रविवार, जून 14, 2020

कम्युनिस्ट क्या है, कौन है, थोड़ा समझिए

कोरोना के संकट मे मजदूरों की दशा बहुत परेशान करने वाली है। परन्तु क्या किसी ने सोचा कि इसका क्या कारण है ? क्यों लाखों युवाओं को मजदूरी करने के लिए अपना घर छोड़ कर दूर किसी अनजान राज्य मे जाना पड़ा। मजदूरों के स्वघोषित सबसे बड़े हितैषी कम्युनिस्टों का इतिहास कितना अच्छा है? अमेरिका मे होने स्थानीय दंगो को अवसर की तरह देखने वाले स्वघोषित बुद्धिमान भारत को भड़काना चाहते हैं।

रात दिन मजदूरों के अधिकारों की बात करने वाले कम्युनिष्ट मजदूरों को किस तरह बर्बाद कर रहे हैं.कोई कम्युनिष्ट मजदूरों को तम्बाकू छोड़ने के नहीं बोलता. मैंने किसी कम्यूनिष्ट साहित्य में एक शब्द नहीं देखा इसके बारे में. टीवी के किसी भी कार्यक्रम में ये लोग मजदूरों को नशा छोड़ने को नहीं कहते. सभी जानते हैं तम्बाकू से दमा, टी बी, फेफड़े का कैंसर, मुंह का कैंसर और अल्सर की सम्भावना कई गुणा बढ़ जाती है. जो मजदूर रोटी के लिए संकट में है वह कैंसर का इलाज कहाँ से करवाएगा.
नशे की सूईंयों लगाकर आज मजदूर रोगों का शिकार हो रहा है. मजदूरों के लिए फैक्ट्री मालिक को गाली देने वाले क्या इन नशे के चक्र को तोड़ेंगे.
शराब का कभी विरोध नहीं करते देखा. हाँ दूध देने वाली गाय के क़त्ल की वकालत जरुर करेंगे. भारतीय बंगाल (West Bengal} के मजदूरों को देने के लिए रोजगार नहीं परन्तु करोड़ों बंगलादेशी मुस्लिम बुला लिए. ये वही बंगलादेशी हैं जिन्होंने 1947 और 1971 में हिन्दूओं का और बिहारी मुसलमानों का कत्लेआम किया था.

त्रिपूरा और बंगाल का GDP Per Capita बेहद कम है. हरियाणा जैसे राज्यों से आधे से भी कम. सीधे शब्दों में -कम GDP Per Capita कम रोजगार, कम शिक्षा कम स्वास्थ्य सुविधाएं. केरल सबसे अधिक साक्षर प्रदेश है परन्तु सबसे अधिक ISIS मे जाने वाले भारतीय केरल से हैं। ये सबके मानवअधिकारों की बात करेंगे धार्मिक अधिकारों की बात करेंगे पर केरल मे सबरीमाला के भक्तो को कुचलेंगे तो बंगाल मे आनन्दमार्गी साधुओं को।

बन्द या हड़ताल का सबसे अधिक असर मजदूरों पर और विशेष रूप से दिहाड़ीदार मजदूर पर होता है. उसके बच्चे भूखे मरने लगते हैं. हडताल, बंद और दंगे में सबसे आगे बंगाल है. यदि भारत के टुकड़े करने का समर्थन चाहिए तो कम्युनिस्ट उपलब्ध हैं.. यदि 1962 में चीन युद्ध के समय सेना का सामान ले जाने वाली मजदूर यूनियन की हडताल करवानी हो तो कम्युनिष्ट उपलब्ध हैं. 35 साल का लगातार शासन कम नहीं होता.

