मंगलवार, मई 12, 2020

महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं

अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया पर 
महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं
है !

जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं ...✍️

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-
1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि

Copied from विवेकानन्द विनय

शनिवार, मई 09, 2020

हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं।

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं।

इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पाँच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है,

ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है, क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना....

महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सीमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है, वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था।

मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर आधिपत्य जमा सके, हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे,

और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा, उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था, उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फियाँ लेकर हाज़िर हुए,

इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी।

बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लड़ाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है, इसे बैटल ऑफ़ दिवेर* कहा गया गया है।

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे, कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है।

ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं, कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया, हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।

युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया। उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया, शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी कि मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है।

ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी।
बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया, दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया कि जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा,

यहाँ तक कि जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए, दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला कि अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा, उसका सर काट दिया जायेगा।इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मँगाई जाती थी।

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया कि अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली।

अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है".।*
जिन्हें अब वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।
आप भी इस प्रयास में जुड़ें।

वीर शिरोमणि #महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उनके चरणों में शत शत नमन 🚩🙏🌹

गुरुवार, मई 07, 2020

बुद्ध से बूत

ईसा से भी साढ़े पांच सौ साल पहले बुद्ध आये.. मगर बाइबिल समेत ईसाईयों की किसी भी किताब में बुद्ध का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है.. ये बताता है कि जिस सभ्यता में ईसा आये वहां बुद्ध की शिक्षा नहीं पहुंची थी.. ईसाईयत की प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ यहूदियत से थी इसलिये बाइबिल यहूदियों की किताब "तौरेत" का ही हिस्सा बन के रह गयी.. ईसाईयत और यहूदी की श्रृंखला में इस्लाम आया.. इस्लाम मे भी बुद्ध का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है.. कितनी हदीसें, कितनी इस्लामिक इतिहास की किताबें हैं मगर उनमें कहीं भी एक बार भी बुद्ध या उन से संबंधित किसी घटना का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है.. जबकि अरब के लगभग हर देवी और देवता का कहीं न कहीं किसी न किसी किताब में ज़िक्र आता ही है.. क़ुरआन में भी अरब की देवियों के नाम आये हैं

ये घटना ये बताती है कि समूचे अफगानिस्तान समेत बहुत बड़े क्षेत्र में फैला बौद्ध धर्म, अरब के लोगों तक नहीं पहुंच पाया था.. अगर पहुंचा होता तो अरब के लोग बुद्ध की भी पूजा कर रहे होते.. और तब शायद ईसाईयत और यहूदियत के "पैग़म्बरी" वाले कांसेप्ट से बाहर निकल चुके होते.. मुहम्मद साहब के समकालीन ही कम से कम बीस और लोग थे जो "पैग़म्बर" होने का दावा करते थे.. वहां बुद्ध का दर्शन पहुंचा ही नहीं था.. लोग पैग़म्बरी की होड़ में फंसे थे क्यूंकि यहूदियों और ईसाईयों के पास अपने पैग़म्बर थे मगर अरबों के पास नहीं थे.. और ये उनके लिए बड़े शर्म और दुःख की बात थी

बुद्ध ने ईसा से भी बहुत पहले देवदूत, पैग़म्बर, अवतार बनने का सारा दर्शन जड़ समूल नष्ट कर दिया था.. बुद्ध ने अपने आसपास के लोगों को इस से बाहर निकाल लिया था और उनके सामने हर तरह की पूजा और इबादत से आगे निकलकर ख़ुद के भीतर सब कुछ खोजने का मार्ग दिखाया था

ये एक नए युग का सूर्य था जो बुद्ध के साथ उदय हुआ.. मगर अरब और उसके आसपास ये प्रकाश नहीं पहुंचा और वहां अज्ञान का अंधेरा जस का तस बना रहा ।

~सिद्धार्थ ताबिश

दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती। इतिहास एक सुनियोजित षड्यंत्र

