बुधवार, जुलाई 25, 2012

असम में हिंदुओं के नरसंहार,इन हालातो के जिम्मेदार कौन ?


मेरा निवेदन है कि इस लेख को थोड़ा समय देकर पढे ।
आजादी के बाद कांग्रेस सरकार के प्रंधानमंत्री नेहरु की कश्मीर नीति की विफलता और मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण देश को कश्मीर समस्या का एक जख्म मिला , जो आज नासूर बन गया है , कश्मीर मे पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है , कहने को तो कश्मीर भारत का हिस्सा है लेकिन श्रीनगर के लाल चौक पर भारत सरकार की इतनी हिम्मत नही है कि वंहा तिंरगा फहरा सके । हजारो कश्मीर पडितो का कत्लेआम हुआ , स्थानीय निवासी अपने ही राज्य में आज भी शरणार्थी बने हुये है । पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते है लेकिन बहरी जम्मू कश्मीर और केन्द्र की काग्रेस सरकार को ये सुनाई नही देते ।
लेकिन उससे सबक ना लेते हुये कांग्रेस सरकार ने इस देश के लिये एक और ' कश्मीर तैयार कर दिया है , असम मे हालात खराब है , बाग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियो मे संगठित होकर स्थानीय निवासियो को कत्ले आम शुरु कर दिया है , अब तक मरने वालों की संख्या बढ़कर 32 (सरकारी आकड़े) हकिकत हजारो मे है ।
। हिंसा राज्य के 11 जिलों के करीब 500 गांवों में पहुंच गई है। वहीं, प्रदेश में अब तक 2लाख लोग घर छोड़कर भाग चुके हैं। 50 हजार से ज्यादा लोग राहत शिविरों की शरण ले चुके हैं,
बोडो लोगों की रिहायश वाले राज्य के आठ जिलों में तनाव का माहौल है। हालात से निपटने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से अर्द्धसैनिक बलों की 50 और कंपनियां मांगी हैं।
आठ जिलो मे कर्फ़्यू लगा है देखते ही गो्ली मारने के आदेश जारी कर दिये है ।
पूरे हिंदुस्तान का संपर्क इस समय वहाँ से टूटा हुआ है.
कल रात राजधानी एक्सप्रेस पर हमला हुआ । करीब 37ट्रेन रद्द है और 30हजार यात्री असम मे भूखे प्यासे फंसे हुये है

इन हालातो के जिम्मेदार कौन ?
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जिम्मेदार है बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये जिन्हे काग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर चलते हुये राजनैतिक संरक्षण दिया ।

वर्षो से अवैध बांग्लादेशियों को इस देश मे शरण दी जाती रही है और एक अध्ययन और BBC की रिपोर्ट के अनुसार ,
अब तक 3करोड़ बाग्लादेशी अवैध रुप से भारत मे रहते है .
इन्हे कभी देश से नही निकाला गया क्योकि ये काग्रेसी वोटर है , खुद काग्रेसियो ने इनके फर्जी वोटर कार्ड बनवाये
इस विडियो को देखे की कैसे पकड़े गये बाग्लादेशियों ने फर्जी नागरिकता दस्तावेज बनवाये।
ये महिला कबूल कर रही है कि ये काग्रेसी वोटर है और बाग्लादेशी है
http://www.youtube.com/watch?v=yprBKTOgnkI

असम के सोनारिपारा मे पाकिस्तानी झंडा फहरा दिया दिया है
देखे विडियो
http://www.youtube.com/watch?v=0oI-PjQkXx4

कहां है इस देश का मीडिया ? सरकार ? वो सब राष्ट्रपति की ताजपोशी मे लगे है ।
इस का आम आदमी ऐसे ही मरता रहा है और आगे भी मरता रहेगा । आज असम मे कत्ले आम हो रहा है कल हमारी बारी है , आप सोते रहो… कर भी क्या सकते हो , इंसानी लाशो का तमाशा देखने के सिवा ।

जब रोम जल रहा तब नीरो बंसी बजा रहा था ..ये बात तो हुई पुरानी .. आज का आधुनिक नीरो भारत में है .नाम है मनमोहन सिंह ..पद प्रधानमंत्री भारत सरकार ... काबिलियत .. संसद के पिछले दरबाजे ( राज्यसभा ) से निर्वाचित जिसको भारत की जनता ने नहीं चुना ,,, उनको आसाम की एक राज्य सभा सीट के जरिये भारत पर खडाऊ शासन के लिये नियुक्ति मिली है ... फिलहाल मुद्दा ये है की प्रधानमंत्री जिस आसाम के पते से निवाचित हुए है और बही आसाम पिछले एक महीने से भीषण बाढ़ की चपेट में है ..आसाम के कई हिस्सो का संपर्क भारत से कट चुका है ,,,इसी वीच कोढ़ में खाज जैसी स्थिति तब पैदा हुई जब कांग्रेस के स्थायी वोट बैक ie बंगलादेश से आये मुस्लिम घुसपैठियों ने बड़ी संख्या में स्थानीय निबासियो का कत्लेआम करना शुरू कर दिया .. ये बही आसाम है जहा पर अक्सर सीमा पर भारतीय सुरक्षाबलों की मुस्लिम घुसपैठियों द्वारा घेर कर हत्याए की जा चूकी है .............सूचना मिली थी की राष्ट्रपति चुनाव की गतिविधियों में से कुछ घंटो का समय निकाल कर भारत के दोनों प्रधानमंत्रियों ने ( घोषित + अघोषित ) आसाम का हवाई सर्वेक्षण करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है ,,, आसाम के हालत इस समय इतने खराब है की उस पर विदेशी मीडिया भी चिंता प्रकट कर रहा है ,,लेकिन भारत के नीरो मनमोहन एंड कम्पनी की बात तो छोडिये खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहने का दम भरने बाला मीडिया भी सन्नाटा मारे है .........!!!
http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-18964870
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मित्रो आसाम मे बांग्लादेशियो का हौसला इतना कैसे बढ गया कि वहाँ उन्होने नापाकिस्तान का झण्डा फहरा दिया???मैं बताता हुँ-कुछ साल पहले महज वोटो के लिये यूपीए -१ के एक मँत्री रामविलास पासवान का ये बयान आया-"बांग्लादेशीयो को भारत का नागरिक बनादिया जाये,उन्हे मत का अधिकार दिया जाये और उनकी सुरक्षा का इंतजाम किया जाये।अल्पसंख्यको के हितो का संरक्षण किया जाये।"जब भडुवे मँत्रीयो के ये बयान होंगे तो भारत मे इसी तरह कश्मीर पे कश्मीर बनते जायेंगे!!
इसीलिये जागो और देश बचाओ


आसाम में एक कमी रह गयी थी वो भी अब पूरी हो गयी हे ..................

बहुत बहुत बधाई हो इस देश के सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष लोगो को , जो अब भी भाई- भाई का नारा देते है ,

जिहादी मुल्लो ने जिन बोडो हिन्दू आदिवासी इलाक को आतंक और मार काट से खाली करवाया था अब वंहा पाकिस्तानी झंडा लहरा दिया हे !!

सरे आम तथाकथित धर्म निरपेक्ष सविंधान और कानून व्यवस्था का बलात्कार किया जा रहा हे !!



http://www.youtube.com/watch?v=1B60_gPf0Ro
आसाम मे कई जगह मुसलमानों ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया है | ये देखिये टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट |

अब कहाँ छुपा है भोदू युवराज ? भठ्ठा परसौल मे नौटकी करता था , अब कोकराझार मे जाकर कब नौटंकी करेगा ?

मित्रों, सिर्फ दो टके के वोट के लिए नीच कांग्रेस ने इस देश को आज बर्बाद कर दिया है ..

पहले कश्मीर, फिर केरल और अब आसाम ...

