बुधवार, सितंबर 26, 2018

हिन्दू युवा तेजी से नास्तिक क्यों हो रहे है?

हिन्दू युवा तेजी से नास्तिक क्यों हो रहे है?
मेरे मित्र ने एक प्रश्न पूछा। हमारे देश के हिन्दू युवा बड़ी तेजी से नास्तिक क्यों बनते जा रहे है? इसका मुख्य कारण क्या है? उनकी हिन्दू धर्म की प्रगति में क्यों कोई विशेष रूचि नहीं दिखती?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न था। भारत के महानगरों से लेकर छोटे गांवों तक मुझे यह समस्या दिखी। इस प्रश्न के उत्तर में हिन्दू समाज का हित छिपा है। अगर इसका समाधान किया जाये तो भारत भूमि को संसार का आध्यात्मिक गुरु बनने से दोबारा कोई नहीं रोक सकता।
हिन्दू युवाओं के नास्तिक बनने के मुख्य चार कारण है।
1. हिन्दू समाज के धर्मगुरु में दूरदृष्टि की कमी होना है।
2. दूसरा कारण मीडिया में हिन्दू धर्मगुरुओं को नकारात्मक रूप से प्रदर्शित करना है।
3. हिन्दू विरोधी ताकतों द्वारा प्रचंड प्रचार है।
4. हिंदुओं में संगठन का अभाव
1. हिन्दू समाज के धर्मगुरु में दूरदृष्टि की कमी होना है।
हिन्दू समाज के धर्मगुरु अपने मठ बनाने में, धन जोड़ने में, पाखंड और अन्धविश्वास फैलाने में अधिक रूचि रखते है। हिन्दू समाज के युवाओं में ईसाई धर्मान्तरण,लव जिहाद, नशा, भोगवाद,चरित्रहीनता, नास्तिकता,अपने धर्मग्रंथों के प्रति अरुचि आदि समस्याएं दिख रही हैं। शायद ही कोई हिन्दू धर्मगुरु इन समस्याओं के निवारण पर ध्यान देता हैं। युवाओं की धर्म के प्रति बेरुखी का एक अन्य कारण उन्हें किसी भी धर्मगुरु द्वारा उचित मार्गदर्शन नहीं मिलना हैं। हिन्दू धर्मगुरु ज्यादा से ज्यादा करोड़ो एकत्र कर कोई बड़ा मंदिर बने लेंगे , अथवा कोई सत्संग कर लेंगे। इससे आगे समाज को दिशा निर्देश देने में उनकी कोई योजना नहीं दिखती।
2. दूसरा कारण मीडिया में हिन्दू धर्मगुरुओं को नकारात्मक रूप से प्रदर्शित करना है।
मीडिया की भूमिका भी इस समस्या को बढ़ाने में बहुत हद तक जिम्मेदार है। आशाराम बापू, शंकराचार्य का जेल भेजना, नित्यानंद की अश्लील सीडी, निर्मल बाबा और राधे माँ जैसे तथाकथित धर्मगुरुओं के कारनामों को मीडिया प्राइम टाइम, ब्रेकिंग न्यूज़, पैनल डिबेट आदि में घंटों, बार-बार, अनेक दिनों तक दिखाता हैं। जबकि मुस्लिम मौलवियों और ईसाई पादरियों के मदरसे में यौन शोषण, बलात्कार, मुस्लिम कब्रों पर अन्धविश्वास, चर्च में समलेंगिकता एवं ननों का शोषण, प्रार्थना से चंगाई आदि अन्धविश्वास आदि पर कभी कोई चर्चा नहीं दिखाता। इसके ठीक विपरीत मीडिया वाले ईसाई पादरियों को शांत, समझदार, शिक्षित, बुद्धिजीवी के रूप में प्रदर्शित करते हैं। मुस्लिम मौलवियों को शांति का दूत और मानवता का पैगाम देने वाले के रूप में मीडिया में दिखाया जाता है।
मीडिया के इस दोहरे मापदंड के कारण हिन्दू युवाओं में हिन्दू धर्म और धर्मगुरुओं के प्रति एक अरुचि की भावना बढ़ने लगती हैं। ईसाई और मुस्लिम धर्म के प्रति उनके मन में श्रद्धाभाव पनपने लगता हैं। इसका दूरगामी परिणाम अत्यंत चिंताजनक है। हिन्दू युवा आज गौरक्षा, संस्कृत, वेद, धर्मान्तरण जैसे विषयों पर सकल हिन्दू समाज के साथ खड़े नहीं दीखते। क्योंकि उनकी सोच विकृत हो चुकी है। वे केवल नाममात्र के हिन्दू बचे हैं। हिन्दू समाज जब भी विधर्मियों के विरोध में कोई कदम उठाता है तो हिन्दू परिवारों के युवा हिंदुओं का साथ देने के स्थान पर विधर्मियों के साथ अधिक खड़े दिखाई देते हैं। हम उन्हें साम्यवादी, नास्तिक, भोगवादी, cool dude कहकर अपना पिंड छुड़ा लेते है। मगर यह बहुत विकराल समस्या है जो तेजी से बढ़ रही है। इस समस्या को खाद देने का कार्य निश्चित रूप से मीडिया ने किया है।
3. हिन्दू विरोधी ताकतों द्वारा प्रचंड प्रचार है।
भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ पर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं से अधिक अधिकार अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमानों और ईसाईयों को मि;मिले हुए हैं। इसका मुख्य कारण जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद आदि के नाम पर आपस में लड़ना है। इस आपसी मतभेद का फायदा अन्य लोग उठाते है। एक मुश्त वोट डाल कर पहले सत्ता को अपना पक्षधर बनाया गया। फिर अपने हित में सरकारी नियम बनाये गए। इस सुनियोजित सोच का परिणाम यह निकला कि सरकारी तंत्र से लेकर अन्य क्षेत्रों में विधर्मियों को मनाने ,उनकी उचित-अनुचित मांगों को मानने की एक प्रकार से होड़ ही लग गई। परिणम की हिंदुओं के देश में हिंदुओं के अराध्य, परंपरा, मान्यताओं पर तो कोई भी टिका-टिप्पणी आसानी से कर सकता है। जबकि अन्य विधर्मियों पर कोई टिप्पणी कर दे तो उसे सजा देने के लिए सभी संगठित हो जाते है। इस संगठित शक्ति, विदेशी पैसे के बल पर हिंदुओं के प्रति नकारात्मक माहौल देश में बनाया जा रहा है। ईसाई धर्मान्तरण सही और शुद्धि/घर वापसी को गलत बताया जा रहा है। मांसाहार को सही और गोरक्षा को गलत बताया जा रहा है। बाइबिल/क़ुरान को सही और वेद-गीता को पुरानी सोच बताया जा रहा है।
विदेशी आक्रांता गौरी-गजनी को महान और आर्यों को विदेशी बताया जा रहा है। इस षड़यंत्र का मुख्य उद्देश्य हिन्दू युवाओं को भ्रमित करना और नास्तिक बनाना है। इससे हिन्दू युवाओं अपने प्राचीन इतिहास पर गर्व करने के स्थान पर शर्म करने लगे। ऐसा उन्हें प्रतीत करवाया जाता है। हिन्दू समाज के विरुद्ध इस प्रचंड प्रचार के प्रतिकार में हिंदुओं के पास न कोई योजना है और न कोई नीति है।
4. हिंदुओं में संगठन का अभाव
हिन्दू समाज में संगठन का अभाव होना एक बड़ी समस्या है। इसका मुख्य कारण एक धार्मिक ग्रन्थ वेद, एक भाषा हिंदी, एक संस्कृति वैदिक संस्कृति और एक अराध्य ईश्वर में विश्वास न होना है। जब तक हिन्दू समाज इन विषयों पर एक नहीं होगा तब तक एकता स्थापित नहीं हो सकती। यही संगठन के अभाव का मूल कारण है। स्वामी दयानंद ने अपने अनुभव से भारत का भ्रमण कर हिंदुओं की धार्मिक अवनति की समस्या के मूल बीमारी की पहचान की और उस बीमारी की चिकित्सा भी बताई। मगर हिन्दू समाज उनकी बात को अपनाने के स्थान पर एक नासमझ बालक के समान उन्हीं का विरोध करने लग गया। इसका परिणाम अत्यंत विभित्स निकला। मुझे यह कहते हुए दुःख होता है कि जिन हिंदुओं के पूर्वजों ने मुस्लिम आक्रांताओं को लड़ते हुए युद्ध में यमलोक पंहुचा दिया था उन्हीं वीर पूर्वजों की मुर्ख सनातन आज अपनी कायरता का प्रदर्शन उन्हीं मुसलमानों की कब्रों पर सर पटक कर करती हैं।
राम और कृष्ण की नामलेवा संतान आज उन्हें छोड़कर साईं बाबा और चाँद मुहम्मद की कब्रों पर शिरडी जाकर सर पटकती है। चमत्कार की कुछ काल्पनिक कहानिया और मीडिया मार्केटिंग के अतिरिक्त साईं बाबा में मुझे कुछ नहीं दीखता। मगर हिन्दू है कि मूर्खों के समान भेड़ के पीछे भेड़ के रूप में उसके पीछे चले जाते हैं। जो विचारशील हिन्दू है वो इस मूर्खता को देखकर नास्तिक हो जाते हैं। जो अन्धविश्वासी हिन्दू है वो भीड़ में शामिल होकर भेड़ बन जाते हैं। मगर हिंदुओं को संगठित करने और हिन्दू समाज के समक्ष विकराल हो रही समस्यों को सुलझाने में उनकी कोई रूचि नहीं है। अगर हिन्दू समाज संगठित होता तो हिन्दू युवाओं को ऐसी मूर्खता करने से रोकता। मगर संगठन के अभाव में समस्या ऐसे की ऐसी बनी रही।
इस उत्तर को पढ़कर पाठक अपने चारों और भ्रमित हो रहे हिन्दू युवाओं को बचाने का प्रयास करेगे। ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।
साभार व्हाट्सएप

