रविवार, अक्टूबर 29, 2017

मानो या ना मानो

*शयन विधान*
*सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।*
* सोने की मुद्रा:*
*उल्टा सोये भोगी,*
*सीधा सोये योगी,*
*डाबा सोये निरोगी,*
*जीमना सोये रोगी।*
* शास्त्रीय विधान भी है।*
*आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,*
*बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।*
*शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।*
*सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र /नवकार मंन्त्र गिने जाए
*"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।*
*"सात भय:-"*
*इहलोक,परलोक,आदान,*
*अकस्मात ,वेदना,मरण ,*
*अश्लोक (भय)*
* दिशा घ्यान:-*
*दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।*
* यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।*
*1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।*
*2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।*
*3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।*
*4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से मृत्यु और हानि होती है ।*
*अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।*
*विशेष शयन की सावधानियाँ:-*
*1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।*
*2:-सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।*
*3:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।*
*4:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।*
*5:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।*
*6:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।*
*7:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।*
*7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।*
*8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान)*
*9:- सोते सोते पढना नहीं।*
*10:-सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले चेत जाएँ )*
*11:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। )*
*12:-शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।*
* प्रत्येक व्यक्ति यह ज्ञान को प्राप्त कर सके इसलिए शेयर अवश्य करे |

