रविवार, मार्च 27, 2022

इस्लाम की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा भारत के कुछ एक्स मुस्लिमो ने उठाया हैं

 इस्लाम  की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा भारत के कुछ एक्स मुस्लिमो ने उठाया हैं जिस से  भारत पाकिस्तान  दुनिया के इस्लाम जगत के  दीन (सिस्टम) में भूचाल आ गया हैं. वास्तव में पूरा इस्लाम झूठ की बुनियाद पर टिका हुआ हैं, कुरआन का अनुवाद भी अधूरा हैं जो भी कुरआन जानते हैं वो रट्टा मारते रहे हैं, उस के अंदर लिखी बाते सिर्फ मौलाना कारी आलिम ही जानते हैं और तो और  हदीशो का २०% भी दुनिया तक नहीं पहुंचाया गया हैं क्युकी सभ्य भाषा में इस्लाम की सच्चाई  रामायण महाभारत की तरह चित्रित नहीं की जाती , इस से भी आगे शब्दों में भी सभ्य समाज अपने समाज में बच्चो को बता भी नहीं सकता. 

1. Sachwala : 

Sachwala (pseudo name) is an India-born activist & critic of Islam. He is quite articulate in the Quranic tongue & Urdu language. 

https://www.youtube.com/c/Sachwala


2. Ex-Muslim Bharti :

 Interviews of Ex Muslim women.

https://www.youtube.com/channel/UC9AOGG3z-QuopUBW6UycuVg 


3. Almosow Free

Ex-muslim Sanatani. Atheist to the Abrahamic God. Lecturer - Academic Philosophy. This channel attempts to get a holistic ...

https://www.youtube.com/c/AlmosowFreeOM

4. Kaali Dasi काली दासी Sarah Khan

जय काली जय महादेव जय भारत Hey Sarah Khan here also know as KaaliDasi/काली दासी I was always a seeker, though ...

https://www.youtube.com/c/SarahKaliDasi

5. Indian ExMuslim Sahil :

 I was a devoted muslim before and a hardcore daee however recently left Islam as it does not make any sense to me now.

https://www.youtube.com/channel/UCjk7V7Rw2jJSflLXYxBOY0g

6. Ex-Muslim Zafar Heretic

I am an Indian ex-muslim Atheist and activist. I left islam after knowing it's reality and bad teachings..I love to expose this religion ...

https://www.youtube.com/c/ExMuslimZafarHeretic 

 

7.EX-MUSLIM SAMEER

Ex-MUSLIM SAMEER AGNOSTIC | HUMANIST | FREE-THINKER Only Humanity And Love Can Change The World. Peace Upon ...

https://www.youtube.com/channel/UCnfqx-4D7HtfIH-xs4ulvmQ


8.Pooja Praveen upadhyaay : Har Har Mahadev 

https://www.youtube.com/c/PoojaParveenUncompromisingIndia/videos

9.  Jaidevi ( Uzma Khan) : 

I am an ex-Muslim after knowing that I have been lied too and there is no rights for women in Islam.  

My channel is about to educate about Islam (Quran & Hadith) to the Western Kuffar Women so they don't come into Muslims men's trap by their manipulation and sugar quoting Quran & hadiths. 

https://www.youtube.com/c/UzmaKhan6

10. Sulemani Jalebiya

This channel is for making informative videos of Islam with authentic reference. Please kindly note that this channel ...

https://www.youtube.com/channel/UCWa4Nrdpkzslx_ZBeXCjdYg

11. Ex muslim Yasmin Khan

Provide food cloth and shelter to poor children you are human show ❣️ kindness to your heart.

https://www.youtube.com/channel/UCNPa6Bf64QmM4hw89Q_UBDw

12. Faiz Alam : 

https://www.youtube.com/channel/UCyM8STPVlMZ4HNyREOYUjzA



HINDU AWAKENING CHANNELS   GAYATRI BOPATRA GOHAIN, GYAN SAFAR,MUNIKA SHERON, NEERAJ ATRI, SATYA SANATAN,ANKUR ARYA , THE SHAM SHARMA SHOW, AKTK AND MANY MORE...

