मंगलवार, अप्रैल 14, 2020

कुरान के राक्षसी रिवाज :शैतानी शरीयत !!

Mudassar Nazir 
कुरान के राक्षसी रिवाज :शैतानी शरीयत !!
मुसलमान भारत को दारुल हरब यानी काफिरों का देश कहते हैं .इसीलिए उन्होंने देश का विभाजन करवा कर पाकिस्तान बनवा लिया था .आज पकिस्तान उनके लिए आदर्श इस्लामी देश है .क्योंकि वहां पर शरीयत का कानून चलता है ,जो कुरआन और हदीसों के अनुसार बताया जाता है .
लेकिन कुरआन और हदीसों में परस्पर विरोधी ,तर्कहीन ,और महिला विरोधी आदेशों की भरमार है .मुसलमान इतने मक्कार हैं की उन आदेशों में जो उनके लिए लाभकारी होता है ,उसे स्वीकार कर लेते हैं .और जो महिलाओं के पक्ष में होता है उसे गलत कहते हैं .पकिस्तान में सन 1979 में शरीयत का कानून लागू कर दिया गया था जिसे हुदूद मसौदा “Hudud Ordinence “कहा जाता है .
लेकिन पाकिस्तान के कई प्रान्तों जैसे सिंध ,बलूचिस्तान ,पजाब के कुछ भागों और सूबाए सरहद के आलावा अन्य क्षेत्रों में कबाइली कानून और रिवाज चलते हैं .इनमे सारे फैसले वहां की “जिरगा “या पंचायत ही कराती है .यह जिरगा मौत की सजा भी दे सकती है .और अक्सर जिरगा के फैसले बेतुके ,अमानवीय और महिला विरोधी होते हैं .लेकिन हदीसों के हवाले देकर इन फैसलों का कोई विरोध नहीं होता .इसके इन्हीं जंगली हदीसों के कारण वहां पर कई राक्षसी रिवाज भी प्रचलित हो गए है जिन्हें बलपूर्वक मनवाया जाता है .और कहा जाता है कि यह रसूल कि सुन्नत है .यानि रसूल भी यही करते थे ,अथवा यह रिवाज हदीसों और कुरान के अनुसार सही है .
यहाँ कुछ रिवाजों के नाम ,और और कुरान और हदीसों से उनका आधार बताया जा रहा है ,कि इन रिवाजों के पीछे कौन सी आयत या हदीस है .पता चला है कि देखादेखी यह राक्षसी रिवाज भारत के मुसलामानों में फ़ैल रहे हैं .और लोग इन्हें शरियत मान रहे है .
1 -सट्टा वट्टा. سٹّہ وٹّہ Satta Watta
इसका मतलब है “पत्नी विनिमय “या Barter Marriage “अक्सर मुसलमान आपस में ही लड़ते रहते हैं .और कई बार मामला गंभीर होजाने से जिरगा या पंचायत के पास चला जाता है .जब झगड़ा किसीभी तरह से नहीं सुलझाता है तो ,जिरगा ऐसे दौनों पक्षों के परिवार जिनके लडके और लड़कियां हों ,आपस में शादियाँ करा देता है .यानी किसी एक परिवार के लडके की दूसरे परिवार की लड़की से शादी करा दी जाती है .और विवाद का निपटारा हो जाता है .जादातर लोग यह फैसला मान लेते हैं .लेकिन यदि कोई परिवार नहीं मानता है तो ,जिरगा बच्चों की जबरदस्ती शादी करा देता है .यह रिवाज सिंध ,बलूचिस्तान ,पंजाब और सीमांत प्रान्त में प्रचलित है .इसका आधार यह हदीस है -
“अबू हुरैरा ने कहा कि,इब्ने नुमैर ने एक बार रसूल से पूछा कि ,मैं ने अपने पडौसी से कहा कि ,यदि वह अपनी लड़की का हाथ मेरे हाथों में दे देगा तो ,मैं अपनी बहिन की शादी उसके साथ कर दूँगा .क्या ऐसा करना उचित होगा .रसूल ने कहा इसमे कोई बुराई नहीं है ,बल्कि इस से एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से जुड़ जाता है .और मनमुटाव ख़त्म होता है.सहीह मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3299 .
2 -कारोकारी . کاروکاریKaroKari
इज्जत के लिए ह्त्या Honour Killing .चूँकि इस्लाम में औरतों को परदे रखने का हुक्म है ,और यदि लड़कियाँ किसी लडके से बात भी करती हैं ,तो इसे बेशर्मी और गुनाह माना जाता है .और औरतों को घर में ही कैद रखा जाता है .इसका आधार यह हदीसें है .-
“अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा कि औरतें ,गधा ,और कुत्ते लोगों का ईमान बिगड़ देते हैं ,इसलिए इनको एक जगह बांध कर रखना जरूरी है .यह बाहर जाकर ख़राब हो जाते हैं “.सही मुस्लिम -किताब 4 हदीस 1034
“अब्दुला इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने कहा है कुत्ता ,गधा ,यहूदी ,पारसी (मजूसी )और लड़कियां इमानबिगड़ देते हैं ,इनको बाहर नहीं रहने देना चाहिए “.अबू दाऊद-किताब 2 हदीस 704
“सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने कहा है औरतें ,ऊंट और गुलाम सब एक जैसे हैं .इनको आजादी नहीं देना चाहिए .यह आजादी देने से काबू में नहीं आ सकते हैं “अबू दाऊद -किताब 4 हदीस 2155
अब यदि कोई लड़का या लड़की आपस में प्रेम करने लगते हैं ,या शादी करना चाहते हैं ,तो इसे बदचलनी और इस्लाम के विरुद्ध माना जाता है .और लोग उस परिवार का अपमान करते है .या समाज से निकाल देते है .दोनो परिवार अपनी बदनामी से बचने के लिए उस प्रेमी जोड़े कीहत्या कर देते है .दुःख की बात यह है कि यह हत्याएं उन बच्चों के बाप ,बड़े भाई ,या सम्बन्धी ही करते है .और इस बात को छुपा देते हैं .भारत में भी यह कुरीति आ गयी है .यहाँ सगोत्र ,या अन्य जाती में शादी करने पर हत्या कर दी जाती है .लेकिन मुसलमानों में गोत्र का या जाती का सवाल ही नहीं है .वहां केवल इन हदीसों के कारण ही हत्या करते हैं .सन 2004 में सिंध में 2700 और पंजाब में 2005 में 1300 लड़कों और 3451 लड़कियों की हत्या कर दी गई थी .इस का सारा पाप मुहमद पर पड़ेगा .
