शुक्रवार, नवंबर 17, 2017

हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है। ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवो।

Manish Pandey
हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है। ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवो। क्या हम अधिकांश भारतीयों को यह पता है इन देशों का निर्माण किस आधार पर हुआ है? जिन्हें नहीं पता है उनके लिए जानकारी है कि इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण हुआ है। ईस्ट तिमोर जो इंडोनेशिया का एक भाग था में पहले ईसाइयों की आबादी बहुत कम थी, मुसलमानों एवं अन्य मत के मानने वाले लोगों की आबादी 80% से अधिक थी केवल 50 वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न से ईस्ट तिमोर में ईसाइयों की जनसंख्या 80% से अधिक हो गई, परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र के दखल से जनमत संग्रह करा कर ईस्ट तिमोर नाम के देश का निर्माण कर दिया गया। कोई युद्ध नहीं हुआ। सूडान के दक्षिणी क्षेत्र में गरीबी थी, मिशनरियों के प्रभाव में कुछ आदिवासी लोगों को पहले ही ईसाई बनाया गया। धीरे धीरे इस मुस्लिम बहुल देश को दक्षिणी क्षेत्र में ईसाइयों से भर दिया गया। फिर गृह युद्ध करा दिया गया। शांति प्रयास संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुए और परिणिति दक्षिणी सूडान को काटकर ईसाई देश के रूप में नए देश की मान्यता दे दी गई। कोसोवो सर्बिया के भीतर एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें खदानें बहुत अधिक थीं। इन खदानों में काम करने के लिए अल्बानियाई मूल के मुसलमानों को मजदूर के रूप में लाया गया था।कालांतर में इनकी संख्या बढ़ गई। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया स्वतंत्र देश बना। लेकिन मुसलमानों ने सर्बों के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और कोसोवो को अलग देश बनाने की मांग किया। गृहयुद्ध जैसी स्थिति कई वर्षों तक रही। फिर नया देश बन गया।
भारत के कई क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यकीय परिवर्तन किए जा रहे हैं। बहुसंख्यक आबादी इससे अनजान है। विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों मे ऐसा होने से गैरकानूनी एवं आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं। यदि हम भारत की अखंडता बनाए रखना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन से मिलकर हमें समस्या का समाधान खोजना चाहिए। आखिर हम भी तो भारत माता के बिना वर्दी वाले सैनिक हैं।

गुरुवार, नवंबर 02, 2017

बंगाल इस्लामिक है, वहीँ ओड़िया बोलने वाले लोग 96% हिन्दू है , जानिये क्यों?

आज अधिकतर बंगाली मुसलमान है, पर ओड़िया बोलने वाले लोग 96% हिन्दू, ऐसा क्यों ?
इतिहास जो हमें जानना चाहिए ....बंगाल (बांग्लादेश सहित) आज इस्लामी हो गया, वहीँ ओडिसा आज भी 95% हिन्दू है .... कैसे ? जबकि दोनों ही इलाकों पर इस्लामिक हमलावरों ने सन 1000 के बाद एक साथ हमला किया था, फिर ऐसा क्या हुआ की बंगाली बोलने वाले लोग आज अधिकतर इस्लामिक है, मुसिलम है, पर ओड़िया बोलने वाले लोग हिन्दू है, कभी आपने इसका कारण सोचा है ?
सन 1248 ( 13वी शताब्दी ) इस्लामिक हमलावर तुगन खान ने उडीसा पर हमला किया । उस समय वहां पर राजा नरसिम्हादेवा का राज था । राजा नरसिम्हादेव ने फ़ैसला किया कि इस्लामी हमलावर को इसका जवाब छल से दिया जाना चाहिये । उन्होने तुगन खान को ये संदेश दिया कि वो भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन की तरह समर्पण करना चाहते हैं, जिसने बिना युद्ध लडे तुगन खान के सामने हथियार डाल दिये थे।
तुगन खान ने बात मान ली और कहा कि वो अपना समर्पण "पूरी" शहर में करे, इस्लाम कबूल करे और जगन्नाथ मंदिर को मस्जिद में बदल दे । राजा नरसिम्हादेव राज़ी हो गए और इस्लामिक लश्कर "पूरी" शहर की तरफ़ बढने लगा, इस बात से अन्जान कि ये एक जाल।है। राजा नरसिम्हादेव के हिंदू सैनिक शहर के सारे चौराहों , गली के नुक्कड़ ओर घरों में छुप गये ।
जब तुगन खान के इस्लामिक लश्कर ने जगन्नाथ मंदिर के सामने पहुंचे, उसी समय मंदिर की घंटिया बजने लगी और 'जय जगन्नाथ' का जयघोष करते हिंदू सैनिको ने इस्लामिक लश्कर पर हमला कर दिया। दिनभर युद्ध चला, ज्यादातर इस्लामिक लश्कर को कब्जे में कर लिया गया और कुछ भाग गये । इस तरह की युद्धनीति का उपयोग पहले कभी नहीं हुआ था । किसी हिंदू राजा द्वारा जेहाद का जवाब धर्मयुद्ध के द्वारा दिया गया ।
राजा नरसिम्हादेवा ने इस विजय के उपलक्ष्य में " कोनार्क" मंदिर का निर्माण किया । गूगल पर कम से कम ज़रूर देखिये इस शानदार मंदिर को ।अगर लड़ोगे तो जीतने की गुंजाइश तो होगी ही, मुर्दे लड़ नहीं सकते इसीलिए वो धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं ।
बंगाली भाषा जहाँ थी वहां का राजा लक्ष्मणसेन ने बिना लड़े हथियार डाल दिया, नतीजा देखिये, आज अधिकतर बंगाली बोलने वाले लोग मुसलमान है, बंगाल सिर्फ पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि बांग्लादेश भी बंगाल ही था, आज अधिकतर बंगाली लोग मुसलमान है, बंगाल इस्लामिक है, वहीँ ओड़िया बोलने वाले लोग 96% हिन्दू है .....
बात बिल्कुल स्पष्ट है ...सामने वाले की मानसिकता जैसी है उसी प्रकार से उसका सामना कीजिए....