सोमवार, सितंबर 24, 2018

सिखों और हिन्दुओ में अलगाववाद ??

हिंदु और सिखों में अलगांव वाद पैदा करनेवाले जरा एक बार बज्जर सिंह का चरित्र पढ़ ले -
सरदार बज्जर सिंह राठौड़ के विषय में, जिनका देश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है बहुत कम लोग इससे परिचित हैँ।
सरदार बज्जर सिंह राठौड सिक्खो के दसवे गुरू श्री गोविंद सिंह जी के गुरू थे ,जिन्होने उनको अस्त्र शस्त्र चलाने मे निपुण बनाया था। बज्जर सिंह जी ने गुरू गोविंद सिंह जी को ना केवल युद्ध की कला सिखाई बल्कि उनको बिना शस्त्र के द्वंद युद्ध, घुड़सवारी, तीरंदाजी मे भी निपुण किया। उन्हे राजपूत -मुगल युद्धो का भी अनुभव था और प्राचीन भारतीय युद्ध कला मे भी पारंगत थे। वो बहुत से खूंखार जानवरो के साथ अपने शिष्यों को लडवाकर उनकी परिक्षा लेते थे। गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने ग्रन्थ बिचित्तर नाटक मे इनका वर्णन किया है। उनके द्वारा आम सिक्खो का सैन्यिकरण किया गया जो पहले ज्यादातर किसान और व्यापारी ही थे और भारतीय martial art गटखा का प्रशिक्षण भी दिया, ये केवल सिक्ख ही नही बल्की पूरे देश मे क्रांतिकारी परिवर्तन साबित हुआ।
बज्जर सिंह राठौड जी की इस विशेषता की तारीफ ये कहकर की जाती है कि जो कला सिर्फ राजपूतों तक सीमित थी उन्होंने मुग़लो से मुकाबले के लिये उसे खत्री सिक्ख गुरूओ को भी सिखाया, जिससे पंजाब में हिन्दुओ की बड़ी आबादी जिसमे आम किसान, मजदूर, व्यापारी आदि शामिल थे, इनका सैन्यकरण करना संभव हो सका।
===पारिवारिक पृष्टभूमि===
बज्जर सिंह जी सूर्यवंशी राठौड राजपूत वंश के शासक वर्ग से संबंध रखते थे। वो मारवाड के राठौड राजवंश के वंशंज थे --
वंशावली--
राव सीहा जी
राव अस्थान
राव दुहड
राव रायपाल
राव कान्हापाल
राव जलांसी
राव चंदा
राव टीडा
राव सल्खो
राव वीरम देव
राव चंदा
राव रीढमल
राव जोधा
राव लाखा
राव जोना
राव रामसिंह प्रथम
राव साल्हा
राव नत्थू
राव उडा ( उडाने राठौड इनसे निकले 1583 मे मारवाड के पतंन के बाद पंजाब आए)
राव मंदन
राव सुखराज
राव रामसिंह द्वितीय
सरदार बज्जर सिंह ( अपने वंश मे सरदार की उपाधि लिखने वाले प्रथम व्यक्ति) इनकी पुत्री भीका देवी का विवाह आलम सिंह चौहान (नचणा) से हुआ जिन्होंने गुरू गोविंद सिंह जी के पुत्रो को शस्त्र विधा सिखाई--।
1710 ईस्वी के चॉपरचिरी के युद्ध में इन्होंने भी बुजुर्ग अवस्था में बन्दा सिंह बहादुर के साथ मिलकर वजीर खान के विरुद्ध युद्ध किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।
स्त्रोत : गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा कृत-बिचित्तर नाटक
साभार विवेक आर्य

शनिवार, सितंबर 15, 2018

सिख पंथ हिन्दू समाज का अंग क्यों है?