जागो हिन्दुओ जागो .. अब जाति पाती से उपर उठकर सम्पूर्ण हिन्दुत्व के बारे मे सोचो |

गुजरात के पटेल मित्रो, किसी भी बापा के बहकावे मे आने से पहले एक बार आसाम के बारे मे जरूर सोच लेना |

एक जमाने मे असाम मे हिंदू कई जाति और जनजातियो मे बटी थी , जैसे गारो, खासी, जयंतिया, बोडो, मारवाड़ी, बिहारी प्रवासी, आदि ..

लेकिन आज सब एक होकर बंगलादेशी मुसलमानों का मुकाबला कर रहे है


खबर आसाम से है असम में बंगलादेशी घुसपैठियों ने बोडो जाती के हिन्दुओं को मार कर भगा दिया है और असम में लगा दिया है पाकिस्तान झंडा l
कांग्रेस ने वोटों के लालच में इन बंगला देसी मुल्लो को शरण दी और कांग्रेस का साथ और समर्थन पा कर ही आज ये अपनी औकात भुला बैठे है l

कांग्रेसियों की इस हरकत को देश कर मुझे एक बहुत पुराणी कहानी याद आ रही है l बहुत पहले एक रजा हुआ करते थे जैचंद उन्होंने प्रथ्विराज चौहान को हराने के लिए मुल्लों का साथ दिया उम्मीद थी की हम इसी तरह राज़ करते रहेंगे हुआ उल्टा ही मुल्लो से हाँथ मिलाया मुल्लो ने पीठ पर वार किया न सत्ता बची न जान l

कुछ ऐसा होता आज भी नज़र आ रहा है सत्ता के लिए मनमोहन सरकार इनका साथ तो दे रही है पर कहीं न कहीं अपने पतन की और बढ़ रही है l

पर याद रहे दोस्तों जैचंद की उस एक गलती ने हमे सालों तक गुलामी की जंजीरों में लपेट दिया था अब हम ऐसा नहीं होने देने और उसके लिए जरुरत है खड़े होकर आवाज उठाने की l किसी के भरोसे मत रहो कोइ
कुछ नहीं करगा जो करना आपको खुद ही करना होगा कश्मीर में
जब हिन्दू मर रहा था तो कोइ नहीं गया ना आज आसाम में कोइ जा रहा है l

दोस्तों कोइ भगवा पहन कर सर पर काली टोपी लगाने वाला संत कभी संत नहीं हो सकता कोइ मुल्लों के आगे हाँथ फ़ैलाने वाला किसी हिन्दू के लिए लड़ने नहीं आएगा l

मित्रों हिन्दुत्व की कीमत पर हमे कोइ नीला पीला और काला धन नहीं चाहिए l नहीं चाहिए कोइ लोकपाल और जोक्पाल हिन्दुत्व की कीमत पर l

अगर अपना घर अपना परिवार बचाना है तो उठ खड़े हो जाओ और अपने अन्दर के हिन्दुत्व को जगाओ या फिर सेकुलर बन अपनी बारी का इंतजार करो हो सकता है आप बच भी जाओ पर आपकी आगली पीढ़ी कभी नहीं बच पायेगी l
जय महाकाल
अगर असम में हिंदुओं के नरसंहार को आप टीवी चैनलों पर नहीं देख पा रहें हैं तो उसके पीछे कुछ खास वजहें हैं। राजदीप सरदेसाई के अनुसार जब तक 1000 हिंदू नहीं मरते, तब तक वो कोई खबर ही नहीं है। बेचारे को गुजरात के दंगों से बड़ा सदमा पंहुचा हुआ लगता है या फिर मुँह में इतने पैसे ठूंस दिए गए हैं कि सच नहीं निकाल पा रहा है।

अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ऐसा होता है तो मैं थूकता हूँ ऐसी मीडिया के दलालों पर....जीने लिए दंगे तो केवल 'गुजरात' में होते हैं और दंगा पीड़ित केवल मुसलमान होते हैं। आ......क थू
सोचिए जरा !

रविवार, जुलाई 22, 2012

जो मृत्यु से डरता है, वो धर्मयुद्ध नहीं कर सकता

जिहाद से भारत का सम्बंध हजार वर्ष पुराना है। भारत में वर्षों शासन करने वाले बादशाह भी जिहाद की बात करते थे। 13वीं 14वीं शताब्दी के दौरान मुसलमानों के अंदर ही एक अन्य समानांतर धारा विकसित हुई। यह थी सूफी धारा। हालांकि सूफी धारा के अगुआ भी इस्लाम का प्रचार करते थे किन्तु वे प्रेम और सद्भाव से इस्लाम की बात करते थे। किन्तु बादशाहों पर सूफियों से कहीं अधिक प्रभाव कट्टरपंथियों का था। इस्लाम के साथ-साथ जिहाद शब्द और जिहादी मनोवृत्ति को भारत पिछले हजार वर्षों से झेल रहा है।

भारत में जो बात हिन्दुओं के साथ हुई, वही बात यूरोप में ईसाइयों के साथ हुई। एक समय ऐसा भी आया था जब स्पेन तक इस्लामी राज्य स्थापित हो गया था। 11वीं शताब्दी में ईसाइयों ने मुसलमानों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा। फिलीस्तीन का सारा क्षेत्र यहूदी और ईसाई दोनों के लिए पवित्र था। अत: दोनों उस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए संघर्ष करते रहे। ईसाइयों ने यहूदियों के साथ इस संघर्ष के लिए जिहाद की टक्कर में एक नया शब्द इस्तेमाल किया - क्रूसेड। क्रूसेड का अर्थ भी लगभग जिहाद की तरह है। इसका अर्थ है विधर्मियों से अपने पवित्र स्थल को मुक्त कराना। जिहाद के विरुद्ध क्रूसेड किया गया। लगभग सारा यूरोप संगठित होकर क्रूसेड के तले जिहाद का सामना कर रहा था। 14वीं शताब्दी में क्रूसेड अत्यंत प्रभावशाली रहा। विशेषत: स्पेन से और पूरे यूरोप से इस्लाम को लगभग समाप्त कर दिया गया। इस्लाम अब तुर्की तक सिमट कर रह गया था।

किन्तु यूरोप में ईसाई जिस प्रकार संगठित होकर जिहाद के विरुद्ध लड़े, उस तरह हम भारतीय नहीं लड़ सके। इसके पीछे कई कारण थे। उस समय इस्लाम के पास जिहाद शब्द था, ईसाइयों के पास क्रूसेड शब्द था लेकिन दुर्भाग्य से हम भारतीयों के पास ऐसा कोई सामयिक या प्रतीकात्मक शब्द नहीं था जो हमें एक संगठित मंच या नेतृत्व देता। हालांकि भारत में उस समय शक्तिशाली और प्रभावशाली राजाओं की कमी नहीं थी। अनेकों ने विदेशी आक्रांताओं का अत्यंत वीरतापूर्वक सामना भी किया। लेकिन उनके सामने कोई एक स्पष्ट लक्ष्य नहीं था। वे ज्यादातर अपनी-अपनी राज्य सीमाओं का बचाव करके चुप हो जाते थे। इसलिए कभी भी संगठित होकर भारत में आक्रांताओं द्वारा लाए गए जिहाद का पूरी शक्ति से विरोध नहीं हुआ।

हालांकि बीच-बीच में प्रयास हुए। सोमनाथ की रक्षा के लिए वहां के राजा ने अपनी सेना को संगठित किया। लेकिन समीपवर्ती राजस्थान के राजा ने उसका साथ नहीं दिया। भारत में लम्बे समय तक कभी तुर्कों, पठानों और फिर मुगलों के साथ-साथ जिहाद भी पनपता रहा।

जिहाद या इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध छिटपुट युद्ध तो हुए किन्तु संगठित प्रयास नहीं हो सका। जिहाद के विरुद्ध हिन्दू राजाओं के प्रयास की बात करें तो सबसे पहले हमें दक्षिण में छत्रपति शिवाजी दिखते हैं। उन्होंने मुगलों के विरुद्ध न केवल एक संगठित विद्रोह खड़ा किया बल्कि अपने प्रयास को एक लक्ष्य भी दिया। छत्रपति शिवाजी ने उस लक्ष्य को हिन्दवी साम्राज्य स्थापित करने का नाम दिया। संभवत: वह प्रथम हिन्दू राजा थे जिन्होंने इस्लाम और जिहाद के विरुद्ध हिन्दवी साम्राज्य का संकल्प दिया।

