रविवार, फ़रवरी 18, 2018

कभी सोचा आपने 30 साल बाद आपकी सम्पति का कौन मालिक होगा?

कभी सोचा आपने 30 साल बाद आपकी सम्पति का कौन मालिक होगा?
याद रखना, आबादी बढ़ते तुम्हारा राष्ट्र मुस्लिम राष्ट्र हो जायेगा! ऐसा हो चूका है और अभी भी हो रहा है!
एक दिन पूरे काबूल (अफगानिस्तान) का व्यापार सिक्खों के हाथ था, आज उस पर तालिबानों का कब्ज़ा है!
सत्तर वर्ष पहले पूरा सिंध सिंधियों का था, आज उनकी पूरी धन संपत्ति पर पाकिस्तानियों का कब्ज़ा है!
एक दिन पूरा कश्मीर धन धान्य और एश्वर्य से पूर्ण हिंदू पंडितों का था, उनके उन महलों और झीलों पर आतंक का कब्ज़ा हो गया और आज वे टेंटों में ज़िंदगी गुजार रहे हैं!
एक दिन वो था जब ढाका का हिंदू बंगाली पूरी दुनिया में जूट का सबसे बड़ा कारोबारी था! आज उसके हाथ क्या है?
गुरु नानक का ननकाना साहब, लवकुश का लाहौर, दाहिर का सिंध, चाणक्य का तक्षशिला, ढाकेश्वरी माता का मंदिर देखते ही देखते सब पराये हो गए!
पाँच नदियों से बने पंजाब में अब केवल दो ही नदियाँ बची हैं!
इस देश के हिंदू समाज की सारी समस्याओं की जड़ ही संगठन का अभाव है!
कोई व्यापारी असम के चाय के बागान अपना समझ रहा है, कोई आंध्र, कर्नाटक की खदानें अपनी मान रहा है! तो कोई सोच रहा है ये हीरे , लोहे का व्यापार सदा सर्वदा उसी का रहेगा!
कभी कश्मीर की केसर व्यापारियों के बारे में भी हिंदू यही सोचा करता था! हिन्दू अपने घर भरता रहा और पूर्वांचल का लगभग पचहत्तर प्रतिशत जनजाति समाज विधर्मी हो गया!
बहुत कमाया तूने बस्तर के जंगलों से, आज वहाँ खुद घुस भी नहीं सकता! आज भी आधे से ज्यादा समाज को तो ये भी समझ नहीं कि उस पर क्या संकट आने वाला है!
बचे हुए समाज में से बहुत सा अपने आप को सेकुलर मानता है!
आजादी के बाद एक बार फिर हिंदू समाज दो राहो पर खड़ा है!
दो ही रास्ते है,
शुतुरमुर्ग की तरह आसन्न संकट को अनदेखा कर रेत में गर्दन गाड़ लेना
या
दूसरा रास्ता तमाम संकटों को भांपकर सारा *हिंदू समाज* आपसी मतभेद भुला कर संगठित हो संघर्ष कर अपनी धरती और संस्कृति बचाना!
जो करना ही होगा और करना ही होगा!
हिन्दू समाज बोलेतो समाज के चारो वर्ण ---ब्राम्हण, वैस्य, क्षत्रिय, क्षुद्र चारो वर्ण में आने वाली सभी जातियाँ । कोईभी अपने को हिन्दू समाज से अलग नही समझे । हमारे में झगड़ा लगाकर अपना काम कर रहे है।। सावधान । । ।सावधान । । ।
जय हिंद
जय भारत
जय हिंदुत्व
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बुधवार, फ़रवरी 14, 2018