SOUECE : COPIED 



मंगलवार, दिसंबर 28, 2021

#जीसस_की_कब्र_भारत_में_है

 

#जीसस_की_कब्र_भारत_में_है

यह संयोग मात्र ही नहीं है कि जब भी कोई सत्य के लिए प्यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्सुक हो उठता हे, अचानक वह पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं यह उतनी ही प्राचीन बात है जितने पुराने प्रमाण और उल्लेख मौजूद हैं। आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, सत्य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। #ईसामसीह भी भारत आए थे।

ईसामसीह की तेरह से तीस वर्ष की उम्र के बीच का #बाइबिल में कोई उल्लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्योंकि तैंतीस की उम्र में तो उन्हें सूली पर ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से तीस तक के सत्रह सालों का हिसाब गायब है। इतने समय वे कहां रहे, और बाइबिल में उन सालों को क्यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्हें जान-बूझकर छोड़ा गया है, कि वह एक मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसामसीह जो भी कर रहे हैं वे उसे सनातन भारत से लाए हैं।

यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्में, #यहूदी की तरह जिए, और यहूदी की तरह मरे। स्मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्होंने तो-ईसा और ईसाई ये शब्द भी नहीं सुने थे। फिर क्यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्यों? न तो ईसाइयों के पास इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब है, न ही यहूदियों के पास। क्योंकि इस व्यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुचाया। वे उतने ही निर्दोष थे, जितनी कि कल्पना की जा सकती है।

...पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्म था। पढे़-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्पष्ट देख लिया कि वे पूरब से विचार ला रहे हैं, जो कि गैर-यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ला रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्हें समझ आएगा कि क्यों वे बार-बार कहते हैं- "अतीत के पैगम्बरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे, तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है, तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।" यह पृर्णतः गैर-यहूदी बात है। उन्होंने ये बातें भारत में  गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।

वे जब भारत आए थे-तब सनातन बौद्ध पंथ  बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए, पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बडा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्क उसमें डूबा हुआ था। उनकी करुणा, क्षमा, प्रेम के उपदेशों को पिए हुआ था। जीसस कहते हैं कि "अतीत के पैंराम्बरों द्वारा यह कहा गया था"- कौन हैं ये पुराने पैगम्बर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगम्बर हैंः इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,-"कि ईश्वर बहुत ही हिंसक है, और वह कभी क्षमा नहीं करता।?"

यहां तक कि उन्होंने ईश्वर के मुंह से भी ये शब्द कहलवा दिए हैं। पुराने टेस्टामेंट के ईश्वर के वचन हैं, " मैं कोई सज्जन पुरुष नहीं हूं, तुम्हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईष्र्यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं हैं वे सब मेरे शत्रु हैं।"

और ईसामसीह कहते हैं कि "मैं तुमसे कहता हूंः परमात्मा प्रेम है।" यह ख्याल उन्हें कहां से आया कि परमात्मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाय दुनिया में कहीं भी परमात्मा को प्रेम कहने का कोई और उल्लेख नहीं है।

उन सत्रह वर्षों में जीसस इजिप्त, भारत, लद्दाख और तिब्बत की यात्रा करते रहे। और यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूंदी धारणाओं से एकदम विपरीत थीं।

तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि अंततः उनकी मृत्यु भी भारत में हुई। और #ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे, तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्या हुआ? आजकल वे कहा हैं? क्योंकि उनकी मृत्यु का तो कोई उल्लेख है ही नहीं!

सच्चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब अड़तालीस घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं, तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्वस्थ है तो साठ घंटे से भी ज्यादा लोग जीवित रहे ऐसे उल्लेख हैं। औसत अड़तालीस घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छः घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छः घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।

यह एक मिलीभगत थी (जीसस के शिष्यों की) पोंटियस पॅायलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वह रोमन वायसरॉय था। क्योंकि जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्य के आधीन था, और इस निर्दोष युवक की हत्या में उसे कोई रुचि नहीं थी। उसके दस्तखत के बगैर यह हत्या नहीं हो सकती थी, और उसे अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए, वह एक जीसस मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॅायलट दुविधा में था; यदि वह जीसस को छोड़ देता है, तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह इस व्यक्ति को सूली देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा मगर उसके स्वयं के अंतःकरण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्यक्ति की हत्या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।