बुधवार, नवंबर 01, 2017

क्रूर कट्टर इस्लाम की जान कुरान रूपी तोते में है |

इस्लामी दुनिया को ले कर सभ्य समाज का दायित्व *
सभ्य सँसार और इस्लामी दुनिया के चिंतन-जीवन में इतनी दूरी है कि सभ्य सँसार इस्लामी दुनिया को समझ ही नहीं सकता। सभ्य समाज में स्त्रियों के बाज़ार जाने, रेस्टोरेंट जाने, स्टेडियम जाने को ले कर कोई सनसनी जन्मती ही नहीं। यह कोई समाचार ही नहीं है मगर इस्लामी सँसार के लिए यह बड़ा समाचार है कि सऊदी अरब अब अपने देश में होने वाली खेल प्रतियोगिताएं को देखने के लिए महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति देगा। यह अनुमति 2018 में लागू होगी। अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिलाएं स्टेडियम में जा कर खुद भी खेल सकेंगी कि नहीं। यह फ़ैसला युवराज मुहम्मद बिन सलमान ने समाज को आधुनिक बनाने और अर्थ व्यवस्था को बढ़ाने के तहत किया है। प्रारम्भ में इसे तीन बड़े नगरों रियाद, जद्दा और दम्माम में बने स्टेडियमों में लागू किया जायेगा। अब उन्हें पुरुषों के खेल देखने की अनुमति भी होगी।
सऊदी अरब खेल प्राधिकरण के अनुसार नई व्यवस्था के लिये स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं की जायेंगी। 32 वर्षीय युवराज के विज़न 2030 के तहत जल्द ही देश में म्युज़िक कंसर्ट और सिनेमा देखने का सिलसिला प्रारंभ होने की उम्मीद है। इसमें अभी भी पेच है। किसी भी सामान्य मस्तिष्क में भी प्रश्न आयेगा कि आख़िर औरतों को स्टेडियम में खेल देखने की यह अनुमति 2018 में लागू क्यों होगी ? आज ही लागू करने में क्या परेशानी है ? इसमें पेच यह है कि सऊदी व्यवस्था को स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं बनानी हैं। इसका मतलब यह है कि औरतों के लिये यह सारी व्यवस्था स्टेडियम में अलग से बने हिस्से में होगी। जिसमें बैठी महिलायें न दायें-बायें देख सकेंगी, न उनके बॉक्स में कोई बाहर से देख सकेगा। यह एक बक्सा सा होगा जो तीन तरफ़ से बंद और केवल सामने से खुला होगा। आपने यदि ताँगे के घोड़े को देखा हो तो आप पायेंगे कि उसकी आँखों के दोनों ओर चमड़े का बनी खिड़की की झावट सी होती है। जिसके होने से वो केवल सीधा ही देख सकता है।
सभ्य समाज को अपने लिए ही नहीं बल्कि मुल्ला समाज के लिए जानना और जनवाना उपयुक्त होगा कि सऊदी अरब ही नहीं अपितु पूरे अरब जगत में औरतें भारी बंदिशें झेल रही हैं। उनके पहनावे के कड़े नियम हैं। सार्वजनिक गतिविधियों, ग़ैरमर्द से बात करने पर प्रतिबंध हैं। पुरुषों के साथ काम करने पर रोक है। घर से अकेले निकलने पर रोक है। इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है।
पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री कहीं और जाना तो दूर डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती। कल्पना कीजिये कि सऊदी अरब में कोई लड़की या औरत घर पर अकेली हो और उसके चोट लग गयी हो। साहब जी, इस्लामी क़ानून के अनुसार उसकी विवशता है कि उसका कोई पुरुष अभिभावक आये और उसे डाक्टर के पास ले जाये अन्यथा वह घायल बाध्य है कि तड़प-तड़प कर, रो-रो कर मर जाये।
मुसलमान औरत के लिए पुरुष की अधीनता बल्कि दासता इस्लामी व्यवस्था है और इससे उसका छूटना, बाहर आना उसकी निजी आवश्यकता ही नहीं है अपितु मानवता के लिए अनिवार्य है। मानवता स्वयं प्रस्फुटित नहीं होती इसे स्थापित करना पड़ता है। प्रत्येक पुरुष के बराबरी के अधिकार, सभी स्त्री-पुरुषों के बराबर के अधिकार मानवता की शर्त है। अतः यह सभ्य समाज की मानवीय ज़िम्मेदारी { moral duty } है कि आप और हम इस्लाम के शिकंजे से मुसलमान समाज को मुक्ति दिलायें। इसके लिये अनिवार्य शर्त इस्लाम से मुसलमानों को परिचित कराना, उसकी सत्यता का मुसलमानों को अहसास कराना है। एक बार मुसलमान स्थिति को समझ गये तो इस्लाम में बदलाव ले आयेंगे।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, अक्टूबर 29, 2017