जिहाद के विरुद्ध जिस प्रयोजनशील शब्द की आवश्यकता थी वह गुरु गोविन्द सिंह ने दिया। गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी परम्परा से ही एक शब्द दिया - धर्मयुद्ध। धर्मयुद्ध जिहाद की टक्कर का शब्द था। ऐसा प्रयोजनमूलक और मंतव्य देने वाला शब्द इससे पहले कभी प्रयोग नहीं किया गया था। धर्मयुद्ध शब्द के साथ उन्होंने पूरा युद्ध दर्शन विकसित किया। पुरानी मानसिकता बदलकर शस्त्रधारण करने की बात कही। मुगलों के साम्राज्य में, विशेषत: उत्तरी भारत में लोगों को (राजपूतों को छोड़कर) न शस्त्र धारण करने की, न माथे पर तिलक लगाने की, और यहां तक कि जूते तक पहनने की भी आज्ञा नहीं थी। किन्तु गुरु गोविन्द सिंह ने लोगों को संगठित कर शस्त्र धारण करवाए, जूते पहनने को कहा तथा उनके नाम के साथ सिंह लगाया ताकि उनमें वीर भाव जाग्रत हो, एक उदासीनता और लचरता, जो मुगलों की लम्बी अधीनता में लोगों के अंदर थी, वह टूटे। उन्होंने एक बहुत बड़े ग्रंथ "कृष्णावतार" की रचना की जो "भागवतपुराण" के दशमस्कंध पर आधारित है। उसमें उन्होंने एक स्थान पर लिखा है-

दशमकथा भागवत की, रचना करी बनाई,

अवर (और) वासना नाहीं प्रभु, धर्मयुद्ध को चाई।

अर्थात् भागवत जो संस्कृत में है और मैंने इसे ब्रजभाषा या जनभाषा में लिखा है, मेरे मन में सिर्फ धर्मयुद्ध का चाव है।

धर्मयुद्ध में गुरु गोविन्द सिंह जी ने सभी जातियों को शामिल किया था। यह अजीब बात थी कि जहां एक ओर जिहाद में सभी मुस्लिम और क्रूसेड में सभी ईसाई शामिल थे, वहीं भारत में कुल जनसंख्या का 10 प्रतिशत से भी कम युद्ध में भाग लेता था। 90 प्रतिशत जनता तो खड़ी देखती रहती थी। यही कारण था कि धर्मयुद्ध में गुरु गोविन्द सिंह जी ने जनभागीदारी को सीमित नहीं किया। धर्मयुद्ध के लिए सबसे आगे रहने वाले पंचप्यारों में भी केवल एक क्षत्रिय था, बाकी चार में जाट, धोबी, कहार तथा नाई थे। उन्हें योद्धा बनाया गया। और आगे चलकर वे ऐसे कुशल योद्धा बने कि दुर्दान्त पठान जो खैबर दर्रों से आते थे, उनका मुंह मोड़ा। जिन दुर्दान्त लड़ाकों का सामना आज अमरीका भी नहीं कर पा रहा है, उन्हीं योद्धाओं को भगाकर महाराजा रणजीत सिंह के समय में सिख सेनाओं ने जमरूद तक अपना अधिकार जमा लिया था। उस समय कश्मीर और लाहौर को भी अफगानों से छीनकर रणजीत सिंह ने अपना कब्जा जमा लिया था।

गुरु गोविन्द सिंह के समय से शुरु हुआ धर्मयुद्ध वास्तविक अर्थों में एक प्रयोजनबद्ध लक्ष्य था। बिना लक्ष्य के सामान्य युद्ध लड़े जा सकते हैं, जिहाद या क्रूसेड नहीं। मुझे लगता है कि अगर गुरु गोविन्द सिंह ने धर्मयुद्ध का लक्ष्य न दिया होता तो आज विभाजन सीमा वाघा नहीं, संभवत: दिल्ली या इससे भी आगे होती। यह अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय था जिहाद के विरुद्ध भारत और भारतीयों के प्रतिरोध के इतिहास का। भारतीय अब यह सोचने लगे थे कि दुर्दान्त आक्रान्ताओं का सामना कर उन्हें उनके घर तक खदेड़कर विजय प्राप्त की जा सकती है।

लेकिन फिर भी धर्मयुद्ध को हम एक मंत्र की तरह सारे भारत में प्रसारित नहीं कर सके। धर्मयुद्ध एक सीमित क्षेत्र तक ही प्रभावित हुआ था।

जहां तक धर्मयुद्ध के महत्व की बात है, इस युद्ध ने भारत के बहुत से क्षेत्रों को स्वतंत्र किया। दिल्ली से पेशावर तक जो क्षेत्र पिछले 800 वर्षों से लगातार मुगलों, पठानों और तुर्कों द्वारा शासित रहे, उन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने स्वतंत्र किया। कांगड़ा से पेशावर तक शासन करने वाला अंतिम हिन्दू राजा था जयपाल सिंह, जिसका पुत्र आनंदपाल 1026 ई. में विदेशी आक्रांताओं से पराजित हुआ। 1026 ई. के बाद सन् 1799 में कहीं जाकर रणजीत सिंह ने पहले लाहौर पर कब्जा किया और सन् 1802 में महाराजा के रूप में उनका तिलक हुआ। इस दौरान पूरे 800 वर्षों तक उक्त प्रदेश विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी में रहे। 800 वर्षों बाद मिली यह सफलता अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह धर्मयुद्ध के मंत्र का प्रभाव था। वरना मुझे लगता है कि अब तक तो हिन्दुस्थान न जाने कितने टुकड़ों में बंट गया होता। इसी संदर्भ में छत्रपति शिवाजी महाराज का हिन्दवी साम्राज्य अभियान जो एक समय "अटक से कटक तक" स्थापित हो गया था, महत्वपूर्ण व प्रभावपूर्ण रहा था।

जिहाद के विरुद्ध संगठित न होने के पीछे भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था की काफी हद तक जिम्मेदार थी। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय ब्राह्मण सदाशिवराव ने सूरजमल जाट का सहयोग नहीं लिया। यदि ऐसा होता तो संभवत: उनकी संगठित शक्ति के आगे अब्दाली टिक नहीं पाता। किन्तु छुआछूत और वर्णभेद की भावना हिन्दुओं के असंगठित रहने का एक कारण बनी।

यह ठीक है कि जिहाद के विरुद्ध या जबरन इस्लाम मत न कबूलने के विरोध सम्बंधी अनेक वैयक्तिक उदाहरण हैं। किन्तु व्यक्तिगत उदाहरण कुछ समय के लिए समाज का आदर्श बन सकते थे, एक सुगठित व सामूहिक मंच नहीं दे सकते थे। ऐसे अनेक उदाहरण धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के उदाहरण थे, पर जिहाद का प्रत्युत्तर नहीं थे। जिहाद एक सामूहिक कर्म है और सामूहिकता ही इसका उत्तर है।