तो उसने शिष्यों के साथ यह व्यवस्था की कि शुक्रवार को, जितनी संभव तो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार के कामधाम बंद कर देते हैं; फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्थगित किया जाता रहा; ब्यूरोक्रेसो तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अतः जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया, और सूर्यास्त के पूर्व ही उन्हें जीवित उतार लिया गया, यद्यपि वे बेहोश थे, क्योंकि शरीर से रक्त स्राव हुआ था, और कमजोरी आ गई थी। फिर जिस गुफा में उनकी देह को रखा गया वहां का चैकीदार... पवित्र दिन के पश्वात् यहूदी उन्हें पुनः सूली पर चढ़ाने वाले थे, मगर वह चैकीदार, गुफा का रक्षक रोमन था...इसीलिए यह संभव हो सका कि शिष्यगण जीसस को बाहर निकाल लिए और फिर जूडिया के भी बाहर गए।

#जीसस ने भारत में जाना क्यों पसंद किया? क्योंकि अपनी युवावस्था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्होंने अध्यात्म का और ब्रह्म का परम स्वाद इतनी निकटता से चखा था, कि उन्होंने वहीं लौटना चाहा। तो जैसे ही स्वस्थ हुए, वे वापस भारत आए, और फिर एक सौ बारह साल की उम्र तक जिए।

#कश्मीर में अभी भी उनकी कब्र/ समाधि है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रु भाषा में है...स्मस्ण रहे भारत में कोई यहूदी नहीं रहते। उस शिलालेख पर खुदा है ‘जोशुआ’- वह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। ‘जीसस’ जोशुआ का ग्रीक रूपांतरण है। "जोशुआ यहां आए"- समय, तारीख वगैरह सब दी हैं। "एक महान सद्गुरु, जो स्वयं को भेड़ों का गडरिया पुकारते थे, अपने शिष्यों के साथ शांतिपूर्वक एक सौ बारह साल की दीर्घायु तक यहां रहे" इसी वजह से वह स्थान "भेडों के चरवाहे का गांव" कहलाने लगा। तुम वहाँ जा सकते हो, वह शहर अभी भी है- ‘पहलगाम’, उसका कश्मीरी में वही अर्थ है- ‘गड़रिए का गांव।’

वे यहाँ रहना चाहते थे, ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सके। एक छोटे से शिष्य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्होंने मरना भी यहीं चाहा, क्योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहाँ जीवन एक सौंदर्य है, और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहाँ मरना भी अत्यंत अर्थपूर्ण है।

केवल #भारत में ही मृत्यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्तुतः तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।

इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मूसा ने भी भारत में आकर देह त्यागी। उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्थान में बनी है। शायद जीसस ने ही महान सदगुरु मूसा के बगल वाला स्थान स्वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्यों काश्मीर में आकर मृत्यु में प्रवेश किया।

#मूसा ईश्वर के देश "इजराइल" की खोज में यहूदियों को इजिप्त के बाहर ले गए थे। उन्हें चालीस वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्होंने घोषणा की कि "यही है वह जमीन, परमात्मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं तथा अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालो, अब तुम संभालो।"

क्योंकि जब उन्होंने इजिप्त से यात्रा प्रारंभ की थी, तब की पीढ़ी लगभग समाप्त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गये, जवान बूढ़े हो गये, नए बच्चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ शुरूआत की थी, वह अब बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थे। उन्होंने युवा लोगों को शासन और व्यवस्था का कार्यभार सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए।

यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्त्रों में भी, उनकी मृत्यु के संबंध में, उनका क्या हुआ इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है। हमारे यहां (काश्मीर में) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिबु्र भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।

मूसा भारत आना क्यों चाहते थे? केवल मृत्यु के लिए? हां, कई रहस्यों में से एक रहस्य यह भी है कि यदि तुम्हारी मृत्यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं वरन् भगवत्ता की ऊर्जा-तरंगें हों, तो तुम्हारी मृत्यु भी एक उत्सव और निर्वाण बन जाती है।

सदियों से, सारी दुनिया से साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनाशील हैं; उनके लिए सबसे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्वी पर कहीं और नहीं है। लेकिन यह समृद्धि आंतरिक है।

– ओशो

मेरा स्वर्णिम भारत
परिशिष्ट-१
भारत: एक अनूठी संपदा

शनिवार, दिसंबर 25, 2021

सेंटा का गिफ्ट... (आज सेंटा सेंटा चिल्लाने वाले बेशर्म, बेवकूफों के लिए)

 


सन 1510
गोआ के तात्कालिक मुश्लिम शासक यूसुफ आदिल शाह को पराजित कर पुर्तगालियों ने गोआ में अपनी सत्ता स्थापित की। अगले पच्चीस तीस वर्षों में गोआ पर पुर्तगाली पूरी तरह स्थापित हो गए। फिर शुरू हुआ गोआ का ईसाईकरण। कुछ लोग उनकी कथा के प्रभाव में आ कर धर्म बदल लिए और ईसाई हुए। जो धन ले कर बदले उन्हें धन दिया गया, जो भय से बदल सकते थे उन्हें भयभीत कर बदला गया। और जो नहीं बदले?