मानो या ना मानो

*शयन विधान*
*सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।*
* सोने की मुद्रा:*
*उल्टा सोये भोगी,*
*सीधा सोये योगी,*
*डाबा सोये निरोगी,*
*जीमना सोये रोगी।*
* शास्त्रीय विधान भी है।*
*आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,*
*बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।*
*शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।*
*सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र /नवकार मंन्त्र गिने जाए
*"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।*
*"सात भय:-"*
*इहलोक,परलोक,आदान,*
*अकस्मात ,वेदना,मरण ,*
*अश्लोक (भय)*
* दिशा घ्यान:-*
*दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।*
* यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।*
*1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।*
*2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।*
*3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।*
*4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से मृत्यु और हानि होती है ।*
*अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।*
*विशेष शयन की सावधानियाँ:-*
*1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।*
*2:-सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।*
*3:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।*
*4:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।*
*5:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।*
*6:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।*
*7:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।*
*7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।*
*8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान)*
*9:- सोते सोते पढना नहीं।*
*10:-सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले चेत जाएँ )*
*11:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। )*
*12:-शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।*
* प्रत्येक व्यक्ति यह ज्ञान को प्राप्त कर सके इसलिए शेयर अवश्य करे |

बुधवार, अक्टूबर 25, 2017

1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था।


# ऐ मेरे वतन के लोगों जरा जान लो ये भी कहानी#
1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था। उस सतत स्मृति के आज 55 साल हो रहे हैं। बीस अक्तूबर को चीन ने धावा बोला और हमें लहूलुहान करने के बाद 20 नवंबर को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया। इससे जुड़ी लगभग सारी चीजें अब भी गोपनीय फाइलों में हैं। ब्रूक्स हेंडरसन कमेटी की रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक किए गए पर उतना ही जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से गढ़े गए हमारे महान नेता की छवि दागदार न होने पाए। लेकिन इसकी पुनरावृत्ति से बचना है तो किसी की शेरवानी पर छींटे लगने की परवाह नहीं करनी होगी। बहुत से राज फाश हो चुके हैं बस हम और आप जानते नहीं।
युद्ध में लड़ती फौज है और नेतृत्व नागरिक सरकार करती है। और नेतृत्व अगर अपनी सेना से ही घृणा करने लगे तो देश माओ की कृपा पर ही रहेगा। माओ चाहें तो कब्जा की हुई जमीनें छोड़ दें या कलकत्ते तक आ पहुंचें। विजयी सेना को दोष देने का कोई औचित्य नहीं। हमें तो यह देखना होगा कि हमारी सरकार ने तैयारियां कैसी की और सेना को किस तरह से लैस किया, उसका मनोबल बढ़ाया। पर इसकी तफ्तीश करेंगे तो शायद क्रोध, घृणा के ज्वार मन में उठें। समस्या आपकी है, पत्रकार का काम बस तटस्थ भाव से बताने का है।
अपने शांतिकामी प्रधानमंत्री सकल विश्व के चाचा बनना चाहते थे। इतिहास में अमरत्व और यश-कीर्ति प्राप्त की उनकी जो उत्कट आकांक्षा थी, वह विरल है। वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता थे, एशिया के नेता थे, वैश्विक नेता थे, भारत का प्रधानमंत्री होना बस एक संयोग था या अपने कद को दुनिया में बढ़ाने का साधन, यहां आपकी राय मानी जाएगी। उनके चीनी समकक्ष झाऊ एन लाई ने कहीं कहा था कि दुनिया के जितने भी नेताओं से वे मिले हैं,उनमें नेहरू का अहंकारोन्माद (Megalomania) सबसे ज्यादा था।
