गुरुवार, जनवरी 08, 2015

सच बताना शुरू करो तो मुल्ले आतंक मचाना शुरू कर देते हैं क्यूंकि इनके पास जवाब नहीं होता

जब से मोहम्मद ने इस्लाम के नाम पर अन्धविश्वास फैलाना शुरू किया तब से बुद्धिजीवियों ने उसका तीव्र विरोध किया है उन सबको मुहम्मद ने अपने चमचों से मरवा डाला और ये आज भी जारी है मुह्हमद के बारे में सच बताना शुरू करो तो मुल्ले आतंक मचाना शुरू कर देते हैं क्यूंकि इनके पास जवाब नहीं होता
अस्मा बिन्त मरवान - ६२४
जब मदीना वासियों ने मोहम्मद को अपने नगर में अतिथि की भांति आदर सत्कार से संरक्षण दिया हुआ था, कुछ निवासी मोहम्मद ओर इस्लाम से प्रसन्न नहीं थे. ऐसी ही एक निवासी थी अस्मा. अस्मा इस्लाम को नापसंद करती थी और इसीलिए उसने अपने पूर्वजों की मूर्तिपूजा के पद्दति (जिसे इस्लाम सबसे घोर अपराध कहता है) को नहीं त्यागा था. वो ऑस नामक कबीले के निवासी मरवान की बेटी थी जिसे कविता लिखने में रूचि थी. सन ६२४ में कविता अपने भाव व्यक्त करने के गिने चुने माध्यमों में से एक था.
अस्मा ने एक कविता रची, जिस में उस ने खेद व्यक्त किया कि उस के नगर वासी एक अनजाने व्यक्ति का स्वागत और विश्वास कर रहे थे, जिसने उन्हीके मुखिया की हत्या की थी. ये पंक्तियाँ धीरे धीरे अन्य मूर्तिपूजकों में भी प्रचलित हो गयी और मुसलामानों तक पहुँच गयीं. मुसलमान इस पर क्रोधित हो गए और उन में से एक ओमीर नामक नेत्रहीन मुसलमान (कुछ के अनुसार अस्मा का भूतपूर्व पति) अत्यंत उत्साहित हो गया और उस ने प्रण किया कि वो अस्मा की हत्या करेगा. वो भी ऑस कबीले का ही निवासी था. एक रात वो चुपके से अस्मा के घर में घुस गया. उसने टटोल कर अस्मा के दूध मुहें बच्चे को अलग किया और अपनी तलवार अस्मा के हृदय में इतनी शक्ति से घोंप दी कि वह चारपाई के साथ ही बिंध गयी.
अगली प्रातः जब वो मस्जिद में पहुंचा तो मोहम्मद ने उस से पूछा "क्या तुमने मरवान की बेटी की हत्या कर दी है?" ओमीर ने उत्तर दिया,"हां, परन्तु यह बताएं कि इस में कोई घबराने वाली बात तो नहीं है?" मोहम्मद ने उत्तर दिया,"नहीं, उस के लिए तो कोई दो बकरियां भी आपस में नहीं भिड़ेंगी." फिर वो मस्जिद में एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए कहा,"यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखना चाहते हो जिस ने अल्लाह और उस के नबी की मदद की है तो इसे देखो".
ये सुन कर ओमर ने कहा,"क्या, ये तो अँधा ओमीर है". मोहम्मद ने उत्तर दिया,"इसे अँधा मत कहो, बल्कि कहो ओमीर बशीर (देखने वाला)".
जब वो हत्यारा वापिस अपने घर जा रहा था तो अस्मा के घर के पास से निकला जहां उसके बेटे अस्मा को दफना रहे थे. उन्होंने ओमीर से कहा कि उसी ने उन की माँ की हत्या की है. ओमीर, जो अब निडर हो चुका था ने प्रत्युतर में कहा कि उसीने हत्या की है और यदि उन में से किसी ने भी वैसा कोई कृत्या किया तो वो उन के पूरे वंश का नाश कर देगा.
इस धमकी का अपेक्षित परिणाम हुआ. धीरे धीरे पूरे कबीले ने इस्लाम संप्रदाय अपना लिया. मृत्यु से बचने का यही एक उपाय रह गया लगता था.
स्त्रोत - इब्न इस्हाक़ पृष्ठ -६७५/९९५, The life of Mahomet - William Muir pp 232
अबू अफाक
इस हत्या के कुछ ही सप्ताह पश्चात् ऐसा ही एक और वध इस्लाम के नाम पर और मोहम्मद के आदेश से किया गया. अबू अफाक नामक एक यहूदी भी अस्मा की ही भांति अपने पूर्वजों के संप्रदाय और पद्दति को पसंद करता था, इसलिए इस्लाम का समर्थक नहीं था. उसने भी कुछ पंक्तियाँ लिखी जो मुसलामानों को पसंद नहीं आयी. वो एक वयोवृद्ध था (कुछ के अनुसार १०० वर्ष से अधिक आयु), और बनी अम्र नामक कबीले का मूल निवासी था.
एक दिन मोहम्मद ने अपने अनुयायिओं से कहा," कौन इस विनाशकारी व्यक्ति से मेरा पीछा छुड़ाएगा"? कुछ ही दिनों के उपरान्त एक मुसलमान सलीम बिन उमैर को अवसर मिल गया. अबू अफाक अपने बरामदे में सो रहा था. मुसलमान ने अवसर देख कर सोये हुए वृद्ध की तलवार से हत्या कर दी. वृद्ध की मृत्यु से पूर्व की चीख पुकार ने आस पास के लोगों को आकृष्ट किया, किन्तु जब तक वे पहुँचते, हत्यारा जा चुका था.
स्त्रोत: इब्न इस्हाक़ पृष्ठ ६७५/९९५, The life of Mahomet - William Muir pp 233
काब बिन अशरफ
काब बिन अशरफ बनी नाधिर नामक कबीले की एक यहूदी महिला का बेटा था. वो कुछ समय के लिए इस्लाम संप्रदाय का समर्थक रहा, किन्तु जब मोहम्मद ने किबला (नमाज़ की दिशा) जेरुसलेम से उलट कर काबा की ओर कर दिया तो इस्लाम से पृथक हो गया.
वो कोरिशों की बद्र के झगडे में हुई पराजय से दुखी था. वो मक्का गया और कोरिशों में, अपनी कवितायों द्वारा, जोश भरने लगा कि वो बद्र में दफ़न अपने वीरों की मृत्यु का प्रतिशोध लें.
जब वो वापिस मदीना पहुंचा तो मुसलामानों ने उस पर आरोप लगाया कि वो उन की महिलायों के सन्दर्भ में अशोभनीय पंक्तियाँ लिखता है. मोहम्मद इस प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा इस्लाम के विरोध से चिंतित था. एक दिन उस ने उच्च स्वर में नमाज़ अदा करते हुए कहा," अल्लाह मुझे अशरफ के बेटे और उसकी कवितायों और विद्रोह से किसी भी तरह निजात दिलायो". पहले कि भांति, अब भी उस ने अपने किसी अनुयायी को सीधे संबोधित करने की अपेक्षा सभी से कहा,"कौन मुझे अशरफ के बेटे से निजात दिलाएगा, जो मुझे परेशान करता है?" मोहम्मद बिन असलम आगे बढ़ा और बोला,"मैं उस की हत्या करूँगा".
मोहम्मद ने अपनी सहमती जताते हुए उसे कहा कि वो अपने कबीले (बनी ऑस) के मुखिया साद बिन मुआध से परामर्श कर ले. साद बिन मुआध के सुझाने पर उस ने अपने कबीले के चार और व्यक्तियों को अपने साथ ले लिया और मोहम्मद से अपनी योजना के लिए अनुमति लेने के लिए पहुंचा. विशेष अनुमति इस लिए लेनी थी क्योंकि योजना के अनुसार उन्होंने यह ढोंग करना था कि वो मोहम्मद को नापसंद करते हैं ताकि काब का विश्वास जीत सकें. इस गिरोह में अबू नैला भी था, जो कि काब का मुंह बोला भाई था और काब उस पर संदेह नहीं करता था.
योजना के अनुसार अबू नैला ने काब के पास जा कर दुःख जताया कि मोहम्मद के कारण कई लोगों को समस्या हो रही है. आस पास के अरबी कबीले मदीना के शत्रु बनाते जा रहे हैं, जिस से कि व्यापर के लिए जाना और जीविका अर्जित करना कठिन हो गया है. जैसी कि अपेक्षा थी, काब बातों में फंस गया. अबू नैला ने काब से कुछ खाद्य सामग्री (मक्की व खजूरें) उधार मांगी, जिस के लिए काब ने उस से कुछ बदले में रखने को कहा. योजना के अनुसार, अबू ने अपने और साथियों के शस्त्र देना स्वीकार कर लिया. अब वे काब की शंका जगाये बिना उस के पास शस्त्र ला सकते थे.
उन्होंने शाम के समय मोहम्मद के घर जा कर स्थिति से अवगत करवाया. वो चांदनी रात थी. मोहम्मद उन के साथ मदीना के बाहर तक आया और बोला,"जाओ, अल्लाह की रहमत तुम पर हो और तुम्हे ऊपर से मदद मिले".
काब का घर मदीना से लगभग २-३ मील बाहर एक यहूदियों की बस्ती के पास था. जब वे पहुंचे तो वो सो रहा था. उन्होंने काब के घर के बाहर से उसे पुकारा. काब जब उठ कर जाने लगा तो उस की नवविवाहित पत्नी ने कहा,"शत्रुता के वातावरण में रात के समय बाहर जाना उचित नहीं है. मुझे इन के स्वर में बुराई (अथवा रक्त) सुनाई दे रहा है". काब ने चेतावनी को अनसुना करते हुए कहा कि ये तो मेरा भाई अबू नैला है, यदि एक योधा को पुकारा जाये तो भी उसे जाना ही चाहिए. इतना कह कर वो बाहर निकल आया और उन से बातचीत करने लगा. अबू ने कहा कि थोड़ा आगे चलते हैं और उस के सर में हाथ फिराते हुए उस के केशों में से आने वाली महक की प्रशंसा करने लगा. काब ने उत्तर दिया कि ये तो उस की पत्नी की महक है.
फिर अचानक ही उस के बालों को खींचते हुए चिल्लाया,"अल्लाह के शत्रु को काट दो". काब ने वीरता से संघर्ष किया और उन के पास होने से उन की तलवारें असफल सिद्ध हो रही थी. फिर एक को अपने छुरे का ध्यान आया. उसने छुरा उस के पेट में घोंप दिया और पेट को काटते हुए उस के गुप्तांगो तक ले गया. इस प्रकार काब वीर गति को प्राप्त हुआ.
उन्हें मोहम्मद के पास लौटने में अधिक समय लगा क्योंकि उन का एक साथी भी घायल हो गया था. मोहम्मद उस समय नमाज़ कर रहा था और उन्हें देख कर उन के पास आया. उन्होंने हत्या की सूचना मोहम्मद को दी. मोहम्मद ने घायल मुसलमान के घाव पर थूका (मुसलामानों के अनुसार मोहम्मद की थूक भी चमत्कारी थी) और उन्हें जाने को कहा. वे अपने अपने घर चले गए.
स्त्रोत - सही बुखारी; खंड ५, पुस्तक ५९, संख्या ३६९
स्त्रोत - इब्न इस्हाक़ पृष्ठ ३६४-३६९
इस्लाम के सम्मानित इतिहासकार तबरी के अनुसार ये पाँचों व्यक्ति हत्या के पश्चात् काब का सर काट कर लाये थे जिसे मोहम्मद को भेंट स्वरुप दिया गया था.
इस की पुष्टि विल्लियम मुइर द्वारा लिखी मोहम्मद की जीवन कथा से भी होती है. वे बताते हैं:
जब उस का पेट कटा तो काब ने एक हृदय विदारक चीख मारी जो रात के सन्नाटे में दूर तक सुनाई दी. कई घरों में प्रकाश हो उठा. हत्यारे पीछा किये जाने के डर से वहाँ से अपने घायल साथी को ले कर भाग खड़े हुए. जब वे कब्रिस्तान के पास सुरक्षित पहुँच गए तो उन्होंने तकबीर लगाई 'अल्लाह हू अकबर'. जिसे मस्जिद में मोहम्मद ने सुन लिया. वो मस्जिद के द्वार पर उन से मिला और बोला,"स्वागत है, तुम्हारे चेहरे फ़तेह से चमकते लग रहे हैं. उन्होंने उत्तर दिया,"आपका भी ऐ नबी" और कटा हुआ सर मोहम्मद के पाँव में गिरा दिया.
The life of Mahomet - pp 239-240
मोहम्मद द्वारा पहली हत्या
बद्र के आक्रमण के पश्चात् जब मुसलमान अपने घायल ओर मृत साथियों के शवों को ले कर मदीना की ओर जा रहे थे तो राह में ओथील नामक घाटी में रात बिताई. प्रातःकाल जब मोहम्मद बंदियों का निरिक्षण कर रहा था तो उस की दृष्टि नाध्र पर पड़ी, जिसे मिकदाद ने बंदी बनाया था. बंधक ने भय से कांपते हुए अपने पास खड़े व्यक्ति से कहा, "उस दृष्टि में तो मृत्यु दिखाई दे रही थी". व्यक्ति ने उत्तर दिया "नहीं ये तुम्हारा भ्रम है". उस अभागे बंदी को विश्वास न आया.उस ने मुसाब को उस की रक्षा करने के लिए कहा. मुसाब ने उत्तर दिया कि वह (नाध्र) इस्लाम को इनकार करता था और मुसलामानों को परेशान करता था. नाध्र ने कहा,"यदि कोरिशों ने तुम्हें बंधक बनाया होता तो वे तुम्हारी हत्या कभी नहीं करते. उत्तर में मुसाबी ने कहा,"यदि ऐसा है भी तो मैं तुम जैसा नहीं हूँ. इस्लाम किसी बंधन को नहीं मानता. इस पर मिकदाद, जिस ने नाध्र को बंधक बनाया था, बोल उठा "वो मेरा बंदी है." उसे भय था कि यदि नाध्र की हत्या कर दी गयी तो उस के सम्बन्धियों से जो फिरौती का धन प्राप्त हो सकता था, उस से वो वंचित रह जाएगा.
इस अवसर पर मोहम्मद ने आदेश दिया,"उस की गर्दन मारो". इस वाक्य का अर्थ है सर काट देना. हत्यारा गर्दन के पीछे से प्रहार कर के एक ही वार से गर्दन काट देता है. आज भी जहां इस्लामिक शरिया व्यवस्था प्रचलित है, वहां इसी प्रकार से गर्दन काटी जाती है.
शरिया के अनुसार गर्दन काटने का दृश्य
इस के पश्चात् मोहम्मद ने कहा,"अल्लाह, मिकदाद को इस से भी अच्छा माल प्रदान करना." अली जो आगे चल कर मोहम्मद का दामाद बना था, आगे बढ़ा और उस ने नाध्र की गर्दन काट दी.
इस हत्या का कारण संभवतः नाध्र द्वारा मोहम्मद का उपहास उड़ाया जाना था. मोहम्मद जब मक्का में रहता था, वो मक्का निवासियों को ये विश्वास दिलाने की असफल चेष्ट करता रहा कि वो एक पैगम्बर है. उस की बातों से अधिकतर मक्का वासी तटस्थ ही रहते थे. इस्लाम को नकारने वालों में नाध्र भी था. जब मोहम्मद अपनी बात तथा बाईबल और तौरात की कहानियां सुनाता तो नाध्र भी कुछ कहानियाँ सुना देता और चुटकी लेते हुए कहता कि मोहम्मद मुझ से अच्छा कथाकार है.
मोहम्मद ने उस की हत्या से इसी अपमान का प्रतिशोध लिया था. ये हत्या नीति अथवा न्याय सांगत थी अथवा नहीं, ये निर्णय हम पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं.