बुधवार, अक्टूबर 25, 2017

1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था।


# ऐ मेरे वतन के लोगों जरा जान लो ये भी कहानी#
1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था। उस सतत स्मृति के आज 55 साल हो रहे हैं। बीस अक्तूबर को चीन ने धावा बोला और हमें लहूलुहान करने के बाद 20 नवंबर को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया। इससे जुड़ी लगभग सारी चीजें अब भी गोपनीय फाइलों में हैं। ब्रूक्स हेंडरसन कमेटी की रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक किए गए पर उतना ही जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से गढ़े गए हमारे महान नेता की छवि दागदार न होने पाए। लेकिन इसकी पुनरावृत्ति से बचना है तो किसी की शेरवानी पर छींटे लगने की परवाह नहीं करनी होगी। बहुत से राज फाश हो चुके हैं बस हम और आप जानते नहीं।
युद्ध में लड़ती फौज है और नेतृत्व नागरिक सरकार करती है। और नेतृत्व अगर अपनी सेना से ही घृणा करने लगे तो देश माओ की कृपा पर ही रहेगा। माओ चाहें तो कब्जा की हुई जमीनें छोड़ दें या कलकत्ते तक आ पहुंचें। विजयी सेना को दोष देने का कोई औचित्य नहीं। हमें तो यह देखना होगा कि हमारी सरकार ने तैयारियां कैसी की और सेना को किस तरह से लैस किया, उसका मनोबल बढ़ाया। पर इसकी तफ्तीश करेंगे तो शायद क्रोध, घृणा के ज्वार मन में उठें। समस्या आपकी है, पत्रकार का काम बस तटस्थ भाव से बताने का है।
अपने शांतिकामी प्रधानमंत्री सकल विश्व के चाचा बनना चाहते थे। इतिहास में अमरत्व और यश-कीर्ति प्राप्त की उनकी जो उत्कट आकांक्षा थी, वह विरल है। वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता थे, एशिया के नेता थे, वैश्विक नेता थे, भारत का प्रधानमंत्री होना बस एक संयोग था या अपने कद को दुनिया में बढ़ाने का साधन, यहां आपकी राय मानी जाएगी। उनके चीनी समकक्ष झाऊ एन लाई ने कहीं कहा था कि दुनिया के जितने भी नेताओं से वे मिले हैं,उनमें नेहरू का अहंकारोन्माद (Megalomania) सबसे ज्यादा था।
शायद इसीलिए चच्चा को अपनी सेना से विकट घृणा थी, वे तो शांतिकामी ताकतों के वैश्विक अगुआ बनना चाहते थे। आजादी के तुरंत बाद भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल राबर्ट लाकहार्ट ने जब पप्पू चच्चा से कहा कि हमें एक रक्षा योजना की जरूरत है तो उन्होंने सेनाध्यक्ष को डपट दिया। कहा, हमें किसी रक्षा योजना की जरूरत नहीं है। हमारी नीति अहिंसा की है। आप चाहें सेना को भंग कर सकते हैं। हमारी सुरक्षा जरूरतों के लिए पुलिस काफी है।
सेना को भंग करने की बहुत जल्दी थी चच्चा को। आजादी के ठीक एक महीने बाद 16 सितंबर को प्रधानमंत्री ने फरमान सुनाया कि सैनिकों की संख्या 280,000 से घटाकर डेढ़ लाख की जाए। 1950-51 में जब चीन तिब्बत पर कब्जा कर चुका था और तनाव बढ़ रहा था तब भी नेहरू ने सेना को भंग करने का सपना देखना नहीं छोड़ा। उस साल 50,000 सैनिकों को घर भेजा गया कि वीर सैनिक, अब जरूरत नहीं रही तुम्हारी। 47 में दिल्ली के नार्थ ब्लाक में सेना का एक छोटा सा दफ्तर होता था जहां गिनती के सैनिक थे। एक दिन चच्चा की नजर उन पर पड़ गई और उन्हें तत्क्षण गुस्सा आ गया- ये यहां क्या रहे हैं? फौरन हटाओ इन्हें यहां से। यूं दुत्कारे गए।
"लोकतंत्र के लिए चुनौती" यानी सेना अंदर से ही खोखली हो जाए इसलिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्होंने राष्ट्र और धर्मनिरपेक्षता के हित में बहुत बड़ा कदम उठाते हुए इसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना में बांट दिया। तब से आज तक हम यूनीफाइड कमांड/थियेटर कमांड और सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बनाने को जूझ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को शायद गंभीरता से लगता था कि भारतीय सेना को लड़ने नहीं आता। तभी तो 1948 के युद्ध में सैन्य कमांडरों को बताने लगे कि कैसे लड़ें। परिणाम यह कि एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के हाथ चला गया। फील्डमार्शल केसी करियप्पा ने 1948 के युद्ध में उत्कृष्ट नेतृत्व करते हुए मोर्चे से सेना की अगुआई की। चच्चा कैसे खुश होते? उन्होंने जनरल करियप्पा को हटाने की ठान ली और उनकी जगह जनरल राजेंद्र सिंहजी जडेजा को फील्डमार्शल बनाने की कोशिश की। जनरल जडेजा मना नहीं करते तो ये भी हो जाता।
भारतीय सेना के निरंतर अपमान और मनोबल तोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष्ण मेनन ने पूरी ऊर्जा झोंक दी। मेनन ने सेना के पूरे चेन ऑफ कमांड को ध्वस्त कर दिया। कायदे से रक्षा मंत्री सिर्फ सेना प्रमुख से बात करता है लेकिन मेनन के क्या कहने। वे तो फोन उठा कर मेजर से भी बात कर लेते थे। सेनाप्रमुख की उनके लिए कोई विशेष हैसियत नहीं थी। के.सी. करियप्पा के बाद नेहरू-मेनन जोड़ी के निशाने पर जनरल कोडांडेरा सुबैय्या थिमैया यानी जनरल केएस थिमैया आए।। 1959 में सेना प्रमुख बने जनरल थिमैया का कद इतना बड़ा था कि नेहरू-मेनन को खतरा लगने लगा। दिखावे के लिए चच्चा सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा का कोई मौका नहीं चूकते थे। गर्वीले सैनिक जनरल थिमैया सेना से नेहरू-मेनन की चिढ़ से अंजान नहीं थे पर घुटने टेकने वालों मे से नहीं थे। 28 अगस्त, 1959 को उनकी नेहरू से तल्ख बहस हो गई। उसी रात पी के टल्ली रक्षा मंत्री मेनन ने जनरल साहब को धमकाया कि सीधे प्रधानमंत्री से कैसे बात कर लिए। नतीजा बुरा होगा। जनरल थिमैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने उन्हें बुलाया और इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया। पर जैसे ही जनरल पीएमओ से निकले, चच्चा ने खबर लीक कर दी। दो सितंबर को नेहरू ने इस्तीफे के बाबत संसद में बयान दिया और ठीकरा थिमैया पर फोड़ दिया।
