एक तो वैसे ही पिछले बारह वर्ष से नरेंद्र मोदी इस “गिरोह” की आँखों में कांटे की तरह चुभते आए हैं, ऐसे में यदि विज्ञान काँग्रेस का उदघाटन मोदी करने वाले हों, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में “प्राचीन वैमानिकी शास्त्र” पर आधारित कोई रिसर्च पेपर पढ़ा जाने वाला हो तो स्वाभाविक है कि इस बौद्धिक गिरोह में बेचैनी होनी ही थी. ऊपर से डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह कहकर माहौल को और भी गर्मा दिया कि पायथागोरस प्रमेय के असली रचयिता भारत के प्राचीन ऋषि थे, लेकिन उसका “क्रेडिट” पश्चिमी देश ले उड़े हैं.
सेकुलरिज़्म, प्रगतिशीलता एवं वामपंथ के नाम पर चलाई जा रही यह “बेईमानी” कोई आज की बात नहीं है, बल्कि भारत के स्वतन्त्र होने के तुरंत बाद से ही नेहरूवादी समाजवाद एवं विदेशी सेकुलरिज़्म के विचार से बाधित वामपंथी इतिहासकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अकादमिक विशेषज्ञों ने खुद को न सिर्फ सर्वश्रेष्ठ के रूप में पेश किया, बल्कि भारतीय इतिहास, आध्यात्म, संस्कृति एवं वेद-आधारित ग्रंथों को सदैव हीन दृष्टि से देखा. चूँकि अधिकाँश पुस्तक लेखक एवं पाठ्यक्रम रचयिता इसी “गिरोह” से थे, इसलिए उन्होंने बड़े ही मंजे हुए तरीके से षडयंत्र बनाकर, व्यवस्थित रूप से पूरी की पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया. “आधुनिक वैज्ञानिक सोच”(?) के नाम पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि को पिछड़ा हुआ, अनगढ़, “कोरी गप्प” अथवा “किस्से-कहानी” साबित करने की पुरज़ोर कोशिश चलती रही, जिसमें वे सफल भी रहे, क्योंकि समूची शिक्षा व्यवस्था तो इसी गिरोह के हाथ में थी. बहरहाल, इस विकट एवं कठिन पृष्ठभूमि तथा हो-हल्ले एवं दबाव के बावजूद यदि वैज्ञानिक बोडस जी विज्ञान काँग्रेस में प्राचीन वैमानिक शास्त्र विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर पाए, तो निश्चित ही इसका श्रेय “बदली हुई सरकार” को देना चाहिए.
यहाँ पर सबसे पहला सवाल उठता है, कि क्या विरोधी पक्ष के इन “तथाकथित बुद्धिजीवियों” द्वारा उस ग्रन्थ में शामिल सभी बातों को, बिना किसी विचार के, अथवा बिना किसी शोध के सीधे खारिज किया जाना उचित है? दूसरा पक्ष सुने बिना, अथवा उसके तथ्यों एवं तर्कों की प्रामाणिक जाँच किए बिना, सीधे उसे नाकारा या अज्ञानी साबित करने की कोशिश में जुट जाना “बौद्धिक भ्रष्टाचार” नहीं है? निश्चित है. यदि इन वामपंथी एवं प्रगतिशील लेखकों को ऐसा लगता है कि महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित “वैमानिकी शास्त्र” निहायत झूठ एवं गल्प का उदाहरण है, तो भी कम से कम उन्हें इसकी जाँच तो करनी ही चाहिए थी. बोडस द्वारा रखे गए विभिन्न तथ्यों एवं वैमानिकी शास्त्र में शामिल कई प्रमुख बातों को विज्ञान की कसौटी पर तो कसना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं किया गया. किसी दूसरे व्यक्ति की बात को बिना कोई तर्क दिए सिरे से खारिज करने की “तानाशाही” प्रवृत्ति पिछले साठ वर्षों से यह देश देखता आया है. “वैचारिक छुआछूत” का यह दौर बहुत लंबा चला है, लेकिन अंततः चूँकि सच को दबाया नहीं जा सकता, आज भी सच धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से सामने आ रहा है... इसलिए इस “प्रगतिशील गिरोह” के दिल में असल बेचैनी इसी बात की है कि जो “प्राचीन ज्ञान” हमने बड़े जतन से दबाकर रखा था, जिस ज्ञान को हमने “पोंगापंथ” कहकर बदनाम किया था, जिन विद्वानों के शोध को हमने खिल्ली उड़ाकर खारिज कर दिया था, जिस ज्ञान की भनक हमने षडयंत्रपूर्वक नहीं लगने दी, कहीं वह ज्ञान सच्चाई भरे नए स्वरूप में दुनिया के सामने न आ जाए. परन्तु इस वैचारिक गिरोह को न तो कोई शोध मंजूर है, ना ही वेदों-ग्रंथों-श
खैर... बात हो रही थी वैमानिकी शास्त्र की... सभी विद्वानों में कम से कम इस बात को लेकर दो राय नहीं हैं कि महर्षि भारद्वाज द्वारा वैमानिकी शास्त्र लिखा गया था. इस शास्त्र की रचना के कालखंड को लेकर विवाद किया जा सकता है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि जब भी यह लिखा गया होगा, उस समय तक हवाई जहाज़ का आविष्कार करने का दम भरने वाले “राईट ब्रदर्स” की पिछली दस-बीस पीढियाँ पैदा भी नहीं हुई होंगी. ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में विमान भी था, दूरदर्शन भी था (महाभारत-संजय प्रकरण), अणु बम (अश्वत्थामा प्रकरण) भी था, प्लास्टिक सर्जरी (सुश्रुत संहिता) भी थी। यानी वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन सवाल तो यह है कि वह सब कहां चला गया? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों साल पहले जिन बातों की “कल्पना”(?) की गई थी, ठीक उसी प्रकार एक के बाद एक वैज्ञानिक आविष्कार हुए? अर्थात उस प्राचीन काल में उन्नत टेक्नोलॉजी तो मौजूद थी, वह किसी कारणवश लुप्त हो गई. जब तक इस बारे में पक्के प्रमाण सामने नहीं आते, उसे शेष विश्व द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी. “प्रगतिशील एवं सेकुलर-वामपंथी गिरोह” द्वारा इसे वैज्ञानिक सोच नहीं माना जाएगा, “कोरी गप्प” माना जाएगा... फिर सच्चाई जानने का तरीका क्या है? इन शास्त्रों का अध्ययन हो, उस संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिसमें ये शास्त्र या ग्रन्थ लिखे गए हैं. चरक, सुश्रुत वगैरह की बातें किसी दूसरे लेख में करेंगे, तो आईये संक्षिप्त में देखें कि महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिकी शास्त्र” पर कम से कम विचार किया जाना आवश्यक क्यों है... इसको सिरे से खारिज क्यों नहीं किया जा सकता.
जब भी कोई नया शोध या खोज होती है, तो उस आविष्कार का श्रेय सबसे पहले उस “विचार” को दिया जाना चाहिए, उसके बाद उस विचार से उत्पन्न हुई आविष्कार के सबसे पहले “प्रोटोटाइप” को महत्त्व दिया जाना चाहिए. लेकिन राईट बंधुओं के मामले में ऐसा नहीं किया गया. शिवकर बापूजी तलपदे ने इसी वैमानिकी शास्त्र का अध्ययन करके सबसे पहला विमान बनाया था, जिसे वे सफलतापूर्वक 1500 फुट की ऊँचाई तक भी ले गए थे, फिर जिस “आधुनिक विज्ञान” की बात की जाती है, उसमें महर्षि भारद्वाज न सही शिवकर तलपदे को सम्मानजनक स्थान हासिल क्यों नहीं है? क्या सबसे पहले विमान की अवधारणा सोचना और उस पर काम करना अदभुत उपलब्धि नहीं है? क्या इस पर गर्व नहीं होना चाहिए? क्या इसके श्रेय हेतु दावा नहीं करना चाहिए? फिर यह सेक्यूलर गैंग बारम्बार भारत की प्राचीन उपलब्धियों को लेकर शेष भारतीयों के मन में हीनभावना क्यों रखना चाहती है?
