बुधवार, मई 09, 2012

सुप्रीम कोर्ट ने हज-सब्सिडी को गैर-इस्लामिक बताते हुए समाप्त करने के निर्देश दिऐ


सुप्रीम कोर्ट ने हज-सब्सिडी को गैर-इस्लामिक बताते हुए समाप्त करने के निर्देश दिऐ
कुरआन के अनुसार सच्चे मुसलमान के लिए हज यात्रा केवल अपनी कमाई से प्राप्त धन से ही हलाल मानी जाती है.
पाकिस्तान ने भी हज सब्सिडी गैर इस्लामिक मानकर उसे उसे बंद कर दिया
किसी भी मुस्लिम देश में हज यात्रियों के लिए सरकारी सब्सिडी नहीं है
मुल्लो ने मुफ्त की सब्सिडी पर अब तक कोई फतवा क्यों नहीं दिया
यह शरियत की हिदायतों के खिलाफ है फिर भी कर रहे हो
तो फिर वन्देमातरम गाने में क्या हर्ज है
अयोध्या में मंदिर निर्माण में क्या परेशानी है

आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हज-सब्सिडी को गैर-इस्लामिक बताते हुए समाप्त करने का केंद्र -सरकार को निर्देश दिया है. परन्तु तथाकथित सेकुलर जमात के कुछ पहरेदार और कुछ राजनैतिक-पार्टियां हज-सब्सिडी खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से गहरे-सन्निपात में हैं. कैसी विडम्बना है कि वंदे मातरम गाने में आपत्ति है क्योंकि वो इस्लाम विरुद्ध है पर इस्लाम विरुद्ध तरीके से हज पर जाने में आपत्ति नहीं है? क्या शर्मनाक नहीं है ये दोहरापन ?मैं पूछना चाहता हूँ कि बात- बात पर फतवे जारी करने वाले इतने सालों से मुफ्त की सब्सिडी पर क्यों कोई फतवा नहीं निकाल पाए? मेरा कहना है कि अमरनाथ और मानसरोवर यात्रा पर तो सरकार कोई भी सब्सिडी नहीं देती फिर भी प्रति वर्ष लाखों गरीब-भक्त इन दोनों स्थानों पर दर्शन करने जाते हैं| ऐसे में जो राजनैतिक-पार्टियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा हज-सब्सिडी खत्म किये जाने का विरोध कर रही हैं दर-असल उन्हें हज से कोई लेना देना नहीं है बल्कि वो सिर्फ मुस्लिम-वोट हथियाने की राजनीति के चलते इस मुद्दे को हवा में उछाल रहे हैं.
कुरआन-ए-पाक में स्पष्ट उल्लेख है कि सच्चे मुसलमान के लिए हज यात्रा केवल अपनी कमाई में से या फिर निकट सम्बन्धी से प्राप्त धन राशि से ही हलाल मानी जाती है. इसीलिए किसी भी मुस्लिम देश में हज यात्रियों के लिए सरकारी सब्सिडी का प्रावधान नहीं है ,क्योंकि यह शरियत की हिदायतों के खिलाफ है.
जब सब्सिडी लेकर हज यात्रा की जा रही है इसका मतलब मुसलमान शरियत की हिदायतों का पालन नहीं कर रहा है और तो देशहित में बहुत बातों में सहयोग क्यों नहीं करते तो फिर वन्देमातरम गाने में क्या हर्ज है
अयोध्या में मंदिर निर्माण में क्या परेशानी है
भारत सरकार प्रतिवर्ष 600 करोड़ रुपये से ज्यादा हज सब्सिडी पर खर्च करती है जिसका फायदा लगभग 1.25 लाख हाजी हर वर्ष उठाते हैं। पिछले पांच वर्षो में भारत ने हज यात्रा पर करीब 2,891.71 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान की है। गत-वर्ष भारत सरकार ने हज यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को एयर इंडिया की हवाई यात्रा में 38,800 रुपये प्रति श्रद्धालु की सब्सिडी दी थी। वैसे भी इस्लाम तो हज पे अपने धन से जाने की बात करता है, इसीलिए पाकिस्तान में न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया था कि हज सब्सिडी गैर इस्लामिक है और पाकिस्तान ने उसे बंद कर दिया | दुनिया का कोई भी देश वर्तमान समय में हज-सब्सिडी नहीं देता है. इसलिए भारत में हज-सब्सिडी समाप्त करने का माननीय सुप्रीम कोर्ट का निर्णय निश्चित तौर पर स्वागत-योग्य है परन्तु यदि हज-सब्सिडी गैर-इस्लामिक है तो 10 वर्ष बाद सरकार को हज-सब्सिडी खत्म करने के निर्देश का कोई औचित्य समझ में नहीं आता . तत्काल हज-सब्सिडी समाप्त की जानी चाहिए.

जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की बेंच ने मंगलवार को यह आदेश जारी किया। बेंच ने हज यात्रा पर जाने वाले प्रधानमंत्री के शिष्टमंडल में प्रतिनिधियों की संख्या 30 से घटा कर दो करने के भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि वह हज कमेटी के कामकाज और हज यात्रियों की चयन प्रक्रिया की भी जांच करेगा। सुनवाई के दौरान केंद्र ने हज यात्रियों को सब्सिडी देने की नीति का बचाव किया।
उसने हलफनामा पेश कर कहा कि 'लोगों को जीवन में एक बार सब्सिडी देने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। इसके तहत उन आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी जिन्होंने कभी हज नहीं किया।'

क्या था मामला : सुप्रीम कोर्ट बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई कर रहा था। दरअसल हर साल 11 हजार हज यात्री वीआईपी कोटा के तहत जाते हैं। हाईकोर्ट ने इनमें से 800 यात्रियों को प्राइवेट ऑपरेटर के जरिए भेजने के निर्देश दिए थे। इसके लिए विदेश मंत्रालय को निर्देशित किया गया था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

कब दी गई कितनी सब्सिडी

वर्ष आवेदन आए हज पर गए सब्सिडी

2009 3,57,388 1,20,131 690 करोड़ रु.

2010 3,00,680 1,26,191 600 करोड़ रु. 2011 3,02,616 1,25,051 605 करोड़ रु.

खेल हवाई टिकट का : भारत से हर साल हज कमेटी की ओर से सवा लाख लोग हज करने जाते हैं। इन्हें हज सब्सिडी मिलती है। करीब 50 हजार लोग निजी ऑपरेटर के जरिये हज को जाते हैं। इन्हें सब्सिडी नहीं मिलती। लेकिन दोनों के खर्च में कोई खास फर्क नहीं होता। दोनों ही में हज यात्रा करने पर प्रति व्यक्ति 95 हजार से लेकर 1.5 लाख रुपये तक खर्च आता है। क्योंकि हज कमेटी सिर्फ एयर इंडिया की चार्टर्ड फ्लाइट बुक करती है। फ्लाइट काफी महंगी पड़ती है, जबकि निजी एयरलाइन से जाना सस्ता पड़ता है

सोमवार, मई 07, 2012

जब उमा भारती ने पाल दिनाकरन का मसला उठाया तब नीच और कमीना चैनेल स्टार न्यूज़ के दर्द क्यों होने लगा ..

अब पूरे देश को पता चला कि जब उमा भारती ने पाल दिनाकरन का मसला उठाया तब नीच और कमीना चैनेल स्टार न्यूज़ के दर्द क्यों होने लगा ..

मित्रों, जब सबसे पहले उमा भारती जी ने इस देश मे पाल दिनाकरन के मामले पर बहस छेड़ी तब भारत मे सिर्फ दो लोगो के े दर्द उठने लगा जैसे कोई गुंटूर की तीखी लाल मिर्च पिस कर सरसों के तेल मे मिलाकर इनके पिछवाड़े घुसेड़ दिया गया हो ..

१- केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय

२- स्टार न्यूज़

अब पूरी कहानी जानिए ..

असल मे सुबोधकांत सहाय मंत्री बनना चाहते थे लेकिन उनको पता था की सोनिया के दरबार मे सिर्फ हिंदू विरोधी लोग ही सफल होते है .. जैसे अम्बिका सोनी और दिग्विजय सिंह ये दोनों ने ईसाइयत कुबूल कर लिया है ..

फिर उन्होंने पाल दिनाकरन से सम्पर्क किया .. पाल दिनाकरन पोप का बहुत खास आदमी है और पोप इसके कामो से बहुत खुश है क्योकि एक तो इसने हर साल पूरे एशिया मे करीब तीन करोड लोगो को ईसाई बनाता है और दूसरा ये अपनी कृपा की कमाई मे से पोप को चंदा भेजता है ..

फिर इसके सिपारिश पर पोप ने सोनिया गाँधी से सुबोधकान्त सहाय को मंत्री बनाने का आदेश दिया और पोप के ईशारे पर सोनिया ने तुरंत ही सुबोधकांत सहाय को मंत्री बना दिया ..