सेना प्रमुख को ठिकाने लगाने का यह उतावलापन तब जब अगस्त में ही चीनियों ने एक भारतीय को बंदी बना लिया था और एकाध जगह झड़पें भी हो चुकी थीं। इस्तीफा प्रकरण के ठीक दो महीने बाद चीनियों ने अक्साईचिन में भारतीय फ्रंटियर पुलिस के आठ सिपाहियों की घात लगाकर हत्या कर दी।
जिस सेना को दफन करने का सपना चच्चा ने पाल रखा था, जरूरत पड़ने पर उसी सेना के भरोसे वे फारवर्ड पालिसी अपनाने का भी मंसूबा रखे थे। 1961 में चच्चा के परमप्रिय जनरल बीएम कौल आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने। उनका मानना था कि चीनी बिना लड़े ही भाग जाएंगे। पहले लद्दाख सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही वेस्टर्न कमांड ने फारवर्ड पालिसी के खिलाफ आगाह किया, फिर सेनाप्रमुख जनरल पीएन थापर ने। लेकिन चच्चा को लगता था कि सेना को उन्होंने कानी उंगली का बल दे दिया है। पर चच्चा न जामवंत थे और न ही जनरल कौल हनुमान। चीनियों ने रौंद दिया। लगा कि पूरा आसाम चला जाएगा और चच्चा ने रेडियो पर कहा- मेरा दिल आसाम के लिए रो रहा है।
चच्चा, आपने जो किया वो भुगता। अब भी समाजवाद और धर्मनिरेपक्षता की मुगली घुट्टी पी रहे सुधीजनों को यह ईशनिंदा लग सकता है। पर कर्मन की गति न्यारी!
पराजय से पूरा देश टूट चुका था। चच्चा का यशोगान मद्धिम पड़ गया था। कवि प्रदीप ने अंधेरे में एक दिया जलाया और अमर गीत लिखा, " ऐ मेरे वतन के लोगों।" दो महीने बाद 1963 में गणतंत्र दिवस के अगले दिन जब लता जी यह गाना गाईं तो नेहरू बिलख पड़े थे। हम कभी नहीं भूलेंगे ये बलिदान। पर ये जो कहानी आपने पढ़ी, उसे याद रखना और दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। वो यह कि राजा अगर आत्ममुग्ध हो जाए तो राज्य रसातल में जाएगा। ऐ मेरे वतन के लोगों, 1962 का यही एकमात्र सबक है।
जय हिंद की सेना।
Adarsh Singh जी की समर्थ लेखनी से# ऐ मेरे वतन के लोगों जरा जान लो ये भी कहानी#
1962 में हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान चकनाचूर हो गया था। उस सतत स्मृति के आज 55 साल हो रहे हैं। बीस अक्तूबर को चीन ने धावा बोला और हमें लहूलुहान करने के बाद 20 नवंबर को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया। इससे जुड़ी लगभग सारी चीजें अब भी गोपनीय फाइलों में हैं। ब्रूक्स हेंडरसन कमेटी की रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक किए गए पर उतना ही जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से गढ़े गए हमारे महान नेता की छवि दागदार न होने पाए। लेकिन इसकी पुनरावृत्ति से बचना है तो किसी की शेरवानी पर छींटे लगने की परवाह नहीं करनी होगी। बहुत से राज फाश हो चुके हैं बस हम और आप जानते नहीं।
युद्ध में लड़ती फौज है और नेतृत्व नागरिक सरकार करती है। और नेतृत्व अगर अपनी सेना से ही घृणा करने लगे तो देश माओ की कृपा पर ही रहेगा। माओ चाहें तो कब्जा की हुई जमीनें छोड़ दें या कलकत्ते तक आ पहुंचें। विजयी सेना को दोष देने का कोई औचित्य नहीं। हमें तो यह देखना होगा कि हमारी सरकार ने तैयारियां कैसी की और सेना को किस तरह से लैस किया, उसका मनोबल बढ़ाया। पर इसकी तफ्तीश करेंगे तो शायद क्रोध, घृणा के ज्वार मन में उठें। समस्या आपकी है, पत्रकार का काम बस तटस्थ भाव से बताने का है।
अपने शांतिकामी प्रधानमंत्री सकल विश्व के चाचा बनना चाहते थे। इतिहास में अमरत्व और यश-कीर्ति प्राप्त की उनकी जो उत्कट आकांक्षा थी, वह विरल है। वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता थे, एशिया के नेता थे, वैश्विक नेता थे, भारत का प्रधानमंत्री होना बस एक संयोग था या अपने कद को दुनिया में बढ़ाने का साधन, यहां आपकी राय मानी जाएगी। उनके चीनी समकक्ष झाऊ एन लाई ने कहीं कहा था कि दुनिया के जितने भी नेताओं से वे मिले हैं,उनमें नेहरू का अहंकारोन्माद (Megalomania) सबसे ज्यादा था।
शायद इसीलिए चच्चा को अपनी सेना से विकट घृणा थी, वे तो शांतिकामी ताकतों के वैश्विक अगुआ बनना चाहते थे। आजादी के तुरंत बाद भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ जनरल राबर्ट लाकहार्ट ने जब पप्पू चच्चा से कहा कि हमें एक रक्षा योजना की जरूरत है तो उन्होंने सेनाध्यक्ष को डपट दिया। कहा, हमें किसी रक्षा योजना की जरूरत नहीं है। हमारी नीति अहिंसा की है। आप चाहें सेना को भंग कर सकते हैं। हमारी सुरक्षा जरूरतों के लिए पुलिस काफी है।