सोनागाछी (कोलकाता } स्लम भारत ही नहीं, एशिया का सबसे बड़ा रेड-लाइट एरिया (वेश्यास्थान } है। यहां कई गैंग हैं जो इस देह-व्यापार के धंधे को चलाते हैं। इस स्लम में 18 साल से कम उम्र की कई हज़ार लड़कियां देह व्यापार में शामिल हैं। उन्‍हें बचपन से ही वो सब देखना पड़ता है जि‍सके बारे में सोचने पर हमारी रुह कांप जाए। ये काम इतना बुरा है कि इसमें मजबूरन पड़ने वाली लड़कियों के लिए बदनसीब शब्द भी बहुत हल्का है।.जिस उम्र में हमारी मां हमें दुनिया के रीति-रिवाज, लाज-शरम सिखाती हैं वहीं ये बच्चियां खुद को बेचने का हुनर सीखती हैं। 12 से 17 साल की उम्र में ये लड़कियां सीख जाती हैं कि मर्दों की हवस कैसे मिटाई जाती है। इसके बदले उन्हें 300 रुपए मिलते हैं। इन रूपयों के बदले यहां की बच्चियां मर्दों की टेबल पर तश्तरी में खाने की तरह परोस दी जाती हैं।
चिड़ियाघर में पिंजरे में कैद जानवरों की हालत से भी बदतर हालत होती है सोनागाछी में इन छोटे छोटे दडबे जैसे पिंजरों में कैद लड़कियों की बक़ायदा नुमायश होती है ताकि सडक पर आते जाते लोग उनकी अदाओं के जाल में फंस जाए। अपने अपने कोठे या कमरे के बाहर खडी होकर ये बदनसीब औरतें और लड़कियां अपने जिस्म नोचने वालों को रिझाती नज़र आती है। सडक पर बिकने वाले मुर्गे और बकरों की तरह सोनागाछी में इंसानों का बाज़ार लगता है।पत्रकारों और फोटोग्राफरों को भी ये लोग भीतर नहीं आने देतेज्यादातर बच्चियां स्कूल छोड़कर आई हैं और अब देह बेचने का पाठ पढ़ रही हैं। कुछ NGO का अध्ययन कहते हैं कि इन 35 सालों में सोनागाछी में देह-व्यापार में आने वाली लड़कियों की संख्या 10 गुणा हो गई है.

लाल आतंक या नक्सली जिसका बौद्धिक समर्थन सारे कम्युनिस्ट करते हैं।

देश में 2011-2017 के समय में माओवादी लाल आतंक की कुल 5960 घटनाएं घटीं. इन घटनाओं में :
1221 नागरिक मरे जिनमे अधिकतर आदिवासी रहे. 455 सुरक्षाकर्मियों की जान गई, 581 माओवादी आतंकवादी मारे गए.
गृहमंत्रालय से आरटीआई के तहत मिली सूचना के मुताबिक : साल 2012 से अक्टूबर 2017 तक लाल आतंकी घटनाओं में देश में कुल 91 टेलीफोन एक्सचेंज और टावरों को निशाना बनाया गया. इसी अवधि में कुल 23 स्कूलों को ध्वस्त किया इन नक्सलियों ने. साल 2012 में कुल 1415 लाल आतंक की घटनाएं हुईं, जिनमे 301 नागरिक, 114 सुरक्षाकर्मी शहीद और 74 माओवादी आतंकी मारे गए.

मानवता के दुश्मन हैं ये वामपंथ जनित लाल आतंकवादी. इनसे भी ज्यादा खतरनाक है अकादमियों, यूनिवर्सिटियों, हॉस्टलों, सेमिनारों और मीडिया आदि में बैठे वे बुद्धिखोर हैं जो इन आतंकवादियों और इनके आतंक की पैरवी, समर्थन करते हैं, इनके लिए खाद-पानी की व्यवस्था करते हैं.

कम्युनिज्म पर डॉ. अंबेडकर के विचार-
'मेरे कम्युनिस्टों से मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। अपने स्वार्थों के लिए मजदूरों का शोषण करनेवाले कम्युनिस्टों का मैं जानी दुश्मन हूं।' मार्क्सवादी तथा कम्युनिस्टों ने सभी देशों की धार्मिक व्यवस्थाओं को झकझोर दिया है। । बौध्द धर्म को मानने वाले देश, जो कम्युनिज्म की बात कर रहे हैं, वे नहीं जानते कि कम्युनिज्म क्या है। रूस के प्रकार का जो कम्युनिज्म है, वह रक्त-क्रांति के बाद ही आता है।