सिख पंथ हिन्दू समाज का अंग क्यों है?
(सिख पंथ में अलगाववाद का विचार सन 1920 के दशक में अंग्रेजों द्वारा पोषित किया गया। आज इसे पाकिस्तान बढ़ावा दे रहा हैं। उससे पहले के सिख विचारक अलगाववाद के विपरीत हिन्दू समाज एक अंग के रूप में सिख पंथ मानते थे। श्री आनन्दपुर साहिब के तत्कालीन गद्दीनशीन टिक्का साहिब सोढी नारायण सिंह की रचना ख़ालसा धर्मशास्त्र पूर्वमीमांसा, श्री गुरमत प्रेस, अमृतसर, १९७० विक्रमी ,१९१३ ईसवी के प्रमुख अंश का हिन्दी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा हैं। इसके अनुवादक स्वर्गीय श्री राजेन्द्र सिंह जी हैं।)
सारे हिन्दू-सम्प्रदायों की एकता की प्रतीक
गोमाता और उसकी रक्षा
साधारण रूप से ऐसे लोगों को ही हिन्दू कहा जाता है जो वेदों को इष्ट मानते हुए देवी, देवताओं और अव-तारों की मूर्तियां पूजते हैं, यज्ञोपवीत धारण करते और तिलक लगाते हैं तथा ब्राह्मणों के कर्मकाण्डों के प्रभाव-अधीन आए हुए लोग हैं। परन्तु वास्तव में केवल इन को ही हिन्दू मान लेना ठीक नहीं है क्योंकि चारों वर्ण और चारों आश्रमों के सारे लोग यज्ञोपवीत धारण करने वाले नहीं हैं, इस पर भी सारे ही हिन्दू हैं।
आर्यसमाजी लोग वेदों को तो इष्ट मानते हैं परन्तु ब्राह्मणों के प्रभावाधीन नहीं हैं। वे न तो ब्राह्मणों के कर्मकाण्ड को मानते हैं और न ही पुराणों, अवतारों, देवी-देवताओं और तीर्थों-पितरों को मानते है, फिर भी वे हिन्दू हैं।
उसी प्रकार जैनमतावलम्बी और बौद्धमतावलम्बी, जो वेदों का खण्डन करते हैं, भी हिन्दू ही हैं। इसी प्रकार चारवाकी और आज के देवसमाजी इत्यादि भी, जो ईश्वर के अस्तित्व को ही नहीं मानते और न ही परलोक को मानते हैं, हिन्दू ही हैं।
ब्रह्मसमाजी, जो वेदों को अन्य मज़हबों की मान्य पुस्तकों से विशिष्ट नहीं मानते, भी हिन्दू कहलाने के ही दावेदार हैं।
इसी प्रकार अन्यान्य मत-मतान्तरों के सारे लोग, जो ब्राह्मणों के मत से मतभिन्नता रखते हैं, भी हिन्दू ही कहलाते हैं।
इससे सिद्ध है कि केवल ब्राह्मणों के पीछे चलने वाले लोगों को, जो अपने-आपको सनातनधर्मी कहलवाते हैं, हिन्दू मानना भूल है। हां, इनका समुदाय हिन्दुओं की एक बड़ी शाखा होने से प्रमुख है।
वास्तव में हिन्दू कोई मज़हब, पन्थ अथवा सम्प्रदाय नहीं है। हिन्दू एक क़ौम है जिसमें हिन्दुस्तान देश के सारे स्वदेशी पन्थों, सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों के जत्थे सम्मिलित हैं।
हिन्दू पद वैदिक नहीं वरन् लौकिक पद है। लौकिक भाषा में कई बोलियों के पद मिले होते हैं। हिंसा से दूर रहने वालों का नाम हिन्दू है। हिंसा पद से "हिं" और दूर पद से "दू" अक्षर लेकर "हिन्दू" पद बना है। इस स्थान पर हिंसा पद से गोहिंसा का प्रयोजन है। तात्पर्य यह है कि गो-हिंसा से दूर रहने वालों का नाम हिन्दू प्रसिद्घ हुआ है।
गो-हिंसा से दूर रहने के साथ दो गुण और भी हिन्दू होने के लिए आवश्यक हैं।
पहला यह कि परम्परा से हिन्दुस्तान की स्वदेशी सन्तान होना, चाहे उच्च से उच्च और नीच से नीच ब्राह्मणों से लेकर चाण्डालों तक हों, वर्ण-आश्रम अथवा वर्ण-आश्रम-विहीन हों तथा जातों, जमातों, गोत्रों के जितने भी जत्थों के लोग देसी सन्तान के हों।
और दूसरा गुण यह कि वे मूसाई, ईसाई, मुहम्मदी इत्यादी विदेशी मज़हबों की धारणा वाले न हों, स्वदेशी पन्थ ही की धारणा वाले हों; भले ही वैदिक, अवैदिक, आस्तिक, नास्तिक किसी प्रदेशीय मत-मतान्तर की धारणा वाले हों।
तात्पर्य यह है कि जितने लोग गो-हिंसा से दूर रहने वाले अर्थात् परहेज़ करने वाले स्वदेशी सन्तान के और स्वदेशी पन्थ रखने वाले हैं, इन सब की एक हिन्दू क़ौम है। जातों, जमातों और पन्थों के सम्प्रदायों को सन्मुख रखकर हिन्दू क़ौम अनगिनत जत्थों में बिखरी हुई है। परन्तु सबको एक क़ौमियत का विचार ही एक सूत्र में बांधने वाला है जिसका नाम हिन्दू क़ौम है और जिस देश के ये हिन्दू हैं, उस देश का नाम हिन्दुस्तान है और अहिंसक होने से यह हिन्दू पद पवित्र शब्द है।
अतः इस अर्थ में सिक्ख भी हिन्दू हैं, वे भी गो-हिंसा से दूर रहने वाले और स्वदेशी सन्तान के लोग हैं तथा सिक्ख-पन्थ भी स्वदेशी है अर्थात् इसी हिन्दुस्तान में ही प्रकट हुआ है। हिन्दू होने के ये तीन लक्षण सिक्खों में में बराबर पाये जाते हैं।
इससे भी बढ़ कर सिक्खों का हिन्दुओं के बीच होने का यह प्रमाण भी है कि हिन्दुओं की ऐतिहासिक और पौराणिक साखियां सिक्ख साहित्य में प्रयोग की जाती हैं। और भी अनेक गुण-कर्म-स्वभाव, खान-पान तथा पहनावे इत्यादि, आवागमन इत्यादि मान्यताएं, दिन- रात-महीने इत्यादि, हिन्दुओं के राष्ट्रीय त्यौहार तथा गो-हिंसकों से खान-पान में छुआछूत रखने के नियम इत्यादि हिन्दुओं वाली अनगिनत बातें सिक्खों के पन्थ में हैं, जो ईसाइओं और मुसलमानों में नहीं।
यह मानो हिन्दुओं की क़ौमियत रूपी सराय के आंगन की सांझ है। यदि ईसाइयों और मुसलमानों की भांति श्रीगुरु जी ने सिक्खों की क़ौम अलग बनाई होती तो सारी ही बातें पृथक् रूप से नयी बनतीं, परन्तु श्रीगुरु जी ने हिन्दुओं का सुधार किया है। सुधार में सभी बातों का उलट-पलट नहीं हुआ करता, जो-जो बातें बिगड़ी-तिगड़ी हों उन्हीं का सुधार होता है, शेष बातें यथावत् ही रहती हैं। ०

सोमवार, सितंबर 10, 2018

जानिए कैसे मुग़ल करते थे हिंदूओ की महिलाओ पर अत्याचार, खून खौल जायेगा पूरा सच जानकर!