सेना को भंग करने की बहुत जल्दी थी चच्चा को। आजादी के ठीक एक महीने बाद 16 सितंबर को प्रधानमंत्री ने फरमान सुनाया कि सैनिकों की संख्या 280,000 से घटाकर डेढ़ लाख की जाए। 1950-51 में जब चीन तिब्बत पर कब्जा कर चुका था और तनाव बढ़ रहा था तब भी नेहरू ने सेना को भंग करने का सपना देखना नहीं छोड़ा। उस साल 50,000 सैनिकों को घर भेजा गया कि वीर सैनिक, अब जरूरत नहीं रही तुम्हारी। 47 में दिल्ली के नार्थ ब्लाक में सेना का एक छोटा सा दफ्तर होता था जहां गिनती के सैनिक थे। एक दिन चच्चा की नजर उन पर पड़ गई और उन्हें तत्क्षण गुस्सा आ गया- ये यहां क्या रहे हैं? फौरन हटाओ इन्हें यहां से। यूं दुत्कारे गए।
"लोकतंत्र के लिए चुनौती" यानी सेना अंदर से ही खोखली हो जाए इसलिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्होंने राष्ट्र और धर्मनिरपेक्षता के हित में बहुत बड़ा कदम उठाते हुए इसे थलसेना, वायुसेना और नौसेना में बांट दिया। तब से आज तक हम यूनीफाइड कमांड/थियेटर कमांड और सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) बनाने को जूझ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को शायद गंभीरता से लगता था कि भारतीय सेना को लड़ने नहीं आता। तभी तो 1948 के युद्ध में सैन्य कमांडरों को बताने लगे कि कैसे लड़ें। परिणाम यह कि एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के हाथ चला गया। फील्डमार्शल केसी करियप्पा ने 1948 के युद्ध में उत्कृष्ट नेतृत्व करते हुए मोर्चे से सेना की अगुआई की। चच्चा कैसे खुश होते? उन्होंने जनरल करियप्पा को हटाने की ठान ली और उनकी जगह जनरल राजेंद्र सिंहजी जडेजा को फील्डमार्शल बनाने की कोशिश की। जनरल जडेजा मना नहीं करते तो ये भी हो जाता।
भारतीय सेना के निरंतर अपमान और मनोबल तोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाने में विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष्ण मेनन ने पूरी ऊर्जा झोंक दी। मेनन ने सेना के पूरे चेन ऑफ कमांड को ध्वस्त कर दिया। कायदे से रक्षा मंत्री सिर्फ सेना प्रमुख से बात करता है लेकिन मेनन के क्या कहने। वे तो फोन उठा कर मेजर से भी बात कर लेते थे। सेनाप्रमुख की उनके लिए कोई विशेष हैसियत नहीं थी। के.सी. करियप्पा के बाद नेहरू-मेनन जोड़ी के निशाने पर जनरल कोडांडेरा सुबैय्या थिमैया यानी जनरल केएस थिमैया आए।। 1959 में सेना प्रमुख बने जनरल थिमैया का कद इतना बड़ा था कि नेहरू-मेनन को खतरा लगने लगा। दिखावे के लिए चच्चा सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा का कोई मौका नहीं चूकते थे। गर्वीले सैनिक जनरल थिमैया सेना से नेहरू-मेनन की चिढ़ से अंजान नहीं थे पर घुटने टेकने वालों मे से नहीं थे। 28 अगस्त, 1959 को उनकी नेहरू से तल्ख बहस हो गई। उसी रात पी के टल्ली रक्षा मंत्री मेनन ने जनरल साहब को धमकाया कि सीधे प्रधानमंत्री से कैसे बात कर लिए। नतीजा बुरा होगा। जनरल थिमैया ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने उन्हें बुलाया और इस्तीफा नहीं देने के लिए मनाया। पर जैसे ही जनरल पीएमओ से निकले, चच्चा ने खबर लीक कर दी। दो सितंबर को नेहरू ने इस्तीफे के बाबत संसद में बयान दिया और ठीकरा थिमैया पर फोड़ दिया।
सेना प्रमुख को ठिकाने लगाने का यह उतावलापन तब जब अगस्त में ही चीनियों ने एक भारतीय को बंदी बना लिया था और एकाध जगह झड़पें भी हो चुकी थीं। इस्तीफा प्रकरण के ठीक दो महीने बाद चीनियों ने अक्साईचिन में भारतीय फ्रंटियर पुलिस के आठ सिपाहियों की घात लगाकर हत्या कर दी।
जिस सेना को दफन करने का सपना चच्चा ने पाल रखा था, जरूरत पड़ने पर उसी सेना के भरोसे वे फारवर्ड पालिसी अपनाने का भी मंसूबा रखे थे। 1961 में चच्चा के परमप्रिय जनरल बीएम कौल आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने। उनका मानना था कि चीनी बिना लड़े ही भाग जाएंगे। पहले लद्दाख सेक्टर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही वेस्टर्न कमांड ने फारवर्ड पालिसी के खिलाफ आगाह किया, फिर सेनाप्रमुख जनरल पीएन थापर ने। लेकिन चच्चा को लगता था कि सेना को उन्होंने कानी उंगली का बल दे दिया है। पर चच्चा न जामवंत थे और न ही जनरल कौल हनुमान। चीनियों ने रौंद दिया। लगा कि पूरा आसाम चला जाएगा और चच्चा ने रेडियो पर कहा- मेरा दिल आसाम के लिए रो रहा है।
चच्चा, आपने जो किया वो भुगता। अब भी समाजवाद और धर्मनिरेपक्षता की मुगली घुट्टी पी रहे सुधीजनों को यह ईशनिंदा लग सकता है। पर कर्मन की गति न्यारी!
पराजय से पूरा देश टूट चुका था। चच्चा का यशोगान मद्धिम पड़ गया था। कवि प्रदीप ने अंधेरे में एक दिया जलाया और अमर गीत लिखा, " ऐ मेरे वतन के लोगों।" दो महीने बाद 1963 में गणतंत्र दिवस के अगले दिन जब लता जी यह गाना गाईं तो नेहरू बिलख पड़े थे। हम कभी नहीं भूलेंगे ये बलिदान। पर ये जो कहानी आपने पढ़ी, उसे याद रखना और दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। वो यह कि राजा अगर आत्ममुग्ध हो जाए तो राज्य रसातल में जाएगा। ऐ मेरे वतन के लोगों, 1962 का यही एकमात्र सबक है।
जय हिंद की सेना।
Adarsh Singh जी की समर्थ लेखनी से