गुरु गोविन्द सिंह द्वारा लगाए गए धर्मयुद्ध के बीज को महाराजा रणजीत सिंह के समय तक पहुंचने और एक फलदार वृक्ष बनने तक लगभग 60-70 वर्ष का समय लगा। इस बीच में सिखों पर मुगल बादशाहों द्वारा बेहिसाब अत्याचार किए गए। इसका एक उदाहरण था लाहौर का सूबेदार मीर मन्नु। उसने एक काजी को स्थानीय गुड़मण्डी नामक स्थान पर बिठाया तथा सामान्यजन को लुभाते हुए कहा था कि जो एक सिख पकड़कर काजी के हवाले करेगा उसे 80 रुपए दिए जाएंगे। वहां लोग सिखों के शीश लाते और काजी उन्हें रुपए देता। वह स्थान शीशों से पट जाता था। यही नहीं, मांओं के सामने ही उनके बच्चों के टुकड़े कर उसकी माला उनके गले में पहना दी जाती थी। गुरु गोविन्द सिंह के बाद धर्मयुद्ध को आगे बढ़ाने वाला बंदा बहादुर अपने 700 लड़ाकों के साथ पकड़ा गया था। सात दिनों में 700 सिखों को कत्ल किया गया और बंदा बहादुर को भी अमानवीय यातनाएं देकर मारा गया। लेकिन यह धर्मयुद्ध की भावना का ही कमाल था कि सिख झुके नहीं। उस समय मीर मन्नू के अत्याचारों के लिए सिखों में एक कहावत प्रचलित हो गई थी-

मन्नू साडी दातरी, असी मन्नु दे सोए

ज्यों-ज्यों सानु वडता, असी दून सवाए होए।

अर्थात् मन्नू हमारी दरांती (फसल काटने का औजार) है और हम उसकी फसल। वह हमें जैसे-जैसे काटता जाता है, हम सवाए-दुगुने होते जाते हैं।

इसी प्रकार एक शब्द है- "घल्लूघारा" जो कालांतर में धर्मयुद्ध का ही एक प्रतीक शब्द बन गया, जिसका अर्थ है पठानों, अफगानों, मुगलों से हुआ संघर्ष। एक अनुमान के अनुसार, एक छोटे घल्लूघारा में 6,000 लोग मारे गए थे तथा एक अन्य में करीब 20,000 व्यक्ति मारे गए थे।

इसी तरह की एक अन्य घटना है अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर दो बार आक्रमण कर उसे तोप से उड़ाया गया। अमृत सरोवर में मिट्टी भरवा दी गई। किन्तु सिखों ने मौका मिलते ही सरोवर व मंदिर का दुबारा-दुबारा निर्माण किया और हर नए निर्माण को पहले से अधिक भव्य बनाया और अंतत: महाराणा रणजीत सिंह ने उसे सोने से भी मढ़वाया। एक अंग्रेज ने लिखा भी था, वे हर बार स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों को पठानों के खून से धोते थे।

कोई भी धर्मयुद्ध एक कीमत मांगता है। जो मृत्यु से डरता है, वो धर्मयुद्ध नहीं कर सकता। सिख गुरुओं ने लोगों के संगठित कर एक निश्चित लक्ष्य के लिए मरना सिखा दिया था। उस समय प्राणों के मोह से बड़ी स्वतंत्रता थी। wikipedia

शनिवार, जुलाई 21, 2012

जितने भी लोग महाभारत को काल्पनिक बताते हैं.... उनके मुंह पर पर एक जोरदार तमाचा है आज का यह पोस्ट...!


जितने भी लोग महाभारत को काल्पनिक बताते हैं.... उनके मुंह पर पर एक जोरदार तमाचा है आज का यह पोस्ट...!

महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक के सभी राजाओं का विवरण क्रमवार तरीके से नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है...!

आपको यह जानकर एक बहुत ही आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था..... जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है :
क्र................... शासक का नाम.......... वर्ष....माह.. दिन

1. राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)..... 36.... 08.... 25
2 राजा परीक्षित (Raja Parikshit)........ 60.... 00..... 00
3 राजा जनमेजय (Raja Janmejay).... 84.... 07...... 23
4 अश्वमेध (Ashwamedh )................. 82.....08..... 22
5 द्वैतीयरम (Dwateeyram )............... 88.... 02......08
6 क्षत्रमाल (Kshatramal)................... 81.... 11..... 27
7 चित्ररथ (Chitrarath)...................... 75......03.....18
8 दुष्टशैल्य (Dushtashailya)............... 75.....10.......24
9 राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)......... 78.....07.......21
10 राजा शूरसेन (Raja Shoorsain).......78....07........21
11 भुवनपति (Bhuwanpati)................69....05.......05
12 रणजीत (Ranjeet).........................65....10......04
13 श्रक्षक (Shrakshak).......................64.....07......04
14 सुखदेव (Sukhdev)........................62....00.......24
15 नरहरिदेव (Narharidev).................51.....10.......02
16 शुचिरथ (Suchirath).....................42......11.......02
17 शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)........58.....10.......08
18 पर्वतसेन (Parvatsain )..................55.....08.......10
19 मेधावी (Medhawi)........................52.....10......10
20 सोनचीर (Soncheer).....................50.....08.......21
21 भीमदेव (Bheemdev)....................47......09.......20
22 नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)...45.....11.......23
23 पूरनमाल (Pooranmal)..................44.....08.......07
24 कर्दवी (Kardavi)...........................44.....10........08
25 अलामामिक (Alamamik)...............50....11........08
26 उदयपाल (Udaipal).......................38....09........00
27 दुवानमल (Duwanmal)..................40....10.......26
28 दामात (Damaat)..........................32....00.......00
29 भीमपाल (Bheempal)...................58....05........08
30 क्षेमक (Kshemak)........................48....11........21

इसके बाद ....क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 विश्व (Vishwa)......................... 17 3 29
2 पुरसेनी (Purseni)..................... 42 8 21
3 वीरसेनी (Veerseni).................. 52 10 07
4 अंगशायी (Anangshayi)........... 47 08 23
5 हरिजित (Harijit).................... 35 09 17
6 परमसेनी (Paramseni)............. 44 02 23
7 सुखपाताल (Sukhpatal)......... 30 02 21
8 काद्रुत (Kadrut)................... 42 09 24
9 सज्ज (Sajj)........................ 32 02 14
10 आम्रचूड़ (Amarchud)......... 27 03 16
11 अमिपाल (Amipal) .............22 11 25
12 दशरथ (Dashrath)............... 25 04 12
13 वीरसाल (Veersaal)...............31 08 11
14 वीरसालसेन (Veersaalsen).......47 0 14

इसके उपरांत...राजा वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा वीरमाह (Raja Veermaha)......... 35 10 8
2 अजितसिंह (Ajitsingh)...................... 27 7 19
3 सर्वदत्त (Sarvadatta)..........................28 3 10
4 भुवनपति (Bhuwanpati)...................15 4 10
5 वीरसेन (Veersen)............................21 2 13
6 महिपाल (Mahipal)............................40 8 7
7 शत्रुशाल (Shatrushaal).....................26 4 3
8 संघराज (Sanghraj)........................17 2 10
9 तेजपाल (Tejpal).........................28 11 10
10 मानिकचंद (Manikchand)............37 7 21
11 कामसेनी (Kamseni)..................42 5 10
12 शत्रुमर्दन (Shatrumardan)..........8 11 13
13 जीवनलोक (Jeevanlok).............28 9 17
14 हरिराव (Harirao)......................26 10 29
15 वीरसेन द्वितीय (Veersen II)........35 2 20
16 आदित्यकेतु (Adityaketu)..........23 11 13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण इस प्रकार है ..