डर


जागो भारत जागो
सुनो ! तुम्हारा ये डर हमे अच्छा लगता है ....
# इस्लाम दुनिया का एक मात्र ऐसा धर्म है जो औरतों के
# जींस # स्कर्ट्स पहनने और एक कार्टून से भी खतरे में आ जाता है .....
और पिछले कुछ सालों में दुनिया में कुछ ऐसे लोगों का जन्म हो चुका है जो इस्लाम को खतरे में डालने के लिए ही पैदा हुए है ....... # भारत में # मोदी...... #रूस में #पुतिन ... और
# अमेरिका में #ट्रम्प .... ऐसे लोग दुनिया से इस्लाम का वजूद मिटाने पर तुले हैं ....ये लोग तो बड़े बड़े खतरे हैं ...
लेकिन छोटे छोटे खतरे भी पैदा हो गए हैं जिनकी वजह से हर रोज़ इस्लाम खतरे में आ जाता है... #तारिक_फ़तेह
# तसलीमा_नसरीन जैसे लोग भी इस्लाम के बड़े दुश्मनों में से एक हैं ......
इस्लाम तब भी खतरे में था जब #मोहम्मद_साहब जिन्दा थे .. इस्लाम आज भी खतरे है में जब करोड़ों मोहम्मद साहब मुसलमानों के रूप में पूरी दुनिया में फैले हैं ...... आज इस्लाम दुनिया का सबसे प्रतिक्रियावादी साम्प्रदाय है .... जो खून का बदला खून में विश्वास रखता है ...
●वो #ईराक #सीरिया और पश्चिमी एशिया में मुसलमानों और गैर मुसलमानों दोनों को मारता है ....
●वो #अल्जीरिया ... #नाइजीरिया .. मुस्लिमों का क़त्ल करता है
●अफ़्रीकी देशों में गैर मुसलमानों को मारता है ...
●वो यूरोपीय देशों में ईसाईयों को मारता है ..
●म्यामार और कम्बोडिया में ईसाईयों और बौद्धों को मारता है ........
● वो भारत में शहीद स्मारक तोड़ता है ..
●सेना और पुलिस के जवानो को मारता है उनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ता है ....
●भारत के मुसलमान बात बात पर इस्लाम का हरा झंडा लेकर सड़क पर उतर आते हैं ....
●कश्मीर के हज़रत बल दरगाह से मोहम्मद साहब का बाल चोरी हो गया और इस्लाम खतरे में आ जाता है .....
●आग लगती है #यूरोशलम के अल-आक्सा मस्जिद में और भारत में इस्लाम खतरे में आ जाता है .......
●मोहम्मद का कार्टून बनता है फ्रांस और डेनमार्क में .. ●लेकिन विरोध में गाड़ियाँ और दुकाने भारत में जलाई जाती हैं.......
●यहाँ तक की एक बॉलीवुड फिल्म भी इस्लाम को खतरे में डाल देती है ......
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जो बात बात पर खतरे में आ जाता है वो
# डरपोक_साम्प्रदाय है ..... 25 करोड़ की कौम महज इसलिए एक जुट हो जाती है ताकि मोदी और भाजपा सत्ता में ना आ पायें .....ये लोग बिना बिजली पानी और रोटी के रह लेंगे लेकिन बीजेपी और मोदी को सत्ता में नहीं देखना चाहेंगे .....
ये डर नहीं तो और क्या है ...??
ऐ # मुसलमानों सुनो ! तुम दुनिया की सबसे डरपोक कौम हो ... तुम वही हो जो राणा सांगा से युद्ध के समय अपने साथ गायों का झुण्ड रखते थे ताकि #हिन्दू_सैनिक सीधे तुम पर हमला ना कर पायें ... तुम 1400 साल पहले भी डरपोक थे और आज भी हो ... तुम पृथ्वी राज चौहान से भी डरते थे .. तुम #बाजीराव_पेशवा और
# महाराणा_प्रताप से भी डरते थे .. तुम राजा दाहिर से डरते थे और तुम #गुरु_गोविन्द_सिंह से भी डरते थे .....
और मै दावे के साथ कहता हूँ की तुम मोदी से भी डरते हो .. मोदी का नाम सुन कर तुम्हारे पसीना छूट जाता है .... डर तुम्हारे खून में है ... तुम कभी एक कार्टून से डर जाते हो तो कभी मलाला नाम की एक बच्ची से ... कभी तुम
# कल्याण_सिंह से डर जाते हो तो कभी
# योगी_आदित्यनाथ से ...... अब तुम मोदी से डर रहे हो बीजेपी से डर रहे हो #आरएसएस और # बजरंग_दल से डर रहे हो .....
खैर जो भी हो ये डर बना रहना चाहिए क्योंकि --
तुम्हारा ये डर हमे अच्छा लगता है ...

रविवार, फ़रवरी 04, 2018

"धर्मयुद्ध और सनातनी युद्ध नियम" वीर तक्षक

Lata Singh
"धर्मयुद्ध और सनातनी युद्ध नियम" ।
किसी बॉलीवुड वाले को अगर फ़िल्म ही बनानी है तो "वीर तक्षक" पर फ़िल्म बनाए !!
मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। तोड़े गए मन्दिरों, मठों और चैत्यों के ध्वंसावशेष अब टीले का रूप ले चुके थे, और उनमे उपजे वन में विषैले जीवोँ का आवास था।
कासिम ने अपने अभियान में युवा आयु वाले एक भी व्यक्ति को जीवित नही छोड़ा था, अस्तु अब इस क्षेत्र में हिन्दू प्रजा अत्यल्प ही थी।
एक बालक जो कासिम के अभियान के समय मात्र "आठ वर्ष" का था, वह इस कथा का मुख्य पात्र है। उसका नाम था "तक्षक"।
भारत ने पहली बार "मानवता" की हत्या देखी थी।
तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो इसी कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे।
लूटती अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से "खींच खींच" कर उनकी देह लूटी जाने लगी। भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें "भय" से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी।
फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का "सर" काट डाला। उसके बाद बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली और तलवार को अपनी "छाती" में उतार लिया।
आठ वर्ष का बालक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भागा।
पचीस वर्ष बीत गए, तब का अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं।
उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था।
कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम, विशाल सैन्यशक्ति और अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे "अरब" कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते।
युद्ध के "सनातन नियमों" का पालन करते नागभट्ट कभी उनका "पीछा" नहीं करते, जिसके कारण बार बार वे मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे, ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।
आज महाराज की सभा लगी थी, कुछ ही समय पुर्व गुप्तचर ने सुचना दी थी, कि अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की "सीमा" पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी।
नागभट्ट का सबसे बड़ा गुण यह था, कि वे अपने सभी "सेनानायकों" का विचार लेकर ही कोई निर्णय करते थे।
आज भी इस सभा में सभी सेनानायक अपना विचार रख रहे थे। अंत में तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला -
"महाराज, हमे इस बार वैरी को उसी की शैली में उत्तर देना होगा"
महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।
तक्षक: महाराज, अरब सैनिक महा बर्बर हैं, उनके सतक्षकाथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ "घात" ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।
महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक"।
तक्षक ने कहा "मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों, ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज, इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है। पर यह हमारा धर्म नही हैं, राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा।
देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना "अत्याचार" किया था।
ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।"
महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।
आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।
अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह अपनी तलवार चलाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी।
सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य!
महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।
विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।
सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा- लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया।
कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया।
युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-
"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अब तक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"
इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों में भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।
सौजन्य से रविंद्र पँवार