अदालत ने जो रोहिंग्या वाला केस लटकाया हैं ये बात सामान्य दिख रही है जबकि ये सामान्य है नहीं, असल में ये भारत के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश है,

अदालत ने जो रोहिंग्या वाला केस लटकाया हैं ये बात सामान्य दिख रही है जबकि ये सामान्य है नहीं, असल में ये भारत के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश है, भारत को तबाह और बर्बाद करना चाहते हैं ये वामपंथी क्योंकि अब तक आपने शायद सुप्रीम कोर्ट का रोहिंग्यों पर फैसला और बाकि अन्य ख़बरों पर गौर नहीं किया, उन्हें लिंक करने की कोशिश नहीं की, अन्यथा आपके होश उड़ जाते कि आखिर ये हो क्या रहा है !
पहले आपको सरल भाषा में बताते है सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्यों को लेकर क्या कहा है :---
सुप्रीम कोर्ट ने कहा की, हम रोहिंग्यों पर फैसला बाद में सुनाएंगे, और जबतक हम फैसला नहीं सुनाते सुनवाई पूरी नहीं करते, तब तक किसी भी रोहिंग्या को बाहर नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कोई तारीख नहीं दी है की कबतक वो रोहिंग्यों पर सुनवाई को पूरी करेगा । बस यही काफी है ।
और देखिये देश में क्या हो रहा है :--
Hyderabad police arrested a rohingya Muslim with Aadhar car, pan card, election ID card
1:18 PM - Sep 12, 2017
15 154 94 Frustitute
@Frustitute
(हैदराबाद में पुलिस ने रोहिंग्या मुस्लिम पकड़ा, उसके पास जन्मप्रमाण पत्र, आधार, पैन कार्ड सब था )
और जरा इसपर गौर कीजिये :---
अब्दुल रहीम नाम के रोहिंग्या मुसलमान का जम्मू में आधार कार्ड भी बन गया
पुरे देश में रोहिंग्या मुसलमान अपना आधार, जन्म प्रमाण पत्र और बाकि तरह के कागज़ बनाने में जुट चुके है
और भारत में ये कोई मुश्किल काम नहीं
कोई भी भारतीय कट्टरपंथी, रोहिंग्या मुस्लिम को अपने घर का किरायेदार बताकर, और अन्य दस्तावेज देकर उसके प्रमाण पत्र बनवा सकता है
भारत में रोहिंग्या समर्थक बहुत है, रोहिंग्यों के लिए आधार, पैन कार्ड इत्यादि सब बनवाना कोई मुश्किल काम नहीं है
और जब सुप्रीम सपोर्ट में सुनवाई होगी तो भैया ये तो भारतीय नागरिक है जी, इनके पास सारे पुख्ता दस्तावेज है
और हमारी अदालत मामले को 15-20 और न जाने कितने साल तक टालती रहेगी
अब कभी सरकार बदल जाये तो फिर क्या दिक्कत है, सबको नागरिकता भी मिल जाएगी । और निकालेंगे हिन्दु से अपना वो ही पुराना बैर ।।
अब बड़ा प्रश्न ये है की, क्या सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या मुसलमानो पर सुनवाई को अनिश्चितकाल तक के लिए इसलिए टाल दिया है ताकि वो सब अपना दस्तावेज बनवा लें और फिर मामले को हमेशा के लिए लटका दिया जाये ? (Pushkar Vir Sinh Bhatia)