अंग्रेज शोधकर्ता डेविड हैचर चिल्द्रेस ने अपने लेख Technology of the Gods – The Incredible Sciences of the Ancients (Page 147-209) में लिखते हैं कि हिन्दू एवं बौद्ध सभ्यताओं में हजारों वर्ष से लोगों ने प्राचीन विमानों के बारे सुना और पढ़ा है. महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित “यन्त्र-सर्वस्व
इसी लेख में डेविड हैचर लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने विभिन्न विमानों के प्रकार, उन्हें उड़ाने संबंधी “मैनुअल”, विमान प्रवास की प्रत्येक संभावित बात एवं देखभाल आदि के बारे में विस्तार से “समर सूत्रधार” नामक ग्रन्थ में लिखी हैं. इस ग्रन्थ में लगभग 230 सूत्रों एवं पैराग्राफ की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं. डेविड आगे कहते हैं कि यदि यह सारी बातें उस कालखंड में लिखित एवं विस्तृत स्वरूप में मौजूद थीं तो क्या ये कोरी गल्प थीं? क्या किसी ऐसी “विशालकाय वस्तु” की भौतिक मौजूदगी के बिना यह सिर्फ कपोल कल्पना हो सकती है? परन्तु भारत के परम्परागत इतिहासकारों तथा पुरातत्त्ववेत्त
इन लुप्त हो चुके शास्त्रों, ग्रंथों एवं अभिलेखों की पुष्टि विभिन्न शोधों द्वारा की जानी चाहिए थी कि आखिर यह तमाम ग्रन्थ और संस्कृत की विशाल बौद्धिक सामग्री कहाँ गायब हो गई? ऐसा क्या हुआ था कि एक बड़े कालखण्ड के कई प्रमुख सबूत गायब हैं? क्या इनके बारे में शोध करना, तथा तत्कालीन ऋषि-मुनियों एवं प्रकाण्ड विद्वानों ने यह “कथित कल्पनाएँ” क्यों की होंगी? कैसे की होंगी? उन कल्पनाओं में विभिन्न धातुओं के मिश्रण अथवा अंतरिक्ष यात्रियों के खान-पान सम्बन्धी जो नियम बनाए हैं वह किस आधार पर बनाए होंगे, यह सब जानना जरूरी नहीं था? लेकिन पश्चिम प्रेरित इन इतिहासकारों ने सिर्फ खिल्ली उड़ाने में ही अपना वक्त खराब किया है और भारतीय ज्ञान को बर्बाद करने की सफल कोशिश की है.
ऑक्सफोर्ड विवि के ही एक संस्कृत प्रोफ़ेसर वीआर रामचंद्रन दीक्षितार अपनी पुस्तक “वार इन द एन्शियेंट इण्डिया इन 1944” में लिखते हैं कि आधुनिक वैमानिकी विज्ञान में भारतीय ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने बताया कि सैकड़ों गूढ़ चित्रों द्वारा प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पौराणिक विमानों के बारे में लिखा हुआ है. दीक्षितार आगे लिखते हैं कि राम-रावण के युद्ध में जिस “सम्मोहनास्त्र”
इसी प्रकार कलकत्ता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफ़ेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में Ancient Astronaut Society की म्यूनिख (जर्मनी) में सम्पन्न छठवीं काँग्रेस के दौरान उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उदबोधन दिया एवं पर्चा प्रस्तुत किया था (सौभाग्य से उस समय वहाँ सतत खिल्ली उड़ाने वाले, आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी नहीं थे). प्रोफ़ेसर कांजीलाल के अनुसार ईसा पूर्व 500 में “कौसितकी” एवं “शतपथ ब्रह्मण” नामक कम से कम दो और ग्रन्थ थे, जिसमें अंतरिक्ष से धरती पर देवताओं के उतरने का उल्लेख है. यजुर्वेद में उड़ने वाले यंत्रों को “विमान” नाम दिया गया, जो “अश्विन” उपयोग किया करते थे. इसके अलावा भागवत पुराण में भी “विमान” शब्द का कई बार उल्लेख हुआ है. ऋग्वेद में “अश्विन देवताओं” के विमान संबंधी विवरण बीस अध्यायों (1028 श्लोकों) में समाया हुआ है, जिसके अनुसार अश्विन जिस विमान से आते थे, वह तीन मंजिला, त्रिकोणीय एवं तीन पहियों वाला था एवं यह तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम था. कांजीलाल के अनुसार, आधे-अधूरे स्वरूप में हासिल हुए वैमानिकी संबंधी इन संस्कृत ग्रंथों में उल्लिखित धातुओं एवं मिश्रणों का सही एवं सटीक अनुमान तथा अनुवाद करना बेहद कठिन है, इसलिए इन पर कोई विशेष शोध भी नहीं हुआ. “अमरांगण-सूत्रध
भारत के मौजूदा मानस पर पश्चिम का रंग कुछ इस कदर चढ़ा है कि हममें से अधिकांश अपनी खोज या किसी रचनात्मक उपलब्धि पर विदेशी ठप्पा लगते देखना चाहते हैं. इसके बाद हम एक विशेष गर्व अनुभव करते हैं. ऐसे लोगों के लिए मैं प्राचीन भारतीय विमान के सन्दर्भ में एरिक वॉन डेनिकेन की खोज के बारे में बता रहा हूँ उससे पहले एरिक वॉन डेनिकेन का परिचय जरुरी है. 79 वर्षीय डेनिकेन एक खोजी और बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं. उनकी लिखी किताब 'चेरिएट्स ऑफ़ द गॉड्स' बेस्ट सेलर रही है. डेनिकेन की खूबी हैं कि उन्होंने प्राचीन इमारतों और स्थापत्य कलाओं का गहन अध्ययन किया और अपनी थ्योरी से साबित किया है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल में एलियंस (परग्रही) पृथ्वी पर आते-जाते रहे हैं. एरिक वॉन डेनिकेन 1971 में भारत में कोलकाता गए थे. वे अपनी 'एंशिएंट एलियंस थ्योरी' के लिए वैदिक संस्कृत में कुछ तलाशना चाहते थे. डेनिकेन यहाँ के एक संस्कृत कालेज में गए. यहाँ उनकी मुलाकात इन्हीं प्रोफ़ेसर दिलीप कंजीलाल से हुई थी. प्रोफ़ेसर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का आधुनिकीकरण किया है. देवताओं के विमान यात्रा वृतांत ने वोन को खासा आकर्षित किया. वोन ने माना कि ये वैदिक विमान वाकई में नटबोल्ट से बने असली एयर क्राफ्ट थे. उन्हें हमारे मंदिरों के आकार में भी विमान दिखाई दिए. उन्होंने जानने के लिए लम्बे समय तक शोध किया कि भारत में मंदिरों का आकार विमान से क्यों मेल खाता है? उनके मुताबिक भारत के पूर्व में कई ऐसे मंदिर हैं जिनमे आकाश में घटी खगोलीय घटनाओ का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है. वॉन के मुताबिक ये खोज का विषय है कि आख़िरकार मंदिर के आकार की कल्पना आई कहाँ से? इसके लिए विश्व के पहले मंदिर की खोज जरुरी हो जाती है और उसके बाद ही पता चल पायेगा कि विमान के आकार की तरह मंदिरों के स्तूप या शिखर क्यों बनाये गए थे? हम आज उसी उन्नत तकनीक की तलाश में जुटे हैं जो कभी भारत के पास हुआ करती थी.
By: Suresh Chiplukar
गुरुवार, जनवरी 22, 2015
किसी भी धर्म की इतनी शाखाएं नहीं हैं जितनी इस्लाम की हैं.. और इन सबकी मान्यताएं बिलकुल भिन्न हैं ??
कुरान
और हदीस का रिफरेन्स और कृत्यों की वजह से सारे मुसलमानों को गलत बता देते
हैं कुछ लोग.. मगर ये सिर्फ अल्पज्ञान के कारण ही ऐसा करते हैं.. आप सबको
जानना चाहिए कि इस्लाम से कितनी शाखाएं निकली.. दुनिया में किसी भी धर्म की
इतनी शाखाएं नहीं हैं जितनी इस्लाम की हैं.. और इन सबकी मान्यताएं बिलकुल
भिन्न हैं
सुफिस्म: इस्लामिक सुफिस्म इस्लाम का ही हिस्सा है मगर इसकी शिक्षाएं इसकी अपनी हैं.. पूरी दुनिया में इस्लामिक सुफिस्म के तीन सौ से भी ज्यादा शाखाएं हैं और हर शाखा की अपनी अपनी शिक्षा है.. सुफिस्म की सारी शिक्षा वेदान्त, बुधिस्म और जेन ही की तरह हैं..
सुफिस्म: इस्लामिक सुफिस्म इस्लाम का ही हिस्सा है मगर इसकी शिक्षाएं इसकी अपनी हैं.. पूरी दुनिया में इस्लामिक सुफिस्म के तीन सौ से भी ज्यादा शाखाएं हैं और हर शाखा की अपनी अपनी शिक्षा है.. सुफिस्म की सारी शिक्षा वेदान्त, बुधिस्म और जेन ही की तरह हैं..