दिए तले अँधेरा

दिए तले अँधेरा
डॉ विवेक आर्य
एक ईसाई प्रचारक बड़े जोश में पंजाब के देहात में जाकर प्रचार करने लगा। उसने सोचा की मसीह की शिक्षा को बढ़िया दिखाने के लिए हिन्दुओं के पुराणों की खिल्ली उड़ानी चाहिए जिससे की हिन्दू अपने ही पुराणों से घृणा करने लगे और मसीह की शिक्षा पर विश्वास लाये। मगर उसकी किस्मत ने उसे धोखा दिया और वह एक पेशावरी टोपी पहने आर्यसमाजी प्रचारक से टकरा गया।
पादरी- हिन्दुओं को पुराणों की शिक्षा को छोड़कर ईसा मसीह की शिक्षाओं को अपनाना चाहिए देखो विष्णु, मत्सय, लिंग आदि पुराणों में क्या लिखा हैं की हिन्दुओं का अराध्य देव ब्रह्मा मद्यपान करता था और एक दिन उन्मत होकर अपनी ही कन्या से कुकर्म किया।
आर्यसमाजी प्रचारक- एक कहावत हैं छाज तो बोले किन्तु छाननी क्या बोले जिसमें सहस्त्रों छेद हैं। पहली बात तो हम केवल वेद मुकद्दस में विश्वास रखते हैं। पुराण आदि पिछले ६००-७०० वर्षों में बने हैं जिनमें सैकड़ों ऐसी बातें भरी हुई हैं जो न तो स्वीकार्य हैं और न ही वेदानुकूल हैं। जिसे तुम इल्हामी बाइबिल कहते हो उसमें कभी ध्यान नहीं देते। देखो उत्पत्ति १९/३१-३६ में लिखा हैं नबी हजरत लूत ने शराब के नशे में अपनी दो पुत्रियों से व्यभिचार किया। इससे आगे सुनों गिनती ३१/३५-४० में हजरत मूसा ने ३२,००० कुंवारी लड़कियों से दुराचार करने की आज्ञा दी। बाइबिल में ऐसा पढ़कर आप लोगों को लज्जा नहीं आती। अप्रमाणिक पुराणों पर आक्षेप करते फिरते हो। तुम लोगों के बारे में तो एक कहावत प्रसिद्द हैं- तो आकाश के ऊपर क्या जानता हैं कि क्या हैं? जबकि तू नहीं जानता कि तेरे घर में कौन हैं?
पादरी- पद्यपुराण के अनुसार विष्णु ने जालंधर वैद्य का रूप धरा और उसकी पत्नी संग सहवास किया?
आर्यसमाजी प्रचारक-अपनी आँख में शहतीर नहीं सूझता, किन्तु दूसरे की आँख में तिनका भी भारी प्रतीत होता हैं। पद्य पुराण में किसी मुर्ख ने कुछ भी अनाप शनाप लिख दिया तो यह प्रामाणिक कैसे हो गया। वेदशास्त्र से प्रमाण होना चाहिए। किन्तु ऐसा प्रमाण वेदों में मिलना दुष्कर ही नहीं असंभव हैं। मगर आपको इंजील से प्रमाण देते हैं। २ शमूएल अध्याय ११ में लिखा हैं कि दाऊद ने ऊरिय्याह की पत्नी से दुराचार किया और ऊरिय्याह को युद्ध में चिट्ठी भेजकर मरवा दिया। लोगो का नाक अपना कटा हुआ हैं मगर नक्क कटा दूसरों को बता रहे हैं। शोक!
पादरी- महादेव अपने विवाह में नग्न होकर बैल पर चढ़ा।
आर्यसमाजी प्रचारक- उत्पत्ति अध्याय ९ आयत २०-२३ में लिखा हैं नूंह शराब पीकर नंगा हो गया। यह बात आपकी इल्हामी पुस्तक कहती हैं।
पादरी- राम ने रावण ब्राह्मण को मारा और अपनी स्त्री सीताको जो रावण के घर प्रविष्ट हुई थी को पुन: स्वीकार किया जबकि लोगों ने उसे अशुद्ध एवं अपवित्र ठहराया था।
आर्यसमाजी प्रचारक- श्री राम तो महापुरुष थे। उनकी जैसी वीरता तो देखने को भी नहीं मिलती। उस काल में बिना अपने पिता के राज्य की सहायता के श्री राम ने २५ कोस लम्बा पुल बनाया, रावण को यमलोक भेजा और सीता को जो बैरियों के मध्य रहकर भी पवित्र रही स्वीकार किया। जरा अपने घर को देखो। उत्पत्ति अध्याय ३४ में लिखा हैं कि याकूब की बेटी दीना को हमोर के पुत्र शकेम ने भ्रष्ट कर अपवित्र कर दिया और बाद में विवाह का प्रस्ताव भेजने पर भी याकूब ने अपवित्र हुई अपनी लड़की को अपने घर में रख लिया। इन को देखकर कर तो एक ही कहावत स्मरण होती हैं "आँख के अंधे नाम नैनसुख"
पादरी- भागवत में लिखा हैं कि कृष्ण ने गोपियों संग दुष्कर्म किया।
आर्यसमाजी प्रचारक- बाइबिल के उत्पत्ति पुस्तक के ३८ अध्याय की आयत १७-१९ में लिखा हैं की यहूदा नबी ने अपनी विधवा पुत्रवधु तामार के संग व्यभिचार किया। ऐसी न जाने कितनी असभ्य बातें बाइबिल में भरी पड़ी हैं। श्री कृष्ण जी महाराज विद्वान, पुण्यात्मा, कर्मठ, साहसी महापुरुष थे। उन पर दोष लगाने वाली भागवत सर्वथा अप्रमाणिक एवं अस्वीकार्य हैं।
पादरी- ईसाईयों का ईश्वर दयावान हैं।
आर्यसमाजी प्रचारक-
वेदों में ईश्वर का वर्णन पवित्र, न्यायकारी, दयालु, सर्वज्ञ, सत्यधर्मा आदि गुणों वाला हैं जबकि बाइबिल का परमेश्वर अज्ञानी, छलि, कमजोर, क्रोधी, ईर्ष्यालु एवं हिंसा में विश्वास रखने वाला हैं।
उत्पत्ति पुस्तक के अनुसार एक आदम के पाप के लिए सम्पूर्ण संसार के सभी मनुष्यों को पापी ठहराना कहाँ की दयालुता हैं?
एक के फांसी दिए जाने से सम्पूर्ण संसार के सभी मनुष्यों के पापों का क्षमा होना कहाँ का न्याय हैं?
१ शमूएल अध्याय ६ की १९ आयत के अनुसार पच्चास हजार सत्तर पुरुषों को मारने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
१ शमूएल अध्याय १५ की ३ आयत के अनुसार क्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या बच्चा, क्या दूधपिउवा, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, क्या ऊंट, क्या गदहा, सब को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
गिनती अध्याय २५ की ९ आयत के अनुसार चौबीस हजार मनुष्यों को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
होशे अध्याय १३ की १६ आयत के अनुसार बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
ऐसे ऐसे अनेक प्रमाण बाइबिल से दिए जा सकते हैं जिनसे स्पष्ट हैं की बाइबिल का ईश्वर हिंसा में विश्वास रखता हैं एवं उनका दयावान होना भ्रम मात्र हैं।
पादरी ने जब देखा कि उसकी हर बात का युक्ति एवं तर्क संगत सप्रमाण खंडन हो गया तो वह अपना बोरियां बिस्तर समेत कर वहां से नौ दो ग्यारह हो गया और हमारे आर्यसमाजी प्रचारक पंडित लेखराम जी सत्य का मंडन एवं असत्य का खंडन करने के लिए आगे बढ़ गए।
सभी पाठकों को अब यह निर्णय करना हैं की उन्हें सत्य ज्ञान वेद में विश्वास रखना हैं अथवा अविद्या के कूप बाइबिल में डूबना हैं।
(पंडित लेखराम के लेखों का संग्रह अमर ग्रन्थ "कुलयात आर्य मुसाफिर" से सभी प्रमाण लिए गए हैं।)