जब औरंगजेब ने मथुरा का श्रीनाथ मंदिर तोड़ा तो मेवाड़ के नरेश राज सिंह 100 मस्जिद तुड़वा दिये थे।
अपने पुत्र भीम सिंह को गुजरात भेजा, कहा 'सब मस्जिद तोड़ दो तो भीम सिंह ने 300 मस्जिद तोड़ दी थी'।

वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था और महाराज अजीत सिंह को राजा बनाकर ही दम लिया।

कहा जाता है कि दुर्गादास राठौड़ का भोजन, जल और शयन सब अश्व के पार्श्व पर ही होता था। वहाँ के लोकगीतों में ये गाया जाता है कि यदि दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती।

वीर दुर्गादास राठौड़ भी शिवाजी के जैसे ही छापामार युद्ध की कला में विशेषज्ञ थे।

मध्यकाल का दुर्भाग्य बस इतना है कि हिन्दू संगठित होकर एक संघ के अंतर्गत नहीं लड़े, अपितु भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थानीय रूप से प्रतिरोध करते रहे।

औरंगजेब के समय दक्षिण में शिवाजी, राजस्थान में दुर्गादास, पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह और पूर्व में लचित बुरफुकन, बुंदेलखंड में राजा छत्रसाल आदि ने भरपूर प्रतिरोध किया और इनके प्रतिरोध का ही परिणाम था कि औरंगजेब के मरते ही मुगलवंश का पतन हो गया।

इतिहास साक्षी रहा है कि जब जब आततायी अत्यधिक बर्बर हुए हैं, हिन्दू अधिक संगठित होकर प्रतिरोध किया है। हिन्दू स्वतंत्र चेतना के लिए ही बना है। हिंदुओं का धर्मांतरण सूफियों ने अधिक किया है। तलवार का प्रतिरोध तो उसने सदैव किया है, बस सूफियों और मिशनरियों से हार जाता है।
बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।
कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....
मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!

अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।

जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।
अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्षों तक राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?
*अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्षों तक टिका रहा।
हम्पी नगर में हीरे माणिक्य की मण्डियां लगती थीं।
महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने, 
5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 
10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 
9 नन्दों ने 100 वर्षों तक ,
12 मौर्यों ने 316 वर्षों तक ,
10 शुंगों ने 300 वर्षों तक ,
4 कण्वों ने 85 वर्षों तक ,
33 आंध्रों ने 506 वर्षों तक ,
7 गुप्तों ने 245 वर्षों तक राज्य किया ।
और पाकिस्तान के सिंध, पंजाब से लेके अफ़ग़ानिस्तान के पर समरकन्द तक राज करने वाले रघुवंशी लोहाणा(लोहर-राणा) जिन्होने देश के सारे उत्तर-पश्चिम भारत वर्ष पर राज किया और सब से ज्यादा खून देकर इस देश को आक्रांताओ से बचाया, सिकंदर से युद्ध करने से लेकर मुहम्मद गजनी के बाप सुबुकटिगिन को इनके खुद के दरबार मे मारकर इनका सर लेके मूलतान मे लाके टाँगने वाले जसराज को भुला दिया। 
कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने आरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके। और कश्मीर की सबसे ताकतवर रानी दिद्दा लोहराणा(लोहर क्षत्रिय) ने सब से मजबूत तरीके से राज किया। और सारे दुश्मनों को मार दिया।
तारीखे हिंदवा सिंध और चचनामा पहला आरब मुस्लिम आक्रमण जिन मे कराची के पास देब्बल मे 700 बौद्ध साध्विओ का बलात्कार नहीं पढ़ाया जाता। और इन आरबों को मारते हुए इराक तक भेजने वाले बाप्पा रावल, नागभट प्रथम, पुलकेसीन जैसे वीर योद्धाओ के बारेमे नहीं पढ़ाया जाता।*
फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।

उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का ........ भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों...!
तुम्हे धिक्कार है !!!

यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।

एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है। 
ये इतिहास को ऐसा प्रस्तुत करने का जिम्मेवार सिर्फ एक व्यक्ति है वो है
मौलाना आजाद
भारत का पहला केंद्रीय शिक्षा मंत्री अब यदि इतिहास में उस समय के वास्तविक हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो विपक्ष शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाता है !