बहाई धर्म: ये भी इस्लाम से ही निकला है.. सय्यद अली मुहम्मद शिराज़ी इसके
संथापक थे.. जिन्होंने अपने आपको पैगम्बर घोषित किया और नया धर्म ही चला
दिया.. बाद में आखिर उनको मार डाला गया.. मगर बहाई धर्म फला फूला.. दिल्ली
का लोटस टेम्पल बहाई धर्म का केंद्र है
कादियानी (अहमदिया): ये भी इस्लाम का ही एक अंग है.. मिर्ज़ा गुलाम अहमद इसके संस्थापक हैं और इन्होने भी अपने आपको पैगम्बर घोषित किया.. इसकी शिक्षाएं इस्लाम से भिन्न हैं.. इसमें कृष्ण जी और भगवान् बुद्ध को भी अल्लाह का पैगम्बर माना गया है और उनको पैगम्बर जितना सम्मान दिया जाता है
नियाजी मुस्लिम: ये पन्थ “शमा नियाजी” द्वारा स्थापित किया है.. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गावं में.. आज इनके मानने वालों की संख्या लाखों में है.. ये पंथ काबा को आदम की कब्र मानता है.. और आदम और मनु को पहला मानव मानता है.. और ये भी कि काबा हर धर्म के लिए है और इसे सबके लिए खोलना चाहिए.. इनकी अन्य शिक्षाओं में भी सनातन, वेदांत और बुद्ध की शिक्षाओं का समावेश है.. भगवान राम और अन्य लोगों को भी इसमें पूर्ण आदर दिया जाता है.. बड़े वहाबी विरोधों के बावजूद भी ये पंथ फलफूल रहा है
शिया इस्लाम: इस पंथ की मूल आस्था का केंद्र पैगम्बर मुहम्मद, और उनके दामाद अली और नवासे हसन हुसैन हैं.. शिया संप्रदाय का वहाबी सम्प्रदाय से मतभेद बहुत पुराना है.. शिया कुरान को तो मानता है मगर हदीस में मतभेद है.. शिया पंथ का मतभेद इस्लाम के कुछ खलीफाओं से भी है.. ये माना जाता है की सुफिस्म शिया इस्लाम से ही निकला था
सुन्नी मत: वैसे पूरी दुनिया के मुसलमानों को सुन्नी बोला जाता है.. मगर एशियाई देशो में सुन्नी मत भिन्न है.. भारत में सुन्नी “अहमद राजा खान बरेलवी” की शिक्षाओं को मानता है.. इसीलिए सुन्नियों की बरेलवी भी बोला जाता है और वहाबियों को देवबंदी.. सुन्नी मत पैगम्बर मुहम्मद को प्रथम रखता है और इनकी इनकी शिक्षाओं में धर्म को लेकर कट्टरपन कम पाया जाता है.. इनका अल्लाह से मिलने का सिलसिला पैगम्बर से होकर जाता है
वहाबी इस्लाम: सऊदी अरब और अन्य इस्लामिक देशो में ये मत ही सर्वोपरि है.. भारत में इसका केंद्र देवबंद है.. ये मत अपने आपको ही असली इस्लाम बताता है बाकी अन्य किसी भी इस्लामिक मत को ये नहीं मानता है.. इनमे अल्लाह पहले आता है बाकी सब कुछ उसके बाद.. ये मत मजारों और दरगाहों और हर उस चीज़ में जिसमे किसी और व्यक्ति या वस्तु की आराधना हो, को खारिज करता है..
और भी बहुत शाखाएं हैं इस्लाम की जिनके बारे में फिर कभी लिखूंगा..
कादियानी (अहमदिया): ये भी इस्लाम का ही एक अंग है.. मिर्ज़ा गुलाम अहमद इसके संस्थापक हैं और इन्होने भी अपने आपको पैगम्बर घोषित किया.. इसकी शिक्षाएं इस्लाम से भिन्न हैं.. इसमें कृष्ण जी और भगवान् बुद्ध को भी अल्लाह का पैगम्बर माना गया है और उनको पैगम्बर जितना सम्मान दिया जाता है
नियाजी मुस्लिम: ये पन्थ “शमा नियाजी” द्वारा स्थापित किया है.. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गावं में.. आज इनके मानने वालों की संख्या लाखों में है.. ये पंथ काबा को आदम की कब्र मानता है.. और आदम और मनु को पहला मानव मानता है.. और ये भी कि काबा हर धर्म के लिए है और इसे सबके लिए खोलना चाहिए.. इनकी अन्य शिक्षाओं में भी सनातन, वेदांत और बुद्ध की शिक्षाओं का समावेश है.. भगवान राम और अन्य लोगों को भी इसमें पूर्ण आदर दिया जाता है.. बड़े वहाबी विरोधों के बावजूद भी ये पंथ फलफूल रहा है
शिया इस्लाम: इस पंथ की मूल आस्था का केंद्र पैगम्बर मुहम्मद, और उनके दामाद अली और नवासे हसन हुसैन हैं.. शिया संप्रदाय का वहाबी सम्प्रदाय से मतभेद बहुत पुराना है.. शिया कुरान को तो मानता है मगर हदीस में मतभेद है.. शिया पंथ का मतभेद इस्लाम के कुछ खलीफाओं से भी है.. ये माना जाता है की सुफिस्म शिया इस्लाम से ही निकला था
सुन्नी मत: वैसे पूरी दुनिया के मुसलमानों को सुन्नी बोला जाता है.. मगर एशियाई देशो में सुन्नी मत भिन्न है.. भारत में सुन्नी “अहमद राजा खान बरेलवी” की शिक्षाओं को मानता है.. इसीलिए सुन्नियों की बरेलवी भी बोला जाता है और वहाबियों को देवबंदी.. सुन्नी मत पैगम्बर मुहम्मद को प्रथम रखता है और इनकी इनकी शिक्षाओं में धर्म को लेकर कट्टरपन कम पाया जाता है.. इनका अल्लाह से मिलने का सिलसिला पैगम्बर से होकर जाता है
वहाबी इस्लाम: सऊदी अरब और अन्य इस्लामिक देशो में ये मत ही सर्वोपरि है.. भारत में इसका केंद्र देवबंद है.. ये मत अपने आपको ही असली इस्लाम बताता है बाकी अन्य किसी भी इस्लामिक मत को ये नहीं मानता है.. इनमे अल्लाह पहले आता है बाकी सब कुछ उसके बाद.. ये मत मजारों और दरगाहों और हर उस चीज़ में जिसमे किसी और व्यक्ति या वस्तु की आराधना हो, को खारिज करता है..
और भी बहुत शाखाएं हैं इस्लाम की जिनके बारे में फिर कभी लिखूंगा..
रविवार, जनवरी 18, 2015
कब्र पूजा – मुर्खता अथवा अंधविश्वास
कब्र पूजा – मुर्खता अथवा अंधविश्वास
आज वीरवार है। शाम को राह जाते एक स्थान पर भीड़ लगी देखी। मालूम चला कोई मुर्दा कब्र में लेटा है और एक अरबी टोपी लगाये एक मुसलमान हाथ में मोरपंख की झाड़ू लेकर उसके नाम पर अंदर धन बटोर रहा है जबकि बाहर उसके रिश्तेदार हरी चादर, अगरबत्ती,फूल आदि बेचकर हिन्दुओं को मुर्ख बना रहे है। कुछ पुराने मित्र कहते है यह आस्था और श्रद्धा का प्रश्न है, कुछ मत कहो। कुछ कहते है की यह मूर्ति पूजा है, कुछ मत कहो। कुछ कहते है की अगर आप प्रश्न करेंगे तो हिन्दुओं में एकता नहीं होगी क्यूंकि युद्ध काल में जब गर्दन पर तलवार हो तब प्रश्न करना मूर्खता है और प्रश्न करने वाला मूर्ख है। परन्तु भाई हम क्या करे कोई गड्डे में गिर रहा हो तो उसे गिरने से न रोके क्यूंकि भावनायें आहत होगी। हम तो महान समाज सुधारक स्वामी दयानंद के शिष्य है जिनका सन्देश स्पष्ट था "सत्य के ग्रहण एवं असत्य के त्याग में सदा उद्यत रहना चाहिये"। मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है। हम मूर्ति पूजा के विरुद्ध नहीं है अपितु अन्धविश्वास के विरुद्ध है। यह लेख कब्र पूजा से सम्बंधित है जिसकी हिन्दू समाज मूर्ति समझ कर पूजा कर रहा है। आप इसे मुर्खता कहेंगे अथवा इसे अंधविश्वास कहेंगे। यह निश्चय आपने स्वयं करना है।
रोजाना के अखबारों में एक खबर आम हो गयी हैं की अजमेर स्थित ख्वाजा मुईन-उद-दीन चिश्ती अर्थात गरीब नवाज़ की मजार पर बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अभिनेत्रियो अथवा क्रिकेट के खिलाड़ियो अथवा राज नेताओ का चादर चदाकर अपनी फिल्म को सुपर हिट करने की अथवा आने वाले मैच में जीत की अथवा आने वाले चुनावो में जीत की दुआ मांगना। भारत की नामी गिरामी हस्तियों के दुआ मांगने से साधारण जनमानस में एक भेड़चाल सी आरंभ हो गई है की उनके घर पर दुआ मांगे से बरकत हो जाएगी, किसी की नौकरी लग जाएग, किसी के यहाँ पर लड़का पैदा हो जायेगा, किसी का कारोबार नहीं चल रहा हो तो वह चल जायेगा, किसी का विवाह नहीं हो रहा हो तो वह हो जायेगा। कुछ सवाल हमे अपने दिमाग पर जोर डालने को मजबूर कर रहे है जैसे की यह गरीब नवाज़ कौन थे ?कहाँ से आये थे? इन्होने हिंदुस्तान में क्या किया और इनकी कब्र पर चादर चदाने से हमे सफलता कैसे प्राप्त होती है?