गुरुवार, जनवरी 25, 2018

अपराधियों को सरकारी लाइसेंस की जरूरत नहीं होती

Saurabh Bhaarat
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जी ने आज लखनऊ में ज्ञान दिया कि यूपी में कानून व्यवस्था में और सुधार करने के लिए सभी लाइसेंसी हथियार वापस ले लेने चाहिए। बिना जमीनी सच्चाई जाने ज्ञान का ओवरफ्लो ऐसे ही होता है। कानून व्यवस्था के लिए समस्या अपराधी प्रवृत्ति के लोग उत्पन्न करते हैं और अपराधियों को सरकारी लाइसेंस की जरूरत नहीं होती। देश में आज भी अगर मजहबी उन्मादी भीड़ ठान ले तो आपको घेरकर मार सकती है और कोई कानून-पुलिस उस समय आपको नहीं बचा सकता। दिल्ली में डॉ नारंग की बर्बर हत्या को भूले नहीं होंगे आप। राष्ट्रवादी सरकार के पुलिसिया इलाके में दिन दहाड़े डॉ नारंग अपने बच्चे के सामने ही मार डाले गए। उनके पास अगर बन्दूक होती तो निश्चय ही ऐसा न होता। 5 लाख कश्मीरी पण्डितों में 50 ने भी बन्दूकें चलाई होतीं तो सैकड़ों आतंकियों की लाशें बिछ जातीं। पुलिस ने तो वैसे भी मदद नहीं करना था। कोई पुलिस गोधरा कांड नहीं रोक पाई। वह तो गुजरात में हिंदुओं ने खुद ही प्रतिक्रिया कर जब जिहादी दंगाईयों को जवाब देना शुरू किया तब पुलिस सक्रिय हुई और ढाई सौ हिन्दू ही एनकाउंटर में उड़ा दिये गए। हिंदुओं को यह घुट्टी पिला दी गयी है और हिंदुओं ने पी भी ली है कि हमारी जान माल की सुरक्षा पुलिस कर लेगी, हमें खुद उसके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं। जबकि शास्त्र के साथ शस्त्र भी रखना हमारे धर्म-संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। हमारे विद्रोह को रोकने के लिए ही अंग्रेजों ने शस्त्रों को नियंत्रित करना जरूरी समझा और आर्म्स एक्ट का कानून बनाया। अब अंग्रेज नहीं है लेकिन सेकुलर स्टेट की अपनी सीमाएं हैं। चाहे किसी की सरकार रही हो न्यायोचित आक्रमण और आत्मरक्षा के प्रति उदासीन हिन्दू प्रताड़ित हुए हैं। आत्मरक्षा को लेकर जागरूकता लाई जानी चाहिए। अगर राज्य ये गारन्टी दे कि एक भी अवैध हथियार किसी के हाथ में नहीं होगा तब तो शस्त्रविहीन समाज को आदर्श बताने का भाषण सुना जा सकता है लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक शस्त्र छीनने के बजाय लाइसेंस प्रक्रिया और आसान बनाई जानी चाहिए ताकि हिन्दू मध्यम वर्ग भी अपनी आत्मरक्षा की एक वैध व्यवस्था कर पाए।