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रविवार, अप्रैल 26, 2020

जब इंदिरा गांधी को बताया गया कि उनका प्रिय बेटा कैंब्रिज में एक रेस्टोरेंट कम बार में वेटर का काम कर रही एंटोनियो माइनो के प्यार के कुचक्कर में है

जब इंदिरा गांधी को बताया गया कि उनका प्रिय बेटा कैंब्रिज में एक रेस्टोरेंट कम बार में वेटर का काम कर रही एंटोनियो माइनो के प्यार के चक्कर में है
तब इंदिरा गांधी ने कई लोगों को राजीव गांधी को समझाने के काम में लगाया
उसमें उस वक्त कैंब्रिज में प्रोफेसर सुब्रमण्यम स्वामी भी थे और उस वक्त कैंब्रिज में पढ़ रही बेनजीर भुट्टो भी थी
बेनजीर भुट्टो और इंदिरा गांधी में एक मां और पुत्री जैसा रिश्ता था क्योंकि इंदिरा गांधी की जीवनी पर लिखी किताब जो उनकी सहेली पुपुल जयकर ने लिखा है उसमें उन्होंने लिखा है कि इंदिरा गांधी बेनजीर भुट्टो को बहुत मानती थी
सबने राजीव गांधी को ऊंच-नीच प्रतिष्ठा इत्यादि समझाया
फिर जब इंदिरा गांधी को यह भी पता चला इस एंटोनियो माइनो का बाप इटली का एक अपराधी है जो कभी मुसोलिनी की फासीवादी संगठन में रह चुका है और एक दो बार नहीं बल्कि 26 बार जेल जा चुका है और यह लड़की अपने घर बार-बार आ रहे पुलिस से तंग आकर ही एक शरणार्थी के रूप में कैंब्रिज में आई है और एक रेस्टोरेंट कम बार में वेटर की नौकरी करके अपना गुजारा कर रही है तब इंदिरा गांधी और भी ज्यादा परेशान हो गई और उस लड़की की शिक्षा मात्र नाइंथ क्लास ही थी
राजीव गांधी नहीं माने और कहते हैं कि बच्चों की जिद के आगे बड़े बड़े लोग हार जाते हैं
उसके बाद एंटोनियो माइनो को भारत बुलाया गया और इंदिरा गांधी ने कुछ दिनों तक हिंदी और भारतीय तौर तरीके सीखने के लिए उसे अमिताभ बच्चन के घर ठहराया
जहां अमिताभ बच्चन की मां स्वर्गीय तेजी बच्चन और अमिताभ बच्चन के पिता तथा अजीताभ बच्चन अमिताभ बच्चन दोनों भाई सब लोग जो भारतीय संस्कृति के तौर तरीके सिखाने लगे
फिर राजीव गांधी और एंटोनियो माइनो उर्फ सोनिया गांधी की सगाई वही अमिताभ बच्चन के बंगले में हुई थी जिसमें सोनिया गांधी के मां का पूरा रस्म अमिताभ बच्चन की मां श्रीमती तेजी बच्चन ने निभाया था
खैर ये तो पहला पार्ट है अब दूसरा पार्ट जानिए जो बेहद ज्यादा खतरनाक है
अमिताभ बच्चन परिवार दशकों तक कांग्रेस का वफादार रहा राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन अच्छे दोस्त थे