इस के दो दिन उपरान्त , जब मदीना का रास्ता आधा रह गया था तो मोहम्मद ने एक और बंधक जिस का नाम ओक्बा था, की हत्या का आदेश दिया. जब ओक्बा ने पूछा कि उसे अन्य बंधकों से अधिक दंड क्यों दिया जा रहा है तो मोहम्मद ने उत्तर दिया,"क्योंकि तुम अल्लाह और उस के रुसूल के शत्रु हो." यहाँ मोहम्मद ओक्बा द्वारा मोहम्मद के उपहास में लिखी कविता की और इंगित कर रहा था. ओक्बा ने खिन्न ह्रदय से पूछा कि,"मेरी बेटी का क्या होगा? उसकी देख भाल कौन करेगा?". मोहम्मद ने उत्तर दिया,"जहन्नुम की आग ". इस के पश्चात्, उसे काट कर धरती पर गिरा दिया गया और मोहम्मद बोला,"तुम अत्यंत बुरे और उत्पीड़क थे जो न तो अल्लाह पर, न उस के रुसूल पर और न ही उस की किताब पर विश्वास करते थे. मैं अल्लाह का आभारी हूँ जिस ने तुम्हारी हत्या की और मेरी आँखों को संतोष दिलाया".
जब बचे हुए बंदियों को लेकर मुसलमान मदीना पहुंचे तो मोहम्मद के निकटतम साथियों में से अबू बकर का विचार था कि बंदियों की हत्या न की जाए बल्कि उनके सम्बन्धियों से फिरौती ले कर उन्हें स्वतंत्र कर दिया जाए, जबकि ओमर का विचार था कि सब की हत्या कर दी जाए. ऐसा कहा जाता है कि उस समय कुरान की आयत प्रकट हुई. सुरा ८, आयत ६७
مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَن يَكُونَ لَهُ أَسْرَىٰ حَتَّىٰ يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ ۚ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّـهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ ۗ وَاللَّـهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
(अनुवाद फारूक खान एवं नदवी):-
कोई नबी जब कि रूए ज़मीन पर (काफिरों का) खून न बहाए उसके यहाँ कैदियों का रहना मुनासिब नहीं तुम लोग तो दुनिया के साज़ो सामान के ख्वाहॉ (चाहने वाले) हो और ख़ुदा (तुम्हारे लिए) आख़िरत की (भलाई) का ख्वाहॉ है और ख़ुदा ज़बरदस्त हिकमत वाला है
इस आयत ने मोहम्मद की दुविधा का निवारण कर दिया. कुछ बंधक जो उसे नापसंद थे, उन की हत्या कर दी गयी और अन्य को फिरौती ले कर स्वतंत्र कर दिया गया.
स्त्रोत : इब्न इस्हाक़ कृत, The Life of Muhammad, अनुवादक A. Guillaume, (Oxford UP, 1955, 2004), pp. 136 (Arabic pages 191-92)
The life of Mahomet by William Muir
अस्मा की हत्या
मदीना में, इस क्रूरता का प्रथम लक्ष्य बनी थी 'अस्मा बिन्त मरवान' नामक एक महिला. उस काल में कविता लिखना एवं बोलना, अपने भावों को व्यक्त करने के गिने चुने माध्यमों में से एक था और ये महिला एक कावय्त्री थी. उसके परिवार ने अपनी परम्परागत शैली एवं धर्म को नहीं त्यागा था इसलिए इस्लाम में उसकी अरुचि थी. उसने बद्र की लड़ाई के उपरान्त के ऐसे व्यक्ति पर कविता लिखी जो अपने ही प्रियजनों का विद्रोही था और युद्ध में उनके मुखिया का हत्यारा था. अन्यों ने ऐसे व्यक्ति पर विश्वास करके उसे अपना लिया था. शीघ्र ही ये कविता सभी में प्रसारित हो गयी. बद्र की लड़ाई को अभी कुछ ही दिन हुए थे. जब ये कविता मुसलामानों के कानों तक पहुंची तो वो भड़क उठे. उनमें से एक 'ओमीर' नामक नेत्रहीन मुसलमान ने, जो अस्मा के ही कबीले का निवासी था (कुछ सूत्रों के अनुसार, उसका पूर्व पति था), ने ये घोषणा की कि वो उस काव्यत्री का वध कर देगा.
एक रात, जब अस्मा और उसके बच्चे सो रहे थे, वो चुपके से अस्मा के घर में घुस गया और टटोल टटोल कर अस्मा के दूध पीते बच्चे को उससे छीन कर अपनी खड़ग, पूरे वेग से, अस्मा के वक्षस्थल में उतार दी. प्रहार इतना शक्तिशाली था कि खड़ग उसे चीर कर खाट में जा धंसी थी.
अगले दिन जब नमाज़ के लिए वो मस्जिद में पहुंचा तो मोहम्मद ने, उससे इस विषय में पूछा
मोहम्मद - 'ओमीर; क्या तुमने मरवान की बेटी को मार दिया है?'.
ओमीर - ' हाँ! पर मुझे ये बताओ कि ये कोई चिंता का विषय तो नहीं है?'
मोहम्मद - चिंता की कोई बात नहीं है. उसके लिए तो दो बकरियां भी आपस में नहीं भिड़ेंगी.
इसके उपरान्त, मोहम्मद ने मस्जिद में एकत्रित मुसलामानों को संबोधित करते हुए कहा
मोहम्मद - अगर तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखना चाहते हो जिसने अल्लाह और उसके नबी की मदद की है तो ओमीर को देखो.
उमर - क्या! अंधे ओमीर को!
मोहम्मद - नहीं! इसे अँधा मत कहो; बल्कि ये तो ओमीर बशीर है. (बशीर अर्थात जो देख सकता है).
ओमीर हत्यारा जब ऊपरी मदीना में स्थित अपने निवास की ओर लौट रहा था तो अस्मा के बेटे अपनी माता के शव को दफना रहे थे. उसे देख कर उन्होंने हत्यारे पर आरोप लगाया कि उसीने उनकी माता का वध किया है. अस्मा ने पूरी निर्लज्जता से इसे न केवल स्वीकार कर लिया अपितु उन बालकों को धमकी देता हुआ बोला कि जिस प्रकार की बातें वो करती थी, यदि किसी ने ऐसा किया तो वो उसके परिवार की भी हत्या कर देगा. इस उग्र धमकी का परिणाम ये हुआ कि मोहम्मद के बढ़ते प्रभाव और उसके चेलों की हिंसक प्रवृति के चलते, अस्मा के परिवार ने ही नहीं, कुछ ही दिनों में सम्पूर्ण कबीला मुसलमान बन गया. इतिहासकारों के अनुसार, रक्त पात से बचने का एक ही उपाय बच जाता था, इस्लाम को अपनाना.
अबू अफाक
इस महिला के पश्चात, जिस कवि की निर्मम हत्या नए सम्प्रदाय इस्लाम के लिए की गयी, वो एक सौ वर्ष से भी अधिक आयु का वृद्ध यहूदी था. अपनी सृजनात्मक कविताओं के द्वारा, अबू अफाक नामक वृद्ध कवि ने कुछ ऐसी कवितायें लिखीं जो मुसलामानों को उचित नहीं लगीं. मोहम्मद ने अपने साथियों से कहा,'कौन मुझे इस कीड़े से मुक्त करवाएगा?' एक नए बने मुसलमान ने, जो अबू अफाक के ही कबीले का था, एक रात, अपने घर के बाहर सोये हुए वृद्ध को अपनी खड़ग से मार डाला. उसकी अंतिम चीख सुन कर निकटवर्ती लोग, जब तक वहां पहुँचते, हत्यारा वहां से भाग चुका था.
यहूदियों में आतंक
जैसा कि अपेक्षित था, महिला और वृद्ध की निर्मम हत्याओं ने यहूदियों एवं सभी उन नागरिकों के मन में, जो मुसलामानों के प्रति अविश्वास अथवा अरुचि रखते थे, एक आतंक व्याप्त हो गया.
बानू कुनैका को मोहम्मद की धमकी
मदीना के साथ ही एक यहूदी कबीला था, बानू कुनैका. बानू कुनैका का मुख्य व्यवसाय सोने की शिल्पकारी का था और मदीना से इस कबीले की मैत्री संधि थी. बद्र की हत्याओं के कुछ दिन पश्चात, मोहम्मद बानू कुनैका नामक यहूदी कबीले में गया और वहां के प्रमुख नागरिकों से एक बैठक में कहने लगा:
अल्लाह कसम! तुम सब जानते हो कि मैं अल्लाह का नबी हूँ इसलिए मुसलमान बन जाओ अन्यथा तुम्हारा भी वही हश्र होगा जो कुरैशियों का हुआ है.
यहूदियों ने मुसलमान बनना अस्वीकार कर दिया और मोहम्मद से कहा कि वो अपने पूर्वजों का मत नहीं त्यागेंगे, भले जो कर लो.
तुरंत 'अल्लाह, की एक नयी आयत मोहम्मद में उतरी.
अध्याय ३, आयत १३:
तुम्हें पहले ही इशारा मिल चूका है, जब दो गिरोह लड़ने के लिए भिड़े तो उनमें से एक अल्लाह की राह में लड़ रहा था और दूसरा काफिर था. ईमानदारों ने देखा कि काफिर उनसे दोगुणा हैं. अल्लाह उसे ही फतह देता है, जिसे वो चाहता है. समझदारों के लिए ये एक इशारा है.
इस प्रकार, एक भीषण परिणाम की धमकी दे कर मोहम्मद चला गया.
इसके कुछ ही समय उपरान्त मोहम्मद को हिंसा का अवसर मिल गया. एक मुसलमान महिला जब एक शिल्पकार के यहाँ किसी आभूषण लेने के लिए बैठी थी तो एक मूर्ख पडोसी ने उसके घाघरे को, उसकी चोली से सिल दिया. जब वो उठी तो घाघरा भी उठ गया. इस असुविधाजनक स्थिति में वो चिल्लाई तो उसे सुन कर एक मुसलमान वहां पहुंचा. उसे जब पता लगा तो उसने ऐसा करने वाले यहूदी को काट दिया. उस यहूदी के भाइयों ने मुसलमान को मार गिराया. उस मुसलमान के साथियों ने मदीना में जा कर, जो मुसलमान बने थे, उन्हें सहायता के लिए कहा. मैत्री संधि के चलते, मोहम्मद चाहता तो शांतिपूर्ण ढंग से, केवल दोषियों को दण्डित कर अथवा करवा सकता था किन्तु उसने मुसलामानों को एकत्रित किया और कुनैका की ओर चल पड़ा. वो श्वेत ध्वज जो उसने लगभग एक महीना पूर्व बद्र में लहराया था, हम्ज़ा को थमाते हुए आक्रमण करने पहुँच गया. कबीले का निर्माण किसी हमले से रक्षा के लिए ही किया गया था, इसलिए कबीले वाले भीतर सुरक्षित थे.
विश्वासघात की प्रशंसा
मुसलामानों ने कबीले को घेर लिया ताकि उन्हें कोई सहायता न मिल सके. कबीलेवासी आशा कर रहे थे कि अब्दुल्लाह बिन उबे एवं खजराज कबीला, जिन से उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, उनकी सहायता करेंगे. उनमें से कोई भी इतना साहस न कर पाया और लगभग १५ दिन तक उनका कबीला अकेला पड़ गया. मुसलमान उन्हें चारों ओर से घेरे रहे. अपने को असहाय स्थिति में पाकर, कुनैका कबीले ने आत्म समर्पण कर दिया. एक एक कर, जब वे बाहर निकले तो उनके हाथ पीछे बाँध कर उन्हें काटने के लिए एक ओर खड़ा कर दिया गया. 'अब्दुल्लाह बिन उबे' अपने पुराने साथियों को इस स्थिति में नहीं देख पाया और उसने मोहम्मद से उन्हें छोड़ने का आग्रह किया. मोहम्मद, जो कि कवच पहने हुए था, ने मुंह फेर लिया तो अब्दुल्लाह ने उसकी भुजा थाम कर अपनी बात दोहराई. मोहम्मद ने चिल्ला कर कहा,' मुझे छोड़!'; किन्तु अब्दुल्लाह ने मोहम्मद को नहीं छोड़ा तो मोहम्मद के हाव भाव से क्रोध झलकने लगा. उसने झल्ला कर कहा:'ऐ नीच! मुझे छोड़!' अब्दुल्लाह ने कहा,' नहीं! मैं तुम्हें तब तक नहीं छोडूंगा जब तक तुम मेरे मित्रों को नहीं छोड़ोगे. मोहम्मद, क्या तुम उन सब को एक ही दिन में काट दोगे जिन्होंने मुझे हदैक और बोआथ की लड़ाइयों में सभी शत्रुओं से सुरक्षा दी. उन लड़ाइयों में ३०० सशत्र कवचधारी और ४०० शास्त्रहीनों नें मेरी रक्षा की थी. मेरा मत है कि समय के साथ अनिष्ट किसी पर भी हो सकता है.'
मोहम्मद अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ था कि अब्दुल्लाह के कहे को ठुकरा देता. अंततः उसने अपने साथियों से कहा 'इन्हें जाने दो! अल्लाह इन पर अपना कहर बरसायेगा, और इस (अब्दुल्लाह) पर भी!'. मोहम्मद ने उन्हें मारा तो नहीं किन्तु उन्हें अपना कबीला छोड़ कर जाने का आदेश दे दिया और उनकी चल अचल संपत्ति पर मुसलामानों ने अधिकार कर लिया. इस लूट के माल (अन्फाल) में, यहूदियों के स्वर्ण शिल्पकारी के उपकरण, उनके कवच एवं शास्त्र सम्मिलित थे. इनमें से २०%, मोहम्मद के लिए था. इसके अतिरिक्त मोहम्मद ने अपने लिए तीन धनुष, तीन खड़ग और दो कवच अपने कब्ज़े में ले लिए थे.
कुनिकावासी अपनी जान बचा कर एक निकटवर्ती यहूदी काबिले 'वादी अल कोरा' पहुंचे और वहां के यहूदियों की सहायता से उन्हें सीरिया की सीमा तक जाने के लिए सवारी का प्रबंध करने में सहायता मिली.
मोहम्मद की, इब्न इस्हाक़ कृत सर्वप्रथम जीवनी में इस घटना के वर्णन से स्पष्ट होता है कि जिस समय अब्दुल्लाह अपने पुराने सहयोगियों का जीवन बचाने के लिए मोहम्मद से विवाद कर रहा था, उस समय 'बानू ऑस' काबिले का 'उबैदा बिन अल समित', जो स्वयं को कुनैकावासियों का मित्र बताता था, ने कुनैकावासियों की मैत्री त्याग कर मोहम्मद से मैत्री कर ली थी. वो मोहम्मद के निकट आया और बोला,"ऐ अल्लाह के पैगम्बर!मैं अल्लाह को, उसके पैगम्बर को और मुसलामानों को अपना मित्र मानता हूँ और काफिरों से अपनी संधि का त्याग करता हूँ".
इस समय अब्दुल्लाह के संबंध में कुरान की नई पंक्तियाँ प्रकट हुई. अध्याय ५, आयत ५१:
ऐ मुसलामानों! यहूदियों और ईसाईयों को अपना औलिया (मित्र, संरक्षक, सहायक इत्यादि) मत बनाओ. वो तो केवल एक दुसरे के परस्पर औलिया हैं. और यदि तुम में से किसी ने उन्हें अपना मित्र बनाया तो वो भी उनके जैसा ही माना जाएगा. अल्लाह जालिमों (अन्य भगवान् की पूजा करने वालों और अन्याय करने वालों) का साथ नहीं देता.
जिस समय अब्दुल्लाह बिन उबे ने कहा कि 'अनिष्ट किसी पर भी हो सकता है' तो कुरान की आयत प्रकट हुई. अध्याय ५, आयत ५२-५३:
और तुम उन्हें देखो जिनके दिलों में (दोगलेपन की) बीमारी है, वो अपने मित्रों को बचाने के लिए कहते हैं: " हमें भय है कि अनिष्ट किसी पर भी हो सकता है." जब अल्लाह अपनी इच्छा से हमें फतह देगा उस समय वो अपने राज़ छिपाने के कारण शर्मिंदा होंगे...... और जो ईमानदार (मुसलमान) हैं, वो कहेंगे:"क्या ये वही हैं जो अल्लाह की कसम खा कर कहते थे कि हम मुसलामानों के साथ हैं?" उन्होंने जो किया व्यर्थ जाएगा और वो पराजित होंगे.
उबैदा, जिसने अपने पुराने मित्रों का इस गंभीर समय में विश्वासघात करते हुए, मोहम्मद से मित्रता कर ली थी, की प्रशंसा करते हुए कुरान में नई आयत आई.अध्याय ५, आयत ५६:
और जिस शख्स ने अल्लाह और उसके रसूल और मुसलामानों को अपना औलिया बनाया तो (अल्लाह के गिरोह में आ गया और) इसमें शक नहीं कि अल्लाह का गिरोह (ग़ालिब) रहता है.