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा धनधर (Raja Dhandhar)...........23 11 13
2 महर्षि (Maharshi)...............................41 2 29
3 संरछि (Sanrachhi)............................50 10 19
4 महायुध (Mahayudha).........................30 3 8
5 दुर्नाथ (Durnath)...............................28 5 25
6 जीवनराज (Jeevanraj).......................45 2 5
7 रुद्रसेन (Rudrasen)..........................47 4 28
8 आरिलक (Aarilak)..........................52 10 8
9 राजपाल (Rajpal)..............................36 0 0

उसके बाद ...सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 समुद्रपाल (Samudrapal).............54 2 20
2 चन्द्रपाल (Chandrapal)................36 5 4
3 सहपाल (Sahaypal)...................11 4 11
4 देवपाल (Devpal).....................27 1 28
5 नरसिंहपाल (Narsighpal).........18 0 20
6 सामपाल (Sampal)...............27 1 17
7 रघुपाल (Raghupal)...........22 3 25
8 गोविन्दपाल (Govindpal)........27 1 17
9 अमृतपाल (Amratpal).........36 10 13
10 बालिपाल (Balipal).........12 5 27
11 महिपाल (Mahipal)...........13 8 4
12 हरिपाल (Haripal)..........14 8 4
13 सीसपाल (Seespal).......11 10 13
14 मदनपाल (Madanpal)......17 10 19
15 कर्मपाल (Karmpal)........16 2 2
16 विक्रमपाल (Vikrampal).....24 11 13

टिप : कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

इसके उपरांत .....विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 मालकचन्द (Malukhchand) 54 2 10
2 विक्रमचन्द (Vikramchand) 12 7 12
3 मानकचन्द (Manakchand) 10 0 5
4 रामचन्द (Ramchand) 13 11 8
5 हरिचंद (Harichand) 14 9 24
6 कल्याणचन्द (Kalyanchand) 10 5 4
7 भीमचन्द (Bhimchand) 16 2 9
8 लोवचन्द (Lovchand) 26 3 22
9 गोविन्दचन्द (Govindchand) 31 7 12
10 रानी पद्मावती (Rani Padmavati) 1 0 0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 हरिप्रेम (Hariprem) 7 5 16
2 गोविन्दप्रेम (Govindprem) 20 2 8
3 गोपालप्रेम (Gopalprem) 15 7 28
4 महाबाहु (Mahabahu) 6 8 29

इसके बाद.......राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 अधिसेन (Adhisen) 18 5 21
2 विल्वसेन (Vilavalsen) 12 4 2
3 केशवसेन (Keshavsen) 15 7 12
4 माधवसेन (Madhavsen) 12 4 2
5 मयूरसेन (Mayursen) 20 11 27
6 भीमसेन (Bhimsen) 5 10 9
7 कल्याणसेन (Kalyansen) 4 8 21
8 हरिसेन (Harisen) 12 0 25
9 क्षेमसेन (Kshemsen) 8 11 15
10 नारायणसेन (Narayansen) 2 2 29
11 लक्ष्मीसेन (Lakshmisen) 26 10 0
12 दामोदरसेन (Damodarsen) 11 5 19

लेकिन जब ....दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 दीपसिंह (Deepsingh) 17 1 26
2 राजसिंह (Rajsingh) 14 5 0
3 रणसिंह (Ransingh) 9 8 11
4 नरसिंह (Narsingh) 45 0 15
5 हरिसिंह (Harisingh) 13 2 29
6 जीवनसिंह (Jeevansingh) 8 0 1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 पृथ्वीराज (Prathviraj) 12 2 19
2 अभयपाल (Abhayapal) 14 5 17
3 दुर्जनपाल (Durjanpal) 11 4 14
4 उदयपाल (Udayapal) 11 7 3
5 यशपाल (Yashpal) 36 4 27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

उपरोक्त जानकारी http://www.hindunet.org/ से साभार ली गई है जहाँ पर इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथों को बताया गया है।
साभार ....जी.के. अवधिया |

जय महाकाल....!!!

नोट : इस पोस्ट को मैंने नहीं लिखा है और मैंने इसे अपने एक मित्र की पोस्ट से कॉपी किया है क्योंकि मुझे ये अमूल्य जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की इच्छा हुई...!

शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये:रविन्द्र नाथ टेगोर

मित्रो या तो इस link http://www.youtube.com/watch?v=D
सच जाने या इस पोस्ट को पूरा पढे !
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‘’वन्देमातरम’’ बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था ! उन्होने इस गीत को लिखा !लिखने
के बाद 7 साल लगे जब यह गीत लोगो के सामने आया ! क्यूँ की उन्होने जब इस गीत
लो लिखा उसके बाद उन्होने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था ‘’आनद मठ’’ उसमे इस
गीत को डाला !वो उपन्यास छपने मे 7 साल लगे !

1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना वन्देमातरम और उसके बाद जब लोगो ने इसको पढ़ा
तो इसका अर्थ पता चला की वन्देमातरम क्या है ! आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र
चटर्जी ने लिखा था अँग्रेजी सरकार के विरोध मे और उन राजा महाराजाओ के विरोध
मे जो किसी भी संप्रदाय के हो लेकिन अँग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे ! फिर
उसमे उन्होने बगावत की भूमिका लिखी कि अब बगावत होनी चाहिए !विरोध होना चाहिए
ताकि इस अँग्रेजी सत्ता को हम पलट सके ! और इस तरह वन्देमातरम को सार्वजनिक
गान बनना चाहिए ये उन्होने घोषित किया !

उनकी एक बेटी हुआ करती थी जिसका अपने पिता बंकिमचंद्र चटर्जी जी से इस बात पर
बहुत मत भेद था ! उनकी बेटी कहती थी आपने यह वन्देमातरम लिखा है उसके ये श्बद
बहुत कलिष्ट हैं ! कि बोलने और सुनने वाले कि ही समझ में नहीं आएंगे ! इसलिए
गीत को आप इतना सरल बनाइये कि बोलने और सुनने वाले कि समझ मे आ सके !

तब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा देखो आज तुमको यह कलिष्ट लग रहा हो लेकिन मेरी
बात याद रखना एक दिन ये गीत हर नोजवान के होंटो पर होगा और हर क्रांतिवीर कि
प्रेरणा बनेगा ! और हम सब जानते है इस घोषणा के 12 साल बाद बंकिम चंद्र चटर जी
का स्वर्गवास हो गया ! बाद मे उनके बेटी और परिवार ने आनद मठ पुस्तक जिसमे ये
गीत था उसका बड़े पेमाने पर प्रचार किया !

वो पुस्तक पहले बंगला मे बनी बाद मे उसका कन्नड ,मराठी तेलगु ,हिन्दी आदि बहुत
भाषा मे छपी ! उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों मे बहुत जोश भरने का काम किया ! उस
पुस्तक मे क्या था कि इस पूरी अँग्रेजी व्यवस्था का विरोध करे क्यू कि यह
विदेशी है ! उसमे ऐसे बहुत सी जानकारिया थी जिसको पढ़ कर लोग बहुत उबलते थे
!और वो लोगो मे जोश भरने का काम करती थी ! अँग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर
पाबंदी लगाई कई बार इसको जलाया गया ! लेकिन इस कोई न कोई एक मूल प्रति बच ही
जाती ! और आगे बढ़ती रहती !

1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया एक अंग्रेज़ अधिकारी
था उसका नाम था कर्ज़न ! उसने बंगाल को दो हिस्सो मे बाँट दिया !एक पूर्वी
बंगाल एक पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए पश्चमी बगाल था
हिन्दुओ के लिए !! हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था !

तो भारत के कई लोग जो जानते थे कि आगे क्या हो सकता है उन्होने इस बँटवारे का
विरोध किया ! और भंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के
प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो
बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो
पश्चिम भारत के बड़े नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन
का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो)
(अँग्रेजी सरकार का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो) (अँग्रेजी वस्तुओ
का बहिष्कार करो) ! और दूसरा हिस्सा था पोजटिव ! कि भारत मे स्वदेशी का
निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो !

लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन कहा ! अँग्रेजी सरकार
इसको भंग भंग विरोधे आंदोलन कहती रही !लोकमान्य तिलक कहते थे यह हमारा स्वदेशी
आंदोलन है ! और उस आंदोलन के ताकत इतनी बड़ी थी !कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो
के खिलाफ जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने आरके
इलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो !करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी
कपड़े पहनना बंद कर दिया ! उयर उसी समय भले हिंदुतसनी कपड़ा मिले मोटा मिले
पतला मिले वही पहनना है ! फिर उन्होने कहाँ अँग्रेजी बलेड का ईस्टमाल करना
ब्नद करो ! तो भारत के हजारो नाईयो ने अँग्रेजी बलेड से दाड़ी बनाना बंद कर
दिया ! और इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर लोक मान्य तिलक ने कहा
अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो ! क्यू कि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी
भारत मे गुड बनाता था ! तो हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड दाल कर मिठाई बनाना
शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से
अपने घरो को मुकत करो ! तो हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े धोना
मुकत कर दिया !फिर उन्होने ने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर तो उन लोगो कि
मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो ! तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने
वालों का बहिष्कार कर दिया !