गांव के बीच मे एक हिन्दू को खड़ा करा कर उसे आरा से चीरा जाता, हिन्दू युवतियों को नग्न कर सँड़सी से उनके स्तन नोंचे जाते... स्त्रियों को नग्न कर उनकी दोनों टांगो में दो रस्सी बाँध दी जाती और दोनों रस्सियां दो घोड़ों से जोड़ दी जातीं। दोनों घोड़े दो ओर दौड़ाये जाते और पल भर में एक शरीर दो भाग में बंट जाता। अरे रुकिए! यह कार्य केवल पुर्तगाली सैनिक नहीं करते थे, उनके साथ एक पादरी रहता था जो बाइबल पढ़ कर अपनी देख-रेख में कार्य प्रारम्भ कराता था। पुर्तगाली ईसाइयों को किसी गाँव मे यह खेल दो बार खेलने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि जिस गाँव मे एक बार यह आयोजन हो जाता, उस गाँव की सारी प्रजा उसी दिन ईसाई हो जाती थी।

पर भारत तो भारत है न! यहाँ के हिन्दू इतनी जल्दी कैसे हार मान लेते? ऊपर से सारा गोआ ईसाई हो गया था, पर अंदर ही अंदर फिर अधिकांश जन हिन्दू हो गए थे। घर में मिट्टी के नीचे दबा कर सनातन धर्मग्रंथ रखे जाने लगे। बच्चों को धर्म का ज्ञान दिया जाने लगा। रामायण-महाभारत, वेद-पुराण पढ़े-पढ़ाने जाने लगे।

पर ईसाई भी तो ईसाई थे न! वे भी इतनी शीघ्रता से कैसे पराजय स्वीकार कर लेते? तो सन 1560...

गोआ के बीचोबीच एक चिता तैयार की गई थी। लकड़ी की नहीं, हिन्दू धर्मग्रंथों की। पिछले छह महीने में हर हिन्दू के घर का कोना कोना छान कर,मिट्टी कोड़ कोड़ कर इन धर्मग्रंथों को निकाला गया था। मराठी और संस्कृत भाषा में लिखे गए इन महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थों की चिता, और उसके ऊपर हाथ पैर बाँध कर डाले गए हिन्दू... कुछ किताबें कहती हैं पाँच सौ लोग थे, कुछ कहती हैं हजार... कुछ किवदन्तियां कई हजार बताती हैं। ईश्वर जाने कितने थे।