जानिए कैसे मुग़ल करते थे हिंदूओ की महिलाओ पर अत्याचार, खून खौल जायेगा पूरा सच जानकर!
आतंकी संगठन आईएसआईएसआई के बारे में जब हम पढ़ते हैं कि वह अल्पसंख्यक यजीदी महिलाओं को यौन गुलाम बना रहा है तो हमें आश्चर्य होता है, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल बादशाहों ने भी बहुसंख्यक हिंदू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दास यानी सेक्स सेल्व्स बनाया था।
इसमें मुगल बादशाह शाहजहां का हरम सबसे अधिक बदनाम रहा, जिसके कारण दिल्ली का रेड लाइट एरिया जी.बी.रोड बसा। इतिहासकार वी. स्मिथ ने लिखा है, “शाहजहाँ के हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।”
-(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ 359)
कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था। यह नर पशु, यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था|
कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी। सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि, “महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था, और नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी।”
-(ट्रेविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर- फ्रान्कोइस बर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ, ऑक्सफोर्ड, 1934)
शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए , आठ हजार औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा। आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं बल्कि उसका असली नाम “अर्जुमंद-बानो-बेगम“ था और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।
मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी । इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और, मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा था जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था। अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की?
शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी । शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की नहीं थी बल्कि वो भी शादीशुदा थी और उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम “शेर अफगान खान“ था। शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।
गौर करने लायक बात यह भी है कि 38 वर्षीय मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला था। शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था, की कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ सम्भोग करने का दोषी तक कहा है।
शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में चर्चा शुरू हुई, तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि – “माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का हक़ है|”
इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ ने तंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।
दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी। इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुग़ल खानदान की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी, नौकर के साथ साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।कहा जाता है कि जहाँआरा अपने बाप के लिए लड़कियाँ भी फंसाकर लाती थी।
जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था। शाहजहाँ के राज ज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा देकर बाप के हवाले कर दिया था, जिससे शाहजहाँ ने अपनी उम्र के 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।
शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि वह तिमूर (तैमूरलंग) का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से वह इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तिमूर द्वितीय रख लिया था।
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया- डॉ. के.एस. लाल, 1992 पृष्ठ- 132)
बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी। अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि, “शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार कर लिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था।” भारत यात्रा पर आये देला वैले (इटली के एक धनी व्यक्ति) के अुनसार शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय दिया। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया, और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।
बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड इट्स नेबरहुड, पृष्ठ 25)
हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था। अब्दुल हमीद ने, ’बादशाहनामा’ में लिखा था- ’’महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र, बनारस में उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं। इस्लाम पंथ के रक्षक, शहंशाह ने आदेश दिया कि बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है,उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए। इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर दिया गया था।’’-(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी, अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII, पृष्ठ 36)हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करने की प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।
-(मध्यकालीन भारत – हरीश्चंद्र वर्मा – पेज-141)
कश्मीर से लौटते समय 1632 में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका। तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सर काट दिया गया। लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।-(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल : आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन, पृष्ठ 312)
1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी बेटी जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया । परन्तु औरंगजेब ने अपने बाप की अय्याशी का पूरा इंतजाम रखा। अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने साथ 40 रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी और दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को किले से बाहर निकाल दिया। उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही 22 जनवरी 1666 ईस्वी में 74 साल में हुई। ’द हिस्ट्री चैनल’ के अनुसार अत्यधिक कामोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण उसकी मौत हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था। अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर महान बताया जाता है?
क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है? क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमें खाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं?दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर तेजो महालय है! इतिहासकार पी.एन.ओक ने पुरातात्विक साक्ष्घ्यों के जरिए बकायदा इसे साबित किया है और इस पर पुस्तकें भी लिखी हैं।असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