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरागी
क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया !
तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला ! कि हमारा तो धंधा ही
चोपट हो गया भारत मे ! हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग
को मंजूर करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम
से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए
! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911 मे divison of bangal
act वापिस लिया गया ! इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत !

तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया ! अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है ! तो बहिष्कार
ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है ! यह 6 साल जो आंदोलन चला इस आंदोलन का मूल मंत्र
था वन्देमातरम ! जीतने क्रांतिकारी थे लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपत
राय ,विपिन चंद्र पाल के साथ उनकी संख्या !1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा थी ! वो
हर कार्यक्रम मे वन्देमातरम गाते थे ! कार्यक्रम कि शुरवात मे वन्देमातरम !
कार्यक्रम कि समाप्ति पर वन्देमातरम !!


उसके बाद क्या हुआ अंग्रेज़ अपने आप को बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे
!क्यूंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था ! सन 1911 तक भारत की राजधानी
बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ
बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने
आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में
दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे
हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि
लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया।
रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत
में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता
था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे,
उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता
डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी
में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के
लिए।

रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन
अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में
अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये
तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ
कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का
भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के
भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी
प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण
भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये
सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और
तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के
भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” में ये गीत गाया गया।

जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया।
जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो
मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश
दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड
बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल
पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार
से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार
को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ
टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल
पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर
मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे
जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है।
जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना
के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड
हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी
तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम
अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए फिर
गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक
तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद
खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
लौटा दिया।

सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार
के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे
थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और
ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की
घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा
मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस
गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस
चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता
हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।

7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र
नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन
गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो
खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे
में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते
थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition
Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार
बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक
कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए।
एक नरम दल और एक गरम दल। गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी।
वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु
(यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से
इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए
आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले
ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो
अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को
वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और
आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग
भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना
शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और
वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और
मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन


1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली।
संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे
जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर
सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम
था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के
दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों
को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे,
तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं
भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत
तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी
तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता
और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है।

उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले
रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया
और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ
और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को
राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं
करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे,


मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा
दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए
तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और
वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते
थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों
ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के
सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों
को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक
जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप
को तय करना है कि आपको क्या गाना है
रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित उनका हस्ताक्षरित …. इंग्लिश में अनुवादित
पत्र

हिन्दू धर्म एक बहती हुई नदी के समान है

हिन्दू धर्म एक बहती हुई नदी के समान है, जिसमें कई प्रकार की धाराएं आकर मिलती हैं और उसी में एकरूप होती हैं… इस बहती हुई नदी की गहराई में विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु पनपते हैं जो आपसी साहचर्य से रहते हैं…

अन्य धर्म एक ठहरे हुए पानी समान हैं, जिनमें "बदलाव" या "समयानुसार परिवर्तन" नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे धर्म (पंथ कहना अधिक सटीक होगा) एक निश्चित सीमा और नियमों में बँधे हुए तालाब समान हैं…

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इतिहास गवाह है कि बहता हुआ पानी हमेशा स्वच्छ और निर्मल होता है, जबकि ठहरा हुआ पानी थोड़ी देर से ही सही, सड़ता जरूर है…

आमिर खान कभी मुसलमानों के समाज की कुरीतियों को समाप्त क्यों नहीं करता है


"क्यों भाई ये आमिर खान कभी मुसलमानों के समाज की कुरीतियों को समाप्त क्यों नहीं करता है इसको केबल हिन्दुओ की बुराई ही नजर आती है कही ऐसा तो नहीं ये फतबो से डरता है" ..

यह अकाट्य सत्य है कि मुसलमानों के आने से पहले घर में शौच करने और मैला ढोने की परम्परा सनातन हिंदू समाज में थी ही नहीं. जब हिंदू शौच के लिए घर से निकल कर किसी दूर स्थान पर ही दिशा मैदान के लिए जाया करते थे, तो विष्टा उठाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. जब विष्टा ढोने का आधार ही समाप्त हो जाता है, तो हिंदू समाज में अछूत कहाँ से आ गया

छुआ छुट (मैला उठाना ) मुसलमानों ने भारत में फैलाया था उस पोस्ट पर कई मुल्ले आ कर कमेन्ट करते थे की इस्लाम में ऐसा नहीं होता है और इस्लाम ऐसा नहीं करता है और न ही किसी मुस्लिम राजा ने ऐसा किया है आप झूठ बोल रहे है इस्लाम में छुआ छूट नहीं होती है आज मै एक और पोस्ट कर रहा हू इस्लाम की हकीकत को बताने के लिए काफी है ..... की इस्लाम दो मुह साँप है .... युद्ध में हारे हुए लोगो को गुलाम बनाने का काम और उनसे अपने गंदे काम कर बाना उनकी ओरतो को अपनी रखेल बनाना ....

भारत में युद्ध में हारे हिंदू :-

"जिनको थी आन प्यारी वो बलिदान हो गए,

जिनको थी जान प्यारी, मुसलमान हो गए "

लेकिन जो बचे बो वाल्मीकि हो गए


वाल्मिकी-हेला समुदाय के सामाजिक बहिष्कार एवं भेदभाव पर अध्ययन

Author: दयाशंकर मिश्र , Source: मीडिया फॉर राइट्स

हेला समाज के बारे में ऐसी लोकमान्यता है कि प्राचीन समय में किसी राजा ने अपने आदेश की अवहेलना पर एक बिरादरी को मैला ढोने की सजा सुनाई थी। इस बिरादरी के मुखिया का नाम इब्राहिम हेला था। ऐसा कहा जाता है कि तभी से इनके वंशजों को हेला कहा गया। इनके नाम पर संसार का सबसे घृणित काम लिख दिया गया। वैसे इस समुदाय के म.प्र. में होने का इतिहास नहीं है और कहा जाता है कि यह लोग उ.प्र. से पलायन करके यहां पहुंचे। जिसके बाद यह कथित आदेश एक अघोषित नियम बन गया।

मस्जिदों में हेलाओं के लिए अलग कतार होती है। ईद पर उनके साथ खुशियां नहीं बाटीं जाती। इसी से तंग आकर उज्जैन की हैलावाड़ी में हेलाओं ने एक अलग मस्जिद ही बना ली है। यह मस्जिद भेदभाव की समस्या का हल तो नहीं है, क्योंकि यह समुदाय को जोड़ने की जगह उसे स्वत: ही बहिष्कृत कर देता है।

हमारा संविधान, इस देश का कानून कागजों पर भले ही कुछ कहते दिखे, लेकिन इसके बाद भी हमारे देश में आज भी करोड़ों ऐसे लोग हैं, जो अपने मौलिक अधिकारों से वंचित, सामान्य जीवन जीने का अधिकार नहीं रखते हैं। मैला ढोने जैसी घृणित कुप्रथाएं आज भी जिंदा हैं। जंगों के जमाने में हारे हुए लोग गुलाम बनाए जाते थे, जिनकी जिंदगी तय करने का हक विजेता राजा को होता था। वक्त बदल गया लेकिन उन हारे हुए लोगों की कौम आज भी वैसी ही जिंदगी के लिए विवश है। अंतर इतना ही है कि लोकतंत्र में ऐसी भूमिका में वह बहुसंख्यक वर्ग होता है, जिसकी सरकार हो, जिसके पास वोट हों। जिसके पास वोट नहीं होते, उसकी स्थिति लोकतंत्र में किसी पराजित सैनिक से कम नहीं होती। सदियों पहले इस देश में एक सेना किसी जंग में हार गई थी और ऐसा माना जाता है कि विजित सेना ने उन्हें सजा सुनाई कि वे जीते हुए मनुष्यों का मैला साफ करें। इसके बाद से मैला ढोने की प्रथा का आरंभ हुआ। सदियां बीत गईं लेकिन यह प्रथा म.प्र. समेत देश के 13 से अधिक राज्यों में बदस्तूर जारी है। इस पर कार्रवाई के लिए अब तक अनेक समितियों का गठन हुआ और अनेक रिपोर्ट्स भी फाइल की गईं, लेकिन ग्रासरूट पर कुछ हुआ नहीं।