निकट खड़े पादरी ने अपनी पवित्र (अपवित्र) पुस्तक पढ़ी, और फिर सैनिक की ओर संकेत किया। सैनिक ने चिता में अग्नि प्रवाहित की और भारत धू-धू कर जल उठा। अग्नि की लपटें बढ़ीं, और उनके साथ ही बढ़ती गयीं दो प्रकार की ध्वनियां... एक जीवित जल रहे हिंदुओं के चीत्कार की ध्वनि, और दूसरी निकट खड़े ईसाइयों के अट्ठहास की ध्वनि...
सनातन जल रहा था, और अग्नि की लपटों के साथ ऊपर उठता जा रहा था चर्च! और वहाँ से हजारों कोस दूर रोम में बैठा सेंटा-क्लॉज मुस्कुरा उठा था।
यह भारत मे ईसाई धर्म के प्रारम्भ का सत्य था।
अपने बच्चों को सेंटा क्लॉज की पोशाक पहना कर खुश होने वाले हिन्दुओं! तुम्हारा सेंटा जब मुस्कुराता है तो लगता है कि वह गोआ की बेटियों की नोची गयी छातियों पर मुस्कुरा रहा है, एक वहशी दैत्य की तरह! तुम नहीं जानते कि क्रिसमस का जो केक तुम खा रहे हो वह गोआ की उन माओं के रक्त से सना हुआ है जिनके नग्न शरीर को घोड़े से चीरवा दिया गया था। क्रिसमस की तुम्हारी शुभकामनाओं में मुझे अपने उन पूर्वजों की चीखें सुनाई देती हैं जिन्हें उनके धर्मग्रन्थों के साथ जीवित ही जला दिया गया था। क्यों? केवल इसी लिए कि वे हिन्दू थे।
गोआ एक उदाहरण मात्र है। भारत मे अंग्रेजी सत्ता के काल मे हिंदुओं-मुसलमानों पर ऐसे असंख्य अत्याचार ईसाइयों ने किए हैं। गिनने लगेंगे तो घृणा अपने चरम पर पहुँच जाएगी।
सेंटा क्लॉज गिफ्ट नहीं देता। सेंटा ने जब भी दिया, भारत को नरसंहार, अत्याचार, शोषण का ही गिफ्ट दिया है। सेंटा क्लॉज भारत पर हुए अत्याचार का प्रतीक है। इसका सम्मान करना, इसका त्योहार मनाना अपने पूर्वजों के अपमान जैसा है।
तुम इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हो? शत्रु-परम्पराओं का सम्मान धर्मनिरपेक्षता नहीं, मूर्खता है मित्र! वे झारखण्ड के जंगलों में तुम्हारे देवी-देवताओं को गाली देते हैं और तुम उनके पर्वों को उत्साह से मनाते हो? वे तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, गोआ, केरल में तुम्हारे पूर्वजों को गाली देते हैं और तुम उनका सम्मान करते हो? वे आसाम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश में सनातन धर्म का लगभग-लगभग नाश कर चुके और तुम इससे अनभिज्ञ प्रेम के गीत गा रहे हो? तनिक सोचो तो, क्या हो तुम? मित्र! तुम अनजाने में अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने राष्ट्र, अपनी परम्पराओं, अपने पूर्वजों की प्रतिष्ठा की हत्या में सहयोग कर रहे हो। मित्र! तुम हत्या कर रहे हो...
और सेक्युलरिज्म? इसे भारत को क्या ईसाइयों से सीखना होगा? एक उदाहरण देता हूँ, सातवीं शताब्दी में भारत के एक हिन्दू शासक अनंगपाल ने राय पिथौरा किले के पास एक ही प्रांगण में 'हिन्दू,बौद्ध और जैन' तीनो धर्मों के सत्ताईस मन्दिरों का निर्माण कराया था। यहाँ जाने वाला हर श्रद्धालु तीन धर्मों के आराध्यों की एक ही साथ पूजा करता था। भारत का वह मन्दिर कुतुबुद्दीन ऐबक ने तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही तोड़ दिया, पर क्या कोई आज भी मुझे पूरी दुनिया मे ऐसा कोई दूसरा स्थान दिखा सकता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ किसी ईसाई ने किसी दूसरे धर्म का धर्मस्थल बनवाया हो? नहीं न?
मित्र! इस धरा पर धर्मनिरपेक्षता हमसे ही प्रारम्भ हो कर हम पर ही समाप्त हो जाती है। पर यह याद रहे, धर्मनिरपेक्षता के भ्रम में आत्महंता बनना केवल और केवल मूर्खता है।
स्वतन्त्रता के बाद वामपंथियों द्वारा थोपी गयी षड्यंत्रपूर्ण परिभाषा के अनुसार मेरी बातें साम्प्रदायिक दिख रही होंगी, पर मुझे गर्व है अपने साम्प्रदायिक होने पर.. मैं अपने पूर्वजों के हत्यारों को क्षमा नहीं कर सकता। मेरे अंदर यदि किसी को घृणा भरी हुई दिखती है तो गर्व है मुझे अपनी घृणा पर। अपने शत्रुओं के प्रति इसी घृणा ने भारत की रक्षा की है, नहीं तो यूनान, मिस्र, रोम कबके मिट गए। साभार सर्वेश कुमार तिवारी

गुरुवार, नवंबर 18, 2021

कुछ अच्छाइयां.. अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए, जिनका ईश्वर के सिवाय.. कोई और गवाह् ना हो...!!

 एक समय की बात है ।

मैं पैदल वापस घर आ रहा था । रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था । पास जाकर देखा, लिखा था:

कृपया पढ़ें

"इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है ।
मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता । जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं ।" ...

यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई ।
पता याद रखा ।
यह उस गली के आखिरी में एक घऱ था ।
वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई ।
मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है ।
उसे ठीक से दिखाई नहीं देता ।

"माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ ।"

यह सुन वह वृद्धा रोने लगी ।

"बेटा,
अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं ।
मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, ।
ठीक से दिखाई नहीं देता ।
पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है ।"

बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए ।
पर एक विनती की -
' बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा ।
जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।
'मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा ।
किसी ने भी नहीं फाड़ा ।
जिंदगी मे हम कितने सही और कितने गलत है,
ये सिर्फ दो ही शक्स जानते है..
परमात्मा और अपनी अंतरआत्मा..!!
मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया ।
जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा ।
सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं , पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई ।
और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं ।
मदद के तरीके कई हैं सिर्फ कर्म करने की तीव्र इच्छा मन मॆ होनी चाहिए

कुछ नेकियाँ
और
कुछ अच्छाइयां..
अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए,
जिनका ईश्वर के सिवाय..
कोई और गवाह् ना हो...!!

रविवार, नवंबर 14, 2021

अब्दुल जन्मजात सबसे बड़ा कायर होता है

 अब्दुल जन्मजात सबसे बड़ा कायर होता है 

RSS TV

फट्टू होता है
फटान होता है

इसीलिए केवल बड़ी बड़ी बातें करता है
भीड़ में हुआँ हुआँ करता है

इसलिए झूठ फैलाता रहता है
अब्दुल मरने से नही डरता है

इन्होंने एक लड़ाई संसार में नहीं जीती
भगोड़े फट्टू केवल धोखा दे सकते हैं
हारने पर माफी मांग लो ताकि
फिर से धूर्तता कर सको

🚫 हमने सद्दाम को सीवर की नाली में छुपे देखा जिसे अमेरिकी सेना ने बाल पकड़कर बाहर निकाला और फंदे से लटका कर फांसी दे दी

🚫 कर्नल गद्दाफ़ी इनका हीरो बनता फिरता था
उसको सड़क की पुलिया के पाईप में छुपे देखा

🚫ओसामा बिन लादेन को अपनी बीवियों के पीछे छिपते देखा जिसे अमेरिकी सैनिकों ने कुत्ते की मौत मारा और समुद्र में फेंक आए ..शार्क खा गई

🚫 ईदी अमीन को बुरका पहनकर महिला के वेश में भागकर सऊदी अरब में शरण लेते देखा

🚫 रोहिंग्याओं को वर्मा से शांतिप्रिय बौद्धों से भागते हुए देखा

🚫 सीरिया में ISIS लड़ाकों को बुर्के मे भागते देखा

🚫 1971 में इमरान के चाचा जरनल नियाजी को भी जान बचाने के लिए सरेंडर करते हुए देखा

🚫 93000 सैनिकों को घुटनों के बल बैठाया है भारतीय सेना ने 1971 में

और हाँ

🚫 अभी अभी उ प्र मेँ आजम खान को पाजाम गीला करता हुआ सबने देखा

🚫मुख्तार अंसारी डर के मारे व्हील चेयर पर पाजामा गीला करता रहा कि गाड़ी न पलट जाय जब उसे पंजाब से युप्पी लाया जा रहा था

🚫 जिसके बदसूरत होठों के दोनों किनारों से थूक निकल जाती है ..भचर भचर बोलने में ..वह जाकिर नाइक डर के मारे मलेशिया में छिपा बैठा है
जो कहता है हम केवल अल्लाह से डरते हैं
उसे अपने बाप की मय्यत तक में आने की हिम्मत नहीं हुई

और अब तो सभी ने ताजा ताजा देखा ही है

🚫 अफगानी फटानों को प्लेन के बाहर लटककर अपने बीबी बच्चो को तालिबान को सौंपकर भागते हुए

अब्दुल मरने से नहीं डरता
जब बोले तो उसे ये सारे नाम गिनवा देना
और कहना तुम संसार के सबसे बड़े फट्टू होते हो मियाँ..