डाॅ. सत्यपालसिंहजी :मनुष्य की उत्पत्ति बन्दर से नहीं हुई

संसारभर के विकासवादियों से प्रश्न
अभी हाल में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री माननीय डाॅ. सत्यपालसिंहजी के इस कथन कि मनुष्य की उत्पत्ति बन्दर से नहीं हुई, सम्पूर्ण भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच रही है। कुछ वैज्ञानिक सोच के महानुभाव इसे साम्प्रदायिक संकीर्णताजन्य रूढ़िवादी सोच की संज्ञा दे रहे हैं। मैं उन महानुभावों से निवेदन करता हूँ कि मंत्रीजी का यह विचार रूढ़िवादी नहीं बल्कि सुदृढ़ तर्कों पर आधारित वैदिक विज्ञान का ही पक्ष है। ऐसा नहीं है कि विकासवाद का विरोध कुछ भारतीय विद्वान् ही करते हैं अपितु अनेक यूरोपियन वैज्ञानिक भी इसे नकारते आये हैं। मैं इसका विरोध करने वाले संसारभर के विकासवादियों से प्रश्न करना चाहता हूँ। ये प्रश्न प्रारम्भिक हैं, इनका उत्तर मिलने पर और प्रश्न किये जायेंगे :-
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10155039158776890&id=733371889&refid=28&ref=opera_speed_dial&_ft_=qid.6514977583997224282%3Amf_story_key.-1027758032293762540%3Atop_level_post_id.10155039158776890&__tn__=%2As-R
शारीरिक विकास
१. विकासवादी अमीबा से लेकर विकसित होकर बन्दर पुनः शनैः-२ मनुष्य की उत्पत्ति मानते हैं। वे बताएं कि अमीबा की उत्पत्ति कैसे हुई?
२. यदि किसी अन्य ग्रह से जीवन आया, तो वहाँ उत्पत्ति कैसे हुई? जब वहाँ उत्पत्ति हो सकती है, तब इस पृथ्वी पर क्यों नहीं हो सकती?
३. यदि अमीबा की उत्पत्ति रासायनिक क्रियाओं से किसी ग्रह पर हुई, तब मनुष्य के शुक्राणु व अण्डाणु की उत्पत्ति इसी प्रकार क्यों नहीं हो सकती?
४. उड़ने की आवश्यकता होने पर प्राणियों के पंख आने की बात कही जाती है परन्तु मनुष्य जब से उत्पन्न हुआ, उड़ने हेतु हवाई जहाज बनाने का प्रयत्न करता रहा है, परन्तु उसके पंख क्यों नहीं उगे? यदि ऐसा होता, तो हवाई जहाज के अविष्कार की आवश्यकता नहीं होती।
५. शीत प्रदेशों में शरीर पर लम्बे बाल विकसित होने की बात कही जाती है, तब शीत प्रधान देशों में होने वाले मनुष्यों के रीछ जैसे बाल क्यों नहीं उगे? उसे कम्बल आदि की आवश्यकता क्यों पड़ी?
६. जिराफ की गर्दन इसलिए लम्बी हुई कि वह धरती पर घास सूख जाने पर ऊपर पेड़ों की पत्तियां गर्दन ऊँची करके खाता था। जरा बताएं कि कितने वर्ष तक नीचे सूखा और पेड़ों की पत्तियां हरी रहीं? फिर बकरी आज भी पेड़ों पर दो पैर रखकर पत्तियां खाती है, उसकी गर्दन लम्बी क्यों नहीं हुई?
७. बंदर के पूंछ गायब होकर मनुष्य बन गया। जरा कोई बताये कि बंदर की पूंछ कैसे गायब हुई? क्या उसने पूंछ का उपयोग करना बंद कर दिया? कोई बताये कि बन्दर पूंछ का क्या उपयोग करता है और वह उपयोग उसने क्यों बंद किया? यदि ऐसा ही है तो मनुष्य के भी नाक, कान गायब होकर छिद्र ही रह सकते थे। मनुष्य लाखों वर्षोंसे से बाल और नाखून काटता आ रहा है, तब भी बराबर वापिस उगते आ रहे हैं, ऐसा क्यों?
८. सभी बंदरों का विकास होकर मानव क्यों नहीं बने? कुछ तो अमीबा के रूप में ही अब तक चले आ रहे हैं, और हम मनुष्य बन गये, यह क्या है?
९. कहते हैं कि सांपों के पहले पैर होते थे, धीरे-२ वे घिस कर गायब हो गये। जरा विचारों कि पैर कैसे गायब हुए, जबकि अन्य सभी पैर वाले प्राणियों के पैर बिल्कुल नहीं घिसे।
१०. बिना अस्थि वाले जानवरों से अस्थि वाले जानवर कैसे बने? उन्हें अस्थियों की क्या आवश्यकता पड़ी?
११. बंदर व मनुष्य के बीच बनने वाले प्राणियों की श्रंखला कहाँ गई?
१२. विकास मनुष्य पर जाकर क्यों रुक गया? किसने इसे विराम दिया? क्या उसे विकास की कोई
आवश्यकता नहीं है?
बौद्धिक व भाषा सम्बन्धी विकास
1. कहते हैं कि मानव ने धीरे-2 बुद्धि का विकास कर लिया, तब प्रश्न है कि बन्दर व अन्य प्राणियों में बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
2. मानव के जन्म के समय इस धरती पर केवल पशु पक्षी ही थे, तब उसने उनका ही व्यवहार क्यों नहीं सीखा? मानवीय व्यवहार का विकास कैसे हुआ? करोड़ों वनवासियों में अब तक विशेष बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
3. गाय, भैंस, घोड़ा, भेड़, बकरी, ऊंट, हाथी करोड़ों वर्षों से मनुष्य के पालतू पशु रहे हैं पुनरपि उन्होंने न मानवीय भाषा सीखी और न मानवीय व्यवहार, तब मनुष्य में ही यह विकास कहाँ से हुआ?