गुरुवार, अक्टूबर 19, 2017

अत्याचार जो हिंदू पूर्वजो पर किये

अत्याचार जो मुगलों, चंगेजों, तुर्कों आदि ने हमारे हिंदू पूर्वजो पर किये

1- मैं नहीं भूला उस कामपिपासु अलाउद्दिन को, जिससे अपने सतित्तव को बचाने के लिये रानी पद्ममिनी ने 14000 स्त्रियो के साथ जलते हुए अग्निकुंड में कूद गयी थीं।

2- मैं नहीं भूला उस जालिम औरंगजेब को, जिसने संभाजी महाराज को इस्लाम स्वीकारने से मना करने पर तडपा तडपा कर मारा था।

3- मैं नहीं भूला उस जिहादी टीपु सुल्तान को, जिसने एक एक दिन में लाखो हिंदुओ का नरसंहार किया था।

4- मैं नहीं भूला उस जल्लाद शाहजहाँ को, जिसने 14 बर्ष की एक ब्राह्मण बालिका के साथ अपने महल में जबरन बलात्कार किया था।

5- मैं नहीं भूला उस बर्बर बाबर को, जिसने मेरे श्री राम प्रभु का मंदिर तोडा और लाखों निर्दोष हिंदुओ का कत्ल किया था।

6- मैं नहीं भूला उस शैतान सिकन्दर लोदी को, जिसने नगरकोट के ज्वालामुखि मंदिर की माँ दुर्गा की मूर्ति के टुकडे कर उन्हे कसाइयो को मांस तोलने के लिये दे दिया था।

7- मैं नहीं भूला उस धूर्त ख्वाजा मोइन्निद्दिन चिस्ती को, जिसने संयोगीता को इस्लाम कबूल ना करने पर नग्न कर मुगल सैनिको के सामने फेंक दिया था।

8- मैं नहीं भूला उस निर्दयी बजीर खान को, जिसने गुरूगोविंद सिंह के दोनो मासूम फतेहसिंग और जोरावार को मात्र 7 साल और 5 बर्ष की उम्र में इस्लाम ना मानने पर दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था।

9- मैं नहीं भूला उस जिहादी बजीर खान को, जिसने बन्दा बैरागी की चमडी को गर्म लोहे की सलाखो से तब तक जलाया जब तक उसकी हड्डियां ना दिखने लगी मगर उस बन्दा वैरागी ने इस्लाम स्वीकार नही किया

10- मैं नहीं भूला उस कसाई औरंगजेब को, जिसने पहले संभाजी महाराज की आँखों मे गरम लोहे के सलिए घुसाए, बाद मे उन्हीं गरम सलियों से पुरे शरीर की चमडी उधेडी, फिर भी संभाजी ने हिंदू धर्म नही छोड़ा था।

11- मैं नहीं भूला उस नापाक अकबर को, जिसने हेमू के 72 वर्षीय स्वाभिमानी बुजुर्ग पिता के इस्लाम कबूल ना करने पर उसके सिर को धड़ से अलग करवा दिया था।

12- मैं नहीं भूला उस वहशी दरिंदे औरंगजेब को, जिसने धर्मवीर भाई मतिदास के इस्लाम कबूल न करने पर बीच चौराहे पर आरे से चिरवा दिया था।