फिर इसके बाद दिनाकरन और सुबोधकांत मिलकर एक वीडियो बनाते है जिसमे दिनाकरन सुबोधकांत को मंत्री बनाये जाने के लिए प्रार्थना कर रहा है .. जबकि ये विडियो सुबोधकांत के मंत्री बन जाने के बाद शूट हुआ ..

जब उमाभारती जी ने पाल दिनाकरन का मामला उठाया तो सबसे गंदा और चौकाने वाला रिएक्शन सुबोधकांत सहाय का था जैसे हम किसी कुत्ते के दूम पर जूता पहनकर खड़े हो जाये या किसी कुत्ते की पूछ उठाकर वहाँ पेट्रोल लगा दिया जाए ..

आजतक ने आज उस वीडियो का खुलासा किया और साफ साफ कहा की क्या इसीलिए सुबोधकांत सहाय उमा भारती से चिढ़ गए थे ?

मित्रों स्टार न्यूज़ का भारत का मुख्य कर्ता धर्ता शाजी जमां नामक एक कट्टर सुन्नी मुस्लिम है . जो इस चैनेल का मुख्य सम्पादक के साथ साथ कोंटेंट हेड भी है .. स्टार ग्रुप एक कट्टर ईसाई रूपर्ट मर्डोक का है और स्टार ग्रुप ईसाईयों की बहुत सी संस्थायो को दान देता है . वाईएमसीए की अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार स्टार ग्रुप ने पिछले साल कुल तीन करोड डॉलर ईसाई संस्था वाईएमसीए को दान दिया |

फिर उमा भारती के बयान के बाद पोप से लेकर भारत मे सोनिया गाँधी सब हरकत मे आ गए . और आनन् फानन मे दो तीन चनेलो को उमा भारती की के बयान को गलत तरीके से दिखाने की सुपारी दे दी गयी ..

लेकिनछात्र जीवन मे आरएसएस के स्वंयसेवक रहे इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने पाल बाबा दिनाकरन की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी और फिर टीआरपी के खेल मे दूसरे चैनेल आजतक भी कूद पड़ा फिर जाकर लोगो को पर्दे के पीछे इस नीच पोर्नग्रेस का खेल का पता चला

मित्रों उस वीडियो को जब कई चनेलो ने दिखया तब सुबोधकांत सहाय के ईशारे पर पाल दिनाकरन ने अपनी साईट से उस वीडियो को हटा लिया ..लेकिन कुछ मीडिया वालो के पास वो वीडियो है
Courtesy- Jitendra Pratap Singh

सुना है इन्सान के दुःख दर्द का इलाज मिला है क्या बुरा है अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाए


यह द्रश्य देखकर शायद आपको अचम्भा हो लेकिन यह शहर के उस स्थान का है जहाँ से बरेली शहर के अधिकारीयों एवं नेताओ का गुजरना आम है।

जनता के हक की लड़ाई लड़ने के नाम पर वोट लेकर संसद मे पहुचने वाले नेता बेईमान साबित हो रहे है।
पहले राजनीती समाजसेवा के लिए की जाती थी अब तो नेता बाकायदा अपना व्यवसाय बताने लगे है... एक नहीं सेकड़ों एन जी ओ ऐसी है जो गरीबों के उदहार के नाम पर अनुदान लेकर अपनी जेबे गरम कर रही हैं।

गरीबों को कितना लाभ मिल रहा द्रश्य स्पष्ट कर रहा है। यह बात अब दूर तलक जरूर जाएगी क्योकि सब अपना अपना पेट भरने में लगे हुए हैं आम जनता से किसी को नहीं है सरोकार।


इन्सान को इन्सान के साथ खाना देखना कोई आम बात नहीं है लेकिन पेट की आग बुझाने के लिए बचा खाना सड़क पर डाला गया हो गरीब उठा कर खाने लगे ... इसी बीच गो माता आ जाएँ और वो भी खाने का लुफ्त उठाने लगे .... इन्सान तो इन्सान को ही भूलता जा रहा है लेकिन बेजुवान जानवर कितने समझदार हैं....जिसे इस इन्सान की पेट की आग देखकर तरस आ गया और दोनों साथ साथ खाने लगे।


हमारे देश मे ये बिडम्बना है एक आदमी महीने भर में बमुश्किल ३००० रूपये ही कमा पाता है वही दूसरा आदमी तीन लाख रुपये वेतन ले रहा है और साथ में बिभिन्न सुबिधाओं का आनंद भी उठा रहा है फिर भी करोड़ों के घोटाले कर रहा है लेकिन अभी भी भूखा है..... इसीलिए गरीबों की परवाह किये बगैर सिर्फ अपने लिए सोचता है_________