गरीब नवाज़ भारत में लूटपाट करने वाले , हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करने वाले ,भारत के अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान को हराने वाले व जबरदस्ती इस्लामिक मत परिवर्तन करने वाले मुहम्मद गौरी के साथ भारत में शांति का पैगाम लेकर आये थे।
पहले वे दिल्ली के पास आकर रुके फिर अजमेर जाते हुए उन्होंने करीब ७०० हिन्दुओ को इस्लाम में दीक्षित किया और अजमेर में वे जिस स्थान पर रुके उस स्थान पर तत्कालीन हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान का राज्य था। ख्वाजा के बारे में चमत्कारों की अनेको कहानियां प्रसिद्ध है की जब राजा पृथ्वी राज के सैनिको ने ख्वाजा के वहां पर रुकने का विरोध किया क्योंकि वह स्थान राज्य सेना के ऊँटो को रखने का था तो पहले तो ख्वाजा ने मना कर दिया फिर क्रोधित होकर शाप दे दिया की जाओ तुम्हारा कोई भी ऊंट वापिस उठ नहीं सकेगा। जब राजा के कर्मचारियों नें देखा की वास्तव में ऊंट उठ नहीं पा रहे है तो वे ख्वाजा से माफ़ी मांगने आये और फिर कहीं जाकर ख्वाजा ने ऊँटो को दुरुस्त कर दिया। दूसरी कहानी अजमेर स्थित आनासागर झील की है। ख्वाजा अपने खादिमो के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने एक गाय को मारकर उसका कबाब बनाकर खाया। कुछ खादिम पनसिला झील पर चले गए कुछ आनासागर झील पर ही रह गए।
उस समय दोनों झीलों के किनारे करीब 1000 हिन्दू मंदिर थे, हिन्दू ब्राह्मणों ने मुसलमानों के वहां पर आने का विरोध किया और ख्वाजा से शिकायत करी।
ख्वाजा ने तब एक खादिम को सुराही भरकर पानी लाने को बोला। जैसे ही सुराही को पानी में डाला तभी दोनों झीलों का सारा पानी सुख गया। ख्वाजा फिर झील के पास गए और वहां स्थित मूर्ति को सजीव कर उससे कलमा पढवाया और उसका नाम सादी रख दिया। ख्वाजा के इस चमत्कार की सारे नगर में चर्चा फैल गई। पृथ्वीराज चौहान ने अपने प्रधान मंत्री जयपाल को ख्वाजा को काबू करने के लिए भेजा। मंत्री जयपाल ने अपनी सारी कोशिश कर डाली पर असफल रहा और ख्वाजा नें उसकी सारी शक्तिओ को खत्म कर दिया। राजा पृथ्वीराज चौहान सहित सभी लोग ख्वाजा से क्षमा मांगने आये। काफी लोगो नें इस्लाम कबूल किया पर पृथ्वीराज चौहान ने इस्लाम कबूलने इंकार कर दिया। तब ख्वाजा नें भविष्यवाणी करी की पृथ्वी राज को जल्द ही बंदी बना कर इस्लामिक सेना के हवाले कर दिया जायेगा।
निजामुद्दीन औलिया जिसकी दरगाह दिल्ली में स्थित हैं ने भी ख्वाजा का स्मरण करते हुए कुछ ऐसा ही लिखा है। बुद्धिमान पाठकगन स्वयं अंदाजा लगा सकते है की इस प्रकार के करिश्मो को सुनकर कोई मुर्ख ही इन बातों पर विश्वास ला सकता है। भारत में स्थान स्थान पर स्थित कब्रे उन मुसलमानों की है जो भारत पर आक्रमण करने आये थे और हमारे वीर हिन्दू पूर्वजो ने उन्हें अपनी तलवारों से परलोक पंहुचा दिया था।
ऐसी ही एक कब्र बहरीच गोरखपुर के निकट स्थित है। यह कब्र गाज़ी मियां की है। गाज़ी मियां का असली नाम सालार गाज़ी मियां था एवं उसका जन्म अजमेर में हुआ था। उन्हें गाज़ी की उपाधि काफ़िर यानि गैर मुसलमान को क़त्ल करने पर मिली थी। गाज़ी मियां के मामा मुहम्मद गजनी ने ही भारत पर आक्रमण करके गुजरात स्थित प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का विध्वंश किया था। कालांतर में गाज़ी मियां अपने मामा के यहाँ पर रहने के लिए गजनी चला गया।
कुछ काल के बाद अपने वज़ीर के कहने पर गाज़ी मियां को मुहम्मद गजनी ने नाराज होकर देश से निकला दे दिया। उसे इस्लामिक आक्रमण का नाम देकर गाज़ी मियां ने भारत पर हमला कर दिया। हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करते हुए, हजारों हिन्दुओं का क़त्ल अथवा उन्हें गुलाम बनाते हुए, नारी जाति पर अमानवीय कहर बरपाते हुए गाज़ी मियां ने बाराबंकी में अपनी छावनी बनाई और चारो तरफ अपनी फौजे भेजी।
कौन कहता हैं की हिन्दू राजा कभी मिलकर नहीं रहे? मानिकपुर, बहरैच आदि के 24 हिन्दू राजाओ ने राजा सोहेल देव पासी के नेतृत्व में जून की भरी गर्मी में गाज़ी मियां की सेना का सामना किया और इस्लामिक सेना का संहार कर दिया। राजा सोहेल देव ने गाज़ी मियां को खींच कर एक तीर मारा जिससे की वह परलोक पहुँच गया। उसकी लाश को उठाकर एक तालाब में फ़ेंक दिया गया।
हिन्दुओं ने इस विजय से न केवल सोमनाथ मंदिर के लूटने का बदला ले लिया था बल्कि अगले २०० सालों तक किसी भी मुस्लिम आक्रमणकारी का भारत पर हमला करने का दुस्साहस नहीं हुआ। कालांतर में फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अपनी माँ के कहने पर बहरीच स्थित सूर्य कुण्ड नामक तालाब को भरकर उस पर एक दरगाह और कब्र गाज़ी मियां के नाम से बनवा दी जिस पर हर जून के महीने में सालाना उर्स लगने लगा। मेले में एक कुण्ड में कुछ बेहरूपियें बैठ जाते है और कुछ समय के बाद लाइलाज बिमारिओं को ठीक होने का ढोंग रचते है। पूरे मेले में चारों तरफ गाज़ी मियां के चमत्कारों का शोर मच जाता है और उसकी जय-जयकार होने लग जाती हैं. हजारों की संख्या में मुर्ख हिन्दू औलाद की, दुरुस्ती की, नौकरी की, व्यापार में लाभ की दुआ गाज़ी मियां से मांगते है, शरबत बांटते है , चादर चदाते हैं और गाज़ी मियां की याद में कव्वाली गाते है। कुछ सामान्य से १० प्रश्न हम पाठको से पूछना चाहेंगे।
१.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चूँकि है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती है?
२. सभी कब्र उन मुसलमानों की है जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं है जिन्होंने अपने प्राण धर्म रक्षा करते की बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे?
३. क्या हिन्दुओ के राम, कृष्ण अथवा 33 करोड़ देवी देवता शक्तिहीन हो चुके है जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है?