इस्लामोफोबिया की बात तुम्हारे जैसे कायरों के मुँह से तो शोभा नहीं ही देती

तुमसे डरता ही कौन है
☺️☺️☺️☺️
जय राम जी की

गुरुवार, नवंबर 11, 2021

हमारे हिन्दू पर्वों के साथ एक विचित्र परिवर्तन हो रहा है छठ सूर्य देवता की आराधना का पर्व है

 हमारे हिन्दू पर्वों के साथ एक विचित्र परिवर्तन हो रहा है

छठ सूर्य देवता की आराधना का पर्व है
यह छठी मैया का पर्व बन गया
लोग तर्क देते हैं
षष्ठी तिथि के चलते इसे मैया मान लिया गया

चलिए ठीक है
तिथि भी पवित्र होती है
माता होती है
मान लिया

दीपावली इसलिए मनाई जानी शुरू हुई
क्योंकि प्रभु श्रीराम चौदह वर्षों बाद अयोध्या जी लौटे थे
घी के दीयों से सारी नगरी सजाई गई

धीरे से हमारी दीपावली लक्ष्मी गणेश जी की पूजा में बदल गयी
हमने नयी नयी कहानियां ढूंढ निकाली
ये तिथि महालक्ष्मी जी की पूजा का भी है

धन्वंतरी आयुर्वेद के जनक थे
उनकी तिथि धनतेरस बन गयी
च्यवनप्राश खरीदो मत खरीदो
बर्तन भांडे जरूर खरीद लेना
स्कूटर कार मोटर साइकिल किश्तों पर ही ले आना
पर ले आना जरूर

गहने भी अब फाइनेंस होने लगे हैं
सोना जरूर खरीदो धनतेरस को
पर खरीद जरूर लेना

होली में किसे याद रहता है
यह होलिका और प्रह्लाद को याद करने का दिन है

सुबह से भर पेट शराब पी कर..
फटे कपड़ों डाल लो..
सिर पर जेहादियों सी हरी गोल टोपी या नुकीली जोकर टोपी डाल के..
गली में हिलते डगमगाते चलते रहो
ताकि लोग समझ लें
कितने संस्कारी हो

और तो और होली को भी महालक्ष्मी जी को प्रसन्न करो ..पूजन करो ..नयी नयी चीजें खरीदो
ये नया कंसेप्ट भी आने वाला है

कौन लोग हैं
जो आपको अपनी संस्कृति.. अपने धर्म अपने पर्वों त्यौहारों के ..असली अर्थ से भटका रहे हैं

टी वी पर नयी नयी लच्छेदार बातों से ये बाजार वाले आपको उलझा रहे हैं

उनका छिपा एजेंडा क्या है
जानिए तो जरा..!!

आपने कभी सुना कि हालेलुइया वाले
क्रिसमस में जीसस के अलावा किसी और को पूजते हैं

आपने कभी सुना कि मुहर्रम में हाय हसन ..हाय हुसैन के अलावा वे कोई अन्य क्रियाकलाप करते हैं

आपकी होली की तिथि ..दीपावली की तिथि तक को ये शक्तियाँ.. दो दो दिन करा देती हैं
आप कंफ्यूज रहते हैं
होली कब है.. धुलेंडी कब है
वे ठहाके लगाते हैं

जागो.. पग पग पर षड्यंत्र हो रहे हैं
जागो हिन्दुओं जागो
🙏🙏🙏🙏
जय राम जी की

बुधवार, नवंबर 10, 2021

वाल्मीकि समाज का 1857 की क्रान्ति एवं भारत देश की आजादी का गौरवशाली इतिहास

 वाल्मीकि समाज का 1857 की क्रान्ति एवं भारत देश की आजादी का गौरवशाली इतिहास ---

(1) श्री मातादीन वाल्मीकि 1857 सैनिक विद्रोह के महा नायक जिन्हें मंगल पांडे से पहले बैरकपुर में फांसी दी गई।

(2) श्री गंगु वाल्मीकि 1857-58 के क्राँन्तिकारी सोरो एटा के जिन्हें कानपुर में फाँसी दी गई।

(3) श्री राम चन्द्र वाल्मीकि

(4) श्री किशन वाल्मीकि 10 मार्च1919 को दिल्ली में फाँसी दी गई।

(5)श्री सालव वाल्मीकि।

(6)श्री सेहजा वाल्मीकि। दोनों को क्रान्तिकारी घोषित कर दिल्ली में फाँसी दी गई।

(7) श्री बुध्दा

( श्री हरि राम

(9) श्री सुरेन सिह मजहबी

(10) श्री पल्ला वाल्मीकि। चारों महापुरुष 13 अप्रैल1919 अम्रतसर जलियावाला बाग हत्या काण्ड में ब्रिटिश सेना की गोलीबारी में शहीद।