"हर सेकेंड भूख से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है.
यानी हर घंटे 3600 लोगों की मौत भूख से होती है.
यानी 86400 लोगों की मौत भूख से होती है.
यानी हर साल 3,15,3600 लोगों की मौत भूख से होती है.
यानी 58 प्रतिशत मौते भूख की वजह से होती है_______"




सुना है इन्सान के दुःख दर्द का इलाज मिला है
क्या बुरा है अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाए

किसी ने सच ही कहा है-

वो भूख से मरा था,फ़ुटपाथ पे पड़ा था
चादर उठा के देखा तो पेट पे लिखा था
सारे जहां से अच्छा,सारे जहां से अच्छा
हिन्दुस्तां हमारा,हिन्दुस्त ां हमारा

भूख लगे तो चाँद भी रोटी नज़र आता है
आगे है ज़माना फिर भी भूख पीछे पीछे
सारी दुनिया की बातें दो रोटियों के नीचे

किसी ने सच ही कहा ...

माँ पत्थर उबालती रही कड़ाही में रात भर
बच्चे फ़रेब खा कर चटाई पर सो गए
चमड़े की झोपड़िया में आग लगी भैया
बरखा न बुझाए बुझाए रुपैया

किसी ने सच ही कहा ...

वो आदमी नहीं मुक़म्मल बयां है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशां है

इक दिन मिला था मुझको चिथड़ों में वो
मैने जो पूछा नाम कहा हिन्दुस्तान है हिन्दुस्तान है

कुछ लोग दुनिया में नसीब लेके आते हैं
बाकी बस आते हैं और यूं ही चले जाते हैं
जाने कब आते हैं और जाने कब जाते हैं

किसी ने सच ही कहा ...

ये बस्ती उन लोगों की बस्ती है
जहां हर गरीब की हस्ती एक एक साँस लेने को तरसती है
इन ऊँची इमारतों में घिर गया आशियाना मेरा
ये अमीर मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए

भूख लगे तो चाँद ..........

किसी ने सच ही कहा______

सेनाध्यक्ष ने बिलकुल सही कहा था की सेना के पास गोला बारूद से लेकर लड़ाई की सभी चीजे खत्म हो चुकी है ...

सेनाध्यक्ष ने बिलकुल सही कहा था की सेना के पास गोला बारूद से लेकर लड़ाई की सभी चीजे खत्म हो चुकी है ...

मित्रों, जब सेनाप्रमुख ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था की सेना के पास हथियारों, गोला बारूद आदि की कमी है और सेना के पास लड़ाई के लिए दो दिन का भी स्टॉक नही है , तब कांग्रेस के कई सीडी छाप नेताओ ने सेनाप्रमुख को गलत ठहराने ले लग गए थे ..

लेकिन आज संसद की रक्षा मामलो की स्टेंडिंग कमेटी जिसके मुखिया कांग्रेसी है और जिसमे पाँच सदस्य कांग्रेस के है उसने भी अपनी रिपोर्ट मे कहा है की सेना के पास सिर्फ दो दिन की लड़ाई का सामान है और वायुसेना के पास हेलिकोप्टर और विमानों की भयंकर कमी है ..

मित्रों, ये नीच कांग्रेस के लिए देश का मतलब सिर्फ नकली गाँधी खानदान है और कांग्रेस अब इसी नकली गांधियो की ही रक्षा को देश की रक्षा समझती है .. बाकी देश गया भाड मे...

मीडिया को भी भोंदू युवराज को दिखाने का समय मिलता है बाड़ी देश जाए भाड़ में , राहुल गधे ने किया यू पी की हार का पोस्टमार्टम वगेरह वगेरह, अरे मूर्खों कभी ये भी दिखा दिया करो की राहुल भोंदू ने काले धन पर बात की , राहुल गधे ने सेना में हो रहे भ्रष्टाचार और दलाली पर दुःख व्यक्त किया देश को खतरे में बताया , या कभी चीन पाकिस्तान पर कोई बयान दिया हो ???

बस नकली नौटंकी करता रहता है और भारत की दलाल , भाण्ड मीडिया भी उसे ही दिखाती है ...

जागो भारतीयों जागो ...वो तो जनरल वी के सिंह जी हैं जिनकी वजह से इतने सारे खुलासे हो गए इस भ्रष्ट सरकार के बारे नहीं तो कोई रसोइपति जैसे सेनाध्यक्ष होते तो शायद हमें इस सच्चाई के बारे में भी नहीं पता चलता ....