राजीव गांधी के कहने पर अपने फिल्मी कैरियर के पीक के दौरान अमिताभ बच्चन ने फिल्मी दुनिया छोड़कर राजनीति में कदम रखा इलाहाबाद से चुनाव लड़े और तब के बहुत बड़े नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की जमानत जप्त करवा दी
लेकिन राजनीति काली कोठरी में अमिताभ बच्चन अपने आप को बचा नहीं पाए और बोफोर्स में दलाली का दाग उनके ऊपर भी लगा और उन्होंने राजनीति से सन्यास लेकर वापस फिल्मी दुनिया में चले गए
फिर अमिताभ बच्चन कर्ज के जाल में उलझ गए और तब समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह सहारा ग्रुप के सुब्रत राय सहारा जैसे लोगों ने उन्हें मदद करके कर्जे के जाल से मुक्ति दिलाई
अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई
फिर अमिताभ बच्चन और फर्जी गांधी परिवार के बीच में तल्खी और दूरियां बढ़ गई
उसी दरम्यान अमिताभ बच्चन की मां श्रीमती तेजी बच्चन का निधन हुआ और आगे जो मैं बात बताने जा रहा हूं यह बात खुद अमिताभ बच्चन जी ने एक टीवी चैनल पर कहा था
अमिताभ बच्चन ने यह बताया कि मुझे पूरा यकीन ही नहीं बल्कि विश्वास था कि मेरे मां के अंतिम संस्कार में गांधी परिवार जरूर आएगा क्योंकि मेरी मां ने सोनिया गांधी के मां की भूमिका निभाई थी मेरी मां की गोद में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी खेले हैं कूदे हैं और मैंने अंतिम संस्कार में 4 घंटे तक विलंब किया क्योंकि मैं गांधी परिवार के लोगों का इंतजार कर रहा था फिर अंत में तेजी बच्चन जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया और गांधी परिवार से कोई भी व्यक्ति श्रीमती तेजी बच्चन के अंतिम संस्कार में नहीं गया
और अमिताभ बच्चन ने एक यह भी लाइन जोड़ा था वह राजा है हम रंक हैं भला एक राजा रंक के अंतिम संस्कार में क्यों आएगा ? आखिर एक राजा एक रंक से रिश्ता क्यों रखेगा??
अमिताभ बच्चन की यह लाइन फर्जी गांधीओं के गाल पर सबसे बड़ा तमाचा है
सोचिए आज जो यह कांग्रेसी चमचे जगह-जगह एंटोनियो माइनो उर्फ सोनिया गांधी को मां बता रहे हैं भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत बता रहे हैं इन कांग्रेसी चमचों को पता होना चाहिए की सनातन संस्कृति में जन्म देने वाली मां से भी बड़ा दर्जा कन्यादान देने वाली मां का होता है और सोनिया गांधी सिर्फ और सिर्फ घमंड अहंकार से ही अपनी कन्यादान करने वाली मां तेजी बच्चन के अंतिम संस्कार में नहीं गई
और ऐसी नीच हरकत एक विदेशी संस्कृति में पली-बढ़ी और विदेशी संस्कृति को मानने वाली महिला ही कर सकती है कभी कोई भारतीय संस्कृति वाली महिला नहीं कर सकती
◆ Jitendra pratap singh ◆