४. जब गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहाँ है की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती है तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?
५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता है तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते है?
६. क्या संसार में इससे बड़ी मुर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता है?
७. हिन्दू जाति कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजाकर प्राप्त कर रहीं है जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं है?
८. कब्र पूजा को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल और सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या है ?
९. इतिहास की पुस्तकों कें गौरी – गजनी का नाम तो आता है जिन्होंने हिन्दुओ को हरा दिया था पर मुसलमानों को हराने वाले राजा सोहेल देव पासी का नाम तक न मिलना क्या हिन्दुओं की सदा पराजय हुई थी ऐसी मानसिकता को बनाना नहीं है?
१०. क्या हिन्दू फिर एक बार 24 हिन्दू राजाओ की भांति मिल कर संगठित होकर देश पर आये संकट जैसे की आंतकवाद, जबरन धर्म परिवर्तन,नक्सलवाद,बंगलादेश ी मुसलमानों की घुसपेठ आदि का मुंहतोड़ जवाब नहीं दे सकते?
आशा हैं इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा।अगर आप आर्य राजा राम और कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दे और अन्य हिन्दुओ को भी इस बारे में प्रकाशित करे।
डॉ विवेक आर्य
आज वीरवार है। शाम को राह जाते एक स्थान पर भीड़ लगी देखी। मालूम चला कोई मुर्दा कब्र में लेटा है और एक अरबी टोपी लगाये एक मुसलमान हाथ में मोरपंख की झाड़ू लेकर उसके नाम पर अंदर धन बटोर रहा है जबकि बाहर उसके रिश्तेदार हरी चादर, अगरबत्ती,फूल आदि बेचकर हिन्दुओं को मुर्ख बना रहे है। कुछ पुराने मित्र कहते है यह आस्था और श्रद्धा का प्रश्न है, कुछ मत कहो। कुछ कहते है की यह मूर्ति पूजा है, कुछ मत कहो। कुछ कहते है की अगर आप प्रश्न करेंगे तो हिन्दुओं में एकता नहीं होगी क्यूंकि युद्ध काल में जब गर्दन पर तलवार हो तब प्रश्न करना मूर्खता है और प्रश्न करने वाला मूर्ख है। परन्तु भाई हम क्या करे कोई गड्डे में गिर रहा हो तो उसे गिरने से न रोके क्यूंकि भावनायें आहत होगी। हम तो महान समाज सुधारक स्वामी दयानंद के शिष्य है जिनका सन्देश स्पष्ट था "सत्य के ग्रहण एवं असत्य के त्याग में सदा उद्यत रहना चाहिये"। मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है। हम मूर्ति पूजा के विरुद्ध नहीं है अपितु अन्धविश्वास के विरुद्ध है। यह लेख कब्र पूजा से सम्बंधित है जिसकी हिन्दू समाज मूर्ति समझ कर पूजा कर रहा है। आप इसे मुर्खता कहेंगे अथवा इसे अंधविश्वास कहेंगे। यह निश्चय आपने स्वयं करना है।
रोजाना के अखबारों में एक खबर आम हो गयी हैं की अजमेर स्थित ख्वाजा मुईन-उद-दीन चिश्ती अर्थात गरीब नवाज़ की मजार पर बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अभिनेत्रियो अथवा क्रिकेट के खिलाड़ियो अथवा राज नेताओ का चादर चदाकर अपनी फिल्म को सुपर हिट करने की अथवा आने वाले मैच में जीत की अथवा आने वाले चुनावो में जीत की दुआ मांगना। भारत की नामी गिरामी हस्तियों के दुआ मांगने से साधारण जनमानस में एक भेड़चाल सी आरंभ हो गई है की उनके घर पर दुआ मांगे से बरकत हो जाएगी, किसी की नौकरी लग जाएग, किसी के यहाँ पर लड़का पैदा हो जायेगा, किसी का कारोबार नहीं चल रहा हो तो वह चल जायेगा, किसी का विवाह नहीं हो रहा हो तो वह हो जायेगा। कुछ सवाल हमे अपने दिमाग पर जोर डालने को मजबूर कर रहे है जैसे की यह गरीब नवाज़ कौन थे ?कहाँ से आये थे? इन्होने हिंदुस्तान में क्या किया और इनकी कब्र पर चादर चदाने से हमे सफलता कैसे प्राप्त होती है?
गरीब नवाज़ भारत में लूटपाट करने वाले , हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करने वाले ,भारत के अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान को हराने वाले व जबरदस्ती इस्लामिक मत परिवर्तन करने वाले मुहम्मद गौरी के साथ भारत में शांति का पैगाम लेकर आये थे।
पहले वे दिल्ली के पास आकर रुके फिर अजमेर जाते हुए उन्होंने करीब ७०० हिन्दुओ को इस्लाम में दीक्षित किया और अजमेर में वे जिस स्थान पर रुके उस स्थान पर तत्कालीन हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान का राज्य था। ख्वाजा के बारे में चमत्कारों की अनेको कहानियां प्रसिद्ध है की जब राजा पृथ्वी राज के सैनिको ने ख्वाजा के वहां पर रुकने का विरोध किया क्योंकि वह स्थान राज्य सेना के ऊँटो को रखने का था तो पहले तो ख्वाजा ने मना कर दिया फिर क्रोधित होकर शाप दे दिया की जाओ तुम्हारा कोई भी ऊंट वापिस उठ नहीं सकेगा। जब राजा के कर्मचारियों नें देखा की वास्तव में ऊंट उठ नहीं पा रहे है तो वे ख्वाजा से माफ़ी मांगने आये और फिर कहीं जाकर ख्वाजा ने ऊँटो को दुरुस्त कर दिया। दूसरी कहानी अजमेर स्थित आनासागर झील की है। ख्वाजा अपने खादिमो के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने एक गाय को मारकर उसका कबाब बनाकर खाया। कुछ खादिम पनसिला झील पर चले गए कुछ आनासागर झील पर ही रह गए।
उस समय दोनों झीलों के किनारे करीब 1000 हिन्दू मंदिर थे, हिन्दू ब्राह्मणों ने मुसलमानों के वहां पर आने का विरोध किया और ख्वाजा से शिकायत करी।
ख्वाजा ने तब एक खादिम को सुराही भरकर पानी लाने को बोला। जैसे ही सुराही को पानी में डाला तभी दोनों झीलों का सारा पानी सुख गया। ख्वाजा फिर झील के पास गए और वहां स्थित मूर्ति को सजीव कर उससे कलमा पढवाया और उसका नाम सादी रख दिया। ख्वाजा के इस चमत्कार की सारे नगर में चर्चा फैल गई। पृथ्वीराज चौहान ने अपने प्रधान मंत्री जयपाल को ख्वाजा को काबू करने के लिए भेजा। मंत्री जयपाल ने अपनी सारी कोशिश कर डाली पर असफल रहा और ख्वाजा नें उसकी सारी शक्तिओ को खत्म कर दिया। राजा पृथ्वीराज चौहान सहित सभी लोग ख्वाजा से क्षमा मांगने आये। काफी लोगो नें इस्लाम कबूल किया पर पृथ्वीराज चौहान ने इस्लाम कबूलने इंकार कर दिया। तब ख्वाजा नें भविष्यवाणी करी की पृथ्वी राज को जल्द ही बंदी बना कर इस्लामिक सेना के हवाले कर दिया जायेगा।
निजामुद्दीन औलिया जिसकी दरगाह दिल्ली में स्थित हैं ने भी ख्वाजा का स्मरण करते हुए कुछ ऐसा ही लिखा है। बुद्धिमान पाठकगन स्वयं अंदाजा लगा सकते है की इस प्रकार के करिश्मो को सुनकर कोई मुर्ख ही इन बातों पर विश्वास ला सकता है। भारत में स्थान स्थान पर स्थित कब्रे उन मुसलमानों की है जो भारत पर आक्रमण करने आये थे और हमारे वीर हिन्दू पूर्वजो ने उन्हें अपनी तलवारों से परलोक पंहुचा दिया था।