अब सोचिये जरा इस भ्रष्ट तंत्र को स्वस्थ बनाने के बारे में की कैसे और क्या भूमिका अदा करके हम अपने भारत को इस भ्रष्ट कांग्रेस/काले अंग्रेजों के राज से बचा सकते हैं ...

हिन्दू अश्त्र-शस्त्र क्यूँ ना उठाये ?


इस लेख को पढने के बाद कोई मुझे ये बताये की हिन्दू अश्त्र-शस्त्र क्यूँ ना उठाये ? अगर तथाकथित बुद्धिजीवियों, सिकुलर और हिन्दू विरोधीयो की भाषा में कहू तो हिन्दू आतंकवादी/भगवा आतंकवादी क्यूँ ना बने ?

* रामायण एक काल्पनिक कहानी है - पंडित जवाहरलाल नेहरू और गवर्नर जनरल राजाजी
* रामायण और महाभारत मात्र कहानी है - तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी
* राम मात्र एक काल्पनिक पात्र था - तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि
* राम पियक्कड़ था - तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि
* कौन था यह राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की थी? और क्या इसका कोई प्रमाण है? - तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि
* हिमालय और गंगा जितना बड़ा सत्य हैं , राम का चरित्र उतना ही झूठा है - तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि
* भगवान राम इस देश मे पैदा ही नहीं हुए थे और रामायण काल्पनिक है , इस धरती पर राम का कभी कोई अस्तिव रहा ही नहीं है - कांग्रेस की केन्द्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा
* भारत माता और देवी देवताओ के नग्न चित्र बनाये - दुष्ट एम् एफ हुसैन
* अमरनाथ यात्रा पाखंड है - अग्निवेश
* हिन्दुओं के आराध्य देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश का उपहास उड़ाया - भांड कुमार विश्वास
* शिव, कृष्ण और दुर्गादेवी का असभ्य और फूहड़ वर्णन किया गया - इग्नू के पाठ्यक्रम में
* भारत माता डायन है - आजम खान, समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता एवं कैबिनेट मंत्री
* भारत माता डायन है - तस्लीमुद्दीन ओवैसी
* कृष्ण के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये जाते है.
* मंदिरों में घंटी बजने पर रोक लगायी जाती है.
* केरल मे कोई रिक्शा चालक अपने वाहन पर श्री कृष्ण या जय हनुमान नहीं लिख सकता.
* "सरस्वती वन्दना" को साम्प्रदायिक कहा जाता है.
* "वन्दे मातरम" को सांप्रदायिक कहा जाता है.
* "भारत माता की जय" को सांप्रदायिक कहा जाता है.
* "जय श्री राम" के उदघोष को सांप्रदायिक कहा जाता है.
अब कोई भारत माता को फूहड़ गीत लिख कर अपमानित कर रहा है - दिबाकर बनर्जी

अब भी जिसका खून ना खौला, खून नहीं वो पानी है !!
जो अपनी मात्रभूमि, स्वाभिमान और गरिमा के लिए ना लड़ा..वो बेकार जवानी है !!

इसे पढने के बाद जो पीड़ा और क्रोध आपके मन में उत्पन्न हुआ होगा ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ. मैं अपने अंतर्मन और दृदय में दबी वेदना और पीड़ा को इस अमूल्य गीत के माध्यम से व्यक्त करना चाहता हु ..............

उठो जवान देश की वसुंधरा पुकारती
देश है पुकारता पुकारती माँ भारती
रगों में तेरे बह रहा है खून राम श्याम का
जगदगुरु गोविंद और राजपूती शान का
तू चल पड़ा तो चल पड़ेगी साथ तेरे भारती
देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
उठा खडग बढा कदम कदम कदम बढाए जा
कदम कदम पे दुश्मनो के धड़ से सर उड़ाए जा
उठेगा विश्व हांथ जोड़ करने तेरी आरती
देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
तोड़कर ध्ररा को फोड़ आसमाँ की कालिमा
जगा दे सुप्रभात को फैला दे अपनी लालिमा
तेरी शुभ कीर्ति विश्व संकटों को तारती
देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
है शत्रु दनदना रहा चहूँ दिशा में देश की
पता बता रही हमें किरण किरण दिनेश की
ओ चक्रवती विश्वविजयी मात्र-भू निहारती
देश है पुकारता पुकरती माँ भारती ||