शनिवार, सितंबर 08, 2018

सदाचार बनाम समलेंगिकता

सदाचार बनाम समलेंगिकता
डॉ विवेक आर्य
सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैगिंकता को धारा 377 के अंतर्गत अपराध की श्रेणी से हटा दिया है। अपने आपको सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले, आधुनिकता का दामन थामने वाले एक विशेष बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा सुप्रीम कोर्ट क निर्णय पर बहुत प्रसन्न हो रहे है। उनका कहना है कि अंग्रेजों द्वारा 1861 में बनाया गया कानून आज अप्रासंगिक है। धारा 377 को यह जमात सामाजिक अधिकारों में भेदभाव और मौलिक अधिकारों का हनन बताती है। समलैगिंकता का समर्थन करने वालो का पक्ष का कहना है कि इससे HIV कि रोकथाम करने में रुकावट होगी क्यूंकि समलैगिंक समाज के लोग रोक लगने पर खुलकर सामने नहीं आते।
अधिकतर धार्मिक संगठन धारा 377 के हटाने के विरोध में हैं। उनका कहना है कि यह करोड़ो भारतीयों का जो नैतिकता में विश्वास रखते हैं उनकी भावनाओं का आदर हैं। आईये समलेंगिकता को प्रोत्साहन देना क्यों गलत है इस विषयकी तार्किक विवेचना करें।
हमें इस तथ्य पर विचार करने की आवश्यकता है कि अप्राकृतिक सम्बन्ध समाज के लिए क्यों अहितकारक है। अपने आपको आधुनिक बनाने की हौड़ में स्वछन्द सम्बन्ध की पैरवी भी आधुनिकता का परिचायक बन गया हैं। सत्य यह हैं कि इसका समर्थन करने वाले इसके दूरगामी परिणामों की अनदेखी कर देते हैं। प्रकृति ने मानव को केवल और केवल स्त्री-पुरुष के मध्य सम्बन्ध बनाने के लिए बनाया है। इससे अलग किसी भी प्रकार का सम्बन्ध अप्राकृतिक एवं निरर्थक है। चाहे वह पुरुष-पुरुष के मध्य हो, स्त्री स्त्री के मध्य हो। वह विकृत मानसिकता को जन्म देता है। उस विकृत मानसिकता कि कोई सीमा नहीं है। उसके परिणाम आगे चलकर बलात्कार (Rape) , सरेआम नग्न होना (Exhibitionism), पशु सम्भोग (Bestiality), छोटे बच्चों और बच्चियों से दुष्कर्म (Pedophilia), हत्या कर लाश से दुष्कर्म (Necrophilia), मार पीट करने के बाद दुष्कर्म (Sadomasochism) , मनुष्य के शौच से प्रेम (Coprophilia) और न जाने किस-किस रूप में निकलता हैं। अप्राकृतिक सम्बन्ध से संतान न उत्पन्न हो सकना क्या दर्शाता है? सत्य यह है कि प्रकृति ने पुरुष और नारी के मध्य सम्बन्ध का नियम केवल और केवल संतान की उत्पत्ति के लिए बनाया था। आज मनुष्य ने अपने आपको उन नियमों से ऊपर समझने लगा है। जिसे वह स्वछंदता समझ रहा है। वह दरअसल अज्ञानता है। भोगवाद मनुष्य के मस्तिष्क पर ताला लगाने के समान है। भोगी व्यक्ति कभी भी सदाचारी नहीं हो सकता। वह तो केवल और केवल स्वार्थी होता है। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य को सामाजिक हितकारक नियम पालन का करने के लिए बाध्य होना चाहिए। जैसे आप अगर सड़क पर गाड़ी चलाते है। तब आप उसे अपनी इच्छा से नहीं अपितु ट्रैफिक के नियमों को ध्यान में रखकर चलाता है। वहाँ पर क्यों स्वछंदता के मौलिक अधिकार का प्रयोग नहीं करता? अगर करेगा तो दुर्घटना हो जायेगी। जब सड़क पर चलने में स्वेच्छा की स्वतंत्रता नहीं है। तब स्त्री पुरुष के मध्य संतान उत्पत्ति करने के लिए विवाह व्यवस्था जैसी उच्च सोच को नकारने में कैसी बुद्धिमत्ता है?
कुछ लोगो द्वारा समलेंगिकता के समर्थन में खजुराओ की नग्न मूर्तियाँ अथवा वात्सायन का कामसूत्र को भारतीय संस्कृति और परम्परा का नाम दिया जा रहा है। जबकि सत्य यह है कि भारतीय संस्कृति का मूल सन्देश वेदों में वर्णित संयम विज्ञान पर आधारित शुद्ध आस्तिक विचारधारा हैं।
भौतिकवाद अर्थ और काम पर ज्यादा बल देता हैं। जबकि अध्यातम धर्म और मुक्ति पर ज्यादा बल देता हैं । वैदिक जीवन में दोनों का समन्वय हैं। एक ओर वेदों में पवित्र धनार्जन करने का उपदेश है। दूसरी ओर उसे श्रेष्ठ कार्यों में दान देने का उपदेश है। एक ओर वेद में सम्बन्ध केवल और केवल संतान उत्पत्ति के लिए है। दूसरी तरफ संयम से जीवन को पवित्र बनाये रखने की कामना है । एक ओर वेद में बुद्धि की शांति के लिए धर्म की और दूसरी ओर आत्मा की शांति के लिए मोक्ष (मुक्ति) की कामना है। धर्म का मूल सदाचार है। अत: कहाँ गया है कि आचार परमो धर्म: अर्थात सदाचार परम धर्म है। आचारहीन न पुनन्ति वेदा: अर्थात दुराचारी व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। अत: वेदों में सदाचार, पाप से बचने, चरित्र निर्माण, ब्रहमचर्य आदि पर बहुत बल दिया गया है
जैसे-
यजुर्वेद ४/२८ – हे ज्ञान स्वरुप प्रभु मुझे दुश्चरित्र या पाप के आचरण से सर्वथा दूर करो तथा मुझे पूर्ण सदाचार में स्थिर करो।
ऋग्वेद ८/४८/५-६ – वे मुझे चरित्र से भ्रष्ट न होने दे।
यजुर्वेद ३/४५- ग्राम, वन, सभा और वैयक्तिक इन्द्रिय व्यवहार में हमने जो पाप किया हैं उसको हम अपने से अब सर्वथा दूर कर देते हैं।
यजुर्वेद २०/१५-१६- दिन, रात्रि, जागृत और स्वपन में हमारे अपराध और दुष्ट व्यसन से हमारे अध्यापक, आप्त विद्वान, धार्मिक उपदेशक और परमात्मा हमें बचाए।
ऋग्वेद १०/५/६- ऋषियों ने सात मर्यादाएं बनाई हैं. उनमे से जो एक को भी प्राप्त होता हैं, वह पापी हैं. चोरी, व्यभिचार, श्रेष्ठ जनों की हत्या, भ्रूण हत्या, सुरापान, दुष्ट कर्म को बार बार करना और पाप करने के बाद छिपाने के लिए झूठ बोलना।
अथर्ववेद ६/४५/१- हे मेरे मन के पाप! मुझसे बुरी बातें क्यों करते हो? दूर हटों. मैं तुझे नहीं चाहता।
अथर्ववेद ११/५/१०- ब्रहमचर्य और तप से राजा राष्ट्र की विशेष रक्षा कर सकता हैं।
अथर्ववेद११/५/१९- देवताओं (श्रेष्ठ पुरुषों) ने ब्रहमचर्य और तप से मृत्यु (दुःख) का नष्ट कर दिया हैं।
ऋग्वेद ७/२१/५- दुराचारी व्यक्ति कभी भी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता।
इस प्रकार अनेक वेद मन्त्रों में संयम और सदाचार का उपदेश हैं।
खजुराओ आदि की व्यभिचार को प्रदर्शित करने वाली मूर्तियाँ , वात्सायन आदि के अश्लील ग्रन्थ एक समय में भारत वर्ष में प्रचलित हुए वाममार्ग का परिणाम हैं। जिसके अनुसार मांसाहार, मदिरा एवं व्यभिचार से ईश्वर प्राप्ति है। कालांतर में वेदों का फिर से प्रचार होने से यह मत समाप्त हो गया पर अभी भी भोगवाद के रूप में हमारे सामने आता रहता है।
मनु स्मृति में समलेंगिकता के लिए दंड एवं प्रायश्चित का विधान होना स्पष्ट रूप से यही दिखाता है कि हमारे प्राचीन समाज में समलेंगिकता किसी भी रूप में मान्य नहीं थी। कुछ कुतर्की यह भी कह रहे है कि मनुस्मृति में अत्यंत थोडा सा दंड है। उनके लिए मेरी सलाह हैं कि उसी मनुस्मृति में ब्रह्मचर्य व्रत का नाश करने वाले के लिए मनु स्मृति में दंड का क्या विधान हैं, जरा देख ले।
इसके अतिरिक्त बाइबिल, क़ुरान दोनों में इस सम्बन्ध को अनैतिक, अवाँछनीय, अवमूल्यन का प्रतीक बताया गया हैं।
जो लोग यह कुतर्क देते हैं कि समलेंगिकता पर रोक से AIDS कि रोकथाम होती हैं। उनके लिए विशेष रूप से यह कहना चाहूँगा कि समाज में जितना सदाचार बढ़ेगा, उतना समाज में अनैतिक सम्बन्धो पर रोकथाम होगी। आप लोगो का तर्क कुछ ऐसा है कि आग लगने पर पानी कि व्यवस्था करने में रोक लगने के कारण दिक्कत होगी, हम कह रहे है कि आग को लगने ही क्यूँ देते हो? भोग रूपी आग लगेगी तो नुकसान तो होगा ही होगा। कहीं पर बलात्कार होगे, कहीं पर पशुओं के समान व्यभिचार होगा , कहीं पर बच्चों को भी नहीं बक्शा जायेगा। इसलिए सदाचारी बनो नाकि व्यभिचारी।
एक कुतर्क यह भी दिया जा रहा है कि समलेंगिक समुदाय अल्पसंख्यक है, उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए। मेरा इस कुतर्क को देने वाले सज्जन से प्रश्न है कि भारत भूमि में तो अब अखंड ब्रह्मचारी भी अल्प संख्यक हो चले है। उनकी भावनाओं का सम्मान रखने के लिए मीडिया द्वारा जो अश्लीलता फैलाई जा रही हैं उनपर लगाम लगाना भी तो अल्पसंख्यक के हितों कि रक्षा के समान हैं।
एक अन्य कुतर्की ने कहा कि पशुओं में भी समलेंगिकता देखने को मिलती हैं। मेरा उस बंधू से एक ही प्रश्न हैं कि अनेक पशु बिना हाथों के केवल जिव्हा से खाते हैं, आप उनका अनुसरण क्यूँ नहीं करते? अनेक पशु केवल धरती पर रेंग कर चलते है आप उनका अनुसरण क्यूँ नहीं करते ? चकवा चकवी नामक पक्षी अपने साथी कि मृत्यु होने पर होने प्राण त्याग देता हैं, आप उसका अनुसरण क्यूँ नहीं करते?
ऐसे अनेक कुतर्क हमारे समक्ष आ रहे हैं जो केवल भ्रामक सोच का परिणाम हैं।
जो लोग भारतीय संस्कृति और प्राचीन परम्पराओं को दकियानूसी और पुराने ज़माने कि बात कहते हैं वे वैदिक विवाह व्यवस्था के आदर्शों और मूलभूत सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं। चारों वेदों में वर-वधु को महान वचनों द्वारा व्यभिचार से परे पवित्र सम्बन्ध स्थापित करने का आदेश हैं। ऋग्वेद के मंत्र के स्वामी दयानंद कृत भाष्य में वर वधु से कहता हैं। हे स्त्री ! मैं सौभाग्य अर्थात् गृहाश्रम में सुख के लिए तेरा हस्त ग्रहण करता हूँ और इस बात की प्रतिज्ञा करता हूँ की जो काम तुझको अप्रिय होगा उसको मैं कभी ना करूँगा। ऐसे ही स्त्री भी पुरुष से कहती हैं की जो कार्य आपको अप्रिय होगा वो मैं कभी न करूँगी और हम दोनों व्यभिचारआदि दोषरहित होके वृद्ध अवस्था पर्यन्त परस्पर आनंद के व्यवहार करेगे। परमेश्वर और विद्वानों ने मुझको तेरे लिए और तुझको मेरे लिए दिया हैं , हम दोनों परस्पर प्रीती करेंगे तथा उद्योगी हो कर घर का काम अच्छी तरह और मिथ्याभाषण से बचकर सदा धर्म में ही वर्तेंगे। सब जगत का उपकार करने के लिए सत्यविद्या का प्रचार करेंगे और धर्म से संतान को उत्पन्न करके उनको सुशिक्षित करेंगे। हम दूसरे स्त्री और दूसरे पुरुष से मन से भी व्यभिचार ना करेगे।
एक और गृहस्थ आश्रम में इतने उच्च आचार और विचार का पालन करने का मर्यादित उपदेश हैं , दूसरी ओर पशु के समान स्वछन्द अमर्यादित सोच हैं। पाठक स्वयं विचार करे कि मनुष्य जाति कि उन्नति उत्तम गृहस्थी बनकर समाज को संस्कारवान संतान देने में हैं अथवा पशुओं के समान कभी इधर कभी उधर मुँह मारने में हैं।
समलेंगिकता एक विकृत सोच है , मनोरोग है, बीमारी है। इसका समाधान इसका विधिवत उपचार है। नाकि इसे प्रोत्साहन देकर सामाजिक व्यवस्था को भंग करना है। इसका समर्थन करने वाले स्वयं अँधेरे में है औरो को भला क्या प्रकाश दिखायेंगे। कभी समलेंगिकता का समर्थन करने वालो ने भला यह सोचा है कि अगर सभी समलेंगिक बन जायेगे तो अगली पीढ़ी कहा से आयेगी? सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलेंगिकता को दंड की श्रेणी से बाहर निकालने का हम पुरजोर असमर्थन करते है।