मंगलवार, जनवरी 06, 2015

विमान प्रकार

संजय सुदर्शन

श्री राम चरित मानस जिन्होंने भी पढ़ा होगा वे महर्षि भरद्वाज के नाम से भलीभांति परिचित होंगे. रामायण में इनकी बहुत प्रशंसा की गयी है. चरक संहिता में इन्हें चिकित्सा शास्त्र का जनक माना गया है.
ये अपने समय के बहुत बड़े वैज्ञानिक भी थे.

महर्षि भरद्वाज अपने ग्रन्थ 'यंत्र सर्वस्व' में आकाश में उड़ने वाले विमानों के सम्बन्ध में जो जानकारी देते हैं वो चौंका देने वाली है.
'यंत्र सर्वस्व' के एक खंड 'विमान प्रकरण' में ये विभिन्न विमानों का विस्तार से वर्णन करते हैं.

इन्होने विमानों का युगानुसार वर्णन किया है. युगशक्ति अनुसार विमान अलग अलग प्रकार के होते हैं. त्रेता में मांत्रिक ( मन्त्र शक्ति ), द्वापर में तांत्रिक ( तंत्र शक्ति ) और कलयुग में इनके अनुसार यांत्रिक ( यंत्र शक्ति ) के विमानों का प्रचलन होता है. सतयुग में विमान की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि मानव चेतना इतनी उन्नत होती है की बिना किसी साधन के मनुष्य कहीं भी पहुँचने की क्षमता रखता है.

पुष्पक विमान को महर्षि मान्त्रिक शक्ति का विमान बताते हैं.

इनके अनुसार कुछ अन्य विमान इस प्रकार से हैं -
1. बिजली से चलने वाला - शाक्युदगम
2. अग्नि , जल , वायु से चलने वाला - भूतवाह
3. गैस से चलने वाला - धूम्रयान
4. तेल से चलने वाला - शिखोदगम
5. सूर्य किरणों से चलने वाला - अंशुवाह
6. चुम्बक से चलने वाला - तारामुखी
7. मणियों से चलने वाला - मणिवाह
8. केवल वायु से चलने वाला - मरुत्सखा

इनके अनुसार कलयुग में यांत्रिक विमान का प्रचलन होता है जिसमे खनिज तेल ईंधन रूप में प्रयुक्त होता है और विमानों की विभिन्न श्रेणियों में यह सबसे निम्न कोटि का विमान है...

गुरुवार, जनवरी 01, 2015

10 लाख सालों में एक ही समय पर इतना सारे महान वैज्ञानिक कैसे पैदा हो गए.

ये सच्चाई सब भारतीय शेयर करे::
मानव इतिहास के 10 लाख सालों में एक ही समय पर इतना सारे महान वैज्ञानिक कैसे पैदा हो गए..न इससे पहले न इसके बाद कोई नया मौलिक सूत्र या नया नियम नहीं आया!!
--( ये सवाल बिलकुल बाजिब है । हमारे मनमें भी यह सवाल उठा था लेकिन आगेकी बात पढी तो किस्सा समज में आ गया ।)----
ऐसा लगता है जैसे उस समय ब्रिटिश, पड़ोसी व मित्र देशों में विज्ञान की लौटरी लग गई हो!! ये सवाल तो कोई हिन्दुस्तानी ही उठा सकता है... समझदार लोग अपने ऊपर गर्व करें ..बाकी पुरातन भारत का इतिहास पढ़े ...कुछ प्रारंभिक तथ्य प्रस्तुत है -
जिस समय न्यूटन के पूर्वज जंगली लोग थे, उस समय महर्षि भाष्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था किन्तु आज हमें सिखाया जाता है कि ब्रिटेन के उस वैज्ञानिक ने ये बनाया जरमनी के उस वैज्ञानिक ने वो बनाया ....
जबकि सच ये है कि भारत से चुरा कर ले जाए ग्रन्थ इन लोगो के हाथ लग गए थे ..और ये उन पर टूट पड़े थे ..हमारे विज्ञान में कोई पेटेंट कराने की जरूरत नहीं थी क्यूंकि तब ब्रहम्मांड के रहस्य हम ही जानते थे किन्तु चोर ने जब चोरी कर ली ...तो चोरी के माल को अपना बताने के लिए वो कागजी रजिस्ट्रेशन का सहारा लेने लगा ....
पिता भारत, मां भारती का कोमेन्ट
आप को अचरज हुआ लेकिन ये सच्चाई है । वो रेनेसां पिरियड था, युरोप में नव जागृति काल । प्रिन्टिंग टेक्नोलोजी और प्रिन्ट मिडिया आ जाने से सामान्य मानवी तक ज्ञान पहुंचने लगा । पढाई लिखाई पर ध्यान गया, बडे बडे पुस्तक छपने लगे, बडे बडे विचारक पैदा होने लगे, बुध्धिजीवियों के क्लब खूलने लगे । आज की तरह ऐसा नही होता था की मायकल दारू पी के दंगा करते थे । वो सब आपस में मिल के ज्ञान की, अपने नए विचार की, अपनी नयी खोज की बातें करते थे । नया ज्ञान था ना, तो उत्साह था । उस युग को ज्ञान का विस्फोट युग भी कहा जाता है । आज की दुनिया को जो भी अच्छा बूरा मिला उस समय का परिणाम है ।
भारत के विज्ञान के लिए इस तरह इतराना ठीक नही । उन लोगों के पूरखें भी सनातनी हिन्दु ही थे, हिन्दु ज्ञान उनकी लाइब्रेरी में पहले से ही मौजुद था, उन की युरोपिय भाषा में ही था सब । ग्रीस का हिन्दुत्व सायन्स पर ज्यादा भार देता था, भगवान कृष्ण का हिन्दुत्व था । द्वारिका डुबने से पहले भगवान के वारिस यादव सेना लेकर ग्रीस तक अश्वमेध का घोडा लेकर चले गए थे । भारत के धनपतियों ने इजराईल के धनपतियों की संगत में आकर सोने के सिक्कों के बल पर भारत के हिन्दुत्व को आसमान की सैर करने को भेज दिया, योग और जुठे चमत्कारों में डाल दिया । जब की जमीनी काम के लिए ग्रीस और युरोप के हिन्दुत्व को खतम करने के बाद धनपतियों के प्यादे इसाईयों ने हिन्दुओं का सायन्सवाला हिस्सा अपने पास रख लिया और बाकी बहुत सा ज्ञान एलेक्जांड्रिया लाईब्रेरी में था वो पूरी लायब्रेरी ही जला डाली ।
पता नही कब भारत के लोग आसमान से जमीन पर आएन्गे । अपना संभाल नही सके और दुसरे लोग करते हैं तो अपना होने का दावा ठोक देते हैं । वो भी सनातनी लोगों के वारिस है, धनपति राक्षसों ने उनकी आस्था बदल दी है और हिन्दुओं के दुश्मन बनाकर अपने पक्ष में कर लिए हैं ।
ये सत्य है उस नव जागृतिकाल में बडे बडे विज्ञानिक और विचारक पैदा हो गए थे लेकिन तुरंत ही धनपति राक्षस डर गए थे और हरकत में आ गए थे । अच्छे अच्छों को खरीद लिया और मिडिया को अपने कंट्रोल में कर लिया था । विज्ञानिकों को अपने नौकर बना कर अपने व्यापार हेतु खोजबीन करवाने लगे जो आज तक जारी है । बुध्धिजीवियों को खरीद कर हिन्दुत्व खतम करने के काम में लगा दिया ।
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दोनो की बात अपने अपने हिसाब से सही है । साला कुछ ही समय में इतने विज्ञानिक पैदा कैसे हो सकते थे !
महान विज्ञानिक निकोला टेस्ला प्रेरणा के लिए एक ग्रंथ हाथ में लेकर बैठा रहता था । वो कोइ इसाई का लिखा ग्रन्थ नही था, हिन्दु ग्रंथ था । हमारा हिन्दुत्व या उनका हिन्दुत्व कहने का कोइ मतलब नही है । हिन्दुत्व सनातन है और सर्वव्यापी था । आज उसका व्याप घटकर आधे भारत में भी नही रहा है ।
हिटलर का स्वस्तिक भी उसके पूरखों का था । उस के पूरखे इसाई बन गए थे वो उसका दुर्भाग्य था ।
हिन्दुस्थान वालों को समजना चाहिए कि चिजें भारत की ना कह कर हिन्दुत्व की है ऐसा मानना चाहिए । युरोप और मिडल इस्ट भी कभी हिन्दुओं का स्थान था । अगर आज भी नही संभले, जमीन पर नही आए तो ये व्यापारियों का दानव समाज हमारे बचे हुए हिन्दुंओं का स्थान भी छीन लेन्गे ।

रविवार, दिसंबर 28, 2014

शर्म करो आप भारतीय हो , अपने को जानते भी हो ?

शर्म करो आप भारतीय हो , अपने को जानते भी हो ?

4 जनवरी को मुंबई में होने वाली इंडियन साइंस कांग्रेस में शिरकत करने वाले वक्ता कैप्टन आनंद जे बोडास का कहना है कि हवाई जहाज की खोज वैदिक युग में हुई और इससे न सिर्फ एक देश से दूसरे देश बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह में भी ट्रैवल करना आसान था।

बोडास ने प्राचीन भारतीय ग्रंथ 'वैमानिका प्रकारानाम' का हवाला देते हुए मीडिया से चर्चा के दौरान बताया कि उन दिनों के विमान आज के विमानों की तुलना में (जो केवल आगे की तरफ ही उड़ते हैं) काफी बड़े होते थे। साथ ही वे दाएं-बाएं घूमने के अलावा पीछे की ओर भी आसानी से आ सकते थे।
वैदिक गणित की खोज भारत में ही हुई थी। स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ द्वारा रचित वैदिक गणित न्यूमेरिकल कैल्कुलेशन की वैकल्पिक व शॉर्ट मेथड का समूह है। इसमें 16 मूल सूत्र दिए गए हैं। वैदिक गणित कैल्कुलेशन की ऐसी मेथड है, जिससे कठिन न्यूमेरिकल कैल्कुलेशन बेहद आसान तरीके से संभव हैं, फिर भी हम कठिन अंग्रेजी तरीको से सवाल हल करते हैं।
शून्य व दशमलव की खोज

माना जाता है कि शून्य का प्रयोग वैदिक काल से शुरू हुआ। सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने शून्य को खोजा। उन्होंने कहा था- 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिए उसके आगे शून्य रखो।  यही संख्या के दशमलव सिद्धांत की शुरूआत माना जाता है। भारत का 'शून्य' अरब में 'सिफर' (खाली) नाम से जाना गया। लैटिन, इटैलियन, फ्रेंच से होते हुए यह अंग्रेजी में 'जीरो' (zero) कहलाया।
भाषा व्याकरण

दुनिया का पहला व्याकरण पाणिनी ने लिखा। 500 ईसा पूर्व पाणिनी ने संस्कृत भाषा को व्याकरण में ढाला। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है, जिसमें 8 अध्याय और 4 सहस्र सूत्र हैं। अष्टाध्यायी में उस समय के भारतीय समाज के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा, राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन के रिफरेंस भी हैं।
पहिए (व्हील) की खोज

ऐसा माना जाता है कि रामायण और महाभारतकाल से पहले ही पहिए की खोज भारत में हो चुकी थी और रथों में पहियों का प्रयोग किया जाता था। विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता सिन्धु घाटी के अवशेषों से मिले (ईसा से 3000-1500 वर्ष पूर्व की बनी) खिलौना हाथीगाड़ी भारत के म्यूजियम में अब भी रखे हैं।
शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की खोज

भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। आज से 3,000 साल पहले सुश्रुत युद्ध या नेचुरल डिजास्टर में जो लोग घायल हो जाते थे उन्हें ठीक करने का काम करते थे। सुश्रुत ने 1,000 ईसा पूर्व प्रेग्नेंसी, कैटरेक्ट, बॉडी पार्ट ट्रांसप्लांट, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की सर्जरी के सिद्धांत बताए थे।
ज्यामिति (ज्यॉमेट्री) की खोज

बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ हैं। दरअसल (800 ईसा पूर्व) बौधायन ने रेखागणित, ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज की थी। उस समय भारत में रेखागणित, ज्यामिति या त्रिकोणमिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था।