ऐसी ही एक कब्र बहरीच गोरखपुर के निकट स्थित है। यह कब्र गाज़ी मियां की है। गाज़ी मियां का असली नाम सालार गाज़ी मियां था एवं उसका जन्म अजमेर में हुआ था। उन्हें गाज़ी की उपाधि काफ़िर यानि गैर मुसलमान को क़त्ल करने पर मिली थी। गाज़ी मियां के मामा मुहम्मद गजनी ने ही भारत पर आक्रमण करके गुजरात स्थित प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का विध्वंश किया था। कालांतर में गाज़ी मियां अपने मामा के यहाँ पर रहने के लिए गजनी चला गया।
कुछ काल के बाद अपने वज़ीर के कहने पर गाज़ी मियां को मुहम्मद गजनी ने नाराज होकर देश से निकला दे दिया। उसे इस्लामिक आक्रमण का नाम देकर गाज़ी मियां ने भारत पर हमला कर दिया। हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करते हुए, हजारों हिन्दुओं का क़त्ल अथवा उन्हें गुलाम बनाते हुए, नारी जाति पर अमानवीय कहर बरपाते हुए गाज़ी मियां ने बाराबंकी में अपनी छावनी बनाई और चारो तरफ अपनी फौजे भेजी।
कौन कहता हैं की हिन्दू राजा कभी मिलकर नहीं रहे? मानिकपुर, बहरैच आदि के 24 हिन्दू राजाओ ने राजा सोहेल देव पासी के नेतृत्व में जून की भरी गर्मी में गाज़ी मियां की सेना का सामना किया और इस्लामिक सेना का संहार कर दिया। राजा सोहेल देव ने गाज़ी मियां को खींच कर एक तीर मारा जिससे की वह परलोक पहुँच गया। उसकी लाश को उठाकर एक तालाब में फ़ेंक दिया गया।
हिन्दुओं ने इस विजय से न केवल सोमनाथ मंदिर के लूटने का बदला ले लिया था बल्कि अगले २०० सालों तक किसी भी मुस्लिम आक्रमणकारी का भारत पर हमला करने का दुस्साहस नहीं हुआ। कालांतर में फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अपनी माँ के कहने पर बहरीच स्थित सूर्य कुण्ड नामक तालाब को भरकर उस पर एक दरगाह और कब्र गाज़ी मियां के नाम से बनवा दी जिस पर हर जून के महीने में सालाना उर्स लगने लगा। मेले में एक कुण्ड में कुछ बेहरूपियें बैठ जाते है और कुछ समय के बाद लाइलाज बिमारिओं को ठीक होने का ढोंग रचते है। पूरे मेले में चारों तरफ गाज़ी मियां के चमत्कारों का शोर मच जाता है और उसकी जय-जयकार होने लग जाती हैं. हजारों की संख्या में मुर्ख हिन्दू औलाद की, दुरुस्ती की, नौकरी की, व्यापार में लाभ की दुआ गाज़ी मियां से मांगते है, शरबत बांटते है , चादर चदाते हैं और गाज़ी मियां की याद में कव्वाली गाते है। कुछ सामान्य से १० प्रश्न हम पाठको से पूछना चाहेंगे।
१.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चूँकि है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती है?
२. सभी कब्र उन मुसलमानों की है जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं है जिन्होंने अपने प्राण धर्म रक्षा करते की बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे?
३. क्या हिन्दुओ के राम, कृष्ण अथवा 33 करोड़ देवी देवता शक्तिहीन हो चुके है जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है?
४. जब गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहाँ है की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती है तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?
५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता है तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते है?
६. क्या संसार में इससे बड़ी मुर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता है?
७. हिन्दू जाति कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजाकर प्राप्त कर रहीं है जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं है?
८. कब्र पूजा को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल और सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या है ?
९. इतिहास की पुस्तकों कें गौरी – गजनी का नाम तो आता है जिन्होंने हिन्दुओ को हरा दिया था पर मुसलमानों को हराने वाले राजा सोहेल देव पासी का नाम तक न मिलना क्या हिन्दुओं की सदा पराजय हुई थी ऐसी मानसिकता को बनाना नहीं है?
१०. क्या हिन्दू फिर एक बार 24 हिन्दू राजाओ की भांति मिल कर संगठित होकर देश पर आये संकट जैसे की आंतकवाद, जबरन धर्म परिवर्तन,नक्सलवाद,बंगलादेश
आशा हैं इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा।अगर आप आर्य राजा राम और कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दे और अन्य हिन्दुओ को भी इस बारे में प्रकाशित करे।
डॉ विवेक आर्य
कवि 'नजीर अकबराबादी'
भारत
पर कभी भारत के मुस्लिमों ने शासन नहीं किया, जो भी मुस्लिम यहाँ के शासक
थे वे सब विदेशी थे, चाहे वो मुगल हो या गुलाम वंश, लेकिन यहाँ के
मुस्लिमों ने शायद ही कभी उनका विरोध किया हो उल्टा जितना आदर उन विदेशी
लुटेरों के लिये मुस्लिमों के दिल मे होता है उतना अपने देश में पैदा हुए
महापुरूषो राम, कृष्ण, शिवाजी आदि के प्रति नहीं होता है और यही अलगाववाद
हैं|
परन्तु कवि 'नजीर अकबराबादी' ऐसी नीच सोच रखने वालों के मुंह पर एक तमाचा हैं| कवि नजीर अकबराबादी का जन्म 1735 ई. मे दिल्ली में हुआ था, उस समय वहाँ का शासक मुहम्मदशाह 'रगींला' था| नादिरशाह के हमले के कारण दरबार
की दशा दयनीय थी| दिल्ली में निर्वाह न होने के कारण 'नजीर' के माता-पिता उन्हे आगरा(अकबराबाद) ले आयें, उस समय 'नजीर' 4 साल के थे| जहाँगीर ने अपने पिता के नाम पर आगरा का नाम अकबराबाद रखा था जिसे अपने साथ जोड़ कर 'नजीर' अकबराबादी हो गये|
कवि 'नजीर' का समय हिन्दी इतिहास मे रीतकाल की परिधि मे आता है, जहाँ रितिकालीन कवि राजदरबारो मे नायिकाओं के नख-शिख के वर्णन को राधा कन्हाई सुमिरन के साथ श्रृंगार रस मे गोते लगा रहें थे, वहाँ हम पाते है कि कवि नजीर को कामुकता छुकर भी नहीं गयी हैं| वह श्रीकृष्ण को सर्वत्र दुःखहरन कृपाकरन मानते हैं, कृष्ण उनके लिये पैगम्बर जैसे हैं| कविता देंखें:
तू सबका खुदा सब तुझ पै फिदा, अल्ला हो गनी अल्ला हो गनी|
सूरत मे नबी सीरत मे खुदा, ऐ सल्ला अल्लाह अल्ला हो गनी|
तालिब है तेरी रहमत का बंदाये नाचीज 'नजीर' तेरा,
तू बहारे करम है नंदलला अल्ला हो गनी अल्ला हो गनी|
श्रीकृष्ण का वर्णन करने मे उन्होने अमित भक्ति दिखायी हैं:-
तारीफ करूँ अब मै क्या उस मुरली अधर बजैया की,
नित सेवा कुंजपिरैया की और वन वन गऊ चरैया की|
गोपाल बिहारी बनवारी दःख हरना मेहर करैया की,
गिरधारी सुन्दर श्याम बरन और हलधर जूं के भैया की|
यह लीला है उस नन्दललन मनमोहन जसुमति छैया की
रस ध्यान सुनौ दंडौत करौ जै बोलो किशन कन्हैया की|
मित्रो हम भी चाहते हैं कि मुस्लिम भाई कवि '