शायद इसीलिए चच्चा को अपनी सेना से विकट घृणा थी, वे तो शांतिकामी ताकतों के वैश्विक अगुआ बनना चाहते थे। आजादी के तुरंत बाद भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल राबर्ट लाकहार्ट ने जब पप्पू चच्चा से कहा कि हमें एक रक्षा योजना की जरूरत है तो उन्होंने सेनाध्यक्ष को डपट दिया। कहा, हमें किसी रक्षा योजना की जरूरत नहीं है। हमारी नीति अहिंसा की है। आप चाहें सेना को भंग कर सकते हैं। हमारी सुरक्षा जरूरतों के लिए पुलिस काफी है।
सेना को भंग करने की बहुत जल्दी थी चच्चा को। आजादी के ठीक एक महीने बाद 16 सितंबर को प्रधानमंत्री ने फरमान सुनाया कि सैनिकों की संख्या 280,000 से घटाकर डेढ़ लाख की जाए। 1950-51 में जब चीन तिब्बत पर कब्जा कर चुका था और तनाव बढ़ रहा था तब भी नेहरू ने सेना को भंग करने का सपना देखना नहीं छोड़ा। उस साल 50,000 सैनिकों को घर भेजा गया कि वीर सैनिक, अब जरूरत नहीं रही तुम्हारी। 47 में दिल्ली के नार्थ ब्लाक में सेना का एक छोटा सा दफ्तर होता था जहां गिनती के सैनिक थे। एक दिन चच्चा की नजर उन पर पड़ गई और उन्हें तत्क्षण गुस्सा आ गया- ये यहां क्या रहे हैं? फौरन हटाओ इन्हें यहां से। यूं दुत्कारे गए।
"लोकतंत्र के लिए चुनौती" यानी सेना अंदर से ही खोखली हो जाए इसलिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्होंने राष्ट्र और धर्मनिरपेक्षता के हित में बहुत बड़ा कदम उठाते हुए इसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना में बांट दिया। तब से आज तक हम यूनीफाइड कमांड/थियेटर कमांड और सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बनाने को जूझ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को शायद गंभीरता से लगता था कि भारतीय सेना को लड़ने नहीं आता। तभी तो 1948 के युद्ध में सैन्य कमांडरों को बताने लगे कि कैसे लड़ें। परिणाम यह कि एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के हाथ चला गया। फील्डमार्शल केसी करियप्पा ने 1948 के युद्ध में उत्कृष्ट नेतृत्व करते हुए मोर्चे से सेना की अगुआई की। चच्चा कैसे खुश होते? उन्होंने जनरल करियप्पा को हटाने की ठान ली और उनकी जगह जनरल राजेंद्र सिंहजी जडेजा को फील्डमार्शल बनाने की कोशिश की। जनरल जडेजा मना नहीं करते तो ये भी हो जाता।
भारतीय सेना के निरंतर अपमान और मनोबल तोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष्ण मेनन ने पूरी ऊर्जा झोंक दी। मेनन ने सेना के पूरे चेन ऑफ कमांड को ध्वस्त कर दिया। कायदे से रक्षा मंत्री सिर्फ सेना प्रमुख से बात करता है लेकिन मेनन के क्या कहने। वे तो फोन उठा कर मेजर से भी बात कर लेते थे। सेनाप्रमुख की उनके लिए कोई विशेष हैसियत नहीं थी। के.सी. करियप्पा के बाद नेहरू-मेनन जोड़ी के निशाने पर जनरल कोडांडेरा सुबैय्या थिमैया यानी जनरल केएस थिमैया आए।। 1959 में सेना प्रमुख बने जनरल थिमैया का कद इतना बड़ा था कि नेहरू-मेनन को खतरा लगने लगा। दिखावे के लिए चच्चा सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा का कोई मौका नहीं चूकते थे। गर्वीले सैनिक जनरल थिमैया सेना से नेहरू-मेनन की चिढ़ से अंजान नहीं थे पर घुटने टेकने वालों मे से नहीं थे। 28 अगस्त, 1959 को उनकी नेहरू से तल्ख बहस हो गई। उसी रात पी के टल्ली रक्षा मंत्री मेनन ने जनरल साहब को धमकाया कि सीधे प्रधानमंत्री से कैसे बात कर लिए। नतीजा बुरा होगा। जनरल थिमैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने उन्हें बुलाया और इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया। पर जैसे ही जनरल पीएमओ से निकले, चच्चा ने खबर लीक कर दी। दो सितंबर को नेहरू ने इस्तीफे के बाबत संसद में बयान दिया और ठीकरा थिमैया पर फोड़ दिया।
सेना प्रमुख को ठिकाने लगाने का यह उतावलापन तब जब अगस्त में ही चीनियों ने एक भारतीय को बंदी बना लिया था और एकाध जगह झड़पें भी हो चुकी थीं। इस्तीफा प्रकरण के ठीक दो महीने बाद चीनियों ने अक्साईचिन में भारतीय फ्रंटियर पुलिस के आठ सिपाहियों की घात लगाकर हत्या कर दी।
जिस सेना को दफन करने का सपना चच्चा ने पाल रखा था, जरूरत पड़ने पर उसी सेना के भरोसे वे फारवर्ड पालिसी अपनाने का भी मंसूबा रखे थे। 1961 में चच्चा के परमप्रिय जनरल बीएम कौल आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने। उनका मानना था कि चीनी बिना लड़े ही भाग जाएंगे। पहले लद्दाख सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही वेस्टर्न कमांड ने फारवर्ड पालिसी के खिलाफ आगाह किया, फिर सेनाप्रमुख जनरल पीएन थापर ने। लेकिन चच्चा को लगता था कि सेना को उन्होंने कानी उंगली का बल दे दिया है। पर चच्चा न जामवंत थे और न ही जनरल कौल हनुमान। चीनियों ने रौंद दिया। लगा कि पूरा आसाम चला जाएगा और चच्चा ने रेडियो पर कहा- मेरा दिल आसाम के लिए रो रहा है।