यह महज संख्याओं का मामला नहीं है। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक गणराज्य में निवास करते हैं, इसलिए हम संख्याओं और आंकड़ों से खेलने के आदि हो चुके हैं। इस फैलोशिप पर अध्ययन के दौरान मैं बड़ी संख्या में लोगों से मिला, उनसे विचार-विमर्श किया। लेकिन इस दौरान ज्यादातर लोगों की सोच यही थी कि अब बहुत थोड़े से लोग इस काम को कर रहे हैं, अतः मामला बहुत गंभीर नहीं है। यही है आंकड़ों की बाजीगरी। हमारा समाज हर चीज को आंकड़ों से क्यों तौलता रहता है। यदि मप्र में मुट्ठीभर लोग भी यह काम करते हैं तो इस बात से अंतर पड़ता है, लोगों के दिलो-दिमाग पर अंतर पड़ना ही चाहिए। मप्र के उज्जैन की हैलावाड़ी, तराना का इलाका, देवास, नीमच और मंदसौर, शाजापुर मप्र के वे प्रमुख स्थान हैं, जहां पर मैला ढोने की कुप्रथा अब तक के तमाम प्रयासों के बाद भी समाप्त नहीं की जा सकी है। फैलोशिप पर अध्ययन के दौरान मैंने वाल्मिकियों, हेला समुदाय के लोगों के साथ निरंतर संवाद के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया कि आखिर उनके बहिष्कृत होने के पीछे क्या कारण हैं। एक ओर हम एक गणतंत्र के रूप में मजबूत हो रहे हैं, तो दूसरी ओर हमारे सामाजिक ढांचे में सहिष्णुता की जगह कट्टरता का विस्तार होता जा रहा है। इस अध्ययन के माध्यम से मैंने वाल्मिकी और हेला दोनों समुदायों के सामाजिक, आर्थिक अध्ययन के साथ ही खुद उनकी विचार प्रक्रिया और दूसरे समाजों के साथ अंर्तसंबंधों को समझने का प्रयास किया है।

मैं फैलोशिप के दौरान मिले प्रत्येक सहयोग के लिए सदैव प्रस्तुत रहने वाले मो. आसिफ का विशेष आभारी रहूंगा। जो हमेशा मेरी मदद के लिए तत्पर रहे। इसके साथ ही महू की शबनम से भी मुझे समय-समय पर सहयोग मिला। आप दोनों ने ही हेला और वाल्मिकी समुदायों की समस्याओं को समझने में मेरी भरपूर मदद की। शबनम ने शोध कार्य के लिए आवश्यक संदर्भ सामग्री जुटाने में बहुत अधिक मदद की, जिसके लिए मैं सदैव उनका आभारी रहूंगा। मानवीय सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध सचिन जैन ने इस संपूर्ण अध्ययन के दौरान एक गाइड की भूमिका निभाई, उनके आत्मीय सहयोग के लिए भी साधुवाद।

मैला ढोना एक अमानवीय पीड़ा

विकास संवाद फैलोशिप के दौरान सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार पर काम करने के दौरान मेरे अनुभव और शोध के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार से हैं, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने की न केवल पोल खोलते हैं, बल्कि सामाजिक हकीकत और विभिन्न धर्मों में व्याप्त आपराधिक, अमानवीयता को भी बखूबी बयां करते हैं:

1. जब रिसर्च के लिए मैं दलित बस्तियों में जाता था तो वहां के लोग कहते कि आपके स्पर्श से हमें ही उल्टा पाप लगता है, जबकि सवर्णों का विरोध इस बात को लेकर था कि क्यों भंगियों के बीच अपने ब्राहमणत्व की धज्जियां उड़ा रहे हो भाई। सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का है कि ऐसे लोग जो कथित तौर पर मानवतावादी रिपोर्टिंग और पत्रकारिता की बात करते हैं, उनको इस तरह की कुप्रथाओं पर अचरज नहीं होता। वे इसे हमारे सामाजिक प्रथाओं की आवश्यक बुराई करार देते हैं।

2. मुझे एक से अधिक अवसरों पर ऐसी बातें सुनने को मिलीं कि इस इस तरह के अध्ययन वास्तव में दलितों को झांसा देने के लिए किए जाते हैं, सवर्ण जाति का हूं। मैं कथित तौर अस्पृश्य जातियों के बीच हूं इस बात का विरोध मुझे दलितों के साथ ही सर्वणों के बीच भी झेलना पड़ा।

3. केवल दो वक्त की रोटियों के लिए भरी बरसात में मैले की टोकरी का सारा मैला सर पर उठाना यह एक ऐसी विवशता है, जो किसी भी संवेदनशील मनुष्य को परेशान कर सकती है। लेकिन कैसा हमारा शिक्षित, सहिष्णु समाज और कैसे कथित तौर पर पढ़े लिखे लोग और नकारा सरकारी तंत्र और विशेषकर कलेक्टरों की जमात है, जिनकी आंखों को कुछ नहीं दिखाई देता।

4. एक कलेक्टर ने कहा कि हम बरसात में पीतल की मटकी इनको उपलब्ध करवाएंगे, ताकि मैला ढोने में परेशानी नहीं हो।

5. इसी तरह से एक पूर्व मुख्यमंत्री जो दलितों की मसीहा हैं, खुद भी पिछले वर्ग से हैं, कहा है कि मैला ढोने के लिए नई गाड़ियों की व्यवस्था करेंगे। इन मासूमों को नहीं मालूम था कि मैला ढोने की प्रथा कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है। ऐसे समाज में और कब तक मैला ढोने का काम बंद होगा कहना मुश्किल है और हो भी गया तो उनको मुख्यधारा में आने में कम से कम एक से अधिक सदी का वक्त लगेगा।

6. जाति हमारे देश की सबसे बड़ी सच्चाई है। यह एक ऐसा बोध है, जिससे देश का आदमी कभी भी उबर नहीं पाता। हाल ही में मुंबई में मेरी मुलाकात फ्रांस से आए एक इंजीनियर से हुई और उसे यह समझाने में कि जाति क्या होती है, लंबा वक्त लगा। लेकिन अंतत: उसे बात समझ आ गई। अपने देश में करोड़ों पढ़े लिखे सवर्ण-दलित दोनों हैं, लेकिन इस पूरी रिसर्च के दौरान मुझे म.प्र. में एक सरकारी अफसर, नेता और इस संदर्भ में पढ़ा-लिखा कहा जा सकने वाला व्यक्ति नहीं मिला जो जातिगत धारणाओं से इतर मानवीय सरोकारों की पैरवी करे।

7. इन समुदायों के भीतर खुद भी एक ऐसी हीनग्रंथि है, जो उनको आगे बढ़ने से रोकती है। यह संभवत: सदियों से दलितों के दमन का सामाजिक परिणाम है कि उनके भीतर सवर्णों से बेहतर हो सकने का भाव कहीं खो गया है। इसका सवर्ण भरपूर दोहन कर रहे हैं।