कुमारिल का आत्मदाह

कुमारिल का आत्मदाह
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कुमारिल भट्ट ने आत्मदाह क्यों किया था? यह मध्यकालीन भारत का एक यक्षप्रश्न है। उन्हें किसी ने बाध्य नहीं किया था, उन्होंने स्वयं ही इसका चयन किया। वैसा करने के अनुल्लंघ्य कारण भी न थे। उन्हें कौन-सी ग्लानि और व्यथा थी, भांति-भांति से इसकी व्याख्या की जाती है। किंतु इसका सबसे बड़ा कारण सनातन धर्म और बौद्धों के बीच उस काल में चल रहे संघर्ष में निहित था। जिस ताप ने कुमारिल को भस्म कर दिया, उसके मूल में वैदिक धर्म के पराभव से उपजा शोक था। वास्तव में कुमारिल सनातन परम्परा के महान हुतात्मा हैं!
कुमारिल मीमांसक थे। मीमांसा दर्शन के भाट्टमत के प्रतिपादक थे! उनके ग्रंथ "श्लोकवार्तिक" की बड़ी प्रतिष्ठा थी। मण्डन मिश्र उन्हीं के शिष्य थे। फिर उन्होंने आत्मनाश क्यों कर लिया? वास्तव में, उस कालखण्ड यानी आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में बौद्धों का वर्चस्व था। वेदों को अप्रामाणिक सिद्ध करने में बौद्धों ने पूरी शक्ति लगा दी थी और उन्हें राज्याश्रय प्राप्त था। बौद्ध-नैयायिकोंकी तब तूती बोलती थी। उनके तर्क अकाट्य मान लिए गए थे। नागार्जुन, वसुबंधु, धर्मकीर्ति और दिंगनाग जैसे बौद्ध दार्शनिकों की बातों का कोई तोड़ तब वैदिक धर्मावलम्बियों के पास नहीं था।
कुमारिल इससे बड़े विक्षुब्ध रहते थे। उन्होंने सोचा कि बौद्धों की तर्क-प्रणाली को जानने के बाद ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। यह निश्चय करके वे नालंदा गए, बौद्ध मत स्वीकार किया और बौद्ध दर्शन के प्रकांड विद्वान धर्मपाल के सान्निध्य में अध्ययन करने लगे। एक दिन की बात है! आचार्य धर्मपाल वैदिक धर्म में निहित दोषों का निर्ममता से उद्घाटन कर रहे थे। उनमें कटाक्ष की वृत्ति बहुत सघन थी, अतएव वे नाना प्रकार से वैदिक धर्म पर कटाक्ष भी करते जा रहे थे। कुमारिल यह सहन नहीं कर पाए। उनकी आंखों से आंसू फूट पड़े।
इधर कुमारिल की आंखों से अश्रुधारा बही, उधर उनका रहस्य खुला। वे आचार्य से बोल पड़े : "आप क्या जानें वेद-विद्या की श्रेष्ठता!" अहिंसा का उपदेश देने वाले आचार्य को इस पर क्रोध आ गया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा : "इस मूढ़ को विहार के शिखर से नीचे धकेल दो, देखते हैं कौन-सा वेद इसकी रक्षा करता है!" कुमारिल को शिखर पर ले जाया गया। नीचे धकेले जाने से पूर्व कुमारिल ने कहा : "यदि वेद प्रमाण हैं तो मेरे प्राण बचे रहें!" कुमारिल बच गए, किंतु अपने वाक्य में "यदि" लगा देने के कारण उनकी एक आंख फूट गई!
कुमारिल को किस बात की ग्लानि थी? शायद इसकी कि उन्होंने मीमांसक के रूप में ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया। या इसकी कि बौद्धों की तर्क-प्रणाली जानने के लिए उन्होंने बौद्ध मत स्वीकार किया। या इसकी कि उन्होंने वेदों पर संशय करके अपनी एक आंख गंवा दी। किंतु शायद ग्लानि से बढ़कर उन्हें इस बात का शोक था कि वे अपनी समस्त क्षमताओं के बावजूद वैदिक धर्म की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।
प्रयाग में संगम पर उन्होंने आत्मदाह का निर्णय लिया। भूसे की ढेरी को सुलगाकर उसमें जा बैठे। उनके शरीर का निचला हिस्सा प्राय: जल गया और वक्ष और शीशस्थल शेष रह गया, तब शंकर उनके दर्शन को पहुंचे। शंकर ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा था किंतु वह बहुत दुर्बोध था। वे कुमारिल की कीर्ति से परिचित थे। वे चाहते थे कि कुमारिल उस भाष्य पर वार्तिक लिखें। यही मनोरथ बांधकर वे प्रयाग आए किंतु यहां धू-धू जलते आचार्य को देखकर वे स्तब्ध रह गए।