पूरे विश्व को सभ्यता हमने सिखाई और आज हम उनसे सभ्यता सिख रहे हैं
ध्यान-साधना, योग, आयुर्वेद, ये सारी अनमोल चीजें हमारी विरासत थी लेकिन अंग्रेजों ने हम लोगों के मन में बैठा दिया कि ये सब फालतू कि चीज़े हैं और हम लोगों ने मान भी लिया पर आज जब उनको जरुरत पड़ रही हैं इन सब चीजों कि तो फिर से हम लोगों कि शरण में दौड़े-भागे आ रहे हैं और अब हमारा योग 'योगा' बनकर हमारे पास आया तब जाकर हमें एहसास हो रहा हैं कि जिसे हम कंचे समझकर खेल रहे थे, वो हीरा था। उस आयुर्वेद के ज्ञान को विदेशी वाले अपने नाम से पेटेंट करा रहे हैं जिसके बाद उसका व्यापारिक उपयोग हम नहीं कर पायेंगे। इस आयुर्वेद का ज्ञान इस तरह रच बस गया हैं हम लोगों के खून में कि चाहकर भी हम इसे भुला नहीं सकते ...आज भले ही बहुत कम ज्ञान हैं हमें आयुर्वेद का पर पहले घर कि हरेक औरतों को इसका पर्याप्त ज्ञान था तभी तो आज दादी माँ के नुस्खे या नानी माँ के नुख्से पुस्तक बनकर छप रहे हैं। उस आयुर्वेद की छाया प्रति तैयार करके अरबी वाले 'यूनानी चिकित्सा' का नाम देकर प्रचलित कर रहे हैं।
जिस समय पश्चिम में आदिमानवों ने कपडे पहनना सीखा था...उस समय हमारे यहाँ लोग पुष्पक विमान में उड़ा करते थे। आज अगर विदेशी वाले हमारे ज्ञान को अपने नाम से पेटेंट करा रहे हैं तो हमारी नपुंसकता के कारण ही ना ??
वो तो योग के ज्ञाता नहीं रहे होंगे विदेश में और जब तक होते तब तक स्वामी रामदेव जी आते नहीं तो ये किसी विदेशी के नाम से पेटेंट हो चुका होता....हमारी एक और महान विरासत हैं संगीत की जो माँ सरस्वती की देन हैं किसी साधारण मानवों की नहीं। फिर इसे हम तुच्छ समझकर इसका अपमान कर रहे हैं। याद हैं आज से साल भर पहले हमारे संगीत-निर्देशक ए.आर. रहमान (पहले नाम दिलीप कुमार) को संगीत के लिए आस्कर पुरूस्कार दिया गया था. और गर्व से सीना चौड़ा हम भारतियों का जबकि मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे अपनों ने मुझे जख्म दिया और अंग्रेज उसमे नमक छिड़क रहे हैं और मेरे अपने उसे देखकर खुश हो रहे हैं।
किस तरह भीगा कर जूता मारा था अंग्रेजों ने हम भारतियों के सर पर और हम गुलाम भारतीय उसमे भी खुश हो रहे थे कि मालिक ने हमें पुरस्कार तो दिया..... भले ही वो जूतों का हार ही क्यों ना हों ?? अरे शर्म से डूब जाना चाहिए हम भारतियों को अगर रत्ती भर भी शर्म बची है तो ??
बेशक रहमान की जगह कोई सच्चा देशभक्त होता तो ऐसे आस्कर को लात मार कर चला आता ........क्योंकि वो पुरस्कार अच्छे संगीत के लिए नहीं दिए गए थे बल्कि उसने पश्चिमी संगीत को मिलाया था भारतीय संगीत में इसलिए मिला वो पुरस्कार....यानी कि भारतीय संगीत कितना भी मधुर क्यों न हों आस्कर लेना हैं तो पश्चिमी संगीत को अपनाना होगा........सीधा सा मतलब यह हैं कि हमें कौन सा संगीत पसंद करना हैं और कौन सा नहीं ये हमें अब वो बताएँगे .........इससे बड़ा और गुलामी का सबूत और क्या हो सकता हैं कि हम अपनी इच्छा से कुछ पसंद भी नहीं कर सकते......कुछ पसंद करने के लिए भी विदेशियों कि मुहर लगवानी पड़ेगी उस पर हमें.... जिसे क,ख,ग भी नहीं पता अब वो हमें संगीत सिखायेंगे जहाँ संगीत का मतलब सिर्फ गला फाड़कर चिल्ला देना भर होता हैं वो सिखायेंगे ??
ज्यादा पुरानी बात भी नहीं हैं ये ......हरिदास जी और उसके शिष्य तानसेन (जो अकबर के दरबारी संगीतज्ञ थे) के समय कि बात हैं जब राज्य के किसी भाग में सुखा और आकाल कि स्थिति पैदा हो जाती थी तो तानसेन को वहां भेजा जाता था वर्षा करने के लिए......तानसेन में इतनी क्षमता थी कि मल्हार गाके वर्षा करा दे, दीपक राग गाके दीपक जला दे और शीतराग से शीतलता पैदा कर दे तो प्राचीन काल में अगर संगीत से पत्थर मोम बन जाता था, जंगल के जानवर खींचे चले आते थे कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये बात कोई भी अनुभव कर सकता हैं की किस तरह दिनों-दिन संगीत-कला विलुप्त होती जा रही हैं .....और संगीत कला का गुण तो हम भारतियों के खून में हैं .......किशोर कुमार, उषा मंगेशकर, कुमार सानू जैसे अनगिनत उदाहरण हैं जो बिना किसी से संगीत की शिक्षा लिए बॉलीवुड में आये थे।
एक और उदहारण हैं जब तानसेन की बेटी ने रात भर में ही "शीत राग" सीख लिया था.......चूँकि दीपक राग गाते समय शरीर में इतनी ऊष्मा पैदा हो जाती हैं कि अगर अन्य कोई “शीत राग” ना गाये तो दीपक राग गाने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जायेगी और तानसेन के प्राण लेने के उद्द्येश्य से ही एक चाल चलकर उसे दीपक राग गाने के लिए बाध्य किया था उससे इर्ष्या करने वाले दरबारियों ने और तानसेन भी अपनी मृत्यु निश्चित मान बैठे थे क्योंकि उनके अलावा कोई और इसका ज्ञाता (जानकार) भी नहीं था और रातभर में सीखना संभव भी ना था किसी के लिए पर वो भूल गए थे कि उनकी बेटी में भी उन्ही का खून था और जब पिता के प्राण पर बन आये तो बेटी असंभव को भी संभव करने कि क्षमता रखती हैं ...... तानसेन के ऐसे सैकड़ों कहानियां हैं पर ये छोटी सी कहानी मैंने आप लोगों को अपने भारत के महान संगीत विरासत कि झलक दिखने के लिए लिखी.......अब सोचिये कि ऐसे में अगर विदेशी हमें संगीत कि समझ कराये तो ऐसा ही हैं जैसे पोता, दादा जी को धोती पहनना सिखाये, राक्षस साधू-महात्माओं को धर्म का मर्म समझाए और शेर किसी हिरन को अपने पंजे में दबाये अहिंसा कि शिक्षा दे ......नहीं..??
हम लोगों के यहाँ सात सुर से संगीत बनता हैं इसलिए 'सात तारों से बना सितार' बजाते हैं हमलोग, लेकिन अंग्रेजों को क्या समझ में आ गया जो छह तार वाला वाध्य-यंत्र बना लिया और सितार कि तर्ज पर उन्सका नामकरण गिटार कर दिया ??
इतना कहने के बाद भी हमारे भारतीय नहीं मानेगे मेरी बात पर जब कोई अंग्रेज कहेगा कि उसने गायों को भारतीय संगीत सुनाया तो ज्यादा दूध लिया या जब शोध सामने आएगा कि भारतीय संगीत का असर फसलों पर पड़ता हैं और वे जल्दी-जल्दी बढ़ने लगते हैं तब हम विश्वास करेंगे.... क्यों ?? ये सब शोध अंग्रेज को भले आश्चर्यचकित कर दे पर अगर ये शोध किसी भारतीय को आश्चर्यचकित करते हैं तो ये दुःख: कि बात हैं।
हमारे देश वासियों को लगता हैं हम लोग पिछड़े हुए हैं जो हमारे यहाँ छोटे-छोटे घर हैं और दूसरी और अंग्रेज तकनीकी विद्या के कितने ज्ञानी हैं, वो खुशनसीब हैं जो उनके यहाँ इतनी ऊँची-ऊँची अट्टालिकाए (Buildings) हैं और इतने बड़े-बड़े पुल हैं........ इस पर मैं अपने देशवासियों से यहीं कहूँगा कि ऊँचे घर बनाना मज़बूरी और जरुरत हैं उनकी, विशेषता नहीं..... हमलोग बहुत भाग्यशाली हैं जो अपनी धरती माँ कि गोद में रहते हैं विदेशियों कि तरह माँ के सर पर चढ़ कर नहीं बैठते।
हम लोगों को घर के छत, आँगन और द्वार का सुख प्राप्त होता हैं .....जिसमें गर्मी में सुबह-शाम ठंडी-ठंडी हवा जो हमें प्रकृति ने उपहार-स्वरूप प्रदान किये हैं उसका आनंद लेते हैं और ठण्ड में तो दिन-दिन भर छत या आँगन में बैठकर सूर्य देव कि आशीर्वाद रूपी किरणों को अपने शारीर में समाते हैं, विदेशियों कि तरह धुप सेंकने के लिए नंगे होकर समुन्द्र के किनारे रेत पर लेटते नहीं हैं.............रही बात क्षमता कि तो जरुरत पड़ने पर हमने समुन्द्र पर भी पत्थरों का पुल बनाया था और रावण तो पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने कि तैयारी कर रहा था तो अगर वो चाहता तो गगनचुम्बी इमारते भी बना सकता था लेकिन अगर नहीं बनाया तो इसलिए कि वो विद्वान था।
तथ्यपूर्ण बात तो ये हैं कि हम अपनी धरती माँ के जितने ही करीब रहेंगे रोगों से उतना ही दूर रहंगे और जितना दूर रहेंगे रोगों के उतना करीब जायेंगे। हमारे मित्रों को इस बात कि भी शर्म महसूस होती हैं कि हम लोग कितने स्वार्थी, बेईमान, झूठे, मक्कार, भ्रष्टाचारी और चोर होते हैं जबकि अंग्रेज लोग कितने ईमानदार होते हैं ....हम लोगों के यहाँ कितनी धुल और गंदगी हैं जबकि उनके यहाँ तो लोग महीने में एक-दो बार ही झाड़ू मारा करते हैं.......तो जान लीजिये कि वैज्ञानिक शोध ये कहती हैं कि साफ़ सुथरे पर्यावरण में पलकर बड़े होने वाले शिशु कमजोर होते हैं, उनके अन्दर रोगों से लड़ने कि शक्ति नहीं होती दूसरी तरफ दूषित वातावरण में पलकर बढ़ने वाले शिशु रोगों से लड़ने के लिए शक्ति संपन्न होते हैं। इसका अर्थ ये मत लगा लीजियेगा कि मैं गंदगी पसंद आदमी हूँ, मैं भारत में गंदगी को बढ़ावा दे रहा हूँ ........मेरा अर्थ ये हैं कि सीमा से बाहर शुद्धता भी अच्छी नहीं होती और जहाँ तक भारत कि बात हैं तो यहाँ हद से ज्यादा गंदगी हैं जिसे साफ़ करने कि अत्यंत आवश्यकता हैं.......रही बात झाड़ू मारने कि तो घर गन्दा हो या ना हों झाड़ू तो रोज मारना ही चाहिए क्योंकि झाड़ू मारकर हम सिर्फ धुल-गंदगी को ही बाहर नहीं करते बल्कि अपशकुन को भी झाड -फुहाड़ कर बाहर कर देते हैं तभी तो हम गरीब होते हुए भी खुश रहते हैं।
भारतीय को समृद्धि कि सूची में पांचवे स्थान पर रखा गया था क्योंकि ये पैसे के मामले में भले कम हैं लेकिन और लोगो से ज्यादा सुखी हैं और जहाँ तक हमारे ऐसे बनने की बात है तो वो सब अंग्रेजों ने ही सिखाया है हमें, नहीं तो उसके आने के पहले हम छल-कपट जानते तक नहीं थे........उन्होंने हमें धर्म-विहीन और चरित्र-विहीन शिक्षा देना शुरू किया ताकि हम हिन्दू धर्म से घृणा करने लगे और ईसाई बन जाए।
उन्होंने नौकरी आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू की ताकि बच्चे नौकरी करने कि पढाई के अलावा और कुछ सोच ही न पाए. इसका परिणाम तो देख ही रहे हैं कि अभी के बच्चे को अगर चरित्र, धर्म या देशहित के बारे में कुछ कहेंगे तो वो सुनना ही नहीं चाहता..........वो कहता है उसे अभी सिर्फ अपने कोर्स कि किताबों से मतलब रखना हैं और किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं उसे......अभी कि शिक्षा का एकमात्र उद्द्येश्य नौकरी पाना रह गया हैं लोगो को किताबी ज्ञान तो बहुत मिल जाता हैं कि वो डॉक्टर, इंजिनियर, वकील, आई.ए.एस. या नेता बन जाता हैं पर उसकी नैतिक शिक्षा न्यूनतम स्तर कि भी नहीं होती जिसका कारण रोज एक-से-बढ़कर एक अपराध और घोटाले करते रहते हैं ये लोग। अभी कि शिक्षा पाकर बच्चे नौकरी पा लेते हैं लेकिन उनका मानसिक और बौद्धिक विकास नहीं हो पाता हैं, इस मामले में वो पिछड़े ही रह जाते हैं जबकि हमारी सभ्यता में ऐसी शिक्षा दी जाती थी जिससे उस व्यक्ति के पूर्ण व्यक्तिगत का विकास होता था.....उसकी बुद्धि का विकास होता था, उसकी सोचने-समझने कि शक्ति बढती थी।