चच्चा, आपने जो किया वो भुगता। अब भी समाजवाद और धर्मनिरेपक्षता की मुगली घुट्टी पी रहे सुधीजनों को यह ईशनिंदा लग सकता है। पर कर्मन की गति न्यारी!
पराजय से पूरा देश टूट चुका था। चच्चा का यशोगान मद्धिम पड़ गया था। कवि प्रदीप ने अंधेरे में एक दिया जलाया और अमर गीत लिखा, " ऐ मेरे वतन के लोगों।" दो महीने बाद 1963 में गणतंत्र दिवस के अगले दिन जब लता जी यह गाना गाईं तो नेहरू बिलख पड़े थे। हम कभी नहीं भूलेंगे ये बलिदान। पर ये जो कहानी आपने पढ़ी, उसे याद रखना और दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। वो यह कि राजा अगर आत्ममुग्ध हो जाए तो राज्य रसातल में जाएगा। ऐ मेरे वतन के लोगों, 1962 का यही एकमात्र सबक है।
जय हिंद की सेना।
Adarsh Singh जी की समर्थ लेखनी से# ऐ मेरे वतन के लोगों जरा जान लो ये भी कहानी#
1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था। उस सतत स्मृति के आज 55 साल हो रहे हैं। बीस अक्तूबर को चीन ने धावा बोला और हमें लहूलुहान करने के बाद 20 नवंबर को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया। इससे जुड़ी लगभग सारी चीजें अब भी गोपनीय फाइलों में हैं। ब्रूक्स हेंडरसन कमेटी की रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक किए गए पर उतना ही जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से गढ़े गए हमारे महान नेता की छवि दागदार न होने पाए। लेकिन इसकी पुनरावृत्ति से बचना है तो किसी की शेरवानी पर छींटे लगने की परवाह नहीं करनी होगी। बहुत से राज फाश हो चुके हैं बस हम और आप जानते नहीं।
युद्ध में लड़ती फौज है और नेतृत्व नागरिक सरकार करती है। और नेतृत्व अगर अपनी सेना से ही घृणा करने लगे तो देश माओ की कृपा पर ही रहेगा। माओ चाहें तो कब्जा की हुई जमीनें छोड़ दें या कलकत्ते तक आ पहुंचें। विजयी सेना को दोष देने का कोई औचित्य नहीं। हमें तो यह देखना होगा कि हमारी सरकार ने तैयारियां कैसी की और सेना को किस तरह से लैस किया, उसका मनोबल बढ़ाया। पर इसकी तफ्तीश करेंगे तो शायद क्रोध, घृणा के ज्वार मन में उठें। समस्या आपकी है, पत्रकार का काम बस तटस्थ भाव से बताने का है।
अपने शांतिकामी प्रधानमंत्री सकल विश्व के चाचा बनना चाहते थे। इतिहास में अमरत्व और यश-कीर्ति प्राप्त की उनकी जो उत्कट आकांक्षा थी, वह विरल है। वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता थे, एशिया के नेता थे, वैश्विक नेता थे, भारत का प्रधानमंत्री होना बस एक संयोग था या अपने कद को दुनिया में बढ़ाने का साधन, यहां आपकी राय मानी जाएगी। उनके चीनी समकक्ष झाऊ एन लाई ने कहीं कहा था कि दुनिया के जितने भी नेताओं से वे मिले हैं,उनमें नेहरू का अहंकारोन्माद (Megalomania) सबसे ज्यादा था।
शायद इसीलिए चच्चा को अपनी सेना से विकट घृणा थी, वे तो शांतिकामी ताकतों के वैश्विक अगुआ बनना चाहते थे। आजादी के तुरंत बाद भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल राबर्ट लाकहार्ट ने जब पप्पू चच्चा से कहा कि हमें एक रक्षा योजना की जरूरत है तो उन्होंने सेनाध्यक्ष को डपट दिया। कहा, हमें किसी रक्षा योजना की जरूरत नहीं है। हमारी नीति अहिंसा की है। आप चाहें सेना को भंग कर सकते हैं। हमारी सुरक्षा जरूरतों के लिए पुलिस काफी है।
सेना को भंग करने की बहुत जल्दी थी चच्चा को। आजादी के ठीक एक महीने बाद 16 सितंबर को प्रधानमंत्री ने फरमान सुनाया कि सैनिकों की संख्या 280,000 से घटाकर डेढ़ लाख की जाए। 1950-51 में जब चीन तिब्बत पर कब्जा कर चुका था और तनाव बढ़ रहा था तब भी नेहरू ने सेना को भंग करने का सपना देखना नहीं छोड़ा। उस साल 50,000 सैनिकों को घर भेजा गया कि वीर सैनिक, अब जरूरत नहीं रही तुम्हारी। 47 में दिल्ली के नार्थ ब्लाक में सेना का एक छोटा सा दफ्तर होता था जहां गिनती के सैनिक थे। एक दिन चच्चा की नजर उन पर पड़ गई और उन्हें तत्क्षण गुस्सा आ गया- ये यहां क्या रहे हैं? फौरन हटाओ इन्हें यहां से। यूं दुत्कारे गए।