मंगलवार, अक्टूबर 17, 2017

सर सैयद अहमद ख़ान का मदरसा

सर सैयद अहमद ख़ान
मुसलमान क़ौम जब भी कभी पराजित होती है तो अपनी जड़ें तलाशती है । क़ुरान कहती है कि क़ुरान की रस्सी को मजबूती से पकड़े रहो तो संसार तुम्हारे कदमों पर होगा । मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद मुसलमानों की एक शाखा ने देवबंद में मदरसा स्थापित किया और एकदम शुद्ध इस्लामी शिक्षा प्रारंभ कर दी जहाँ क़ुरान , इस्लामी न्यायशास्त्र यानी फिका, और अरबी साहित्य , हदीस के ग्रंथ आदि की शिक्षा दी जाती है । यह संस्थान केवल मौलवी तैयार करने का काम करता है जो अपने ढंग के शुद्धतावादी सुन्नी दृष्टिकोण का प्रचार प्रसार करता है ।
सर सैयद अत्यंत दूरदर्शी थे । उन्होंने ताड़ लिया कि आधुनिक शिक्षा के बिना मुसलमानों का कल्याण संभव नहीं है । जब उन्होंने मोहमडन एंगलो ओरियंटल स्कूल की स्थापना की तो मुस्लिम समाज की ओर से इतना विरोध हुआ कि उनके ख़िलाफ बीसियौं फतवे निकाले गये । उन्हें काफिर घोषित किया गया और तो और लोग सऊदी अरब से भी उनके ख़िलाफ फतवा ले आये । अंग्रेजों की हुक़ूमत न होती तो शायद कोई सिरफिरा उनका काम भी तमाम कर देता । सबसे अधिक एतराज़ तो इस बात पर था कि कॉलेज में सुन्नी धर्म शास्त्र और शिया धर्म शास्त्र दोनों के अलग अलग विभाग खोले गये । यह बात तो नाक़ाबिले बर्दाश्त थी ।
सर सैयद का मदरसा आगे चल कर विश्वविद्यालय बन गया । पूरे उपमहाद्वीप में मुसलमानों की तरक्की में अलीगढ़ का बहुत योगदान है जबकि देवबंद ने पहले से फिरकों बंटे मुसलमानों को एक और फिरका देने के सिवा कुछ नहीं दिया । अरब की जड़ों में वह इस कदर घुसे हुए हैं कि भारत में होते हुए भी पंचतंत्र जैसे महान ग्रंथ का अरबी अनुवाद 'कलीला व दमना' पढ़ाते हैं ।
अलीगढ़ प्रवास के दौरान एएमयू से रत्न परीक्षण में एक साल का डिप्लोमा करने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त है । पढ़ाई कितनी सस्ती हो सकती है इसका अंदाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे वर्ष की फीस लगभग ६००/ थी और यूनिवर्सिटी ने कम से कम १००००/ रुपये मेरे ऊपर शैक्षिक भ्रमण आदि में ख़र्च कर दिये होंगे । सारे भारत में लोगों ने अपनी संपत्तियाँ अलीगढ़ विश्वविद्यालय को वक़्फ कर रखी हैं ।
यहाँ के पूर्व छात्रों ने राजनीति, साइंस, इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि क्षेत्रों में सारी दुनिया में नाम कमाया है । मुसलमान सर सैयद से कभी उऋण नहीं हो सकते !
आज सर सैयद के जन्म को २०० वर्ष पूरे हो रहे हैं । अलीगढ़ में हर साल १७ अक्तूबर को सर सैयद डे मनाया जाता है । सर सैयद नै राजनीति से दूर रह कर विशुद्ध शैक्षिक उद्धार के लिये यह इदारा क़ायम किया था लेकिन अलीगढ़ में ही पाकिस्तान के बीज बोये गये जो सर सैयद की शायद कभी अभिलाषा न रही हो । वह हिंदू मुसलमान दोनों की उपमा अपनी दो आँखों से देते थे ।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े हुए सभी लोगों को मैं सर सैयद डे की बधाई देता हूँ ।
राजकमल गोस्वामी Rajkamal Goswami जी की पोस्ट।।