आज ये अंग्रेज जो पूरी दुनिया में ढोल पिट रहे हैं कि ईसाईयत के कारण ही वो सभ्य और विकसित हुए और उनके यहाँ इतनी वैज्ञानिक प्रगति हुई तो क्या इस बात का उत्तर हैं उनके पास कि कट्टर और रुढ़िवादी ईसाई धर्म जो तलवार के बल पर 25-50 कि संख्या से शुरू होकर पूरा विश्व में फैलाया गया, जो ये कहता हो कि सिर्फ बाईबल पर आँख बंदकर भरोसा करने वाले लोग ही स्वर्ग जायेंगे बाकी सब नर्क जाएंगे,,,जिस धर्म में बाईबल के विरुद्ध बोलने कि हिम्मत बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी नहीं कर सकता वो इतना विकासशील कैसे बन गया ???
400 साल पहले जब गैलीलियों ने यूरोप की जनता को इस सच्चाई से अवगत कराना चाहा कि पृथ्वी सूर्य कि परिक्रमा करती हैं तो ईसाई धर्म-गुरुओं ने उसे खम्बे से बांधकर जीवित जलाये जाने का दंड दे दिया वो तो बेचारा क्षमा मांगकर बाल-बाल बचा। एक और प्रसिद्ध पोप, उनका नाम मुझे अभी याद नहीं, वे भी मानते थे कि पृथ्वी सूर्य के चारो और घुमती हैं लेकिन जीवन भर बेचारे कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए...उनके मरने के बाद उनकी डायरी से ये बात पता चली। क्या ऐसा धर्म वैज्ञानिक उन्नति में कभी सहायक हो सकता हैं ??? ये तो सहायक की बजाय बाधक ही बन सकता हैं।
हिन्दू जैसे खुले धर्म को जिसे गरियाने की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई हैं सबको, जिसमें कोई मूर्ति-पूजा करता हैं, कोई ध्यान-साधना, कोई तन्त्र-साधना, कोई मन्त्र-साधना ....... ऐसे अनगिनत तरीके हैं इस धर्म में, जिस धर्म में कोई बंधन नहीं ..जिसमें नित नए खोज शामिल किये जा सकते हैं और समय तथा परिस्थिति के अनुसार बदलाव करने की पूरी स्वतंत्रता हैं, जिसने सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाई, 'वसुधैव कुटुम्बकम' का नारा दिया, पूरे विश्व को अपना भाई माना, जिसने अंक शास्त्र, ज्योतिष-शास्त्र, आयुर्वेद-शास्त्र, संगीत-कला, भवन निर्माण कला, काम-कला आदि जैसे अनगिनत कलाएं तुम लोगों (ईसाईयों) को दी और तुम लोग कृतघ्न, जो नित्यकर्म के बाद अपने गुदा को पानी से धोना भी नहीं जानते, हमें ही गरियाकर चले गए।
अगर ईसाई धर्म के कारण ही तुमने तरक्की की तो वो तो 1800 साल पहले कर लेनी चाहिए थी, पर तुमने तो 200-300 साल पहले जब सबको लूटना शुरू किया और यहाँ (भारत) के ज्ञान को सीख-सीखकर यहाँ के धन-दौलत को हड़पना शुरू किया तबसे तुमने तरक्की की ऐसा क्यों ???
ये दुनिया करोडों वर्ष पुरानी हैं लेकिन तुम लोगों को 'ईसा और मुहम्मद' के पहले का इतिहास पता ही नहीं कहते हो बड़े-बड़े विशाल भवन बना दिए तुमने. अरे जाओ, जब आज तक पिछवाडा धोना सीख ही नहीं पाए, खाना बनाना सीख ही नहीं पाए, जो की अभी तक उबालकर नमक डालकर खाते तो बड़े-बड़े भवन बनाओगे तुम। एक भी ग्रन्थ तुम्हारे पास-भवन निर्माण के ?? जो भी छोटे-मोटे होंगे वो हमारे ही नक़ल किये हुए होंगे।
प्रोफ़ेसर ओक ने तो सिद्ध कर दिया की भारत में जितने प्राचीन भवन हैं वो हिन्दू भवन या मंदिर हैं जिसे मुस्लिम शासकों ने हड़प कर अपना नाम दे दिया और विश्व में भी जो बड़े-बड़े भवन हैं उसमें हिन्दू शैली की ही प्रधानता हैं। ये भी हंसी की ही बात हैं की मुग़ल शासक महल नहीं सिर्फ मकबरे और मस्जिद ही बनवाया करते थे भारत में। जो हमेशा गद्दी के लिए अपने बाप-भाईयों से लड़ता-झगड़ता रहता था, अपना जीवन युद्ध लड़ने में बिता दिया करते थे उसके मन में अपने बाप या पत्नी के लिए विशाल भवन बनाने का विचार आ जाया करता था !! इतना प्यार करता था अपनी पत्नी से जिसको बच्चा पैदा करवाते करवाते मार डाला उसने !! मुमताज़ की मौत बच्चा पैदा करने के दौरान ही हुई थी और उसके पहले वो 14 बच्चे को जन्म दे चुकी थी. जो भारत को बर्बाद करने के लिए आया था, यहाँ के नागरिकों को लूटकर, लाखों-लाख हिन्दुओं को काटकर और यहाँ के मंदिर और संस्कृतिक विरासत को तहस-नहस करके अपार खुशी का अनुभव करता था वो यहाँ कोई सृजनात्मक विरासत कार्य करे ये तो मेरे गले से नहीं उतर सकता। जिसके पास अपना कोई स्थापत्य कला का ग्रन्थ नहीं हैं वो भारत की स्थापत्य कला को देखकर ये कहने को मजबूर हो गया था की भारत इस दुनिया का आश्चर्य हैं इसके जैसा दूसरा देश पूरी दुनिया में कहीं नहीं हो सकता हैं, वो लोग अगर ताजमहल बनाने का दावा करते हैं तो ये ऐसा ही हैं जैसा 3 साल के बच्चे द्वारा दसवीं का प्रश्न हल करना।
दुःख तो ये हैं की आज़ाद देश आज़ाद होने के बाद भी मुसलमानों को खुश रखने के लिए इतिहास में कोई सुधर नहीं किये, हमारे मुसलमान और ईसाई भाइयों के मूत्र-पान करने वाले हमारे राजनितिक नेताओं ने। आज जब ये सिद्ध हो चूका हैं की ताजमहल शाहजहाँ ने नहीं बनवाया बल्कि उससे सौ-दो-सौ साल पहले का बना हुआ हैं तो ऐसे में अगर सरकार सच्चाई लाने की हिम्मत करती तो क्या हम भारतीय गर्व का अनुभव नहीं करते ? क्या हमारी हीन भावना दूर होने में मदद नहीं मिलती? ताजमहल साथ आश्चर्यों में से एक हैं ये सब जानते हैं पर सात आश्चर्यों में ये क्यों शामिल हैं ये कितने लोग जानते हैं ? इसके शामिल होने का कारण इसकी उत्कृष्ट स्थापत्य कला, इसकी अदभुत कारीगरी को अब तक आधुनिक इंजीनियर समझने की कोशिश कर रहे हैं। जिस प्रकार कुतुबमीनार के लौह-स्तम्भ की तकनीक को समझने की कोशिश कर रहे हैं......जो की अब तक समझ नहीं पाए हैं। (इस भुलावे में मत रहिएगा की कुतुबमीनार को कुतुबद्दीन एबक ने बनवाया था)
मोटी-मोटी तो मैं इतना ही जानता हूँ की यमुना नहीं के किनारे के गीली मुलायम मिटटी को इतने विशाल भवन के भार को सेहन करने लायक बनाना, पूरे में सिर्फ पत्थरों का काम करना समान्य सी बात नहीं हैं. इसको बनाने वाले इंजिनियर के इंजीनियरिंग प्रतिभा को देखकर अभी के इंजीनियर दांतों तले ऊँगली दबा रहे हैं। अगर ये सब बातें जनता के सामने आएगी तभी तो हम अपना खोया आत्मविश्वास प्राप्त कर पायेंगे. 1200 सालों तक हमें लूटते रहे, लूटते रहे, लूटते रहे और जब लुट-खसौट कर कंगाल कर दिया तब अब हमें एहसास करा रहे हों की हम कितने दीन-हीन हैं और ऊपर से हमें इतिहास भी गलत पढ़ा रहे हैं इस डर से की कहीं फिर से अपने पूर्वजों का गौरव इतिहास पढ़कर हम अपना आत्मविश्वास ना पा लें। अरे, अगर हिम्मत हैं तो एक बार सही इतिहास पढ़कर देखों हमें हम स्वाभिमानी भारतीय जो सिर्फ अपने वचन को टूटने से बचाने के लिए जान तक गवां देते थे इतने दिनों तक दुश्मनों के अत्याचार सहते रहे तो ऐसे में हमारा आत्म-विश्वास टूटना स्वभाविक ही हैं. हम भारतीय जो एक-एक पैसे के लिए, अन्न के एक-एक दाने के लिए इतने दिनों तक तरसते रहे तो आज हीन भावना में डूब गए, लालची बन गए, स्वार्थी बन गए तो ये कोई शर्म की बात नहीं. ऐसी परिस्थिति में तो धर्मराज युधिष्ठिर के भी पग डगमगा जाएँ. आखिर युधिष्ठिर जी भी तो बुरे समय में धर्म से विचलित हो गए थे जो अपनी पत्नी तक को जुए में दावं पर लगा दिए थे।
चलिए इतिहास तो बहुत हो गया अब वर्तमान पर आते हैं
वर्तमान में आप लोग देख ही रहे हैं कि विदेशी हमारे यहाँ से डाक्टर-इंजिनियर और मैनेजर को ले जा रहे हैं इसलिए कि उनके पास हम भारतियों कि तुलना में दिमाग बहुत ही कम हैं। आप लोग भी पेपरों में पढ़ते रहते होंगे कि अमेरिका में गणित पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी हो जाती हैं जिसके लिए वो भारत में शिक्षक की मांग करते हैं तो कभी ओबामा भारतीय बच्चो की प्रतिभा से डर कर अमेरिकी बच्चो को सावधान होने की नसीहत देते हैं । पूर्वजों द्वारा लुटा हुआ माल हैं तो अपनी कंपनी खड़ी कर लेते हैं लेकिन दिमाग कहाँ से लायेंगे....उसके लिए उन्हें यहीं आना पड़ता हैं ....हम बेचारे भारतीय गरीब पैसे के लालच में बड़े गर्व से उनकी मजदूरी करने चले जाते थे, पर अब परिस्थिति बदलनी शुरू हो गयी हैं। अब हमारे युवा भी विदेश जाने की बजाय अपने देश की सेवा करना शुरू कर दिए हैं ....वो दिन दूर नहीं जब हमारे युवाओं पर टिके विदेशी फिर से हमारे गुलाम बनेंगे। फिर से इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पूरे विश्व पर पहले हमारा शासन चलता था जिसका इतिहास मिटा दिया गया हैं.
लेकिन जिस तरह सालों पहले हुई हत्या जिसकी खूनी ने अपनी तरफ से सारे सबूत मिटा देने की भरसक कोशिश की हो, उसकी जांच अगर की जाती हैं तो कई सुराग मिल जाते हैं जिससे गुत्थी सुलझ ही जाती हैं, बिलकुल यहीं कहानी हमारे इतिहास के साथ भी हैं जिस तरह अब हमारे युवा विदेशों के करोड़ों रुपये की नौकरी को ठुकराकर अपने देश में ही इडली, बड़ा पाव सब्जी बेचकर या चालित शौचालय, रिक्शा आदि का कारोबार कर करोड़ों रुपये सालाना कम रहे हैं, ये संकेत हैं की अब हमारे युवा अपना खोया आत्म-विशवास प्राप्त कर रहे हैं और उनमे नेतृत्व क्षमता भी लौट चुकी हैं तो वो दीन भी दूर नहीं जब पूरे विश्व का नेतृत्व फिर से हम भारतियों के हाथों में होगा और हम पुन: विश्वगुरु के सिंहासन पर आसीन होंगे। जिस तरह हरेक के लिए दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है वैसे हम लोगों के 1200 सालों से ज्यादा रात का समय कट चुका हैं अब दिन निकल आया हैं ...इसका उदाहरण देख लो भारत का झारखंड राज्य जहां जनसँख्या 3 करोड़ की नहीं हैं और यहाँ 14,000 करोड़ का घोटाला हो जाता हैं फिर भी ये राज्य प्रगति कर रहा है।
इसलिए अपने पराधीन मानसिकता से बाहर आओ, डर को निकालों अपने अन्दर से हमें किसी दूसरे का सहारा लेकर नहीं चलना हैं। खुद हमारे पैर ही इतने मजबूत हैं की पूरी दुनिया को अपने पैरों तले रौंद सकते हैं हम ...हम वही हैं जिसने विश्वविजेता का सपना देखने वाले सिकन्दर का दंभ चूर-चूर कर दिया था। गौरी को 13 बार अपने पैरों पर गिराकर गिडगिडाने को मजबूर किया और जीवनदान दिया। जिस प्रकार बिल्ली चूहे के साथ खेलती रहती हैं वैसे ही ये दुर्भाग्य था हमारा जो शत्रू के चंगुल में फंस गए क्योंकि उस चूहे ने अपनों की ही सहायता ले ली पर हमने उसे छोड़ा नहीं,
अँधा हो जाने के बावजूद भी उसे मारकर मरे.. जिस प्रकार जलवाष्प की नन्ही-नन्ही पानी की बूंदें भी एकत्रित हो जाने पर घनघोर वर्षा कर प्रलय ला देती है, अदृश्य हवा भी गति पाकर भयंकर तबाही मचा देती है, नदी-नाले की छोटी लहरें नदी में मिलकर एक होती है तो गर्जना करती हुई अपने आगे आने वाली हरेक अवरोधों को हटाती हुई आगे बढती रहती है वैसे ही मैं अभी भले ही जलवाष्प की एक छोटी सी बूंद हूँ, पर अगर आप लोग मेरा साथ दो तो इसमें कोई शक नहीं की हम भारतीय फिर से इस दुनिया को अपने चरणों में झुका देंगे. और मुझे पता हैं दोस्त मेरे जैसी करोड़ों बूंदें एकृत होकर बरसने को बेकरार हैं इसलिए अब और ज्यादा विलंब ना करो और मेरे हाँथ में अपना हाँथ दो मित्र और अगर किसी को इस लेख से किसी भी प्रकार की चोट पहुंचाई तो उसके लिए भी क्षमा मांगता हूँ।
मैं गर्व से कह सकता हूँ मैं भारतीय हूँ