कम्युनिस्टों ने अपने मकसद में डॉ. अंबेडकर को अवरोध मानते हुए समय-समय पर उनके व्यक्तित्व पर तीखे प्रहार किए। पूना पैक्ट के बाद कम्युनिस्टों ने डा. अंबेडकर पर 'देशद्रोही', 'ब्रिटीश एजेंट', 'दलित हितों के प्रति गद्दारी करनेवाला', 'साम्राज्यवाद से गठजोड़ करनेवाला' आदि तर्कहीन तथा बेबुनियाद आक्षेप लगाए। इतना ही नहीं, डा. अंबेडकर को 'अवसरवादी', 'अलगाववादी' तथा 'ब्रिटीश समर्थक' बताया।
(गैइल ओंबवेडन, 'दलित एंड द डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन: डॉ. अंबेडकर एंड दी दलित मूवमेंट इन कॉलोनियल इंडिया')
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कम्युनिस्ट क्या है, कौन है, थोड़ा समझिए..
यदि आपके घर में काम करने वाले नौकर से कोई आकर कहे, कि तुम्हारा मालिक तुमसे ज्यादा क्यों कमा रहा है? तुम उसके यहां काम मत करो, उसके खिलाफ आंदोलन करो, उसे मारो और अगर जरूरत पड़े तो हथियार उठाओ, हथियार मैं ला कर दूंगा। यह सलाह देने वाला व्यक्ति कम्युनिस्ट है..अगर कोई गरीब मजदूर, जो किसी ठेकेदार या किसी पुलिस वाले का सताया हो, उसको यह कहकर भड़काना, कि पूरी सरकार तुम्हारी दुश्मन है, इन्हें मारो और अपना खुद का राज्य बनाओ। तुम्हें हथियार में दूंगा। यह आदमी कम्युनिस्ट है..अगर कोई आपके पुरखों के वैभव और शानदार इतिहास को छुपाकर आपको यह बताए, समझाए और पढ़ाए कि दूसरे देश तुम से बेहतर हैं, तुम कुछ भी नहीं हो, यह हीन भावना जगाने वाला आदमी कम्युनिस्ट है..
एक चलते हुए कारखाने को कैसे बंद करना है, एक सुरक्षित देश में कैसे सेंध लगानी है, अच्छे खासे युवा के दिमाग में कैसे देशद्रोही का बीज बोना है, किसी सिस्टम के सताए मजबूर इंसान को कैसे राष्ट्रविरोधी नक्सली बनाना है.. यह सब कम्युनिस्टों की विचारधारा है। पश्चिमी बंगाल और केरल में वामपंथी अनेक दशकों तक सत्ता में रहे लेकिन कोई आदर्श स्थापित नहीं कर पाए सिवाए आधे-अधूरे भूमिसुधार के जिसकी बदोलत वे इतने साल सत्ता में रह पाए | इसके अतिरिक्त वे कोई छाप नहीं छोड़ पाए- न भ्रष्टाचार कम हुआ, न गरीवी का उन्मूलन हुआ न उद्योग धंधे न रोजगार में वृद्धि न स्वास्थ्य और शिक्षा का विकास हुआ और न ही जातिवाद का खात्मा हो पाया |
वीडियो (अधिवक्ता श्रीमति मोनिका अरोड़ा)

गुरुवार, जून 11, 2020

मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है।

#विज्ञान_वनाम_शास्त्र_विधि 👇👇

जब किसी की मृत्यु होती थी तब भी 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था। यही Isolation period था। क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है। यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का quarantine period बनाया गया।

जो शव को अग्नि देता था उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 13 दिन तक। उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे। तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात, सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था ।

तब भी आप बहुत हँसे थे। bloody indians कहकर मजाक बनाया था।

जब किसी रजस्वला स्त्री को 4 दिन isolation में रखा जाता है ताकि वह भी बीमारियों से बची रहें और आप भी बचे रहें तब भी आपने पानी पी पी कर गालियाँ दी। और नारीवादियों को कौन कहे वो तो दिमागी तौर से अलग होती हैं उन्होंने जो जहर बोया कि उसकी कीमत आज सभी स्त्रियाँ तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर चुका रही हैं।

जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है, इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने।

आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं। जब कोई भी बहू लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों, तब तक। खूब मजाक बनाया था न।

इन्हीं सवर्णों को और ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये गलत और गंदे कार्य करने वाले माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब क वह स्नान से शुद्ध न हो जाय। ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़, बकरी, मुर्गा, कुत्ता इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे।
ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी।

यही वह गंदे कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग, टी बी, चिकन पॉक्स, छोटी माता, बड़ी माता, जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया।

आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं। Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं ।
पर शास्त्रों के उन्हीं वचनों को तो ब्राह्मणवाद/मनुवाद कहकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था।
आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है।

याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को।
यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।
शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें।
लेकिन सब आपने भुला दिया।

आपको तो अपने शास्त्रों को गाली देने में और ब्राह्मणों को अपमानित करने में उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता।