एक_फर्जी_प्रेम_की_हकीकत

H Man Singh Panwar
# एक_फर्जी_प्रेम_की_हकीकत
शाहजंहा के असली नाम खुर्रम था ,जब भी वो कोई युद्ध जीतता था तो कैद किये लोगो के सर कटवा कर कमान बनवाता था और उनके स्त्रीधन को बंदी बना लेता था उनमे से जो भी पसंद आती वो उनमे से उसे रखैल बना कर हरम में ले लेता था !शाहजहा की सात शादियां हुई थी जिसमे चौथे नंबर की बीबी थी मुमताज ! जब शाहजंहा और मुमताज की शादी हुई थी उस समय मुमताज शादीशुदा थी ,मुमताज का पति शाहजहाँ का सबसे वफादार दोस्त था !एक समारोह के दौरान जब मुमताज अपने पति के साथ शाहजंहा के महल में गयी तो शाहजंहा उस पर मोहित हो गया !इसके बाद उसने षड्यंत्र से उसके पति कि हत्या करवा दी !जिस समय मुमताज से शाहजंहा के साथ निकाह किया था उस समय मुमताज के एक औलाद भी थी जिसे शाहजंहा ने नदी में फिंकवा दिया था !शाहजंहा और मुमताज के 14 बच्चे हुवे और 14 वे बच्चे के जन्म के समय ही मुमताज की मृत्य हुई थी !हालाँकि मुमताज उसकी सभी रानियों में से खूबसूरत थी जिससे शाहजंहा अपना ज्यादातर समय मुमताज बिताता था ! सात रानियाँ होने के बावजूद शाहजंहा की 8000 रखेले भी थी !
शाहजंहा की हवस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हे की उसने उसकी और मुमताज की बेटी जंहाआरा तक भी नहीं बख्शा !जंहाआरा बेहद सुंदर थी उसे देख कर उसपर कोई भी मोहित हो जाता था इसलिए शाहजंहा ने उसे अपनी रखेल बना लिया और कभी उसकी शादी नहीं होने दी ! शाहजंहा अपनी कही इस बात को सिद्ध करता था की जब कोई माली अपने बगीचे में पेड़ लगाता हे तो उसके फल खाने का भी उसको पूरा हक हे ,उसके इस कूतर्क का उस समय तत्कालीन किसी भी इस्लामिक धर्म गुरु के पास कोई जवाब नहीं था !शाहजंहा को पता चला की जंहाआरा किसी लड़के से प्रेम करती हे तो उस लड़के को मरवा दिया इसके बाद उसने अपनी बेटी के साथ ही सभी घिनोने कर्म किए !
यदि शाहजंहा मुमताज से सच्चा प्यार करता था तो उसने उसके मरने के बाद शादियां क्यों की ? ये एक बड़ा सवाल हे ? आपको बता दू की मुमताज की मोत के बाद शाहजंहा ने उसी की छोटी बहिन के साथ शादी कर ली !शाहजंहा की कुदृष्टि हर सुंदर महिला पर रहती थी !सुंदर महिलावो को शहजहा की वासनावो का कोई अंत नहीं था !इतनी हवस रखने वाला इंसान किसी से सच्चा प्यार कैसे कर सकता हे इसका जवाब किसी के पास नहीं हे !

सच को सच कहना भी आसान नही है !!

Farida Khanam सच को सच कहना भी आसान नही है !!
कुछ लोगों सवाल कर रहे हैं की मुगल हिन्दुस्तान आये और जबरन धर्म परिवर्तन करवाया तब हिन्दुस्तान में सिर्फ 15% मुसलमान और 85% हिन्दू कैसे हैं ?
वह भुल जाते हैं की उस वक्त पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान भी हिन्दुस्तान का ही हिस्सा थे और इन सब की जनसंख्या का आजादी के पूर्व की जनसंख्या से मिलान किया जाए तो बात स्पष्ट हो जाएगी की सारी सुन्नत ही मार मार बनाई मुसलमान हैं !
रही बात शियाओं की तो वह निश्चित ही विदेशी शरणार्थियों में रहे हैं जो खुद पर हो रहे अत्याचारों से ज्यादा इमाम हुसैन अहिलैस्लाम का इंसानियत का पैगाम ले कर ठीक उसी तरह वतन से निकले थे जैसे तथागत बौद्ध बुद्धत्व का पैगाम ले कर निकले थे !
बुद्ध के संदेशवाहको ने कभी किसी देश मे हिंसा के सहारे बुद्ध का संदेश नहीं पहुंचाया ! ठीक उसी तरह आज भी हिन्दुस्तान के इतिहास इमाम हुसैन के इंसानियत के संदेश लाए शिया कभी आतंकवाद के आरोपी तक नहीं रहे !
अफसोसजनक है की शमशीरें सत्य को काटती चली गई और शैतानीयत इस्लाम के चहरे में घुसपैठ कर बैठी!
वर्तमान का कट्टरपंथी मुसलमान इस्लाम से ज्यादा हिन्दू धर्म की कुरीतियों पर बात करता नजर आएगा ! वह हर इल्म के लिए विदेशी इस्लामीक मुल्कों की सूरत देखता नजर आएगा, यह बात ठीक उन दलितों के बौद्ध धर्म और बौद्ध धर्म की विदेशी सूरत को देखें तो तस्वीर साफ हो जाएगी , तथाकथित बौद्ध की पोस्ट गौर करें वह हिन्दु विरोधी हैं पर कहीं बुद्ध की क्षिक्षाऔ का अनुगामी नहीं !वह बुद्ध का ध्यान भुल ही गया वर्ना शिव तक पहुंच जाता , ठीक ऎसे ही मुसलमान हुसैन अहिलैस्लाम का त्याग याद रखता तो आतंकवाद तक नहीं पहुंचता ! कमज़ोरी की पहचान गालियाँ और आतंक है , सत्यता की पहचान मौन और अहिंसा है