|| जय भारत || || जय माँ भारती ||

बुधवार, अप्रैल 25, 2012

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता


कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

रघु ठाकुर


पिछले कई माह से थल सेना अध्यक्ष बीके सिंह का विवाद समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में प्रमुखता से छाया रहा है. थल सेना अध्यक्ष ने पहले अपने जन्म को 1950 के बजाय 1951 से गणना करने का आरोप रक्षा मंत्रालय पर लगाया जबकि उन्होंने स्वतः ही अपनी आयु दर्शाते समय अपना जन्म वर्ष 1950 लिखा था तथा उसी के आधार पर तीन पदोन्नतियॉं भी प्राप्त की थी. ’’सेना कानून ’’ के अनुसार अगर किसी अधिकारी की उम्र के संबंध में कोई त्रुटि हो तो वह अपने सेवाकाल के एक वर्ष के अंदर उसे सुधार हेतु प्रस्तुत कर सकता है. परन्तु हमारे देश के जनरल को 40 वर्ष की सेवा पूरी होने तक अपने आयु वर्ष का ज्ञान नहीं हुआ तथा ना ही उन्होंने आयु वर्ष सुधरवाने हेतु कुछ पहल की.
वी के सिंह

पिछले कई वर्षों से हथियारों की खरीद आवश्यकता की तुलना में कम हुई थी क्योंकि 1988 के बोफोर्स कांड ने स्व. राजीव गांधी के ऊपर राजनैतिक संकट ला दिया था और बाद में एनडीए शासनकाल में जार्ज फर्नाडीस के रक्षा मंत्रित्वकाल में भी हथियारों तथा सैन्य सामग्री की खरीद विवादित रही. इसलिये आम तौर पर पिछले व वर्तमान रक्षामंत्री हथियार खरीद से लगभग बचने का प्रयास करते रहे हैं.

अभी पखवाड़े भर में दो महत्वपूर्ण घटनायें घटीं. एक- इन्हीं जनरल बीके सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा हुआ पत्र, समाचार पत्रों में लीक हुआ था. इस पत्र में यह कहा गया था कि भारतीय सेना के पास जो हथियार व गोला बारूद है, वह पुराना पड़ चुका है तथा सामरिक आवश्यकताओं की तुलना में अपर्याप्त है.

इस समाचार से भी देश में एक चिंता व भय का वातावरण बना है और राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़े हुये हैं. इसी बीच यह भी समाचार आया कि भारत से ज्यादा हथियार चीन खरीदता है. चूंकि आम भारतीय 1962 के बाद से चीन को भारत का शत्रु जैसा मानता है तथा चीन से भारत की सीमाओं को ज्यादा खतरा मानता है और जो है भी. अतः राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता बढ़ना और स्वाभाविक था. 1962 में चीनी हमले के समय भी हथियार व गोला बारूद पुराने थे अतः इन दोनों समाचारों को देश के आम नागरिकों ने लगभग साथ जोड़कर पढ़ा व चिंता, भय में तब्दील होने लगी.

अब इस कड़ी में एक और घटना घटी कि इंडियन एक्सप्रेस जैसे सत्ता प्रतिष्ठानों एवं सत्ता क्षेत्रों में प्रतिष्ठित अखबार ने एक सनसनीखेज कहानी छापी जिसमें कहा गया कि 16-17 जनवरी 2012 को जब सेना अध्यक्ष जनरल बीके सिंह ने अपनी उम्र के विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, उसी रात हिसार और आगरा से सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली की ओर कूच कर गई थीं.

इसके बाद सेना सचिव श्री शर्मा को विदेश से बुलाया गया और सेना के बड़े अधिकारियों को बुलाया गया तथा विस्तृत पूछताछ व जांच के बाद इस घटना को तथ्यहीन पाया गया. अगले दिन इस समाचार को देश के अन्य समाचार पत्रों ने भी प्रमुखता से छापा और सरकार की ओर से सफाई भी छपी कि यह एक प्रकार की मोकड्रिल यानी कृत्रिम अभ्यास थी, जो सेना के अभ्यासों का एक आम हिस्सा है.

इस सारे घटनाक्रम में कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण ढंग से उभरकर आते हैं जिनकी विस्तृत जॉंच होना चाहिये-

1. थल सेना अध्यक्ष अपना कार्यकाल एक वर्ष क्यों बढ़ाना चाहते हैं ? इस वर्ष जो हथियारों की खरीद का निश्चय हुआ है, जिसके लिये वर्ष 2012-13 के आम बजट में रक्षा के लिये 1 लाख 92 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि रखी गई है, इस खरीदी और उम्र विवाद के बीच कहीं कोई संबंध तो नहीं है ?