"लोकतंत्र के लिए चुनौती" यानी सेना अंदर से ही खोखली हो जाए इसलिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्होंने राष्ट्र और धर्मनिरपेक्षता के हित में बहुत बड़ा कदम उठाते हुए इसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना में बांट दिया। तब से आज तक हम यूनीफाइड कमांड/थियेटर कमांड और सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बनाने को जूझ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को शायद गंभीरता से लगता था कि भारतीय सेना को लड़ने नहीं आता। तभी तो 1948 के युद्ध में सैन्य कमांडरों को बताने लगे कि कैसे लड़ें। परिणाम यह कि एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के हाथ चला गया। फील्डमार्शल केसी करियप्पा ने 1948 के युद्ध में उत्कृष्ट नेतृत्व करते हुए मोर्चे से सेना की अगुआई की। चच्चा कैसे खुश होते? उन्होंने जनरल करियप्पा को हटाने की ठान ली और उनकी जगह जनरल राजेंद्र सिंहजी जडेजा को फील्डमार्शल बनाने की कोशिश की। जनरल जडेजा मना नहीं करते तो ये भी हो जाता।
भारतीय सेना के निरंतर अपमान और मनोबल तोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष्ण मेनन ने पूरी ऊर्जा झोंक दी। मेनन ने सेना के पूरे चेन ऑफ कमांड को ध्वस्त कर दिया। कायदे से रक्षा मंत्री सिर्फ सेना प्रमुख से बात करता है लेकिन मेनन के क्या कहने। वे तो फोन उठा कर मेजर से भी बात कर लेते थे। सेनाप्रमुख की उनके लिए कोई विशेष हैसियत नहीं थी। के.सी. करियप्पा के बाद नेहरू-मेनन जोड़ी के निशाने पर जनरल कोडांडेरा सुबैय्या थिमैया यानी जनरल केएस थिमैया आए।। 1959 में सेना प्रमुख बने जनरल थिमैया का कद इतना बड़ा था कि नेहरू-मेनन को खतरा लगने लगा। दिखावे के लिए चच्चा सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा का कोई मौका नहीं चूकते थे। गर्वीले सैनिक जनरल थिमैया सेना से नेहरू-मेनन की चिढ़ से अंजान नहीं थे पर घुटने टेकने वालों मे से नहीं थे। 28 अगस्त, 1959 को उनकी नेहरू से तल्ख बहस हो गई। उसी रात पी के टल्ली रक्षा मंत्री मेनन ने जनरल साहब को धमकाया कि सीधे प्रधानमंत्री से कैसे बात कर लिए। नतीजा बुरा होगा। जनरल थिमैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने उन्हें बुलाया और इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया। पर जैसे ही जनरल पीएमओ से निकले, चच्चा ने खबर लीक कर दी। दो सितंबर को नेहरू ने इस्तीफे के बाबत संसद में बयान दिया और ठीकरा थिमैया पर फोड़ दिया।
सेना प्रमुख को ठिकाने लगाने का यह उतावलापन तब जब अगस्त में ही चीनियों ने एक भारतीय को बंदी बना लिया था और एकाध जगह झड़पें भी हो चुकी थीं। इस्तीफा प्रकरण के ठीक दो महीने बाद चीनियों ने अक्साईचिन में भारतीय फ्रंटियर पुलिस के आठ सिपाहियों की घात लगाकर हत्या कर दी।
जिस सेना को दफन करने का सपना चच्चा ने पाल रखा था, जरूरत पड़ने पर उसी सेना के भरोसे वे फारवर्ड पालिसी अपनाने का भी मंसूबा रखे थे। 1961 में चच्चा के परमप्रिय जनरल बीएम कौल आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने। उनका मानना था कि चीनी बिना लड़े ही भाग जाएंगे। पहले लद्दाख सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही वेस्टर्न कमांड ने फारवर्ड पालिसी के खिलाफ आगाह किया, फिर सेनाप्रमुख जनरल पीएन थापर ने। लेकिन चच्चा को लगता था कि सेना को उन्होंने कानी उंगली का बल दे दिया है। पर चच्चा न जामवंत थे और न ही जनरल कौल हनुमान। चीनियों ने रौंद दिया। लगा कि पूरा आसाम चला जाएगा और चच्चा ने रेडियो पर कहा- मेरा दिल आसाम के लिए रो रहा है।
चच्चा, आपने जो किया वो भुगता। अब भी समाजवाद और धर्मनिरेपक्षता की मुगली घुट्टी पी रहे सुधीजनों को यह ईशनिंदा लग सकता है। पर कर्मन की गति न्यारी!
पराजय से पूरा देश टूट चुका था। चच्चा का यशोगान मद्धिम पड़ गया था। कवि प्रदीप ने अंधेरे में एक दिया जलाया और अमर गीत लिखा, " ऐ मेरे वतन के लोगों।" दो महीने बाद 1963 में गणतंत्र दिवस के अगले दिन जब लता जी यह गाना गाईं तो नेहरू बिलख पड़े थे। हम कभी नहीं भूलेंगे ये बलिदान। पर ये जो कहानी आपने पढ़ी, उसे याद रखना और दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। वो यह कि राजा अगर आत्ममुग्ध हो जाए तो राज्य रसातल में जाएगा। ऐ मेरे वतन के लोगों, 1962 का यही एकमात्र सबक है।
जय हिंद की सेना।
Adarsh Singh जी की समर्थ लेखनी से