अरे समझो अपने शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा।

तुम ऐसे अपने शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति के मूर्ख 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए।

अब भी कहता हूँ अपने शास्त्रों का सम्मान करना सीखो। उनको मानो। बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है। उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके।
लेकिन गाली मत दो उसको जलाने का दुष्कृत्य मत करो।

जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है correlate कर सकता है और समझा भी सकता है।

इसे फिर से समझिए और बार बार समझिए

पता नहीं कि आप इसे पढ़ेंगे या नहीं लेकिन मेरा काम है आप लोगों को जगाना जिसको जगना है या लाभ लेना है वह पढ़ लेगा।
यह भी अनुरोध है कि आप भले ही किसी भी जाति/समाज से हों धर्म के नियमों का पालन कीजिये इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरेगा।

॥सर्वे भवन्तु सुखिनः सवेँसनतु निरामया:॥
#महादेव_की_जय_हो ❤️🙏🏼

रविवार, जून 07, 2020

जो ईरान में हुआ, भारत में भी होगा?

जो ईरान में हुआ, भारत में भी होगा? 
इस्लाम ने दुनिया की बहुत सी सभ्यताओं को लील लिया और अंधकार युग में पहुंचा दिया। ऐसा हुआ तो विश्व से सभ्यताओं के साथ ही मानवता नष्ट हो जाएगी। ईरान को इस्लामी चंगुल से छुड़ाना होगा और भारत को इस्लाम से बचाना होगा। 


क्या भारत में वही हो रहा है, जो ईरान में हुआ। इस्लाम दमनकारी है और यह मानव के जीवन में अतिक्रमण करता है.. निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर गुलामों जैसा जीवन व्यतीत करने पर मजबूर करता है.. दमन व अत्याचार के हथियार से ही ये अब तक सफलता प्राप्त करता रहा है। इन फोटो में देखिए, मजहबी कूरता का रूप। एक इस्लाम के कब्जे से पूर्व का ईरान है, जहां आनंद, स्वतंत्रता और सभ्यता है और दूसरी फोटो आज के इस्लामी अंधकार युग के ईरान की है। इसी तरह तीसरी फोटो भारत की मुसलमान महिलाओं की हैं, जिन्हें मजहबी दमन के कारण मनुष्य की तरह रहने, पहनने तक के अधिकार नहीं मिल रहे।

इस्लाम की यह रणनीति आज से नहीं, मुहम्मद के समय से है। है। काबा में 360 मूर्तियां थीं और ये मूर्तियां अलग-अलग जनजातियों के संरक्षकों की थीं। उस समय अरब में यहूदी, ईसाई, जोराष्ट्रियन, सैबियंस (लुप्त हो चुका अद्वैतवादी सम्प्रदाय) और सभी तरह के धर्मावलंबी रहते थे। ये सभी स्वंत्रतापूर्वक अपने-अपने धर्म को निभाते थे। इस्लाम के आने के साथ ही अरब में धार्मिक असहिष्णुता पैदा हुई। मुहम्मद की अगुवाई में अरब प्रायद्वीप की उन्नत सभ्यता को नष्ट कर इस्लामी अंधकार युग में डाल दिया गया। यही ईरान में हुआ और यही गजवा-ए-हिंद के रूप में भारत में भी हो रहा है।

ईरान अर्थात फारस की सभ्यता अति उन्नत थी। इस्लाम के कब्जे से पूर्व यह वही ईरान था, जहां कला, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान स्थापित था। डॉ शीरीन टी. हन्टर ने ‘ईरान डिवाइडेड: द हिस्टारिकल रूट्स ऑफ इरानियन डिबेट्स ऑन आइडेंटिटी, कल्चर...’ में लिखते हैं कि अतिवादी ईरानी स्कूल ऑफ थॉट का कहना है कि इस्लाम से पूर्व ईरान में असभ्यता और अंधकार था। जबकि सच यह है कि इस्लाम के आने के बाद ईरान अंधकारयुग में चला गया। देखते-देखते अरब और इस्लाम ईरान की महान सभ्यता को लील गए । ईसा पूर्व 550 में मदीना, बेबीलोनिया साम्राज्य को पराजित कर जिस सभ्यता को साइरस द ग्रेट ने स्थापित किया था, उसे इस्लाम ने चंद सालों में इस्लामी कू्ररता, दमन और चरमपंथ से लूट लिया। पर कहते हैं न कि जड़ें हमेशा अपनी ओर बुलाती हैं, शायद फारस के लोगों को उनकी जड़ें पुकार रही हैं और ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की उस स्वीकारोक्ति को जीना चाहते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हां, हम ईरानी आर्य हैं। आर्य भारत के लोग भी हैं और गजवा-ए-हिंद यहां भी आर्यों को समाप्त करने के लिए पूरा जोर लगा रहा है, सऊदी की वहाबी आतंकी मानसिकता की मदद से और पेट्रोडालर के टुकड़े डालकर।