मेरे परदादा


मेरे परदादा,
संस्कृत और हिंदी जानते थे।
माथे पे तिलक,
और सर पर पगड़ी बाँधते थे।।
फिर मेरे दादा जी का,
दौर आया।
उन्होंने पगड़ी उतारी,
पर जनेऊ बचाया।।
मेरे दादा जी,
अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते थे।
जानना तो दूर,
अंग्रेजी के नाम से कन्नी काटते थे।।
मेरे पिताजी को अंग्रेजी,
थोड़ी थोड़ी समझ में आई।
कुछ खुद समझे,
कुछ अर्थ चक्र ने समझाई।।
पर वो अंग्रेजी का प्रयोग,
मज़बूरी में करते थे।
यानि सभी सरकारी फार्म,
हिन्दी में ही भरते थे।।
जनेऊ उनका भी,
अक्षुण्य था।
पर संस्कृत का प्रयोग,
नगण्य था।।
वही दौर था, जब संस्कृत के साथ,
संस्कृति खो रही थी।
इसीलिए संस्कृत,
मृत भाषा घोषित हो रही थी।।
धीरे धीरे समय बदला,
और नया दौर आया।
मैंने अंग्रेजी को पढ़ा ही नहीं,
अच्छे से चबाया।।
मैंने खुद को,
हिन्दी से अंग्रेजी में लिफ्ट किया।
साथ ही जनेऊ को,
पूजा घर में सिफ्ट किया।।
मै बेवजह ही दो चार वाक्य,
अंग्रेजी में झाड जाता हूँ।
शायद इसीलिए समाज में,
पढ़ा लिखा कहलाता हूँ।।
और तो और,
मैंने बदल लिए कई रिश्ते नाते हैं।
मामा, चाचा, फूफा,
अब अंकल नाम से जाने जाते हैं।।
मै टोन बदल कर वेद को वेदा,
और राम को रामा कहता हूँ।
और अपनी इस तथा कथित,
सफलता पर गर्वित रहता हूँ।।
मेरे बच्चे,
और भी आगे जा रहे हैं।
मैंने संस्कार चबाया था,
वो अंग्रेजी में पचा रहे हैं।।
यानि उन्हें दादी का मतलब,
ग्रैनी बताया जाता है।
रामा वाज ए हिन्दू गॉड,
गर्व से सिखाया जाता है।।
जब श्रीमती जी उन्हें,
पानी मतलब वाटर बताती हैं।
और अपनी इस प्रगति पर,
मंद मंद मुस्काती हैं।।
जाने क्यों मेरे पूजा घर की,
जीर्ण जनेऊ चिल्लाती है।
और मंद मंद,
कुछ मन्त्र यूँ ही बुदबुदाती है।।
कहती है - ये विकास,
भारत को कहाँ ले जा रहा है।
संस्कार तो गल गए,
अब भाषा को भी पचा रहा है।।
संस्कृत की तरह हिन्दी भी,
एक दिन मृत घोषित हो जाएगी ।
शायद उस दिन भारत भूमि,
पूर्ण विकसित हो जाएगी॥
_इसके दोषी सिर्फ हम और हम ही हैं_

अब स्कुलो में होगा समलैंगिकता का प्रचार। सहज स्वीकार्य बनाने का कम्युनिस्ट एजेंडा ।