अदालत ने जो रोहिंग्या वाला केस लटकाया हैं ये बात सामान्य दिख रही है जबकि ये सामान्य है नहीं, असल में ये भारत के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश है,

अदालत ने जो रोहिंग्या वाला केस लटकाया हैं ये बात सामान्य दिख रही है जबकि ये सामान्य है नहीं, असल में ये भारत के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश है, भारत को तबाह और बर्बाद करना चाहते हैं ये वामपंथी क्योंकि अब तक आपने शायद सुप्रीम कोर्ट का रोहिंग्यों पर फैसला और बाकि अन्य ख़बरों पर गौर नहीं किया, उन्हें लिंक करने की कोशिश नहीं की, अन्यथा आपके होश उड़ जाते कि आखिर ये हो क्या रहा है !
पहले आपको सरल भाषा में बताते है सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्यों को लेकर क्या कहा है :---
सुप्रीम कोर्ट ने कहा की, हम रोहिंग्यों पर फैसला बाद में सुनाएंगे, और जबतक हम फैसला नहीं सुनाते सुनवाई पूरी नहीं करते, तब तक किसी भी रोहिंग्या को बाहर नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कोई तारीख नहीं दी है की कबतक वो रोहिंग्यों पर सुनवाई को पूरी करेगा । बस यही काफी है ।
और देखिये देश में क्या हो रहा है :--
Hyderabad police arrested a rohingya Muslim with Aadhar car, pan card, election ID card
1:18 PM - Sep 12, 2017
15 154 94 Frustitute
@Frustitute
(हैदराबाद में पुलिस ने रोहिंग्या मुस्लिम पकड़ा, उसके पास जन्मप्रमाण पत्र, आधार, पैन कार्ड सब था )
और जरा इसपर गौर कीजिये :---
अब्दुल रहीम नाम के रोहिंग्या मुसलमान का जम्मू में आधार कार्ड भी बन गया
पुरे देश में रोहिंग्या मुसलमान अपना आधार, जन्म प्रमाण पत्र और बाकि तरह के कागज़ बनाने में जुट चुके है
और भारत में ये कोई मुश्किल काम नहीं
कोई भी भारतीय कट्टरपंथी, रोहिंग्या मुस्लिम को अपने घर का किरायेदार बताकर, और अन्य दस्तावेज देकर उसके प्रमाण पत्र बनवा सकता है
भारत में रोहिंग्या समर्थक बहुत है, रोहिंग्यों के लिए आधार, पैन कार्ड इत्यादि सब बनवाना कोई मुश्किल काम नहीं है
और जब सुप्रीम सपोर्ट में सुनवाई होगी तो भैया ये तो भारतीय नागरिक है जी, इनके पास सारे पुख्ता दस्तावेज है
और हमारी अदालत मामले को 15-20 और न जाने कितने साल तक टालती रहेगी
अब कभी सरकार बदल जाये तो फिर क्या दिक्कत है, सबको नागरिकता भी मिल जाएगी । और निकालेंगे हिन्दु से अपना वो ही पुराना बैर ।।
अब बड़ा प्रश्न ये है की, क्या सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या मुसलमानो पर सुनवाई को अनिश्चितकाल तक के लिए इसलिए टाल दिया है ताकि वो सब अपना दस्तावेज बनवा लें और फिर मामले को हमेशा के लिए लटका दिया जाये ? (Pushkar Vir Sinh Bhatia)