ईरानी लेखक व चिंतक Dr. Naila H Shirazi कहती हैं, "ईरान में लोगों के जीवन की बेहतरी में इस्लाम का नाममात्र का भी योगदान नहीं है। इस्लाम अत्याचारी और दमनकारी है। लोकतंत्र की पुनस्र्थापना करनी ही होगी। वहां के लोगों को और मजबूती से खड़ा होना होगा और इस्लामी शासन के खिलाफ बगावत करनी होगी, क्राउन प्रिंस रजा पहलवी को अपने आंदोलन के माध्यम से ताकतवर बनाना होगा।"

ईरान उस इस्लाम के अत्याचार, चरमपंथ और कू्ररता के आगे 1979 में आखिकार पराजित हो गया। पर भारत प्रारंभ से कू्रर, बर्बर और असभ्य इस्लाम से पिछले 1400 सालों से न केवल लड़ रहा है, बल्कि इस्लाम को पराजित कर रहा है। पर इधर, स्थितियां चिंताजनक हुई हैं, खासकर भारत की आजादी के बाद सत्ता हिंदू के रूप में वेश बदलकर आए मुगल नेहरू और उनके वंशजोंं के हाथों में जाने से। ये छद्मवेषी मुगल भारत की महान सभ्यता और संस्कृति को तोडऩे में बड़े पैमाने पर कामयाब भी हो चुके हैं और इन्हें यह कामयाबी इसलिए मिली कि इन्होंने गजवा-ए-हिंद यानी भारत का इस्लामीकरण सीधा करने के बजाय हिंदू होने का मुखौटा लगाकर किया। ईरान तो अंधकार युग में है और लोकतंत्र व स्वतंत्रता दमनकारी और अत्चायारी इस्लाम के चंगुल में बेडिय़ोंं में जकडक़र रखी गई है, पर भारत में अभी भी कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों की भारतीय संस्कृति व सभ्यता के खिलाफ खतरनाक साजिशों के बावजूद लोकतंत्र का बड़ा परिमाण बचा हुआ है।

पर सवाल यह है कि कब तक? 1000 साल की गुलामी से आजादी के बाद भी भारतीय संस्कृति के प्रतीक और उसकी सबसे पवित्र भूमि प्रयाग काल्पनिक अल्लाह के नाम पर है। विश्व के आदर्श पुरुषोत्तम राम का उनके जन्म स्थान पर मंदिर तक बनाने की स्थिति नहीं है। विश्व को आलोकित करने वाले ज्ञान-विज्ञान का स्रोत वेद और गीता को सांप्रदायिक बताकर लुप्त प्राय बनाने का षडयंत्र किया जा रहा है। विश्व को ज्ञान का भंडार देने वाली संस्कृत भाषा और उसके साहित्य को लुप्त सा कर दिया गया है। जिहाद हर रूप में, भूमि जिहाद, जनसंख्या जिहाद, लव जिहाद जोरों पर चल रहा है...

विडम्बना यह है कि छद्म हिंदू (कोप्टिक मुसलमान) के सहयोग भारत की सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर दारुल-इस्लाम बनाने की मानवता के खिलाफ साजिश चल रही है। ईरान से रजा पहलवी भगाए गए, भारत से उस राजा दाहिर के वंशजों को ही मुसलमानों ने नष्ट कर दिया, जिसने मुहम्मद के परिवार के लोगों की जान बचाई थी। भारत में भी इस्लाम अपनी क्रूरता और बर्बरता का रूपरंग बदलकर अब उसी धोखेबाजी व चालबाजी से मानव सभ्यता को नष्ट करने की ओर बढ़ चला है, जो तब किया था, जब इस्लाम की शुरुआत हुई थी। भारत विरोधी व मानवता विरोधी दलों, बुद्धिजीवियों की साजिश कामयाब हुई तो इस्लाम पूरी दुनिया को निगल कर अंधकार में पहुंचा देगा। यदि भारत नाकाम हुआ तो पूरा विश्व नाकाम होगा और सभ्यता मिट जाएगी। इससे हमें लडऩा होगा, इस्लाम की साम्राज्यवादी आक्रामकता से भारतवासियों को लडऩा होगा। पूरा विश्व हमारी ओर देख रहा है, हमें बर्बर और महान सभ्यताओं को लील कर अंधकार युग में ले जाने को आतुर बर्बर, क्रूर व जेहादी इस्लाम से युद्ध जीतना ही होगा।

मंगलवार, मई 12, 2020

महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं

अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया पर 
महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं
है !

जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं ...✍️

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि

Copied from विवेकानन्द विनय

शनिवार, मई 09, 2020

हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं।

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं।

इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पाँच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है,

ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है, क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना....

महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सीमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है, वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था।

मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर आधिपत्य जमा सके, हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे,

और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा, उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था, उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फियाँ लेकर हाज़िर हुए,

इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी।

बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लड़ाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है, इसे बैटल ऑफ़ दिवेर* कहा गया गया है।

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे, कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है।

ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं, कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया, हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।

युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया। उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया, शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी कि मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है।

ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी।
बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया, दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया कि जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा,

यहाँ तक कि जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए, दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला कि अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा, उसका सर काट दिया जायेगा।इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मँगाई जाती थी।

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया कि अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली।

अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है".।*
जिन्हें अब वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।
आप भी इस प्रयास में जुड़ें।

वीर शिरोमणि #महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उनके चरणों में शत शत नमन 🚩🙏🌹

गुरुवार, मई 07, 2020

बुद्ध से बूत

ईसा से भी साढ़े पांच सौ साल पहले बुद्ध आये.. मगर बाइबिल समेत ईसाईयों की किसी भी किताब में बुद्ध का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है.. ये बताता है कि जिस सभ्यता में ईसा आये वहां बुद्ध की शिक्षा नहीं पहुंची थी.. ईसाईयत की प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ यहूदियत से थी इसलिये बाइबिल यहूदियों की किताब "तौरेत" का ही हिस्सा बन के रह गयी.. ईसाईयत और यहूदी की श्रृंखला में इस्लाम आया.. इस्लाम मे भी बुद्ध का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है.. कितनी हदीसें, कितनी इस्लामिक इतिहास की किताबें हैं मगर उनमें कहीं भी एक बार भी बुद्ध या उन से संबंधित किसी घटना का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है.. जबकि अरब के लगभग हर देवी और देवता का कहीं न कहीं किसी न किसी किताब में ज़िक्र आता ही है.. क़ुरआन में भी अरब की देवियों के नाम आये हैं

ये घटना ये बताती है कि समूचे अफगानिस्तान समेत बहुत बड़े क्षेत्र में फैला बौद्ध धर्म, अरब के लोगों तक नहीं पहुंच पाया था.. अगर पहुंचा होता तो अरब के लोग बुद्ध की भी पूजा कर रहे होते.. और तब शायद ईसाईयत और यहूदियत के "पैग़म्बरी" वाले कांसेप्ट से बाहर निकल चुके होते.. मुहम्मद साहब के समकालीन ही कम से कम बीस और लोग थे जो "पैग़म्बर" होने का दावा करते थे.. वहां बुद्ध का दर्शन पहुंचा ही नहीं था.. लोग पैग़म्बरी की होड़ में फंसे थे क्यूंकि यहूदियों और ईसाईयों के पास अपने पैग़म्बर थे मगर अरबों के पास नहीं थे.. और ये उनके लिए बड़े शर्म और दुःख की बात थी

बुद्ध ने ईसा से भी बहुत पहले देवदूत, पैग़म्बर, अवतार बनने का सारा दर्शन जड़ समूल नष्ट कर दिया था.. बुद्ध ने अपने आसपास के लोगों को इस से बाहर निकाल लिया था और उनके सामने हर तरह की पूजा और इबादत से आगे निकलकर ख़ुद के भीतर सब कुछ खोजने का मार्ग दिखाया था

ये एक नए युग का सूर्य था जो बुद्ध के साथ उदय हुआ.. मगर अरब और उसके आसपास ये प्रकाश नहीं पहुंचा और वहां अज्ञान का अंधेरा जस का तस बना रहा ।