शुक्रवार, सितंबर 12, 2014

मुहम्मद की दौलत का भंडाफोड़ !

Via BhanDafodu
मुहम्मद की दौलत का भंडाफोड़ !
आज हमें मुहम्मद साहब के चरित्र से शिक्षा लेने की जरुरत है . ऐसा इसलिए नहीं कि वह अल्लाह के सच्चे अनुयायी और सबसे प्यारे अंतिम रसूल थे . बल्कि इसलिए नहीं कि वह जोभी गलत काम करते थे उसे जायज बताने के लिए अल्लाह की तरफ से कोई न कोई आयत कुरान में जोड़ देते थे . यानि अपने सभी गलत कामों में अल्लाह को शामिल कर लेते थे . यद्यपि मुस्लिम विद्वान् दावा करते हैं कि मुहम्मद साहब एक सच्चे सीधे और सदा व्यक्ति थे ,और उनको धन संपत्ति से कोई मोह नहीं था . और न उन्होंने जीवन भर में किसी प्रकार की दौलत और जमीन अपने पास रखी थी . लेकिन हदीसों और इस्लाम की इतिहास की किताबों से सिद्ध होता है कि मुहम्मद साहब दुनिया में एकमात्र ऐसे नबी थे इस्लाम की जगह अपनी दौलत पर अधिक प्यार था . उनको इस्लाम की नहीं दौलत की चिंता बनी रहती थी , जो इस हदीस से सिद्ध होता है ,
1-महालोभी और लालची रसूल
मुहम्मद साहब को धन संपत्ति का कितना मोह और लालच था , इसे साबित करने के लिए यह एक ही हदीस काफी है ,
“उकबा बिन आमिर ने कहा कि रसूल कहते थे कि मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं है कि मेरी मौत के बाद तुम इस्लाम त्याग कर फिर से मुशरिक हो जाओ , लेकिन मुझे तो इस बात की सबसे बड़ी चिंता लगी रहती है , कि कहीं मेरी संपत्ति दूसरों हाथों में न चली जाये “
बुखारी-जिल्द 2 किताब 2 हदीस 428
2-बद्र की लूट
मुहम्मद के साथी पहले भी काफिले लूटते थे , और मुहम्मद की कई औरतें भी थी ,जिनका खर्चा चलाना कठिन हो रहा था ,इसलिए मुहम्मद जब अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना में रहने लगे , तो लूटमार करने लगे . इसका नाम उन्होंने “गजवा ” रख दिया था जिसका अरबी बहुवचन ” गजवात ” होता है .जिसका वास्तविक अर्थ “युद्ध (Battle ) नहीं बल्कि “छापा raids ” या लूट (plundering) होता है .मुहम्मद ने अपने जीवन में ऐसे कई गजवे (छापे ) किये , और लूट का माल घर में भर लिया था .चूँकि मदीना से कुछ दूर ही मुख्य व्यापारिक मार्ग था , जो लाल समुद्र (Red Sea ) के किनारे यमन से सीरिया तक जाता था . और इसी मार्ग से काफिले अपना कीमती सामान लाते -लेजाते थे .मुहम्मद की जीवनी लिखने वाले प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार इब्ने इसहाक ( Ibn Ishaq/Hisham 428) पर लिखा है .कि अबूसुफ़यान ने रसूल को एक गुप्त सूचना दी , कि मदीना से करीब 80 मील दूर मुख्य मार्ग से काफिला गुजरने वाला है .जिसमे पचास हजार सोने की दीनार , और चांदी के दिरहम के साथ काफी कीमती सामान है .अबूसुफ़यान ने यह भी बताया कि उस काफिले में केवल तीस या चालीस लोग ही हैं .यह खबर मिलते ही रसूल ने अपने लोगों को आदेश दिया कि जल्दी जाओ और उस काफिले पर धावा बोल दो . और काफिले का जितना भी माल है सब लूट लो .मुहम्मद के आदेश से मुसलमानों ने मदीना से करीब 80 मील दूर “बद्र ” नामकी जगह पर 13 मार्च शनिवार सन 624 तदानुसार 17 रमजान हिजरी सन 2 को उस काफिले पर धावा बोल दिया .मुसलमान इस लूट को” बद्र का युद्ध Battle of Badr “या अरबी में “गजवा बद्र غزوة بدر “कहते हैं .इस लूट का कमांडर अबूसुफ़यान था . जिसके साथी अबूबकर ,उमर .अली ,हमजा ,मुसअब इब्न उमर ,जुबैर अल अब्बास , अम्मार इब्न यासिर और अबूजर अल गिफारी थे . यह लोग 70 ऊंट और दो घोड़े भी लाये थे .इनमे जादातर लोग मुहम्मद के रिश्तेदार थे . और सबने मिलकर काफिले की संपत्ति लुट ली . क्योंकि काफिले वाले कम थे .और मुहम्मद ने अल्लाह का डर दिखा कर वह सारा माल घर में भर लिया .जिसका नाम मुहम्मद ने “अनफाल ” रख दिया .
3-कुरान में अनफाल
क्योंकि बद्र की इस लूट में मुहम्मद के कई रिश्तेदार शामिल थे , इसलिए वह भी अपना हिस्सा मांगने लगे . तब उनका मुंह बंद करने के लिए मुहम्मद ने आयत बना दी ,
” हे नबी जो लोग तुम से अनफाल के धन के बारे में सवाल ( आपत्ति ) करते हैं ,तो उनसे कह दो कि इस अनफाल के धन पर केवल रसूल का ही अधिकार है “
सूरा -अनफाल 8:1 ( अनफाल का अर्थ”Accession ” होता है .यह ऐसी संपत्ति को कहते हैं ,जो दूसरों से छीन कर प्राप्त की गयी हो )
यह बात इन हदीसों से प्रमाणित होती है , कि मुहम्मद ने अकेले ही लूट का माल हथिया लिया था ,
“सईद बिन जुबैर ने इब्न अब्बास से पूछा कि कुरान की सूरा ” अनफाल ( सूरा 8) किस लिए उतरी थी . तो वह बोले यह सूरा बद्र में लुटे गए माल को रसूल के लिए वैध ठहराने के लिए उतरी थी “बुखारी -जिल्द 6 किताब 60 हदीस 404
बुखारी -जिल्द 6 किताब 60 हदीस 168
4-लूट का माल रसूल के घर में
मुहम्मद ने पहले तो बद्र के लूट की दौलत अपने लिए वैध ठहरा दी और अपने परिवार में बाँट दी , जैसा इन हदीसों में कहा है ,
“अली ने कहा ,कि बद्र की लुट में मुझे जो दौलत और सोना मिला , उस से मैंने उसी दिन एक ऊंटनी खरीद ली . मैं फातिमा से शादी करना चाहता था .इस लिए मैंने लूट के सोने से ” बनू कैनूना ” के सुनार (Goldsmith ) से फातिमा के लिए जेवर बनवा लिए . और कुछ सोना सुनारों को बेच कर अपनी और फातिमा की शादी और दावत पर खर्च कर दिया .और अपने और फातिमा के लिए दो ऊंटनियाँ काठी (Saddles ) सहित खरीद लीं
.बुखारी -जिल्द 5 किताब59 हदीस 340
5-खैबर पर हमला
एकबार जब मुहम्मद को लूट से काफी दौलत मिल गयी तो लूट से दौलत कमाने का चस्का लग गया , और धन के साथ जमीन पर भी कब्ज़ा करने लगे ,मुहम्मद में ऐसा एक और हमला खैबर पर किया था .खैबर में फदक का बगीचा यहूदियों के पास था , जो कई पीढ़ियों से वहां के खजूर बेच कर ,पैसा कमा रहे थे , और दुसरे धंधे कर रहे थे . जब मुहम्मद को पता चला कि फदक के खजूरों को बेचकर यहूदी धनवान हो रहे हैं ,तो मुहम्मद ने 7 मई सन 629 को करीब 1500 जिहादी और 200 घुड़सवारों की फ़ौज बना कर खैबर पर हमला कर दिया .और यहूदियों को मार भगा दिया . और फदक के बागों पर कब्ज़ा कर लिया .यह घटना इब्न इसहाक ने मुहम्मद की जीवनी ” सीरत रसूलल्लाह ” में विस्तार में लिखी है .अरब के उत्तरी भाग में खैबर नामकी जगह में एक “नखलिस्तान (Oasis ) था . जहाँ पानी की प्रचुरता होने से खजूरों के बड़े बड़े बाग़ थे . इनका नाम “फदक فدك” था . यह बाग़ मदीना से करीब 30 मील दूर था .फदक के खजूर अच्छे होते थे और इनसे काफी आमदानी होती थी .खैबर की लूट में मुहमद ने यहूदियों से फदक के बाग़ के साथ 2000 कीमती यमनी कपड़ों की गाठें (Bales ) और 5000 कपड़ों के थान लूट लिये थे ,यहूदी यह सामान सीरिया भेजने वाले थे . इसके अलावा मुहम्मद ने फदक पास दो बाग़ ” अल शिक्क الشِّق” और “अल कतीबाالكتيبة ” पर भी कब्जा कर लिया था .और सबको अपनी संपत्ति घोषित कर दिया था .जब तक मुहम्मद जीवित रहे फदक बाग़ उनकी संपत्ति माने गए . उन्हीं की उपज से मुहम्मद अपने इतने बड़े परिवार का खर्चा चलाते रहे . खलीफा उमर इन बागों की कीमत पचास लाख दीनार आंकी थी .और जब फातिमा और अली अपने पुत्रों हसन और हुसैन के लिए अबू बकर से फदक के बागों से अपना हिस्सा मागने गयी थी , तो अबू बकर ने इंकार कर दिया था .शिया -सुन्नी विवाद का यह भी एक कारण है .
6-लुटेरे के घर डाका
मुहम्मद ने जिस दौलत और जमीन के लिए हजारों निर्दोष लोगों इस लिए को मार दिया था .कि इस दौलत से मेरे परिवार के लोग पीढ़ियों तक मजे से ऐश करते रहेंगे , लेकिन मुहम्मद को पता नहीं था कि उसकी मौत के बाद लूट की सम्पति उसका सगा ससुर एक डाकू की तरह हथिया लेगा ,और मुहम्मद की औरतों , और लड़की दामाद को अबू बकर ने एक फूटी कौड़ी नहीं दी थी ,जो इन हदीसों से पता चलता है ,
“आयशा ने कहा कि रसूल की मौत के बाद उनकी दूसरी पत्नियाँ रसूल की सम्पति में हिस्सा चाहती थी . इसके लिए उन्होंने उस्मान बिन अफ्फान को मेरे पिता अबू बकर के पास भेजा . तो मेरे पिता ने कहा ” रसूल का कोई वारिस नहीं होता ” मैंने तो रसूल की दौलत ग़रीबों में खैरात कर दी है “
सही मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4351
अबू बकर ने कहा कि एकमात्र मैं ही रसूल की संपत्ति का संरक्षक हूँ . और जब अली और अब्बास अबू बकर से बद्र और “फदक” के बागों में हिस्सा मांगने आये तो . अबू बकर बोला अल्लाह की कसम खाता इनमे तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं बनता .” सही मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4349
“उरवा बिन जुबैर ने कहा कि , आयशा ने बताया , जब फातिमा और अली मेरे पिता अबू बकर के पास गए , और उन से बद्र और खबर की लूट का हिस्सा माँगा ,तो ,मेरे पिता ने कहा , मैं उस अल्लाह की कसम खाकर सच कहता हूँ जिसके हाथों में मेरी जान है .लूट की वह सारी दौलत इस्लामी राज्य की स्थापना में खर्च हो गयी . और रसूल की यही अंतिम इच्छा थी . यह सुन कर फातिमा और अली रुष्ट होकर घर लौट गए .
सही मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4354
7-लूट का क्रूर तरीका
मुसलमान दावा करते हैं कि हमारे रसूल तो बड़े दयालु और रहमदिल थे , उन्होंने जिंदगी भर एक व्यक्ति की भी हत्या नहीं की थी . लेकिन सब जानते हैं लालच में अँधा व्यक्ति कुछ भी कर सकता है .मुहम्मद ने लूटों के दौरान हत्या का जो तरीका अपनाया था , उसे जानकर कटर से कठोर दिल वाले काँप जायेंगे मुहम्मद लोगों को जिन्दा दफना देता था , ताकि कोई सबूत्त बाकि नहीं रहे ,.
“अबू तल्हा ने कहा कि बद्र की लूट में रसूल ने सभी काफिले वालों बुरी तरह से मारा , जिस से कुछ तो अपनी जान बचा कर काफिले का सामान छोड़ कर भाग गए .लेकिन 24 लोग रसूल के हाथों पकडे गए .जो बुरी तरह से घायल थे . तब रसूल ने उन सभी को बद्र के एक सूखे और गहरे कुंएं में फिकवा दिया .और हमें वहीँ तीन दिन रात रुकने का हुक्म दिया . कहीं कोई कुंएं से जिन्दा न निकल सके . अबू तल्हा ने बताया की जब भी रसूल काफिले लूटते यही तरीका अपनाते थे .जिस से घायल काफिले वाले कुंएं में भूखे प्यासे मर जाते थे ” बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 314
8-मुहम्मद की धूर्तता
जिस तरह हर मुसलमान अपने अपराधों पर पर्दा डालने के लिए दूसरों पर आरोप लगा देता है , उसी तरह खुद को हत्या के अपराध से निर्दोष साबित करने के लिए मुहम्मद अल्लाह को ही जिम्मेदार बता देता था . जैसा कुरान में कहा है ,
” हे रसूल तुमने उनका क़त्ल नहीं किया , बल्कि अल्लाह ने उनको क़त्ल किया है . और तुमने उनको कुंएं में नहीं फेका ,बल्कि अल्लाह ने ही उनको कुएं में फेका है .सूरा -अनफाल 8: 17
9-निष्कर्ष
इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि मुहम्मद एक महालोभी , क्रूर लुटेरा और ऐसा धूर्त था कि लोग उसके द्वारा की गयी हजारों हत्याओं का पता भी नहीं कर सकें . जब लाश ही नहीं मिलेगी तो लोग मुहम्मद को दयालु मान लेगे , इसके अतिरिक्त यह बात भी सिद्ध है कि मुहमद और अल्लाह एकही थैली के चट्टे बट्टे है . और अल्लाह भी मुहम्मद की मर्जी के मुताबिक आयतें बना देता था .
लेकिन इस अटल सत्य को हजारों अल्लाह मिल कर भी नहीं बदल सकते ,कि हरेक धूर्त का एक दिन “भंडाफोड़ ” जरुर हो जाता है .मुहम्मद ने जैसे क्रूर कर्म किये थे वैसी ही कष्टदायी मौत मारा गया .
यदि धूर्तता सीखना हो तो रसूल से सीखो
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गुरुवार, सितंबर 04, 2014

कैसे रोथ्स्चाइल्ड ने बैंकों के माध्यम से भारत पर कब्जा किया

कैसे रोथ्स्चाइल्ड ने बैंकों के माध्यम से भारत पर कब्जा किया
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भारत इतना समृद्ध देश था कि उसे `सोने की चिडिया ‘ कहा जाता था । भारत की इस शोहरत ने पर्यटकों और लुटेरों – दोनों को आकर्षित किया ।

यह बात तब की है जब ईस्ट इन्डिया कम्पनी को भारत के साथ व्यापार करने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था । उसके बाद क्या हुआ यह नीचे पढिये -
सन् १६०० – ईस्ट इन्डिया कम्पनी को भारत के साथ व्यापार करने की स्वीकृति मिली

१६०८ – इस दौरान कम्पनी के जहाज सूरत की बन्दरगाह पर आने लगे जिसे व्यापार के लिये आगमन और प्रस्थान क्षेत्र नियुक्त किया गया ।.

अगले दो सालों में ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने दक्षिण भारत में बंगाल की खाडी के कोरोमन्डल तट पर मछिलीपटनम नामक नगर में अपना पहला कारखाना खोला ।

१७५० – ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने अपने २ लाख सैनिकों की निजी सेना के वित्त प्रबन्ध के लिये बंगाल और बिहार में अफीम की खेती शुरु कर दी । बंगाल में इसके कारण खाद्य फसलों की जो बर्बादी हुई उससे अकाल की स्थिति पैदा हुई जिससे दस लाख लोगों की मृत्यु हुई ।

कैसे और कितनी भारी संख्या मे लोगों की मृत्यु हुई यह जानने के लिये पढिये Breakdown of Death Toll of Indian Holocaust caused during the British (Mis)Rule

१७५७ – बंगाल के शासक सिराज-उद-दौला के पदावनत हुए सेना अध्यक्ष मीर जाफर, यार लुत्फ खान, महताब चन्द, स्वरूप चन्द, ओमीचन्द और राय दुर्लभ के साथ षडयन्त्र करके अफीम के व्यापारियों ने प्लासी की लडाई में सिराज-उद-दौल को पराजित करके भारत पर कब्जा कर लिया और दक्षिण एशिया में ईस्ट ईन्डिया कम्पनी की स्थापना की ।

जगत सेठ, ओमीचन्द और द्वारकानाथ ठाकुर ( रबिन्द्रनाथ ठाकुर के दादा) को `बंगाल के रोथ्चाईल्ड’ का नाम दिया गया था (द्वारकानाथ ठाकुर, भारत के `ड्रग लार्ड’ की गाथा अलग से एक लेख में लिखी जाएगी)
१७८० – चीन के साथ नशीली पदार्थों का व्यापार करने का खयाल सर्वप्रथम भारत के पहले गवर्नर जेनरल वारेन हेस्टिंग्स को आया ।

सन् १७९० — ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने अफीम के व्यापार पर एकाधिकार बनाया और खस खस उत्पादकों को अपनी उपज सिर्फ ईस्ट इन्डिया कम्पनी को बेचने की छूट थी । हजारों की संख्या में बंगाली, बिहारी और मालवा के किसानों से जबरन अफीम की खेती करवायी जाती थी ।

उस दौरान योरोप में व्यापार में मन्दी और स्थिरता चल रही थी । कम्पनी के संचालक ने पार्लियामेन्ट से आर्थिक सहायता मांगकर दिवालियापन से बचने की कोशिश की । इसके लिये `टी ऐक्ट’ बनाया गया जिससे चाय और तेल के निर्यात पर शुल्क लगना बन्द हो गया । ईस्ट इन्डिया कम्पनी की करमुक्त चाय दुनिया के हर ब्रिटिश कोलोनी में बेची जाने लगी, जिससे देशी व्यापारियों का कारोबार रुक गया । अमेरिका में इसके कारण जो विरोध शुरु हुआ, उसका समापन मस्साचुसेट्स में `बोस्टन टी पार्टी ‘ से हुआ जब विरोधियों के झुन्ड ने जहाजों में रखी चाय की पेटियों को समुद्र में फेंक दिया | इसके पश्चात् बगावत बढती गयी और अमेरिकन रेवोल्युशन का जन्म हुआ जिसके कारण १७६५ से १७८३ के बीच तेरह अमरीकी उपनिवेश ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतन्त्र (नाम के स्वतंत्र ,जैसे भारत को नकली आज़ादी मिली ,आज भी नागरिको पर कंट्रोल पावर इल्लुमिनाती की है )हो गये ।

ब्रिटेन अब चाँदी देकर चीन से चाय खरीदने में समर्थ नहीं रहा । अफीम जो कि आसानी से और मुफ्त में हासिल था, अब उनके व्यापार का माध्यम बन गया ।

उन्नीसवीं सदी — ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया नशीले पदार्थों की सबसे बडी व्यापारी थीं । वह खुद भी अफीम ( लौडनम, जो कि अफीम को शराब में मिलाकर बनाया जाता है) का सेवन करती थीं । इस बात के रिकार्ड बाल्मोरल पैलेस के शाही औषधखाने में हैं कि कितनी बार अफीम शाही घराने में पहुँचाया गया । कई ब्रिटिश कुलीन जन समुदाय के लोग भी अफीम का सेवन करते थे ।

अब कुछ जरूरी बातें …

ईस्ट इन्डिया कम्पनी के मालिक कौन थे ?