समलैंगिकता पर कोर्ट के निर्णय के साथ ही लोगबाग जाग गए. हमने प्रतिक्रियाएँ देनी शुरू कर दीं क्योंकि हम किस बात पर प्रतिक्रिया देंगे यह हमेशा दूसरे खेमे से तय किया जाता है.
एक सामान्य प्रतिक्रिया है कि लोगों को पप्पू याद आएगा ही आएगा. कुछ हँसी मजाक होगा. समलैंगिकता की उससे ज्यादा प्रासंगिकता हमारे समाज में कभी नहीं थी. अगर कोई समलैंगिक निकल आता है तो हमारे देश में यह थोड़े मजाक और थोड़े कटाक्ष से ज्यादा बड़ा विषय कभी नहीं बनता. आपने किसी को जेल जाते तो नहीं सुना होगा.
पर पश्चिम की बात कुछ और है. यहाँ यह सचमुच दंडनीय अपराध था. ऑस्कर वाइल्ड ने कई साल जेल में गुजारे थे. पर वह तो था ही मोटी चमड़ी वाला. उससे ज्यादा दुखद कहानी है कंप्यूटर के आविष्कारक गणितज्ञ एलन ट्यूरिंग की. ट्यूरिंग बेचारा शर्मीला सा आदमी था. उसे बेइज्जती झेलने की आदत नहीं थी. उसे सजा के तौर पर कुछ साल हॉर्मोन थेरेपी दी गई, फिर उसने आत्महत्या कर ली.
इन दुखद कहानियों का बहुत बड़ा बाजार है. भारतीयों का कोमल हृदय ऐसी ट्रैजिक कहानियों के लिए बहुत ही उर्वर मिट्टी है. तो आज मुझे भी एक-दो सहानुभूति से भरी हुई पोस्ट्स मिलीं, जिनमें समलैंगिकों की व्यक्तिगत पसंद और जीवन शैली के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता के स्वर थे.
पर यहाँ किसी के लिए भी समलैंगिक व्यक्तियों के सेक्सुअल ओरिएंटेशन की पसंद और निजता का विषय विमर्श का केंद्र नहीं है. भारत में यूँ ही सेक्स एक ऐसा टैबू है कि कोई सामान्यतः सेक्स की बात नहीं करता. सेक्स टीनएजर्स के बीच एक कौतूहल और जोक्स के अलावा किसी गंभीर चर्चा में कोई स्थान नहीं पाता. इसलिए अगर आप अपने व्यक्तिगत जीवन में समलैंगिक हों तो कोई यूँ भी आपकी निजता में झाँकने नहीं आने वाला.
पर यह कम्युनिस्ट्स के लिए एक बड़ा विषय है. क्यों? क्योंकि इसमें कम्युनिस्ट उद्देश्यों की पूर्ति का बहुत स्कोप है. पहली तो कि इसमें आइडेंटिटी पॉलिटिक्स जुड़ी है. आप आज इसे महत्वपूर्ण नहीं समझते, पर 15-20 सालों में यह एक बड़ा विषय हो जाएगा. जितने समलैंगिक होंगे, उनके लिए यह उनकी पहचान का सबसे बड़ा भाग होगा. उन्हें हर समय हर किसी को यह बताना बहुत जरूरी लगेगा कि वे गे/लेस्बियन हैं.
फिर अगला पक्ष आएगा अधिकारों का - गे/लेस्बियन के अधिकार परिभाषित किये जायेंगे, और जब वे परिभाषित कर दिए जाएंगे तो जाहिर है कि उनका हनन हो रहा होगा, जो कि वामपंथी संदर्भ में हर समाज में होता है. वामपंथी शब्दकोश में समाज की परिभाषा ही यह है, कि वह इकाई जहाँ आपके अधिकार छीने जाते हैं उसे समाज कहते हैं.
फिर एट्रोसिटी लिटरेचर की बाढ़ आएगी. आपको जरा जरा सी बात पर होमोफोबिक करार दिया जाएगा. कोई यह थ्योरी लेकर आएगा कि हिन्दू सभ्यता में सदियों से समलैंगिकों का शोषण होता आ रहा है. राम ने बाली और रावण को इसलिए मार दिया था क्योंकि दोनों गे थे, और इसी वजह से कृष्ण ने शिशुपाल को मार दिया था.
यहाँ तक आप इसे नुइसन्स समझ कर झेल लोगे. लेकिन तब यह समस्या बन के आपके बच्चों की तरफ बढ़ेगा. क्योंकि उन्हें रिक्रूट चाहिए. समाज के 2-3% समलैंगिक सामाजिक संघर्ष के लिए अच्छा मटेरियल नहीं हैं. बढ़िया संघर्ष के लिए इन्हें 10-15% होना चाहिए. तो ये स्कूलों में समलैंगिकता को प्रचारित करेंगे, उसे प्राकृतिक और फिर श्रेष्ठ बताएंगे. समलैंगिक खिलाड़ियों और फ़िल्म स्टार्स की कहानियाँ बच्चों तक पहुंचने लगेंगी. इसे ग्लैमराइज किया जाएगा.
मुझे कैसे पता? क्योंकि यह सब हो चुका है. यह सारा ड्रामा 1950-60 के दशक में अमेरिका में और 70-80 के दशक में इंग्लैंड और यूरोप में खेला जा चुका है. समाज में परिवार नाम की संस्था इनके निशाने पर है, इसलिए ये एक समलैंगिक परिवार की कहानी चलाने में लगे हुए हैं. समलैंगिक शादियाँ, उनके गोद लिए हुए बच्चे...परिवार के समानांतर एक संस्था खड़ी की जा रही है. साथ ही यह वर्ग नशे के लिए भी बहुत अच्छा बाजार है, डिप्रेशन का भी शिकार औसत से ज्यादा है और इस वजह से सोशल सिक्योरिटी सिस्टम यानी मुफ्तखोरी की व्यवस्था का भी अच्छा ग्राहक है.
जो चीज सबसे ज्यादा चुभेगी आपको, वह है उनका समलैंगिकता का विज्ञापन. जैसे कि धूप में आप काले हो रहे हैं...बोल कर आपको फेयरनेस क्रीम बेच दी जाती है. युवाओं और किशोरों को बताया जाएगा कि उनके जीवन में जो कुछ खालीपन है, जो कूलत्व घट रहा है उसकी भरपाई सिर्फ समलैंगिकता से हो सकती है. बहुत से टीनएजर्स सिर्फ पीअर प्रेशर में, कूल बनने के लिए समलैंगिकता के प्रयोग करते हैं. इसे यहाँ कहते हैं "एक्सप्लोरिंग योर सेक्सुअलिटी".
हर शहर में हर साल गे-प्राइड परेड के आयोजन होंगे, जिनमें लड़के पिंक रिबन बाँध कर और लिपस्टिक लगा कर और लड़कियाँ सर मुंड़ा कर LGBT की फ्लैग लेकर दारू पीते और सड़कों पर चूमते मिलेंगे. यह विज्ञापन और रिक्रूटमेंट इस परिवर्तन का सबसे घिनौना पक्ष है. आज जो बात इससे शुरू हुई है कि अपने बेडरूम में कोई क्या करता है यह उसका निजी मामला है, तो मामला वह निजी रह क्यों नहीं जाता, उसे पूरे शहर को प्रदर्शित करने और पब्लिक का मामला बनाने की क्या मजबूरी हो जाती है? कैसे एक व्यक्ति का सेक्सुअल ओरिएंटेशन उसकी पूरी आइडेंटिटी बन जाता है?
इसकी हद सुनेंगे? मेरे बच्चों के स्कूल में एक महिला को बुलाया गया एनुअल डे में चीफ गेस्ट के रूप में. उनकी तारीफ यह थी कि वे LGBT के लिए एक चैरिटी चलाती थीं. यह चैरिटी बच्चों को समलैंगिकता को प्राकृतिक रूप से स्वीकार्य बनाने का काम करता है. उन महिला ने बच्चों को सेमलैंगिकता की महिमा बताई. फिर अपनी चैरिटी आर्गेनाईजेशन के बारे में बताया, बीच में दबी जुबान में डोनाल्ड ट्रम्प को गालियाँ भी दीं. उसने अपनी लिखी और छपवाई हुई नर्सरी बच्चों की एक तस्वीरों वाली कहानियों की किताब भी दिखाई. उसमें बतख, बंदर, हिरण की कहानियाँ थीं...खास बात यह थी कि उन कहानियों में सभी पात्र समलैंगिक थे...
सोच सकते हैं आप? स्कूल समलैंगिकता का प्रचार कुछ ऐसे कर रहे हैं कि 2-3 साल के बच्चों को भी समलैंगिकता के बारे में बताया जा रहा है...
समलैंगिकता पर यह आंदोलन सिर्फ उन कुछ लोगों को निजता और यौन-प्राथमिकताओं के अधिकार का प्रश्न भर नहीं है जो नैसर्गिक रूप से समलैंगिक हैं (अगर समलैंगिकता को आप यौन-विकृति ना भी मानें...). समझें यह कम्युनिस्ट का एक और रिक्रूटमेंट काउंटर भर खुला है.