(11) श्री शेरू लाल वाल्मीकि गाजियाबाद 1857 में शहीद

(12) श्री राम स्वरूप वाल्मीकि बिजनौर 1857 में शहीद।

(13) श्री रुढा वाल्मीकि 21 जुलाई 1857 में शहीद।

(14)श्री बालू वाल्मीकि 1857 में शहीद।

(15) श्री सत्तादीन ( सत्तीवा) इलाहाबाद बहुआ गाँव 31 जुलाई 1857 को फाँसी।

(16) श्री भूरा वाल्मीकि 1857 दिल्ली चाँदनी चौक पर फाँसी।

(17) श्री गनेशी वाल्मीकि दिल्ली नि0 18 नवम्बर 1857 को फाँसी दी गई।

(18)श्री मातादिन वाल्मीकि गुडगाँव हरियाणा नि0 15 दिसम्बर 1857 को फाँसी दी गई।

(19) श्री मनोरा वाल्मीकि दिल्ली नि0 22 फरवरी 1857 को फाँसी दी गई।

(20) श्री हरदन वाल्मीकि नि0 गाँव सिसौली मुजफ्फरनगर 1857 में शहीद।

(21) श्री रामजस वाल्मीकि नि0 गाँव नगलिया मुजफ्फरनगर 1857 में शहीद।

(22) श्री बारु वाल्मीकि नि0 गाँव मुण्डभर कैराना मुजफ्फरनगर 1857 में शहीद।
(23) श्री जमादार रजवार वाल्मीकि 20 सितम्बर 1857 में शहीद।
(24) श्री हीरा डोम 22 फरवरी 1857 में फांसी।

(25) श्री महावीर वाल्मीकि 1857 गोरखपुर में शहीद।

(26) श्री भोला वाल्मीकि अहीर जमीरा जिला आरा 1942 में शहीद।
(27) श्री ननकाऊ वाल्मीकि

(28) श्री कन्हैया लाल बक्सी बाजार इलाहाबाद दोनों को चोरी चोरा काण्ड में 12 अगस्त 1942 -45 मैं कारावास।

(29) श्री नरसिह देव जोधपुर राज0 स्वतन्त्रता सेनानी।

(30) श्री राम जी सर्वटे स्वतंत्रता सेनानी

(31) श्री काशी राम वाल्मीकि

(32) श्री अमीर चन्द्र। सूरतगंज फतेहपुर , बाराबंकी भारत छोडो आन्दोलन में 1942 में कारावास।

(33) श्री मातादीन नेता जी नि0 रामपुरवा कानपुर 15 अक्टूबर 1940 में कारावास।

(34) श्री सदन लाल वाल्मीकि स्वतंत्रता सेनानी।

(35) श्रीनाथु राम वाल्मीकि टीकम गढ म0प्र0 स्वतन्त्रता सेनानी।

(36) श्री राम किशन वाल्मीकि दिल्ली।
(37) कल्लु दास वाल्मीकि काम्टी ,नागपुर महाराष्ट्र।

(38) श्री मा0 राम नारायण वाल्मीकि मोतीलाल जयपुर

(39) श्री अजब सिह वाल्मीकि।

(40) श्री शुगन चन्द्र वाल्मीकि मुजफ्फनगर।

(41)श्री उल्फत सिह वाल्मीकि स्वतंत्रता सेनानी नि 0 भरई , भिण्ड , म0प्र0

"1857 की क्रान्ति एव भारतत्र देश की आजादी में वाल्मीकि वीरागनाओं का योगदान"

(1) श्रीमती महावीरी देवी जिन्होंने साथी महिलाओं के साथ मिलकर वर्छी भालों से 18 अंग्रेज सैनिकों को मारकर शहीद हो गई।

(2) श्रीमती रणवीरी वाल्मीकि 10 मई 1857 मैं शहीद।

(3) श्रीमती कमला मोहन्ती उडीसा 1943 मैं कारावास

(4) श्रीमती लाजो देवी

नोट: "लाजो देवी" सफाई कर्मचारी ने मंगल पांडेय को मेरठ छावनी में कारतूस में चर्बी मिले होने के बारे मे बताया था। जिसके बाद 1857 की क्रांति की शुरुआत हुई @लाजो@ नाम से एक पुस्तिका भी रजनी तिलक जी ने लिखी..... लाजो पर पुस्तक लिखने वाली लेखिका रजनी तिलक अब इस दुनिया में नहीं है।
जय वाल्मीकि जय श्री राम
🙏🚩🚩

साभार 🙏