परन्तु कवि 'नजीर अकबराबादी' ऐसी नीच सोच रखने वालों के मुंह पर एक तमाचा हैं| कवि नजीर अकबराबादी का जन्म 1735 ई. मे दिल्ली में हुआ था, उस समय वहाँ का शासक मुहम्मदशाह 'रगींला' था| नादिरशाह के हमले के कारण दरबार
की दशा दयनीय थी| दिल्ली में निर्वाह न होने के कारण 'नजीर' के माता-पिता उन्हे आगरा(अकबराबाद) ले आयें, उस समय 'नजीर' 4 साल के थे| जहाँगीर ने अपने पिता के नाम पर आगरा का नाम अकबराबाद रखा था जिसे अपने साथ जोड़ कर 'नजीर' अकबराबादी हो गये|
कवि 'नजीर' का समय हिन्दी इतिहास मे रीतकाल की परिधि मे आता है, जहाँ रितिकालीन कवि राजदरबारो मे नायिकाओं के नख-शिख के वर्णन को राधा कन्हाई सुमिरन के साथ श्रृंगार रस मे गोते लगा रहें थे, वहाँ हम पाते है कि कवि नजीर को कामुकता छुकर भी नहीं गयी हैं| वह श्रीकृष्ण को सर्वत्र दुःखहरन कृपाकरन मानते हैं, कृष्ण उनके लिये पैगम्बर जैसे हैं| कविता देंखें:
तू सबका खुदा सब तुझ पै फिदा, अल्ला हो गनी अल्ला हो गनी|
सूरत मे नबी सीरत मे खुदा, ऐ सल्ला अल्लाह अल्ला हो गनी|
तालिब है तेरी रहमत का बंदाये नाचीज 'नजीर' तेरा,
तू बहारे करम है नंदलला अल्ला हो गनी अल्ला हो गनी|
श्रीकृष्ण का वर्णन करने मे उन्होने अमित भक्ति दिखायी हैं:-
तारीफ करूँ अब मै क्या उस मुरली अधर बजैया की,
नित सेवा कुंजपिरैया की और वन वन गऊ चरैया की|
गोपाल बिहारी बनवारी दःख हरना मेहर करैया की,
गिरधारी सुन्दर श्याम बरन और हलधर जूं के भैया की|
यह लीला है उस नन्दललन मनमोहन जसुमति छैया की
रस ध्यान सुनौ दंडौत करौ जै बोलो किशन कन्हैया की|
मित्रो हम भी चाहते हैं कि मुस्लिम भाई कवि '
नजीर' के साथ श्रीकृष्ण की जय
बोले और उनकी आवाज हमसे ऊँची हो| ऐसा करके वो संसार को सन्देश दे कि हमारे
पेशवा या मजहबी नेता भले ही मोहम्मद साहब हो पर हमारे पूर्वज आज भी राम और
कृष्ण हैं| मै समझता हूँ यही सच्ची भारतीयता होगी|
ग़जनी का अंतिम हिन्दू शासक
मुहम्मद गजनवी नेँ भारत पर कई हमले किये थे। और गुजरात के सोमनाथ मन्दिर
पर उसके हमले काफी कुख्यात है। परन्तु शहर 'गजनी' एक हिन्दू राजा "गज
सिँह" का बसाया हुआ है। तवारीख-ए-जैसलमेर के पृष्ठ संख्या 9,10 का
एक दोहा बड़ा प्रसिद्ध है-
तीन सत्त अतसक धरम, वैशाखे सित तीन।
रवि रोहिणि गजबाहु नै गजनी रची नवीन।।
एक दोहा बड़ा प्रसिद्ध है-
तीन सत्त अतसक धरम, वैशाखे सित तीन।
रवि रोहिणि गजबाहु नै गजनी रची नवीन।।
यानि गजबाहु नेँ युधिष्ठिर संवत् 308 मेँ गजनी शहर को बसाया था।
प्रसिद्ध अरबी इतिहासकार याकूबी के अनुसार नवीँ शती मेँ भारत की सीमायेँ ईरान तक थी। 712-13 ई॰ मेँ सिँध पर मुसलमानो का अधिकार हो गया पर हिन्दुओँ ने उन्हे चैन से बैठने दिया और ये अधिकार अधूरा ही रहा। लेकिन सिँध की विजय से उत्साहित होकर बुखारा बगदाद के खलीफा बलदीन नेँ अपने गुलाम सेनापति यदीद खाँ को मेवाड़ राजस्थान पर बड़ी विजय के लिए भेजा। उस समय चित्तौड़गढ़ का शासक वीरमान सिँह था और उनके सेनानायक थे 'बप्पा रावल' जो खुद उनके भांजे थे। उन्होनेँ आगे बढ़कर यदीद खाँ की सेना का सामना किया, चित्तौड़गढ़ की सहायता मेँ अजमेर, गुजरात, सौराष्ट्र की राजपूत सेनायेँ भी आ गयी।
बड़ा भयानक युद्ध हुआ, हाथी धोड़ो की लाशो के ढेर लग गये, राजपूतोँ की तलवारेँ उन विधर्मियोँ को ऐसे काट रही थी जैसे किसान अपनी फसल बचाने को खर-पतवार काटता है। एक तरफ यदि इस्लामी जेहादी जुनून था तो दूसरी तरफ राष्ट्रधर्म रक्षा की भावना, एक तरफ हवस और लूटपाट थी तो दूसरी तरफ मातृभूमि का रक्षा का संकल्प। अतः युद्ध बप्पा को विजय मिली। बप्पा रावल केवल एक अजेय योद्धा ही नही दूरदर्शी राजनैतिज्ञ भी था। उसने भाग रहे दुश्मनोँ का पीछा किया और उन्हेँ गजनी मेँ जा घेरा। गजनी को वो अपने पूर्वजो की विरासत मानता था। उस समय गजनी का शासक शाह सलीम था, उसने बड़ी सेना के बप्पा से मुकाबला किया लेकिन बप्पा के सामने टिक न सका। जान बचाने के वास्ते अपनी बेटी की शादी बप्पा से करदी। गजनी के सिँहासन पर बैठकर बप्पा ने ईराक, ईरान तक भगवा फहराया, जिसकी पुष्टि अबुल फजल ने भी की है। प्रसिद्ध अग्रेँज इतिहासकार कर्नल.टाड के अनुसार बप्पा ने कई अरबी युवतियोँ से विवाह करके 32 सन्तानेँ पैदा जो आज अरब मेँ नौशेरा पठान के नाम से जाने जाते हैँ।
अफसोस की बात है दोस्तो कि आजादी के बाद सेक्युलरिज्म के नाम हमारे
सच्चे इतिहास को दबा दिया गया।

प्रसिद्ध अरबी इतिहासकार याकूबी के अनुसार नवीँ शती मेँ भारत की सीमायेँ ईरान तक थी। 712-13 ई॰ मेँ सिँध पर मुसलमानो का अधिकार हो गया पर हिन्दुओँ ने उन्हे चैन से बैठने दिया और ये अधिकार अधूरा ही रहा। लेकिन सिँध की विजय से उत्साहित होकर बुखारा बगदाद के खलीफा बलदीन नेँ अपने गुलाम सेनापति यदीद खाँ को मेवाड़ राजस्थान पर बड़ी विजय के लिए भेजा। उस समय चित्तौड़गढ़ का शासक वीरमान सिँह था और उनके सेनानायक थे 'बप्पा रावल' जो खुद उनके भांजे थे। उन्होनेँ आगे बढ़कर यदीद खाँ की सेना का सामना किया, चित्तौड़गढ़ की सहायता मेँ अजमेर, गुजरात, सौराष्ट्र की राजपूत सेनायेँ भी आ गयी।
बड़ा भयानक युद्ध हुआ, हाथी धोड़ो की लाशो के ढेर लग गये, राजपूतोँ की तलवारेँ उन विधर्मियोँ को ऐसे काट रही थी जैसे किसान अपनी फसल बचाने को खर-पतवार काटता है। एक तरफ यदि इस्लामी जेहादी जुनून था तो दूसरी तरफ राष्ट्रधर्म रक्षा की भावना, एक तरफ हवस और लूटपाट थी तो दूसरी तरफ मातृभूमि का रक्षा का संकल्प। अतः युद्ध बप्पा को विजय मिली। बप्पा रावल केवल एक अजेय योद्धा ही नही दूरदर्शी राजनैतिज्ञ भी था। उसने भाग रहे दुश्मनोँ का पीछा किया और उन्हेँ गजनी मेँ जा घेरा। गजनी को वो अपने पूर्वजो की विरासत मानता था। उस समय गजनी का शासक शाह सलीम था, उसने बड़ी सेना के बप्पा से मुकाबला किया लेकिन बप्पा के सामने टिक न सका। जान बचाने के वास्ते अपनी बेटी की शादी बप्पा से करदी। गजनी के सिँहासन पर बैठकर बप्पा ने ईराक, ईरान तक भगवा फहराया, जिसकी पुष्टि अबुल फजल ने भी की है। प्रसिद्ध अग्रेँज इतिहासकार कर्नल.टाड के अनुसार बप्पा ने कई अरबी युवतियोँ से विवाह करके 32 सन्तानेँ पैदा जो आज अरब मेँ नौशेरा पठान के नाम से जाने जाते हैँ।
अफसोस की बात है दोस्तो कि आजादी के बाद सेक्युलरिज्म के नाम हमारे
सच्चे इतिहास को दबा दिया गया।

रविवार, जनवरी 11, 2015
काबा में आज भी चलता है वेदो का कानून
काबा में आज भी चलता है वेदो का कानून
लेखिका: फरहाना ताज
काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, उसका अति प्राचीन नाम मक्ख-मेदिनी है और मक्ख-मेदिनी का मतलब होता है यज्ञभूमि। मक्का का काबा मंदिर वास्तव में काव्य शुक्र का मंदिर है। काबा काव्य का ही अपभ्रंश है। शुक्र का अर्थ जुम्मा अर्थात् बड़ा होता है और गुरु शुक्राचार्य बड़े ही माने जाते हैं।