2. पिछले दिनों भारत ने लगभग 55 हजार करोड़ का हथियार फ्रांस से खरीदना तय किया है. यह सौदा आखिर तक लगभग 1 लाख करोड़ तक जा सकता है. यह एक सुविदित तथ्य है कि फ्रांस के मुकाबले अमेरीका इन हथियारों की बिक्री के लिये अत्यधिक उत्सुक था और प्रयासरत भी था. यहां तक कि जब यह ठेका भारत ने फ्रांसीसी कम्पनी को दिया तब अमरीकी सरकार के मंत्री ने जाहिर तौर पर घोर निराशा व्यक्त की थी और इसे अपने राजदूत की असफलता माना था. यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जिसकी जांच होनी चाहिये कि भारत सरकार की सामरिक सामग्री की खरीदी के ताजे निर्णयों और उपरोक्त घटनाओं के बीच कहीं कोई संबंध तो नहीं है ?

3. सर्वोच्च न्यायालय ने थल सेना अध्यक्ष की याचिका को न केवल नकारा है बल्कि उनके वकील को लगभग डांटते हुये कहा कि इस याचिका में कोई दम नहीं है. या तो आप वापिस करें अन्यथा हम इसे खारिज करते हैं. यह भी एक प्रकार का सर्वोच्च न्यायालय का उच्च वर्गीय और उच्च पदीय शिष्टाचार ही था कि उन्होंने याचिका को खारिज करने के बजाय वापिस करने का सुझाव दिया परन्तु जनरल ने इसके बावजूद भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित नहीं किया और बयान दिया कि वे ’’ सेना के सम्मान के लिये लड़ रहे है’.’’ जनरल की उम्र कितनी है, कौन सी सही है, कौन सी गलत है, यह सेना अध्यक्ष का निजी मसला हो सकता है, निजी मान सम्मान का हो सकता है पर इसका सेना के सम्मान से क्या संबंध ? वैसे भी सेना का सम्मान तो जनरल ने गिराया है, जिन्होंने अपनी जन्मतिथि बदलवाने को न केवल मुद्दा बनाया बल्कि झूठी लड़ाई लड़ने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे. क्या सेनाध्यक्ष की जन्मतिथि नहीं बदलने से सेना झूठी हो गई या फिर सेनाध्यक्ष झूठे साबित हुये?

4. इंडियन एक्सप्रेस ने इस कहानी को छापा परन्तु इस बात को दृष्टि ओझल कर दिया कि वह एक खतरनाक औेर उत्प्रेरक समाचार भी हो सकता है. प्रथमतः तो यह है कि 16 - 17 जनवरी की घटना का रहस्योद्घाटन अचानक 50 दिनों के बाद कैसे हुआ व क्यों हुआ ? ऐसी सूचनायें स्वतः जनरल के अलावा कौन दे सकता है ? व क्यों देगा ? अब यह समाचार आये हैं कि किसी केन्द्रीय मंत्री का हाथ इसे छपवाने में है. इस सूचना की भी जांच कर प्रधानमंत्री को तत्काल कार्यवाही करना चाहिये तथा ऐसा कोई गद्दार मंत्री अगर है तो उसे न केवल बर्खास्त करना चाहिये, बल्कि उसके विरूद्ध राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिये.
इस समाचार को लेकर भी जनरल का बयान चालाकी भरा है. उन्होंने मीडिया का जिक्र करते हुये कहा ’’ एक अखबार में यह खबर है कि यह एक केन्द्रीय मंत्री के इशारे पर किया गया.’’ हो सकता है कि नौकरशाही का एक वर्ग गलत इनपुट दे रहा हो. जनरल का यह बयान चालाकीपूर्ण बर्ताव है. आखिर ऐसे समाचार के बारे में पता कराना क्या जनरल का वैधानिक दायित्व व काम का हिससा नहीं है ? कहीं वे अपने बचाव के लिये तो विषय से नहीं हटना चाह रहे. 

5. भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी इतने अधिक सत्ता उन्मुख हो रहे हैं कि वे हर घटना को केवल चुनावी लाभ हानि की दृष्टि से देखते हैं. उन्होंने इसे सेना व सरकार के बीच के संबंध ‘निकृष्टतम’ के रूप में व्यक्त किया है. जबकि इस प्रकरण में सेना कहीं नहीं है, केवल जनरल एक व्यक्ति हैं. फिर एनडीए शासनकाल में तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस व एडमिरल श्री भागवत के बीच की सार्वजनिक बहस क्या उन्हें याद नहीं है. सेना के उच्च अधिकारियों को क्या ऐसे बयान देना या सरकार की सार्वजनिक आलोचना, लोकतंत्र के भविष्य के लिये चिंताजनक नहीं है ? 