कुमारिल का आत्मदाह करना और ऐन उसी अवसर पर शंकर का उनके पास पहुंचना- यह मध्यकालीन भारत के इतिहास में केंद्रीय महत्व की घटना है। शंकर ने कुमारिल को ब्रह्मसूत्र का अपना भाष्य दिखलाया तो उनकी आंखों में चमक आ गई। जो काम वो पूरा नहीं कर सके थे, उसे शंकर पूरा करेंगे, यह उन्हें विश्वास हो गया। मृत्यु से क्षोभ चला गया, उसमें आत्मबलिदान की दीप्ति आ गई। उन्होंने शंकर को आशीष देते हुए कहा कि मण्डन से शास्त्रार्थ करो और विजयी होओ। मण्डन तो उन्हीं के शिष्य थे, फिर उन्होंने शंकर को विजय का आशीष क्यों दिया? इसलिए, क्योंकि वे जान गए थे कि अब अद्वैत-वेदान्त ही सनातन धर्म की रक्षा कर सकता है और इसके लिए मीमांसकों को पीछे हटना होगा। शंकर ने यही कर दिखाया। अकेले अपने बूते वे भारत में सनातन धर्म की पुन:प्रतिष्ठा करने में सफल रहे। बौद्धों का तब जो पराभव हुआ तो आज तक वे भारत में अपनी धरती नहीं पा सके।
सनातन धर्म पर इससे बड़ा संकट इससे पहले कभी नहीं आया था। ना ही उसके बाद कभी आया। यों तो कालान्तर में सनातन धर्म पर यवनों, म्लेच्छों, विधर्मियों, विदेशियों ने अनेक प्रहार किए, किंतु वे सभी बाहरी आक्रमण थे, उसकी मूल दार्शनिक-मान्यताओं को तो बौद्धों ने ही सबसे प्रमुख चुनौती दी थी। बीसवीं सदी के बीच में नवबौद्धों ने अवश्य एक कथित धर्म-आंदोलन चलाया था। बौद्ध धर्म उनके लिए राजनीतिक पूंजी की तरह था। भीमराव की नीति अतीत के प्रेतों को जगाकर हिंदू धर्म पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की थी। किंतु उनके सामाजिक न्याय का चाहे जो हुआ हो, उनके नवबौद्धों का कोई नामलेवा आज नहीं है। आधुनिक काल में वामधारा के द्वारा सनातन के मानमर्दन के यत्किंचित प्रयत्न किए जाते हैं, किंतु वे इतने उपहास्य हैं कि उनकी बात करना भी उन्हें महत्व देना है।
मध्यकाल के वज्रयानियों से लेकर आधुनिक काल के नवबौद्धों और वामपंथियों तक- ये सभी भारत से सनातन के उन्मूलन में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं? इसका संकेत शंकर-मण्डन संवाद में मिलता है। मण्डन ने शंकर से कहा था- वेद का अभिप्राय है विधि का प्रतिपादन करना और उपनिषद स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं। मैं तो विधि की ही बात करूंगा। इसके प्रत्युत्तर में शंकर ने जीव-ब्रह्मैक्य का सिद्धांत प्रतिपादित किया और यह तर्क देकर मण्डन को निरुत्तर कर दिया कि जिसे प्रमाण से सिद्ध किया जा सकता हो, वह पूर्णब्रह्म नहीं हो सकता। मण्डन को हार मानना पड़ी। कुमारिल यह जानते थे, इसलिए उन्होंने शंकर को विजय का आशीष दिया था। वे अपनी मृत्युशैया पर अद्वैत-वेदान्त के सामर्थ्य को पहचान गए थे।
शंकर न तो वेदविरुद्ध थे, न ही विधि-विरुद्ध, किंतु उन्होंने औपनिषदिक प्रविधि इसलिए अपनाई, क्योंकि वे जानते थे कि विधि को चुनौती दी जा सकती है, किंतु स्वरूप का खण्डन नहीं किया जा सकता। यह वही स्वरूप है, जिससे बुद्ध के अनित्य को भी प्राणधारा मिलती थी। मण्डूक्योपनिषद में बौद्ध और वेदान्त के सूत्र एकमेक हो जाते थे। स्वरूप को साध लिया तो फिर धर्म की भी रक्षा हो सकेगी, यह शंकर के उद्यम के मूल में था।
आज जो भी सनातन-धर्म की विधियों पर प्रहार करते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उसके स्वरूप को नष्ट किए बिना भारत से सनातन-धर्म का उन्मूलन नहीं किया जा सकता, और भारत के गुणसूत्र इस स्वरूप से इतने अविच्छिन्न हो गए हैं कि इसे नष्ट करना सम्भव नहीं। प्रयाग में त्रिवेणी-संगम पर तुषानल के दाह में कुमारिल को जिस तत्व का बोध हो गया था, जिसकी धर्मध्वजा शंकर ने चतुर्दिक फहराई, उसकी मानहानि करना कम से कम वामाचारी विदूषकों के बस का रोग नहीं है। इति।
#सुशोभित