यज्ञ करने वाला अपनी सांसारिक इच्छाओ और वासनाओ को छोड देता है और यज्ञ में पाक एवं बिना सिले सफेद वस्त्र पहनने की परम्परा वैदिक काल में रही है और यही सब हज के दौरान भी होता है, हाजी एहराम पहनते हैं यानी दो बिना सिले सफेद कपडे के टुकडे होते हैं।
यज्ञ हिंसा से रहित होता है और हज भी हिंसा से रहित होती है। मक्का का पाक क्षेत्र पूरी तरह सम्मानित है, ये लोग वेदो को तो भूल गए, लेकिन यहां पर फिर भी अल्लाह की सबसे पहली किताब वेदो के ही कानून का पूरी तरह पालन किया जाता है, वेद में किसी भी प्रकार की हिंसा या बलि का विधान नहीं और मक्का में यही वेदो का कानून आज भी चलता है, इस पाक क्षेत्र में कोई भी हाजी किसी भी जानवर, यहां तक की मक्खी और इससे भी आगे बढकर किसी प्रकृति यानी किसी पौधे को तनिक भी हानि नहीं पहुंचा जा सकते। हज यात्री का पूरा अस्तित्व अल्लाह को समर्पित हो जाता है। यदि अल्लाह को कुर्बानी पंसद होती तो काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, फिर यहां पर सबसे अधिक बकरे काटने के लिए हाजी साथ लेकर जाते? लेकिन यह क्षेत्र तो हिंसा से रहित है, क्योंकि यहां वेदो का कानून चलता है। पांच वक्त की नमाज का बहुत महत्व है। नमाज खुद संस्कृत का शब्द है यानी पंच और यज्ञ। और पांच का महत्व वेदो में ही है, जैसे पंचाग्नि, पंचपात्र, पंचगव्य, पंचांग आदि।
पांच दिन के हज के दौरान पूरी दुनिया के हाजी मक्का में एकत्र होते हैं और एक साथ इबादत करते हैं और एक साथ लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। हज शब्द ही संस्कृत के व्रज का अपभंश है, वज्र का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना है।
सफेद वस्त्रधारी हाजी काबा की सात परिक्रमाएं करते हैं, सात परिक्रमा का विधान पूरी तरह वेदो का है। सप्तपदी मंदिरो में होती है, सप्तपदी विवाह संस्कार में होती है यज्ञ के सामने। John Lewis Burckhardt लिखते हैं कि मुसलमानों में हज की यात्रा इस्लाम पूर्व की है। उसी प्रकार Suzafa और Merana भी इस्लाम पूर्व के पाक क्षेत्र हं और क्योंकि यहा Motem और Nabyk नाम के देवताओ के बुत होते थे। अराफात की यात्रा कर लेने पर यात्री प्रकार Motem और Nabyk की यात्रा करते हैं। N. J. Dawood ने कुरान के अंग्रेजी संस्करण की भूमिका में लिखा है कि कुरान का प्रत्येक शब्द स्वर्ग में लिखे हुए शिलालेख से अल्लाह ने देवूदत ग्रेबियल द्वारा मोहम्मद को जैसा सुनाया, वैसा लिखा गया। बाइबिल कहती है और स्वर्ग में ईश्वर का मंदिर खोला और उसके नियम का संदूक उसके मंदिर में दिखाई दिया। ईश्वर का ज्ञान चार संदूको में है। अब सच यह है कि सृष्टि के आरम्भ में ही अल्लाह ने चार मौलाओ यानी ऋषियों को अपना ज्ञान दिया, इसलिए अल्लाह का कानून वेद हैं। वेदो में ज्ञान और विज्ञान है, लेकिन कुरान में ज्ञान-विज्ञान की बाते कम और इतिहास अधिक है। लेकिन इतिहास लिखने का कार्य अल्लाह का नहीं हो सकता, इतिहासकारो का होता है। अल्लाह तो ज्ञान और विज्ञान की बाते ही बता सकते हैं।
यहां चित्र में देख लीजिए इन हाजियो के परिधान यज्ञकर्ताओ जैसे क्यों हैं?
लेखिका: फरहाना ताज
काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, उसका अति प्राचीन नाम मक्ख-मेदिनी है और मक्ख-मेदिनी का मतलब होता है यज्ञभूमि। मक्का का काबा मंदिर वास्तव में काव्य शुक्र का मंदिर है। काबा काव्य का ही अपभ्रंश है। शुक्र का अर्थ जुम्मा अर्थात् बड़ा होता है और गुरु शुक्राचार्य बड़े ही माने जाते हैं।
यज्ञ करने वाला अपनी सांसारिक इच्छाओ और वासनाओ को छोड देता है और यज्ञ में पाक एवं बिना सिले सफेद वस्त्र पहनने की परम्परा वैदिक काल में रही है और यही सब हज के दौरान भी होता है, हाजी एहराम पहनते हैं यानी दो बिना सिले सफेद कपडे के टुकडे होते हैं।
यज्ञ हिंसा से रहित होता है और हज भी हिंसा से रहित होती है। मक्का का पाक क्षेत्र पूरी तरह सम्मानित है, ये लोग वेदो को तो भूल गए, लेकिन यहां पर फिर भी अल्लाह की सबसे पहली किताब वेदो के ही कानून का पूरी तरह पालन किया जाता है, वेद में किसी भी प्रकार की हिंसा या बलि का विधान नहीं और मक्का में यही वेदो का कानून आज भी चलता है, इस पाक क्षेत्र में कोई भी हाजी किसी भी जानवर, यहां तक की मक्खी और इससे भी आगे बढकर किसी प्रकृति यानी किसी पौधे को तनिक भी हानि नहीं पहुंचा जा सकते। हज यात्री का पूरा अस्तित्व अल्लाह को समर्पित हो जाता है। यदि अल्लाह को कुर्बानी पंसद होती तो काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, फिर यहां पर सबसे अधिक बकरे काटने के लिए हाजी साथ लेकर जाते? लेकिन यह क्षेत्र तो हिंसा से रहित है, क्योंकि यहां वेदो का कानून चलता है। पांच वक्त की नमाज का बहुत महत्व है। नमाज खुद संस्कृत का शब्द है यानी पंच और यज्ञ। और पांच का महत्व वेदो में ही है, जैसे पंचाग्नि, पंचपात्र, पंचगव्य, पंचांग आदि।
पांच दिन के हज के दौरान पूरी दुनिया के हाजी मक्का में एकत्र होते हैं और एक साथ इबादत करते हैं और एक साथ लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। हज शब्द ही संस्कृत के व्रज का अपभंश है, वज्र का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना है।
सफेद वस्त्रधारी हाजी काबा की सात परिक्रमाएं करते हैं, सात परिक्रमा का विधान पूरी तरह वेदो का है। सप्तपदी मंदिरो में होती है, सप्तपदी विवाह संस्कार में होती है यज्ञ के सामने। John Lewis Burckhardt लिखते हैं कि मुसलमानों में हज की यात्रा इस्लाम पूर्व की है। उसी प्रकार Suzafa और Merana भी इस्लाम पूर्व के पाक क्षेत्र हं और क्योंकि यहा Motem और Nabyk नाम के देवताओ के बुत होते थे। अराफात की यात्रा कर लेने पर यात्री प्रकार Motem और Nabyk की यात्रा करते हैं। N. J. Dawood ने कुरान के अंग्रेजी संस्करण की भूमिका में लिखा है कि कुरान का प्रत्येक शब्द स्वर्ग में लिखे हुए शिलालेख से अल्लाह ने देवूदत ग्रेबियल द्वारा मोहम्मद को जैसा सुनाया, वैसा लिखा गया। बाइबिल कहती है और स्वर्ग में ईश्वर का मंदिर खोला और उसके नियम का संदूक उसके मंदिर में दिखाई दिया। ईश्वर का ज्ञान चार संदूको में है। अब सच यह है कि सृष्टि के आरम्भ में ही अल्लाह ने चार मौलाओ यानी ऋषियों को अपना ज्ञान दिया, इसलिए अल्लाह का कानून वेद हैं। वेदो में ज्ञान और विज्ञान है, लेकिन कुरान में ज्ञान-विज्ञान की बाते कम और इतिहास अधिक है। लेकिन इतिहास लिखने का कार्य अल्लाह का नहीं हो सकता, इतिहासकारो का होता है। अल्लाह तो ज्ञान और विज्ञान की बाते ही बता सकते हैं।
यहां चित्र में देख लीजिए इन हाजियो के परिधान यज्ञकर्ताओ जैसे क्यों हैं?
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