यह सभी को मालूम है कि इस कम्पनी ने भारत से भारी मात्रा में सोना और हीरे – जवाहरात लूटे थे । उसका क्या हुआ ???

सच तो यह है कि भारत से लूटा गया यह खजाना आज तक बैंक आफ इंगलैन्ड के तहखाने में रखा है | यह खजाना अप्रत्यक्ष रूप से भारत में लगभग सभी बैंकिन्ग संस्थानो के निर्माण के लिये इस्तेमाल किया गया, साथ ही विश्व में और भी कई बैंकों की स्थापना का आधार बना ।

१७०८ — मोसेस मोन्टेफियोर और नेथन मेयर रोथ्स्चाइल्ड ने ब्रिटिश राजकोष को ३,२००,००० ब्रिटिश पाऊन्ड कर्ज दिया (जिसे रोथ्स्चाइल्ड के निजी बैन्क ओफ इंगलैन्ड का ऋण चुकाने के लिये इस्तेमाल किया गया) । यह कर्ज रोथ्स्चाइल्ड ने अपनी ईस्ट इन्डिया कम्पनी को (जिसके वह गुप्त रूप से मालिक थे) केप होर्न और केप आफ गुड होप के बीच स्थित इन्डियन और पैसेफिक महासागर के सभी देशों के साथ व्यापार करने के विशिष्ट अधिकार दिलाने के लिये दिया – अर्थात् रिश्वत्खोरी की सहायता ली ।

रोथ्स्चाइल्ड हमेशा संयुक्त पूँजी द्वारा स्थापित संस्थाओं के जरिये काम करते हैं ताकि उनका स्वामित्व गुप्त रहे और वह निजी जिम्मेदारी से बचे रहें ।

नेथन रोथ्स्चाइल्ड ने कहा, ` तब ईस्ट ईंडिया कम्पनी के पास बेचने के लिये आठ लाख पाउन्ड का सोना था । मैंने नीलामी में सारा सोना खरीद लिया । मुझे पता था कि वेलिंग्टन के ड्यूक के पास वह जरूर होगा, चूंकि मैंने उनके ज्यादातर बिल सस्ते दाम पर खरीद लिये थे। सरकार से मुझे बुलावा आया और यह कहा गया कि इस सोने की (उन दिनों चल रही लडाईयों की आर्थिक सहयता के लिये ) उन्हें जरूरत है । जब वह उनके पास पहुँच गया तो उन्हें समझ नहीं आया कि उसे पुर्तगाल कैसे पहुँचाया जाए । मैंने सारी जिम्मेवारी ली और फ्रान्स के जरिये भिजवाया । यह मेरा सबसे बढिया व्यापार था । ‘

इस प्रकार नेथन रोथ्स्चाइल्ड ब्रिटिश सरकार के विश्वसनीय बन गये जो कि उनके लिये मुद्रा क्षेत्र में अपना कारोबार और हुकूमत बढाने में फायदेमन्द साबित हुआ, जैसा कि आप आगे पढेंगे ।

यह ध्यान रहे कि वह रोथ्स्चाइल्ड घराना ही था जिसने आदम वाईशौप के जरिये इलुमिनाटी ग्रूप की शुरुआत की । योजना यह थी कि खुद को संसार में सबसे ज्यादा सुशिक्षित मानने वाले इस वर्ग के लोग अपने शिष्यों के जरिये मानव समाज के सभी महत्वपूर्ण सन्स्थाओं में मुख्य स्थानों पर अधिकार जमाकर `न्यु वर्ल्ड आर्डर’ अर्थात् `नयी सुनियोजित दुनिया’ की स्थापना करेंगे जिसके नियम वह बनाएँगे ।
१८४४ – राबर्ट पील के शासन में बैन्क चार्टर ऐक्ट पास हुआ जिससे ब्रिटिश बैंकों की ताकत कम कर दी गयी और सेन्ट्रल बैंक आफ इंगलैंड (जो कि रोथ्स्चाइल्ड के अधीन था) को नोट प्रचलित करने का एकमात्र अधिकार दिया गया । इससे यह हुआ कि रोथ्स्चाइल्ड अब और भी शक्तिशाली हो गये चूँकि अब कोई भी बैंक अपने नोट नहीं बना सकता था, उन्हें जबरन रोथ्स्चाइल्ड नियन्त्रित बैंक के नोट स्वीकार करने पडते थे ।
और आज यह स्थिति है कि संसार में मात्र तीन देश बच गये हैं जहाँ के बैंक रोथ्स्चाइल्ड के कब्जे में नहीं हैं

दुनिया मे हो रही लडाइयों का लक्ष्य है उन देशों के सेन्ट्रल बैंक पर कब्जा । मेयर ऐम्शेल रोथ्स्चाइल्द ने बिल्कुल सच कहा था जब उन्होंने यह कहा था कि `मुझे बस देश के धन/पैसों के सप्लाई पर नियन्त्रण चाहिये, उस देश के नियम कौन बनाता है इसकी मुझे परवाह नहीं।

जार्ज वार्ड नोर्मन १८२१ से १८७२ तक बैंक आफ इंगलैन्ड के निदेशक थे और १८४४ के बैंक चार्टर ऐक्ट के निर्माण में उनकी बडी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी । उनका सोंचना था कि रेवेन्यू सिस्टम को पूरी तरह से बदल उसे बहुग्राही सम्पत्ति टैक्स (कंप्रिहेन्सिव प्रापर्टी टैक्स) सिस्टम बनाकर मानव के आनन्द को बढाया जा सकता है ।

१८५१ – १८५३ – महारानी विक्टोरिया से शाही अधिकार पत्र मिलने के पश्चात् जेम्स विल्सन ने लन्दन में चार्टर्ड बैंक आफ इन्डिया, औस्ट्रेलिया और चाइना की स्थापना की ।

यह बैंक मुख्य रूप से अफीम और कपास के दामों पर छूट दिलाने का कार्य करते थे । हालाँकि चीन में अफीम की खेती में वृद्धि होती गयी, फिर भी आयात में बढोतरी हुई थी ।

अफीम के व्यापार से चार्टर्ड बैंक को अत्यधिक मुनाफा हुआ ।

उसी वर्ष (१८५३) कुछ पारसी लोगों के द्वारा (जो कि अफीम के व्यापारी थे और ईस्ट ईंडिया कम्पनी के दलाल थे) मुम्बई में मर्केन्टाइल बैंक आफ ईन्डिया, लन्दन और चाईना की स्थापना हुई ।

कुछ समय बाद यही बैंक शांघाई (चीन) में विदेशी मुद्रा जारी करने की प्रमुख संस्था बन गया । आज हम उसे एच-एस-बी-सी बैंक के नाम से जानते हैं ।

१९६९ में चार्टर्ड बैंक आफ ईन्डिया और स्टैन्डर्ड बैंक का विलय हो गया और इन दोनों के मिलने से स्टैन्डर्ड चार्टर्ड बैंक बना । उसी वर्ष भारत की सरकार ने इलाहाबाद बैंक का राष्ट्रीयकरण किया । .

स्टेट बैंक आफ ईन्डिया

एस-बी-आई की शुरुआत कोलकाता ( ब्रिटिश इन्डिया के समय में भारत की राजधानी ) में हुई , जब उसका जन्म २ जून १८०६ को बैंक आफ कल्कत्ता के नाम से हुआ। इसकी शुरुआत का मुख्य कारण था टीपू सुल्तान और मराठाओं से युद्ध कर रहे जेनेरल वेलेस्ली को आर्थिक सहयता पहुँचाना । जनवरी २, १८०९ को इस बैंक को बैंक आफ बंगाल का नया नाम दिया गया । इसी तरह के मिश्रित पूँजी (जोइन्ट स्टौक ) के अन्य बैंक यानि बैंक आफ बम्बई और बैंक आफ मद्रास की शुरुआत १८४० और १८४३ में हुई ।
१९२१ में इन सभी बैंकों और उनकी ७० शाखाओं को मिलाकर इम्पीरियल बैंक आफ ईन्डिया का निर्माण किया गया । आजादी के पश्चात् कई राज्य नियन्त्रित बैंकों को भी इम्पीरियल बैंक आफ ईन्डिया के साथ मिला दिया गया और इसे स्टेट बैंक आफ ईन्डिया का नाम दिया गया । आज भी वह इसी नाम से जाना जाता है ।

१८५९ – १८५७ की बगावत के पश्चात् जेम्स विल्सन (चार्टर्ड बैंक आफ इन्डिया, औस्ट्रेलिया और चाइना के निर्माता ) को टैक्स योजना और नयी कागजी मुद्रा की स्थापना और भारत के वित्तीय प्रणाली (फाईनान्स सिस्टम) का पुनः निर्माण करने के लिये भारत भेजा गया ।

उन्हें भारतीय टैक्स सिस्टम के पितामह का दर्जा दिया गया है ।

रिजर्व बैंक आफ इन्डिया

आर –बी-आई की नींव हिल्टन यंग कमीशन के समक्ष डाक्टर अम्बेड्कर के बताये निदेशक सिद्धान्त और सन्चालन रीति पर रखी गयी ( जैसा के हमें बताया जाता है, मगर असली प्रारम्भ कहीं और ही हुआ, जिसके बारे एक दूसरा लेख हम प्रस्तुत करेंगे ) । जब यह कमीशन `रायल कमीशन आन इन्डियन करेन्सी एन्ड फाईनान्स’ के नाम से भारत आयी तब उसके हरेक सदस्य के पास डाक्टर अम्बेड्कर की किताब ` द प्राब्लेम आफ द रुपी- इट्स ओरिजिन एन्ड इट्स सोल्यूशन ‘ मौजूद थी ।

डाक्टर अम्बेड्कर की किताब ` द प्रोब्लेम आफ द रुपी- इट्स ओरिजिन एन्ड इट्स सोल्यूशन ‘ से उद्धृत –

अध्याय ५ – स्वर्ण मान से स्वर्ण विनिमय तक (from a Gold Standard To a Gold Exchange Standard)

` जब तक मूल्यांकन धातु मुद्रा से किया जाता है तब तक अत्यधिक मुद्रा स्फीति (इन्फ्लेशन) सम्भव नहीं है क्योंकि उत्पादन लागत उसपर रोक लगाती है । जब मूल्यांकन रुपयों (पेपर मनी) से होता है तो प्रतिबन्ध से इसको काबू में रखा जा सकता है । लेकिन जब मूल्यांकन वैसे रुपयों से होता है जिसका मोल उसकी अपनी कीमत से ज्यादा है और वह अपरिवर्तनीय है, तो उसमें असीमित स्फीति की सम्भावना है , जिसका अर्थ है मूल्य मे कमी और दामों मे बढोतरी । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता है कि बैंक चार्टर ऐक्ट ने बैंक रेस्ट्रिक्शन ऐक्ट से बेहतर नहीं था । वाकई वह बेहतर था क्योंकि उस ऐक्ट से ऐसी मुद्रा जारी की गयी जिसमें मुद्रा स्फीति की सम्भावना कम थी । अब रुपया एक अपरिवर्तनीय अपमिश्रित ( डीबेस्ड) सिक्का और असीमित वैध मुद्रा (लीगल टेन्डर) है । इस रूप में वह अब उस वर्ग में है जिसमें असीमित मुद्रा स्फीति की क्षमता है । इससे बचाव के लिये निःसन्देह पहली योजना इससे बेहरत थी जिसमें रुपयों का वितरण सीमित था । इससे भारतीय मुद्रा प्रणाली १८४४ के बैंक चार्टर ऐक्ट के अधीन ब्रिटिश प्रणाली के अनुरूप था ।

यदि उपर्युक्त तर्कसंगत विचारों में बल है, तो फिर चेम्बर्लेन कमीशन आफ एक्स्चेन्ज स्टैंडर्ड के विचारों से सहमत होने में आपत्ति होती है । इससे यह प्रश्न उठता है कि कमीशन ने जो भी कहा उसके बावजूद उस प्रणाली में कहीं कोई कमजोरी तो नहीं जो कभी उसके पतन का कारण बन सकती है । ऐसी अवस्था में उस मान्य की नींव को नये द्रिष्टिकोण से जाँचना जरूरी हो जाता है ।

क्या डाक्टर अम्बेड्कर को भिन्न आरक्षन प्रणाली (फ्रैक्शनल रिजर्व बैंकिंग) और खन्ड मुद्रा (फिआत करेंसी) के खतरों का (जिसका असर आज समस्त सन्सार पर हो रहा है ) सही अनुमान हो चुका था ?

इस विषय पर रिसर्च और चर्चा की जरूरत है जिससे हकीकत सामने आ सके !

नशीले पदार्थों की तस्करी और भारत, पुर्तगाल, ब्राजील, चीन, बर्मा और अन्य देशों से लूटे गये सोने से आज के मुद्रा प्रणाली (मोनेटरी सिस्टम ) की नींव रखी गयी ।

लेकिन क्या यह अब समाप्त हो चुका ?