4. दीपक से जलता पतंगा करोड़ों वर्षों में इतना भी बौद्धिक विकास नहीं कर सका कि स्वयं को जलने से रोक ले, और मानव बन्दर से इतना बुद्धिमान् बन गया कि मंगल की यात्रा करने को तैयार है? क्या इतना जानने की बुद्धि भी विकासवादियों में विकसित नहीं हुई ? पहले सपेरा सांप को बीन बजाकर पकड़ लेता था और आज भी वैसा ही करता है परन्तु सांप में इतने ज्ञान का विकास भी नहीं हुआ कि वह सपेरे की पकड़ में नहीं आये।
5. पहले मनुष्य बल, स्मरण शक्ति एवं शारीरिक प्रतिरोधी क्षमता की दृष्टी से वर्तमान की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्ध था, आज यह ह्रास क्यों हुआ, जबकि विकास होना चाहिए था?
6. संस्कृत भाषा, जो सर्वाधिक प्राचीन भाषा है, उस का व्याकरण वर्तमान विश्व की सभी भाषाओं की अपेक्षा अतीव समृद्ध व व्यवस्थित है, तब भाषा की दृष्टी से विकास के स्थान पर ह्रास क्यों हुआ?
7. प्राचीन ऋषियों के ग्रन्थों में भरे विज्ञान के सम्मुख वर्तमान विज्ञान अनेक दृष्टी से पीछे है, यह मैं अभी सिद्ध करने वाला हूँ, तब यह विज्ञान का ह्रास कैसे हुआ? पहले केवल अन्तःप्रज्ञा से सृष्टि का ज्ञान ऋषि कर लेते थे, तब आज वह ज्ञान अनेकों संसाधनों के द्वारा भी नहीं होता। यह यह उलटा क्रम कैसे हुआ?
भला विचारें कि यदि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास हो जाता, तो एक भी पशु पक्षी मनष्य के वश में नहीं आता। यह कैसी अज्ञानता भरी सोच है, जो यह मानती है कि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास नहीं होता परन्तु शारीरिक विकास होकर उन्हें मनुष्य में बदल देता है और मनुष्यों में शारीरिक विकास नहीं होकर केवल भाषा व बौद्धिक विकास ही होता है। इसका कारण क्या विकासवादी मुझे बताएंगे।
आज विकासवाद की भाषा बोलने वाले अथवा पौराणिक बन्धु श्री हनुमान् जी को बन्दर बताएं, उन्हें वाल्मीकीय रामायण का गम्भीर ज्ञान नहीं है। वस्तुतः वानर, ऋक्ष, गृध, किन्नर, असुर, देव, नाग आदि मनुष्य जाति के ही नाना वर्ग थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रक्षेपों (मिलावट) को पहचानना परिश्रम साध्य व बुद्धिगम्य कार्य है।
ऊधर जो प्रबुद्धजन किसी वैज्ञानिक पत्रिका में पेपर प्रकाशित होने को ही प्रामाणिकता की कसौटी मानते हैं, उनसे मेरा अति संक्षिप्त विनम्र निवेदन है-
1. बिग बैंग थ्योरी व इसके विरुद्ध अनादि ब्रह्माण्ड थ्योरी, दोनों ही पक्षों के पत्र इन पत्रिकाओं में छपते हैं, तब कौनसी थ्योरी को सत्य मानें?
2. ब्लैक होल व इसके विरुद्ध ब्लैक होल न होने की थ्योरीज् इन पत्रिकाओं में प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
3. ब्रह्माण्ड का प्रसार व इसके प्रसार न होने की थ्योरीज् दोनों ही प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। इस कारण यह आवश्यक नहीं है कि हमें एक वर्गविषेश से सत्यता का प्रमाण लेना अनिवार्य हो? हमारी वैदिक एवं भारतीय दृष्टी में उचित तर्क, पवित्र गम्भीर ऊहा एवं योगसाधना (व्यायाम नहीं) से प्राप्त निष्कर्ष वर्तमान संसाधनों के द्वारा किये गये प्रयोगों, प्रक्षेपणों व गणित से अधिक प्रामाणिक होते हैं। यदि प्रयोग, प्रेक्षण व गणित के साथ सुतर्क, ऊहा का साथ न हो, तो वैज्ञानिकों का सम्पूर्ण श्रम व्यर्थ हो सकता है। यही कारण है कि प्रयोग, परीक्षणों, प्रेक्षणों व गणित को आधार मानने वाले तथा इन संसाधनों पर प्रतिवर्ष खरबों डाॅलर खर्च करने वाले विज्ञान के क्षेत्र में नाना विरोधी थ्योरीज् मनमाने ढंग से फूल-फल रही हैं और सभी अपने को ही सत्य कह रही हैं। यदि विज्ञान सर्वत्र गणित व प्रयोगों को आधार मानता है, तब क्या कोई विकासवाद पर गणित व प्रयोगों का आश्रय लेकर दिखाएगा?
इस कारण मेरा सम्मान के योग्य वैज्ञानिकों एवं देश व संसार के प्रबुद्ध जनों से अनुरोध है कि प्रत्येक प्राचीन ज्ञान का अन्धविरोध तथा वर्तमान पद्धति का अन्धानुकरण कर बौद्धिक दासत्व का परिचय न दें। तार्किक दृष्टी का सहारा लेकर ही सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग करने का प्रयास करें। हाँ, अपने साम्प्रदायिक रूढ़िवादी सोच को विज्ञान के समक्ष खड़े करने का प्रयास करना अवश्य आपत्तिजनक है।
- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक, वैदिक वैज्ञानिक
अध्यक्ष, श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास

रविवार, जनवरी 21, 2018

सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं? : ताबिश सिद्दीकी

Tabish Siddiqui
एक स्टेटमेंट, जो लगभग हर धर्म जाति का आम इंसान आपको कहता हुवा मिलेगा कि "सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं, सभी धर्मों का मूल एक है, सारे अवतारों, पैगम्बरों और संतों की शिक्षा एक ही है.. ईश्वर अल्लाह तेरे नाम".. ये मेरे हिसाब से ऐसा स्टेटमेंट होता है जिसका सत्य से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है.. मगर ये स्टेटमेंट इतना आम है और हमारे स्कूलों की दीवारों और पब्लिक प्लेस में इतनी बहुतायत से लिखा मिलता है कि धीरे धीरे हमारा अवचेतन इस पर बिना कोई सवाल उठाए स्वीकार कर लेता है
पहली बात तो ये कि अगर ये सच होता कि सारे धर्मों की शिक्षा एक है तो फिर इतने धर्म दुनिया मे होते ही न.. इतने अलग अलग धर्मों का होना अपने आप मे ऊपर के स्टेटमेंट का विरोधाभास है
जो कहते हैं कि ईश्वर अल्लाह एक है तो उनसे पूछिये कि वो मंदिर में कभी अल्लाह अल्लाह जप लिया करें और मस्जिद में कभी राम राम.. जपेंगे वो?? जो बात मुहम्मद साहब ने कही वही बुद्ध भी कहते हैं तो फिर वो लोग क्यूं नहीं क़ुरआन छोड़ के धम्मपद पढ़ते हैं? जब सब कुछ आप लोगों के हिसाब से इतना सीधा और साफ़ है तो फिर झगड़ा किस बात का है आप लोगों के बीच?
ये बिल्कुल ग़लत बात है अगर आप कहें कि बुद्ध ने जो कहा वही सारे पैगम्बरों और अवतारों ने कहा है.. ये एकदम गलत स्टेटमेंट है.. और इस भ्रम से छुटकारा पाना होगा सभी को.. एक दो उदाहरणों से मैं आपको इस घातक स्टेटमेंट की असलियत समझाना चाहूंगा.. ये घातक इसलिए है क्योंकि बरसों से इसी चक्कर में हमारे युवा अपनी खोज बन्द किये बैठे हैं.. जब एक मुसलमान युवक से आप ये कह देते हैं कि जो मुहम्मद ने कहा वही बुद्ध ने और जो तुम्हारा अल्लाह है वही ईश्वर है तो आप उसके खोज की संभावना ख़त्म कर देते हैं.. क्यूंकि जब सब एक ही हैं तो फिर अब किसी को क्या पढ़ना.. बस क़ुरआन पढ़ लो.. यही चालाकी ज़ाकिर नायक जैसे करते हैं.. वो वेदों को क़ुरआन सम्मत साबित करने की जी तोड़ कोशिश करते हैं ताकि सब कुछ क़ुरआन सम्मत हो जाय और क़ुरआन के मानने वालों का अहंकार और चरम पर पहुंच जाए और वो उसी को पकड़े बैठे रहें.. उनकी कोशिश ये रहती है कि चालाकी से ऐसा दिखाया जाए कि सब कुछ क़ुरआन में है और मुसलमानो के खोज की सारी संभावनाओं पर लगाम लगा दी जाय
छोटा सा उदाहरण लीजिये.. एक धार्मिक मुसलमान दाढ़ी रखता है.. एक हिन्दू संत भी दाढ़ी रखता है.. एक सिख भी दाढ़ी रखता है.. अब ऊपर ऊपर से आप देखेंगे तो आपको सबकी दाढ़ी एक जैसी लगेगी.. और आपके उस स्टेटमेंट के हिसाब के अनुसार कि "ईश्वर अल्लाह एक है", के हिसाब से ये सारी दाढ़ियां एक होनी चाहिए.. मगर इन सारी दाढ़ियों के पीछे का मूल एकदम अलग है