~सिद्धार्थ ताबिश

दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती। इतिहास एक सुनियोजित षड्यंत्र

जब औरंगजेब ने मथुरा का श्रीनाथ मंदिर तोड़ा तो मेवाड़ के नरेश राज सिंह 100 मस्जिद तुड़वा दिये थे।
अपने पुत्र भीम सिंह को गुजरात भेजा, कहा 'सब मस्जिद तोड़ दो तो भीम सिंह ने 300 मस्जिद तोड़ दी थी'।

वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था और महाराज अजीत सिंह को राजा बनाकर ही दम लिया।

कहा जाता है कि दुर्गादास राठौड़ का भोजन, जल और शयन सब अश्व के पार्श्व पर ही होता था। वहाँ के लोकगीतों में ये गाया जाता है कि यदि दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती।

वीर दुर्गादास राठौड़ भी शिवाजी के जैसे ही छापामार युद्ध की कला में विशेषज्ञ थे।

मध्यकाल का दुर्भाग्य बस इतना है कि हिन्दू संगठित होकर एक संघ के अंतर्गत नहीं लड़े, अपितु भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थानीय रूप से प्रतिरोध करते रहे।

औरंगजेब के समय दक्षिण में शिवाजी, राजस्थान में दुर्गादास, पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह और पूर्व में लचित बुरफुकन, बुंदेलखंड में राजा छत्रसाल आदि ने भरपूर प्रतिरोध किया और इनके प्रतिरोध का ही परिणाम था कि औरंगजेब के मरते ही मुगलवंश का पतन हो गया।

इतिहास साक्षी रहा है कि जब जब आततायी अत्यधिक बर्बर हुए हैं, हिन्दू अधिक संगठित होकर प्रतिरोध किया है। हिन्दू स्वतंत्र चेतना के लिए ही बना है। हिंदुओं का धर्मांतरण सूफियों ने अधिक किया है। तलवार का प्रतिरोध तो उसने सदैव किया है, बस सूफियों और मिशनरियों से हार जाता है।
बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।
कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....
मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!

अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।

जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।
अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्षों तक राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?
*अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्षों तक टिका रहा।
हम्पी नगर में हीरे माणिक्य की मण्डियां लगती थीं।
महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने, 
5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 
10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 
9 नन्दों ने 100 वर्षों तक ,
12 मौर्यों ने 316 वर्षों तक ,
10 शुंगों ने 300 वर्षों तक ,
4 कण्वों ने 85 वर्षों तक ,
33 आंध्रों ने 506 वर्षों तक ,
7 गुप्तों ने 245 वर्षों तक राज्य किया ।
और पाकिस्तान के सिंध, पंजाब से लेके अफ़ग़ानिस्तान के पर समरकन्द तक राज करने वाले रघुवंशी लोहाणा(लोहर-राणा) जिन्होने देश के सारे उत्तर-पश्चिम भारत वर्ष पर राज किया और सब से ज्यादा खून देकर इस देश को आक्रांताओ से बचाया, सिकंदर से युद्ध करने से लेकर मुहम्मद गजनी के बाप सुबुकटिगिन को इनके खुद के दरबार मे मारकर इनका सर लेके मूलतान मे लाके टाँगने वाले जसराज को भुला दिया। 
कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने आरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके। और कश्मीर की सबसे ताकतवर रानी दिद्दा लोहराणा(लोहर क्षत्रिय) ने सब से मजबूत तरीके से राज किया। और सारे दुश्मनों को मार दिया।
तारीखे हिंदवा सिंध और चचनामा पहला आरब मुस्लिम आक्रमण जिन मे कराची के पास देब्बल मे 700 बौद्ध साध्विओ का बलात्कार नहीं पढ़ाया जाता। और इन आरबों को मारते हुए इराक तक भेजने वाले बाप्पा रावल, नागभट प्रथम, पुलकेसीन जैसे वीर योद्धाओ के बारेमे नहीं पढ़ाया जाता।*
फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।

उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का ........ भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों...!
तुम्हे धिक्कार है !!!

यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।

एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है। 
ये इतिहास को ऐसा प्रस्तुत करने का जिम्मेवार सिर्फ एक व्यक्ति है वो है
मौलाना आजाद
भारत का पहला केंद्रीय शिक्षा मंत्री अब यदि इतिहास में उस समय के वास्तविक हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो विपक्ष शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाता है !

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