यह जानने के लिये कि ओबामा ने अपने द्वितीय कार्यकाल में भारत के लिये क्या सोंच रखा है कृपया पढें – Unlocking the full potential of the US-India Relationship 2013

सार्वभौमिकता (Globalisation) सर्वव्यापी धर्मनिर्पेक्ष जीवन शैली नहीं है ….
यह उपनिवेशवाद (Colonialism) का नया रूप है जिसके जरिये समस्त संसार को एक बडा उपनिवेश (कोलोनी) बनाने की चेष्टा की जा रही है ।

अपने दिनों में कम्पनी नें सही अर्थों में सार्वभौमिक अर्थव्यवस्था में मौजूद कमजोरियों का धूर्तता से अपने फायदे के लिये शोषण किया । चीन की चाय भारत के अफीम से खरीदी गयी । भारत मे उपजे कपास से बने भारतीय और बाद में ब्रिटिश कपडों से पश्चिम अफ्रीका के गुलाम खरीदे गये , जिन्हें अमेरिका में सोने और चाँदी के लिये बेचा गया , जिसे इंगलैंड में निवेशित किया गया जहाँ गुलामों द्वारा बनाई चीनी के कारण चायना से आयात चाय की लोकप्रियता मर्केट में बनी रही । विजेता विश्व के सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय केन्द्र अर्थात् फाईनेन्शियल सेन्टर `सिटी आफ लन्दन’ में विराजमान थे और भारी संख्या में असफल व्यक्तिगण संसार के हर कोने में मौजूद थे ।

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रिजर्व बैंक आफ इन्डिया

आर –बी-आई की नींव हिल्टन यंग कमीशन के समक्ष डाक्टर अम्बेड्कर के बताये निदेशक सिद्धान्त और सन्चालन रीति पर रखी गयी ( जैसा के हमें बताया जाता है, मगर असली प्रारम्भ कहीं और ही हुआ, जिसके बारे एक दूसरा लेख हम प्रस्तुत करेंगे ) । जब
यह कमीशन `रायल कमीशन आन इन्डियन करेन्सी एन्ड फाईनान्स’ के नाम से भारत आयी तब उसके हरेक सदस्य के पास डाक्टर अम्बेड्कर की किताब ` द प्राब्लेम आफ द रुपी- इट्स ओरिजिन एन्ड इट्स सोल्यूशन ‘ मौजूद थी ।

डाक्टर अम्बेड्कर की किताब ` द प्रोब्लेम आफ द रुपी- इट्स ओरिजिन एन्ड इट्स सोल्यूशन ‘ से उद्धृत –

अध्याय ५ – स्वर्ण मान से स्वर्ण विनिमय तक (from a Gold Standard To a Gold Exchange Standard)

` जब तक मूल्यांकन धातु मुद्रा से किया जाता है तब तक अत्यधिक मुद्रा स्फीति (इन्फ्लेशन) सम्भव नहीं है क्योंकि उत्पादन लागत उसपर रोक लगाती है । जब मूल्यांकन रुपयों (पेपर मनी) से होता है तो प्रतिबन्ध से इसको काबू में रखा जा सकता है । लेकिन जब मूल्यांकन वैसे रुपयों से होता है जिसका मोल उसकी अपनी कीमत से ज्यादा है और वह अपरिवर्तनीय है, तो उसमें असीमित स्फीति की सम्भावना है , जिसका अर्थ है मूल्य मे कमी और दामों मे बढोतरी । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता है कि बैंक चार्टर ऐक्ट ने बैंक रेस्ट्रिक्शन ऐक्ट से बेहतर नहीं था । वाकई वह बेहतर था क्योंकि उस ऐक्ट से ऐसी मुद्रा जारी की गयी जिसमें मुद्रा स्फीति की सम्भावना कम थी । अब रुपया एक अपरिवर्तनीय अपमिश्रित ( डीबेस्ड) सिक्का और असीमित वैध मुद्रा (लीगल टेन्डर) है । इस रूप में वह अब उस वर्ग में है जिसमें असीमित मुद्रा स्फीति की क्षमता है । इससे बचाव के लिये निःसन्देह पहली योजना इससे बेहरत थी जिसमें रुपयों का वितरण सीमित था । इससे भारतीय मुद्रा प्रणाली १८४४ के बैंक चार्टर ऐक्ट के अधीन ब्रिटिश प्रणाली के अनुरूप था ।

यदि उपर्युक्त तर्कसंगत विचारों में बल है, तो फिर चेम्बर्लेन कमीशन आफ एक्स्चेन्ज स्टैंडर्ड के विचारों से सहमत होने में आपत्ति होती है । इससे यह प्रश्न उठता है कि कमीशन ने जो भी कहा उसके बावजूद उस प्रणाली में कहीं कोई कमजोरी तो नहीं जो कभी उसके पतन का कारण बन सकती है । ऐसी अवस्था में उस मान्य की नींव को नये द्रिष्टिकोण से जाँचना जरूरी हो जाता है ।

क्या डाक्टर अम्बेड्कर को भिन्न आरक्षन प्रणाली (फ्रैक्शनल रिजर्व बैंकिंग) और खन्ड मुद्रा (फिआत करेंसी) के खतरों का (जिसका असर आज समस्त सन्सार पर हो रहा है ) सही अनुमान हो चुका था ?

इस विषय पर रिसर्च और चर्चा की जरूरत है जिससे हकीकत सामने आ सके !

मुहम्मद मरे नहीं थे, भारत के महाकवि कालिदास के हाथों मारे गए थे :?


मुहम्मद मरे नहीं थे, भारत के महाकवि कालिदास के हाथों मारे गए थे :

इतिहास का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि इस्लाम के पैगम्बर (रसूल) मुहम्मद साहब सन ६३२ में अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरे थे, अपितु भारत के महान साहित्यकार कालिदास के हाथों मारे गए थे. मदीना में दफनाए गए (?) मुहम्मद की कब्र की जांच की जाए तो रहस्य से पर्दा उठ सकता है कि कब्र में मुहम्मद का कंकाल है या लोटा ।

भविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व) में सेमेटिक मजहबों के सभी पैगम्बरों का इतिहास उनके नाम के साथ वर्णित है. नामों का संस्कृतकरण हुआ है I इस पुराण में मुहम्मद और ईसामसीह का भी वर्णन आया है. मुहम्मद का नाम "महामद" आया है. मक्केश्वर शिवलिंग का भी उल्लेख आया है. वहीं वर्णन आया है कि सिंधु नहीं के तट पर मुहम्मद और कालिदास की भिड़ंत हुई थी और कालिदास ने मुहम्मद को जलाकर भस्म कर दिया. ईसा को सलीब पर टांग दिया गया और मुहम्मद भी जलाकर मार दिए गए- सेमेटिक मजहब के ये दो रसूल किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. शर्म के मारे मुसलमान किसी को नहीं बताते कि मुहम्मद जलाकर मार दिए गए, बल्कि वह यह बताते हैं कि उनकी मौत कुदरती हुई थीI

भविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व, 3.3.1-27) में उल्लेख है कि ‘शालिवाहन के वंश में १० राजाओं ने जन्म लेकर क्रमश: ५०० वर्ष तक राज्य किया. अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए । उन्होंने देश की मर्यादा क्षीण होती देख दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया । उनकी सेना दस हज़ार थी और उनके साथ कालिदास एवं अन्य विद्वान्-ब्राह्मण भी थे । उन्होंने सिंधु नदी को पार करके गान्धार, म्लेच्छ और काश्मीर के शठ राजाओं को परास्त किया और उनका कोश छीनकर उन्हें दण्डित किया । उसी प्रसंग में मरुभूमि मक्का पहुँचने पर आचार्य एवं शिष्यमण्डल के साथ म्लेच्छ महामद (मुहम्मद) नाम व्यक्ति उपस्थित हुआ । राजा भोज ने मरुस्थल (मक्का) में विद्यमान महादेव जी का दर्शन किया । महादेवजी को पंचगव्यमिश्रित गंगाजल से स्नान कराकर चन्दनादि से भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया और उनकी स्तुति की: “हे मरुस्थल में निवास करनेवाले तथा म्लेच्छों से गुप्त शुद्ध सच्चिदानन्दरूपवाले गिरिजापते ! आप त्रिपुरासुर के विनाशक तथा नानाविध मायाशक्ति के प्रवर्तक हैं । मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मुझे अपना दास समझें । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।” इस स्तुति को सुनकर भगवान् शिव ने राजा से कहा- “हे भोजराज ! तुम्हें महाकालेश्वर तीर्थ (उज्जयिनी) में जाना चाहिए । यह ‘वाह्लीक’ नाम की भूमि है, पर अब म्लेच्छों से दूषित हो गयी है । इस दारुण प्रदेश में आर्य-धर्म है ही नहीं । महामायावी त्रिपुरासुर यहाँ दैत्यराज बलि द्वारा प्रेषित किया गया है ।

वह मानवेतर, दैत्यस्वरूप मेरे द्वारा वरदान पाकर मदमत्त हो उठा है और पैशाचिक कृत्य में संलग्न होकर महामद (मुहम्मद) के नाम से प्रसिद्ध हुआ है । पिशाचों और धूर्तों से भरे इस देश में हे राजन् ! तुम्हें नहीं आना चाहिए । हे राजा ! मेरी कृपा से तुम विशुद्ध हो । भगवान् शिव के इन वचनों को सुनकर राजा भोज सेना सहित पुनः अपने देश में वापस आ गये । उनके साथ महामद भी सिंधु तीर पर पहुँच गया । अतिशय मायावी महामद ने प्रेमपूर्वक राजा से कहा- ”आपके देवता ने मेरा दासत्व स्वीकार कर लिया है ।” राजा यह सुनकर बहुत विस्मित हुए। और उनका झुकाव उस भयंकर म्लेच्छ के प्रति हुआ । उसे सुनकर कालिदास ने रोषपूर्वक महामद से कहा- “अरे धूर्त ! तुमने राजा को वश में करने के लिए माया की सृष्टि की है । तुम्हारे जैसे दुराचारी अधम पुरुष को मैं मार डालूँगा ।“ यह कहकर कालिदास नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) के जप में संलग्न हो गये । उन्होंने (नवार्ण मन्त्र का) दस सहस्र जप करके उसका दशांश (एक सहस्र) हवन किया । उससे वह मायावी भस्म होकर म्लेच्छ-देवता बन गया । इससे भयभीत होकर उसके शिष्य वाह्लीक देश वापस आ गये और अपने गुरु का भस्म लेकर मदहीनपुर (मदीना) चले गए और वहां उसे स्थापित कर दिया जिससे वह स्थान तीर्थ के समान बन गया। एक समय रात में अतिशय देवरूप महामद ने पिशाच का देह धारणकर राजा भोज से कहा- ”हे राजन् ! आपका आर्यधर्म सभी धर्मों में उत्तम है, लेकिन मैं उसे दारुण पैशाचधर्म में बदल दूँगा । उस धर्म में लिंगच्छेदी (सुन्नत/खतना करानेवाले), शिखाहीन, दढि़यल, दूषित आचरण करनेवाले, उच्च स्वर में बोलनेवाले (अज़ान देनेवाले), सर्वभक्षी मेरे अनुयायी होंगे । कौलतंत्र के बिना ही पशुओं का भक्षण करेंगे. उनका सारा संस्कार मूसल एवं कुश से होगा । इसलिये ये जाति से धर्म को दूषित करनेवाले ‘मुसलमान’ होंगे । इस प्रकार का पैशाच धर्म मैं विस्तृत करूंगा I”

‘एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्येण समन्वितः ।
महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः ।। 5 ।।
नृपश्चैव महादेवं मरुस्थलनिवासिनम् ।
गंगाजलैश्च संस्नाप्य पंचगव्यसमन्वितैः ।
चन्दनादिभिरभ्यच्र्य तुष्टाव मनसा हरम् ।। 6 ।।

भोजराज उवाच
नमस्ते गिरिजानाथ मरुस्थलनिवासिने ।
त्रिपुरासुरनाशाय बहुमायाप्रवर्तिने ।। 7 ।।
म्लेच्छैर्मुप्ताय शुद्धाय सच्चिदानन्दरूपिणे ।
त्वं मां हि किंकरं विद्धि शरणार्थमुपागतम् ।। 8 ।।

सूत उवाच
इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम् ।
गंतव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले ।। 9 ।।
म्लेच्छैस्सुदूषिता भूमिर्वाहीका नाम विश्रुता ।
आर्यधर्मो हि नैवात्र वाहीके देशदारुणे ।। 10 ।।
वामूवात्र महामायो योऽसौ दग्धो मया पुरा ।
त्रिपुरो बलिदैत्येन प्रेषितः पुनरागतः ।। 11 ।।
अयोनिः स वरो मत्तः प्राप्तवान्दैत्यवर्द्धनः ।
महामद इति ख्यातः पैशाचकृतितत्परः ।। 12 ।।
नागन्तव्यं त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके ।
मत्प्रसादेन भूपाल तव शुद्धि प्रजायते ।। 13 ।।
इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान्पु नरागमतः ।
महामदश्च तैः साद्धै सिंधुतीरमुपाययौ ।। 14 ।।
उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामदविशारदः ।
तव देवो महाराजा मम दासत्वमागतः ।। 15 ।।
इति श्रुत्वा तथा परं विस्मयमागतः ।। 16 ।।
म्लेच्छधनें मतिश्चासीत्तस्य भूपस्य दारुणे ।। 17 ।।
तच्छ्रुत्वा कालिदासस्तु रुषा प्राह महामदम् ।
माया ते निर्मिता धूर्त नृपमोहनहेतवे ।। 18 ।।
हनिष्यामिदुराचारं वाहीकं पुरुषाधनम् ।
इत्युक्त् वा स जिद्वः श्रीमान्नवार्णजपतत्परः ।। 19 ।।
जप्त्वा दशसहस्रंच तदृशांश जुहाव सः ।
भस्म भूत्वा स मायावी म्लेच्छदेवत्वमागतः ।। 20 ।।
मयभीतास्तु तच्छिष्या देशं वाहीकमाययुः ।
गृहीत्वा स्वगुरोर्भस्म मदहीनत्वामागतम् ।। 21 ।।
स्थापितं तैश्च भूमध्येतत्रोषुर्मदतत्पराः ।
मदहीनं पुरं जातं तेषां तीर्थं समं स्मृतम् ।। 22 ।।
रात्रौ स देवरूपश्च बहुमायाविशारदः ।
पैशाचं देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत् ।। 23 ।।
आर्यधर्मो हि ते राजन्सर्वधर्मोत्तमः स्मृतः ।
ईशाख्या करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम् ।। 24 ।।
लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रु धारी स दूषकः ।
उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम ।। 25 ।।
विना कौलं च पशवस्तेषां भक्षया मता मम ।
मुसलेनेव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति ।। 26 ।।
तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः ।
इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः ।। 27 ।।’

(भविष्यमहापुराणम् (मूलपाठ एवं हिंदी-अनुवाद सहित), अनुवादक: बाबूराम उपाध्याय, प्रकाशक: हिंदी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग; ‘कल्याण’ (संक्षिप्त भविष्यपुराणांक), प्रकाशक: गीताप्रेस, गोरखपुर, जनवरी, 1992 ई.)

कुछ विद्वान कह सकते हैं कि महाकवि कालिदास तो प्रथम शताब्दी के शकारि विक्रमादित्य के समय हुए थे और उनके नवरत्नों में से एक थे, तो हमें ऐसा लगता है कि कालिदास नाम के एक नहीं बल्कि अनेक व्यक्तित्व हुए हैं, बल्कि यूं कहा जाए की कालिदास एक ज्ञानपीठ का नाम है, जैसे वेदव्यास, शंकराचार्य इत्यादि. विक्रम के बाद भोज के समय भी कोई कालिदास अवश्य हुए थे. इतिहास तो कालिदास को छठी-सातवी शती (मुहम्मद के समकालीन) में ही रखता है.

कुछ विद्वान "सरस्वतीकंठाभरण", समरांगणसूत्रधार", "युक्तिकल्पतरु"-जैसे ग्रंथों के रचयिता राजा भोज को भी ९वी से ११वी शताब्दी में रखते हैं जो गलत है. भविष्यमहापुराण में परमार राजाओं की वंशावली दी हुई है. इस वंशावली से भोज विक्रम की छठी पीढ़ी में आते हैं और इस प्रकार छठी-सातवी शताब्दी (मुहम्मद के समकालीन) में ही सिद्ध होते हैं.
कालिदासत्रयी-

एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केनचित्।

शृङ्गारे ललितोद्गारे कालिदास त्रयी किमु॥

(राजशेखर का श्लोक-जल्हण की सूक्ति मुक्तावली तथा हरि कवि की सुभाषितावली में)
इनमें प्रथम नाटककार कालिदास थे जो अग्निमित्र या उसके कुछ बाद शूद्रक के समय हुये। द्वितीय महाकवि कालिदस थे, जो उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य के राजकवि थे। इन्होंने रघुवंश, मेघदूत तथा कुमारसम्भव-ये ३ महाकाव्य लिखकर ज्योतिर्विदाभरण नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा। इसमें विक्रमादित्य तथा उनके समकालीन सभी विद्वानों का वर्णन है। अन्तिम कालिदास विक्रमादित्य के ११ पीढ़ी बाद के भोजराज के समय थे तथा आशुकवि और तान्त्रिक थे-इनकी चिद्गगन चन्द्रिका है तथा कालिदास और भोज के नाम से विख्यात काव्य इनके हैं।