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2020

भारत में विज्ञान पर इतना शोध किस प्रकार होता था जाने गुरुकुल को

"भारत में ७ लाख ३२ हज़ार गुरुकुल एवं विज्ञान की २० से अधिक शाखाए थी।"
भारत में विज्ञान पर इतना शोध किस प्रकार होता था, तो इसके मूल में है भारतीयों की जिज्ञासा एवं तार्किक क्षमता, जो अतिप्राचीन उत्कृष्ट शिक्षा तंत्र एवं अध्यात्मिक मूल्यों की देन है। "गुरुकुल"के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है। भारत में विज्ञान की २० से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख
१. खगोल शास्त्र
२. नक्षत्र शास्त्र
३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान
४. धातु शास्त्र
५. रसायन शास्त्र
६. स्थापत्य शास्त्र
७. वनस्पति विज्ञान
८. नौका शास्त्र
९. यंत्र विज्ञान आदि इसके अतिरिक्त शौर्य (युद्ध) शिक्षा आदि कलाएँ भी प्रचुरता में रही है। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते थे।
थोमस मुनरो सन १८१३ के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में ४०० लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेरने सन १८२२ में लिखा है, उत्तर भारत में २०० लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है "भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में ८० सहस्त्र (हज़ार) से अधिक गुरुकुल है जो की कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है"।
उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में १८ वी शताब्दी तक ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की १८ शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग २० करोड़ थी, ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में ७ लाख ३२ सहस्त्र गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार १८२२ के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग ७ लाख ३२ सहस्त्र थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल। १६ से १७ वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी १८ वी शताब्दी में यहीं लिखा की "भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं"।
राजा की सहायता के अपितु, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण १८ शताब्दी तक भारत में साक्षरता ९७% थी, बालक के ५ वर्ष, ५ माह, ५ दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम १४ वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः २० से अधिक विषयों का अध्यन कर गुरुकुल से निकलता था। तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।
इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो २००० वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र १५०-१७० वर्ष पूर्व भी भारत में ५००-५२५ के लगभग विश्वविद्यालय थे। थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) जिन्हें पहले हमने विराम दिया था जब सन १८३४ आये तो कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गए की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाश करने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत कदापि पददलित नहीं किया जा सकेगा, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का हेतु सिद्ध हो सकता है। इसी कारण "इंडियन एज्यूकेशन एक्ट"बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।
उस पर से अंग्रेजी कदाचित शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं होती तो इस कुचक्र के पहले अंकुर माता पिता ही पल्लवित होने से रोक लेते परंतु ऐसा हो न सका। हमारे निर्यात कारखाने एवं उत्पाद की कमर तोड़ने हेतु भारत में स्वदेशी वस्तुओं पर अधिकतम कर देना पड़ता था एवं अंग्रेजी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया गया था। कृषकों पर तो ९०% कर लगा कर फसल भी लूट लेते थे एवं "लैंड एक्विजिशन एक्ट"के माध्यम से सहस्त्रो एकड़ भूमि भी उनसे छीन ली जाती थी, अंग्रेजो ने कृषकों के कार्यों में सहायक गौ माता एवं भैसों आदि को काटने हेतु पहली बार कलकत्ता में कसाईघर चालू कर दिया, लाज की बात है वह अभी भी चल रहा है। सत्ता हस्तांतरण के दिवस (१५-८-१९४७ ) के उपरांत तो इस कुचक्र की गोरे अंग्रेजो पर निर्भरता भी समाप्त हो गई, अब तो इसे निर्बाधित रूप से चलने देने के लिए बिना रीढ़ के काले अंग्रेज भी पर्याप्त थे, जिनमें साहस ही नहीं है भारत को उसके पूर्व स्थान पर पहुँचाने का |
"दुर्भाग्य है की भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषों को भूल चुके है। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिक ग्रंथि से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है"
डॉ.कलाम, "भारत २०२० : सहस्त्राब्दी"
आप सोच रहे होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चों के लिए सार्वजानिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैण्ड में सन १८६८ में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका में अर्थात जब भारत में प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल था, ९७ % साक्षरता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी की शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए बाकी सब को तो सेवा करनी है।
#साभार