Navneet Kumar
तुम हमारा योग लो , हम तुम्हारा भोग (रोग) लेंगें
# AnujAgarwal
जी हाँ, कुछ इसी तर्ज पर भारत मे मोदी सरकार ने समलेंगिकता पर अपनी सहमति दी और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैधानिक कर दिया। अपनी स्थापना से ही इस अप्राकृतिक कृत्य का विरोध करने वाले संघ के एक वर्ग को भी मोदी-जेटली की जोड़ी ने तोड़ लिया और तभी सन 2016 में संघ के सहकार्यवाह दत्तात्रेय हौसले ने व्यक्तव्य दिया कि संघ समलेंगिकता को अपराध नहीं मानता मगर अप्राकृतिक मानता है। पश्चिमी ताकतों से पर्दे के पीछे लेनदेन के इस खेल में संघ परिवार ने योग के बदले भोग व रोग को आंतरिक स्वीकृति दे डाली। मजदूरों, किसानों, एफ़ डी आई व स्वदेशी के बाद संघ परिवार की यह सबसे बड़ी उलटबांसी है जिसने संघ परिवार के कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवको, प्रचारकों व सनातनधर्मी लोगों को अंदर से हिला दिया है। हर मोर्चे पर समझौता करने को आतुर संघ परिवार जिस भगवे को विश्व गुरू बनाने के लिए संघर्षरत है रातोंरात उसका रंग सतरंगी हो चला है। अंततः वह भी देश मे खुले बाजार की उन नीतियों की विकृतियों का शिकार हो गया जिनकी नींव कांग्रेस पार्टी की नरसिम्हा राव सरकार ने सन 1991 में डाली थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने तो वैसे भी काफी पहले गोविंदाचार्य जी से कहा ही था कि हममें व कांग्रेसियों में कोई अंतर नहीं। वे कांग्रेसी हैं और हम भगवा कांग्रेसी। बस जनता को यह अब अच्छे से समझ आ गया।
बिना किसी जनगणना, सामाजिक बहस व सर्वसम्मति के देश की 135 करोड़ आबादी को तथाकथित 25 लाख बीमार लोगों (कोई जनगणना नहीं बस अनुमान) की विकृति को न्यायोचित करने के नाम पर दांव पर लगा दिया गया। बीमारी के इलाज की जगह बीमारी को ही सही ठहराने का यह खेल बाज़ार और व्यापक लेनदेन के बिना संभव नहीं। दुनिया में बड़ी मात्रा में समलैंगिक एड्स आदि यौन बीमारियों का शिकार हैं। अपनी विकृत यौन पिपासा की पूर्ति के लिए ड्रग्स लेते हैं व अपने अतिरिक्त खर्चो की पूर्ति के लिए पोर्नोग्राफी के व्यवसाय में भी लग जाते हैं। दुनिया का मेडिकल माफिया और जीडीपी बढ़ाने वाली सरकारें व न्यायायल और उनका भोंपू मीडिया व फ़िल्म जगत इनका प्रवक्ता बन जाता है और ये सब एक सिंडिकेट की शक्ल लेकर चंद रुपयों की खातिर पूरे समाज को दांव पर लगा देते हैं।
समलैंगिकता को मान्यता पूर्णतः बाजार के दवाब में दी गयी है। जब सामान्य युवक व युवती इस प्रकार के जोड़ो को देखेंगे तो ऐसा करने को प्रेरित हो सकते हैं। इसी के साथ ही इस खेल का बाजार बढ़ता जाता है । अनेको रोगों व उनके उपचारों का बाजार। हम कुछ लोगों के अधिकारों के नाम पर पूरे समाज को दांव पर नहीं लगा सकते। अभी देश मे पेडमेंन और टॉयलेट एक प्रेमकथा जैसी फिल्में बनाने की जरूरत पड़ रही है और सुप्रीम कोर्ट को ट्रांसजेंडर की ज्यादा फिक्र हो गयी। क्यो करोड़ो आध्यात्मिक व धर्मिक जीवन जीने वालो के आराध्य राम का मंदिर सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता में नहीं?
जब आपके घर परिवार इस विकृति का शिकार होंगे और आपके परिजन ऑन लाईन शॉपिंग करेंगे घटिया सामानों की, करेंगे ड्रग्स का इस्तेमाल तब गहराई से समझेंगे इसे। यह मकड़जाल है और सबको फंसा लिया गया है इसमें। जिस मजबूर लड़की को वेश्यावृत्ति में धकेला जाता है,कुछ समय बाद वह भी अपनी नियति को स्वीकार कर लेती है, क्या इससे हम वेश्यावृत्ति को न्यायोचित ठहरा सकते हैं? यूरोप व अमेरिका में पोर्न, ड्रग्स व होमोसेक्सुअलटी के प्रोडक्ट व बीमारियों का बाज़ार हथियारों के बाद सबसे बड़ा बाजार है। अगर कोई समलैंगिकता से पीड़ित है तो उसके प्रति पूरी सहानुभूति होनी चाहिए व सरकार उसके इलाज व पुनर्वास के पूरे प्रबंध करे मगर उनके अधिकारों के संरक्षण के नाम पर पूरे समाज को दांव पर न लगाए। भारत को भारतीय मानसिकता वाले न्यायधीशो की आवश्यकता है, मगर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारा संविधान व संविधानविद अपनी प्रेरणा व प्रशिक्षण ब्रिटेन से लेते हैं और उनकी नज़र से देखते व सोचते हैं। भारत को भारत के संदर्भो में देखने व चलाने की जरूरत है मगर वैश्वीकरण की आड़ में हम विकृत व्यवस्थाओं को अपनाते जा रहे हैं जो बहुत ही घातक है। अगर किसी को प्राकृतिक नियमों व पशुता से इतना ही लगाव है तो उसे कानून व संविधान भी समाप्ति का पक्षधर हो जाना चाहिए। आजादी के नज़्म पर बाज़ार के एजेंट हमें गर्त के गड्ढे में धकेल रहे हैं जहाँ कीचड़ व अंधेरों के सिवा कुछ नहीं।
॥अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते॥