मुसलमानो में दाढ़ी रखने की शुरुवात अरबों की देन है.. ज़्यादातर अरब पहले भी दाढ़ी रखते थे और उसकी मूल वजह थी वहां का शुष्क वातावरण और धूल.. दाढ़ी रेत के फ़िल्टर का काम करती थी.. फिर जब इस्लाम आया और धार्मिक खींचतान शुरू हुई तो मुसलमानो को ये समझ आया कि धार्मिक यहूदी तो पहले से दाढ़ी रखता है तो एक धार्मिक यहूदी और धार्मिक मुसलमान के बीच भेद कैसे किया जाय? तो मुसलमानो ने मूछ हटा दी.. बिना मूंछ की दाढ़ी ने मुसलमानो को यहूदियों से अलग कर दिया.. और फिर आगे के नए इस्लाम के अनुयायियों ने बिना मूंछ के दाढ़ी रखना शुरू किया.. और उन्होंने ये दाढ़ी सिर्फ इसलिए रखी क्यूंकि मुहम्मद साहब भी दाढ़ी रखे हुए थे और बाद के ख़लीफ़ाओं ने भी दाढ़ी रखी हुई थी.. तो मुसलमानो की दाढ़ी नक़ल होती है मुहम्मद की और उनके साथियों की.. दाढ़ी रखकर मुसलमान अपने पैग़म्बर की सुन्नत (कार्य) अदा करता है.. इस्लाम मे दाढ़ी ले पीछे की सिर्फ यही एक अवधारणा है बस.. मुसलमान अपने पैग़म्बर के जैसा बनना चाहता है दाढ़ी रखा कर.. इस भेद पर ध्यान दीजियेगा
एक हिन्दू संत जब सन्यास के मार्ग पर निकलता है तो उसकी पहली शिक्षा होती है प्रकृति से अपने सारे विरोध को ख़त्म करना.. प्रकृति से एकाकार होना हिन्दू संत का पहला कर्तव्य होता है.. जो कुछ भी प्राकृतिक है वो सब स्वीकार्य है और अब उसका कोई भी विरोध नहीं होगा.. पुरुषों की दाढ़ी प्राकृतिक रूप से स्वयं उगती है और उसे हम जब काट देते हैं तो एक तरह से हम प्रकृति को ये बताते हैं कि तुम्हारे द्वारा दिये गए ये बाल हमे स्वीकार्य नहीं हैं.. तो एक सनातनी संत इस विरोध को पहले ही दिन से ख़त्म कर देता है और वो दाढ़ी और मूछों के बालों को भी प्राकृतिक रूप से स्वीकार कर लेता है.. आप ग़ौर किजियेगा तो देखिएगा कि संत सिर्फ़ दाढ़ी ही नहीं सिर के बाल भी नहीं काटता है.. क्यूंकि समूचा विरोध उसे ख़तम करना होता है प्रकृति के साथ.. तो हिंदुओं में सन्यास की इस अवधारणा के साथ दाढ़ी का जन्म होता है.. कोई संत, राम या कृष्ण की नकल करने के लिए दाढ़ी नहीं रखता है.. राम और कृष्ण वैसे भी ज़्यादातर बिना दाढ़ी के ही दिखाए जाते हैं..इसलिए दाढ़ी की अवधारणा सनातन में इस्लाम से एकदम भिन्न है
अब जब कोई सिख अपने बाल और दाढ़ी बढ़ाता है तो उसके पीछे न तो सनातन के प्राकृतिक विरोध की शिक्षा होती है और न ही अरब की कोई संस्कृति.. जब सिख केश और कृपाण धारण करता है तो उसके पीछे उनके गुरु की दीक्षा होती है.. एक दृढ़ता और एक जूझने का भाव जो उस समय की परिस्थितियों के अनुसार पैदा हुआ.. इसलिए सिख को धार्मिक सिख होना होता है तो दाढ़ी और केश रखने होते हैं
तो देखिए सिर्फ़ एक छोटी सी धार्मिक रीति, दाढ़ी और मूछ के पीछे कितनी भिन्न मान्यता है.. इसलिए क्या आप ये कहेंगे कि "सबकी दाढ़ी एक समान, चाहे हिन्दू हो या मुसलमान"??
इसलिए अपने युवकों को कंफ्यूज मत कीजिये ऐसे स्टेटमेंट दे कर कि "सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं".. युवकों से कहिये की सब अलग अलग हैं और सबको पढ़ो और जानो कि कौन क्या शिक्षा देता है.. यहां कुछ भी एक नहीं है.. इसीलिये इतनी मारकाट है हमारे बीच.. हम सब एक नहीं हैं.. और ये कटु सत्य है
ऐसे ही अन्य बातें भी हैं.. लेख बड़ा हो रहा है वरना मैं ईश्वर, अल्लाह और क़ुरआन, गीता और वेद की शिक्षा में भी भिन्नता बताता.. इसलिए वो फिर कभी किसी अन्य लेख में.. अभी के लिए इतना ही.. धन्यवाद
~ताबिश