8. पुरुषों और महिलाओं के बीच एक ही तरह का यूनिवर्सल रिश्ता है। पुरुष स्त्रियों को किसी भी तरह से अपने समान दर्जा देने को तैयार नहीं हैं और वह उसे अपने अधिकार क्षेत्र के सीमाओं से बाहर निकलने, शिक्षा जैसे सहज मानवीय अधिकार से महज इसलिए वंचित रखना चाहता है ताकि कहीं उसे अपने अधिकारों के बारे में पता नहीं लग जाए। मैला ढोने का काम करने को विवश समाजों में भी स्त्री चेतना, उसकी अभिव्यक्ति पर पुरुषों का ही बोलबाला है। दूसरों का मैला ढोए औरत और मर्द दूसरी औरत के चक्कर में फिरे, दिनभर चिलम फूंकता रहे। उसके लिए अधिक पत्नी का मतलब है अधिक काम और आय का साधन। इसकी पुष्टि हेला समाज में बहुपत्नी प्रथा के रूप में मिलती है, चूंकि इस्लाम में एक से अधिक पत्नियों को मान्यता दी गई है, इसलिए इसके विरोध में कहीं से कोई स्वर नहीं उभरता है।

9. गांवों विशेषकर कस्बों में छूआछूत में इतना ही अंतर आया है कि जो व्यक्ति किसी न किसी तरह से मुख्यधारा में शामिल हो गया है, उसे कुछ हद तक चाय की दुकान में चाय पीने का हक है और अपनी बात रखने का हक है। इसके अलावा वह जो गरीबी के मकड़जाल से मुक्त नहीं हो सके हैं, उनकी स्थिति अभी भी सामंतवादी दिनों जैसी ही है।

10. मैला ढोने वाले वाल्मिकियों और हेला समाज दोनों की स्थिति अपने ही समुदाय यानि दलितों और पिछड़ों के बीच बहिष्कार की है। इस्लाम में अस्पृश्यता की स्थिति को देखना दुखद अनुभव है, क्योंकि मनुष्यों के बीच आपसी समानता पर सबसे अधिक बल देने वाले धर्मों में से एक यह धर्म है।

11. मस्जिदों में हेलाओं के लिए अलग कतार होती है। ईद पर उनके साथ खुशियां नहीं बाटीं जाती। इसी से तंग आकर उज्जैन की हैलावाड़ी में हेलाओं ने एक अलग मस्जिद ही बना ली है। यह मस्जिद भेदभाव की समस्या का हल तो नहीं है, क्योंकि यह समुदाय को जोड़ने की जगह उसे स्वत: ही बहिष्कृत कर देता है।

12. मायावती और कांशीराम के सत्ता में आने से दलित चेतना में खासी सुधार हुआ है। इस बात में कोई दो संशय नहीं होना चाहिए कि दलितों, पिछड़ों के आत्मबल में जो कुछ सुधार गत दो दशकों में दर्ज किया गया है वह मुख्यत: बहुजन समाज पार्टी और उसके जैसे अन्य नेताओं के सत्ता में रहने से हुआ है। म.प्र. में बसपा का असर भले ही अभी भी कम हो लेकिन अंदर ही अंदर एक तरह की कसमसाहट तो है ही। माया एंड कंपनी को श्रेय देने के दो कारण हैं।

13. पहला तो यह कि दलितों का एक वोट बैंक बना। जिसने उनको एक किस्म की सामुदायिक एकता प्रदान की। दलितों के भीतर की सामाजिक चेतना के विस्तार से सबसे बड़ा लाभ यही हुआ कि उनको यह विश्वास हुआ कि उनके भीतर की एक दलित लड़की देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक की मुखिया बन सकती है। मायावती के एक नहीं अनेक बार सीएम बनने से दलितों में उनके एकदिन आगे हो जाने की संभावना को बल मिला।

14. दूसरा बड़ा काम जो माया के बार-बार सत्ता में आने से हुआ वह यह कि ब्राह्मण अब दलितों के साथ सामुदायिक और सार्वजनिक स्थानों पर अब बेहतर तरीके से पेश आने लगे दिखते हैं।

15. मेरे लिए यह पहला अवसर था जब मैं मेला ढोने वालों के इतने जीवंत रूप में देख रहा था। मेरे भीतर कोई जातिगत हिचक तो नहीं थी, जो मुझे उन समुदायों के साथ इस बैठने, भोजन करने से रोकती, लेकिन जिस गंदगी, बजबजाहट भरे वातावरण वे रहने को विवश हैं, वहां पर उनके साथ भोजन और चाय-पान के प्रस्तावों को स्वीकारते हुए अंदर से मैं कांप जाता था। हालांकि मैंने इन प्रस्तावों को किसी भी कीमत पर अस्वीकार नहीं करने का पक्का इरादा कर लिया था, क्योंकि इससे मेरी समानता और जातिगत बुराइयों पर कही गई बातों का उल्टा असर होने का खतरा था। इन समुदायों के लोग ऐसा होने पर किसी भी तरह से संवाद के दौरान सरल नहीं हो पाते।

16. देश बदल रहा है, वक्त बदल रहा है। लेकिन जातियों को लेकर आने वाला बदलाव बेहद धीमी गति से आ रहा है। जातियों के नाम पर समाज इस तरह से बंटा हुआ है कि गरीबी की मार खाते किसानों की बमुश्किल बची जमा पूंजी मुकदमों के लिए तहसील जाने-आने में ही खर्च हो रही है।

17. रोटी-बेटी के व्यवहार की बात तो दूर की कौड़ी है। अभी भी आते जाते स्पर्श हो जाने पर सवर्णों की गालियां, अपनी औकात भूलने के ताने दिए जाते हैं। इस हाल में इन वर्गों के बच्चों की शिक्षा किस तरह से प्रभावित हो रही है, यह समझ पाना कतई मुश्किल नहीं है।

18. वाल्मिकियों और हेलाओं समेत दूसरी अछूत माने जाने वाली जातियों की लड़कियों के लिए स्कूल से आगे का सफर बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि उन्हें न केवल सवर्ण जातियों की गंदी गालियों का सामना करना पड़ता है, बल्कि केवल इसी वजह से उनको गांवों में अनेक प्रकार के अघोषित बहिष्कारों का भी सामना करना पड़ सकता है।

सोमवार, जुलाई 16, 2012

मो.गाँधी: जानिये कुछ तथ्य जो कान्ग्रेस ने अभी तक प्रकाशित ही नही होने दिया|

मो.गाँधी: जानिये कुछ तथ्य जो कान्ग्रेस ने अभी तक प्रकाशित ही नही होने दिया|

आखिर क्या कारण थे कि गोडसे जी ने तथाकित राष्ट्रपिता को मारा, जोकि कोर्ट ने तो सुना लेकिन यह व्क्तवय कभी भी सार्वजनिक न हो पाया|
आइये जानिये और योगदान दे गोदसे के विचारो को फैलाने मे.......

गाँधी-वध के मुकद्दमें के दौरान न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति माँगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी। नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गाँधी-वध के सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्ष गाँधी-वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: -

1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाये। गाँधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से स्पष्ठ मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गाँधी की ओर देख रहा था, कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचायें, किन्तु गाँधी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया।

3. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गये अपने सम्बोधन में गाँधी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4. मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गाँधी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दू मारे गये व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

5. १९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये अहितकारी घोषित किया।

6. गाँधी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7. गाँधी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दू बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गाँधी ही थे जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिये बनी समिति (१९३१) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

10. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गाँधी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण प�� त्याग दिया।

11. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गाँधी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गाँधी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गाँधी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे; ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

14. पाकिस्तान से आये विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गाँधी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

15. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउण्टबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपये की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गाँधी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

16. जिन्ना की मांग थी कि पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समय लगता है और हवाई जहाज से जाने की सभी की औकात नहीं| तो हमको बिलकुल बीच भारत से एक कोरिडोर बना कर दिया जाए.... जो लाहौर से ढाका जाता हो, दिल्ली के पास से जाता हो..... जिसकी चौड़ाई कम से कम १६ किलोमीटर हो....४. १० मील के दोनों और सिर्फ मुस्लिम बस्तियां ही बने

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आपने स्वयं और अपने परिवार के लिए सब कुछ किया, देश के लिए भी कुछ करिये,
क्या यह देश सिर्फ उन्ही लोगो का है जो सीमाओं पर मर जाते हैं??? सोचिये......