गुरुवार, अक्टूबर 19, 2017

अत्याचार जो हिंदू पूर्वजो पर किये

अत्याचार जो मुगलों, चंगेजों, तुर्कों आदि ने हमारे हिंदू पूर्वजो पर किये

1- मैं नहीं भूला उस कामपिपासु अलाउद्दिन को, जिससे अपने सतित्तव को बचाने के लिये रानी पद्ममिनी ने 14000 स्त्रियो के साथ जलते हुए अग्निकुंड में कूद गयी थीं।

2- मैं नहीं भूला उस जालिम औरंगजेब को, जिसने संभाजी महाराज को इस्लाम स्वीकारने से मना करने पर तडपा तडपा कर मारा था।

3- मैं नहीं भूला उस जिहादी टीपु सुल्तान को, जिसने एक एक दिन में लाखो हिंदुओ का नरसंहार किया था।

4- मैं नहीं भूला उस जल्लाद शाहजहाँ को, जिसने 14 बर्ष की एक ब्राह्मण बालिका के साथ अपने महल में जबरन बलात्कार किया था।

5- मैं नहीं भूला उस बर्बर बाबर को, जिसने मेरे श्री राम प्रभु का मंदिर तोडा और लाखों निर्दोष हिंदुओ का कत्ल किया था।

6- मैं नहीं भूला उस शैतान सिकन्दर लोदी को, जिसने नगरकोट के ज्वालामुखि मंदिर की माँ दुर्गा की मूर्ति के टुकडे कर उन्हे कसाइयो को मांस तोलने के लिये दे दिया था।

7- मैं नहीं भूला उस धूर्त ख्वाजा मोइन्निद्दिन चिस्ती को, जिसने संयोगीता को इस्लाम कबूल ना करने पर नग्न कर मुगल सैनिको के सामने फेंक दिया था।

8- मैं नहीं भूला उस निर्दयी बजीर खान को, जिसने गुरूगोविंद सिंह के दोनो मासूम फतेहसिंग और जोरावार को मात्र 7 साल और 5 बर्ष की उम्र में इस्लाम ना मानने पर दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था।

9- मैं नहीं भूला उस जिहादी बजीर खान को, जिसने बन्दा बैरागी की चमडी को गर्म लोहे की सलाखो से तब तक जलाया जब तक उसकी हड्डियां ना दिखने लगी मगर उस बन्दा वैरागी ने इस्लाम स्वीकार नही किया

10- मैं नहीं भूला उस कसाई औरंगजेब को, जिसने पहले संभाजी महाराज की आँखों मे गरम लोहे के सलिए घुसाए, बाद मे उन्हीं गरम सलियों से पुरे शरीर की चमडी उधेडी, फिर भी संभाजी ने हिंदू धर्म नही छोड़ा था।

11- मैं नहीं भूला उस नापाक अकबर को, जिसने हेमू के 72 वर्षीय स्वाभिमानी बुजुर्ग पिता के इस्लाम कबूल ना करने पर उसके सिर को धड़ से अलग करवा दिया था।

12- मैं नहीं भूला उस वहशी दरिंदे औरंगजेब को, जिसने धर्मवीर भाई मतिदास के इस्लाम कबूल न करने पर बीच चौराहे पर आरे से चिरवा दिया था।