उपरोक्त घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि उम्र और सेवानिवृत्ति की अवधि न बढ़ पाने से जनरल इतने हताश हो चुके हैं कि वे स्वतः राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. अपनी सेवा निवृत्ति के मात्र तीन माह पहले उन्हें दिव्य ज्ञान होता है कि हथियार पुराने पड़ गये हैं, जबकि वे उसी सेना के प्रमुख हैं. 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक उपदेशक बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी. दरअसल प्रधानमंत्री एक गैर राजनैतिक नौकरशाह हैं, जिन्हें राष्ट्रीय चिंताओं से कोई सरोकार नहीं है. पिछले उ.प्र. के चुनाव अभियान में उन्हें केवल कानपुर में एक सभा को संबोधित करने को आमंत्रित किया गया था और वह भी सिक्ख बाहुल्य इलाके में. हालांकि उस क्षेत्र में भी कांग्रेस हार गई. पंजाब में भी वे प्रभावहीन ही रहे. 

उन्हें वर्ल्ड बैंक की चाकरी की ज्यादा चिंता है, बजाय राष्ट्रीय चिंताओं की. परन्तु ऐसी घटनायें भारतीय लोकतंत्र के लिये ठीक नहीं हैं. भारतीय सेना में विद्रोह एक अकल्पनीय सपना है परन्तु इंडियन एक्सप्रेस जैसे समाचार पत्र ने इस सपने की कल्पना देने की पहल कर दी है. प्रेस की आजादी में हमारा पूरा विश्वास है परन्तु क्या प्रेस की आजादी का मतलब झूठे और अस्पष्ट समाचारों द्वारा अपने ही लोकतंत्र को क्षति पहुंचाना है? क्या प्रेस का कोई राष्ट्रीय दायित्व नहीं है. प्रेस की आजादी की ओट में विदेशी हथियार कंपनियों का खेल रोका जाना चाहिये. यह कुछ ऐसा होगा जैसे कोई बंदर अपने हाथ में उस्तरा लेकर कहे कि अपनी गर्दन काटना हमारी आजादी है. 

हमारे देश में सेनाध्यक्ष को कुछ ज्यादा बोलने की बीमारी है. जनरल करियप्पा, जनरल थिमैया, फील्डमार्शल मानिक शा जैसे सेनाध्यक्ष हुये हैं परन्तु उन्होंने कभी भी सार्वजनिक या नीतिगत बयानबाजी नहीं की. यह सेना के चरित्र के लिये उचित नहीं है. परन्तु हमारे सेनाध्यक्ष तो आजकल भारत के प्रधानमंत्री को भी विदेश नीति पर सलाह देते हैं. 

अपनी नेपाल यात्रा में उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री से मुलाकात में कहा कि “मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि नेपाल के हित में जो कुछ होगा, वह भारत के भी हित में होगा’’. उनका यह कथन 6 अप्रैल 2012 के अखबारों ने छापा है. उनके बयान से ऐसा लगता है जैसे कोई विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बोल रहा हो. 

प्रधानमंत्री को या तो अकर्मण्यता छोड़ना चाहिये या फिर कुर्सी का मोह छोड़ देना चाहिये क्योंकि प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हुये व्यक्ति की अकर्मण्यता गलतियों से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है. देश की जनता को अगर प्रधानमंत्री लोकतंत्र और राष्ट्र में से चयन करना हो तो लोकतंत्र और अपने राष्ट्र को ही चयन करना होगा. प्रधानमंत्री तो आते जाते रहते हैं.

19.04.2012, 09.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित  http://raviwar.com/news/694_bk-singh-and-indian-express-raghu-thakur.shtml

नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??



नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??  By  Shripad Kulkarni 



























एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क मियां लूटेरा था ....बख्तियार खिलजी. इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.

किसी ने उसको सलाह दी... नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय वैद्य ...उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी... मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...

उसको बड़ी झुंझलाहट हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!

बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के राख कर दिया...!

वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले.

आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!

बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया

आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान लेते है

यह प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण

इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
स्वरूप

यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
परिसर

अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।
प्रबंधन

समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य

इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम

प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और उसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति

इस विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी। शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर में अध्ययन तथा शंका समाधान चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र

यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय

नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर' नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था। 'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से अनेक पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने साथ ले गये थे।