यहाँ भी इस कुरीति का विरोध होना चाहिए .यह महा पाप है .
3 -पेटलिखी .پیٹ لکهی Pait Likkhi .
इसका अर्थ है कि बच्चों के जन्म से पूर्व ही उनकी शादी तय कर देना .Arrangin Marriages in the Womb .अक्सर कई मुस्लिम परिवार एक साथ रहते हैं .और एक ही मकान में रहते है .मुसलमानों में चचेरे ,ममेरे भाइयों और बहिनों में शादी हो जाती है .जब किन्हीं भाइयों की औरतें एक ही समय गर्भवती हो जाती है ,तो घर के बुजुर्ग बच्चों के पेट में होते ही आपस में तय कर लेते है की ,अगर अमुक के घर लड़का होगा ,और अमुक के घर लड़की होगी तो ,उनकी आपस में शादियाँ करा देंगे .यह बात काजी के सामने लिखी जाती है .और दौनों तरफ के लोगों के सही कराये जाते है .बाद में यदि कोई इस बात से मुतारता है ,तो उस पर जिरगा जुरमाना लगा देती है .चूंकि यह अनुबंध पेट के बच्चों के लिए होता है ,उस पर बाल विवाह का कानून नहीं लगता ..इसका अधार यह आयतें और हदीसें है -
“अल्लाह माता के पेट में ही जोड़े बना देता है “सूरा-अज जुमुर 39 :4 -6
“हमने हरेक के शकुन अपशकुन को गले में बांध दिया है “सूरा -बनी इस्राएल 17 :13
“गर्भ में क्या है अल्लाह यह जानता है ,”सूरा -हूद 11 :5 .
4 -अड्डोवद्ड़ो. اڈّووڈّو Addo Vaddo
जिन परिवारों में किसी न किसी बात पर विवाद या झगड़े चलते रहते हैं ,वे आपसी झगडा निपटने के लिए एक दुसरे के बच्चों की शादी करा देते हैं .यह एक प्रकार का Child Marriage है .यह रिवाज सिंध पंजाब और बलूचिस्तान में प्रचलित है.इसका आधार यह हदीस है -
“आयशा ने कहा कि जब मैं 6 साल कि थी ,मेरे माँ बाप में मेरी शादी रसूल के साथ कर दी थी और जब मैं 9 साल की हुई तो रसूल ने मेरे साथ सम्भोग किया था “बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 64
इसी हदीस की आड़ लेकर 21 मई 2010 को एक 25 साल के युवक ने एक 6 साल की बच्ची से शादी की थी .और शरई कानून ने उसे जायज बताया था .आज भी पाकिस्तान में छोटी छोटी बच्चियों की शादियाँ होती है ,जिस से कई बच्चियां मर जाती है ,
5 -विन्नी . وِنّی Vinni
यह पश्तो शब्द है . वैसे तो इसका अर्थ है क्षतिपूर्ति या बदला है ,लेकिन किसी की शारीरिक हनी ,या हत्या के बदले में अपराधी से औरतें ली जाती है “Women as Compesation “यह प्रथा सीमांत प्रान्त ,बलूचिस्तान ,और स्वात में अधिक है .इसे उर्दू में दिय्यत دِیَّت Diyyat कहा जाता है .इसके बारे में कुरानऔर हदीसों में यह लिखा है-
“यदि कोई ईमान वाला भूल से या जानबूझकर किसी ईमान वाले ला वध कर दे ,तो मारे गए व्यक्ति के परिवार को एक आदमी सौंपना होगा .और खून के बदले धन भी देना होगा “सूरा -अन निसा 4 :92
“एक पुरुष के बराबर दो स्त्रियाँ होंगीं “सूरा-निसा -4 :11
“यदि मारा गया व्यक्ति पागल हो तो उसकी दिय्यत आधी होगी .और मारी गयी औरत की दिय्यत मर्दों की कीमत से आधी होगी .यानि एक मर्द की हत्या के बदले दो औरतें देना होंगी .और औरत की आयु अगर सात साल से कम हो तो दो छोटी बच्चियों से काम चलाओ .”
बुखारी -जिल्द ५ किताब 59 हदीस 709 .और बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 64
(नोट -इस के मुताबिक एक मर्द के हया के बदले दो औरतें ,या 7 साल से कमकी चार बच्चियां देना होंगी )
फिर जो औरतें या बच्चियांबदले में ली जाती हैं ,उनसे मृतक के परिवार के लोग गुलामी करते हैं .और सब मिल कर बलात्कार भी करते हैं .कई जगह जमीदारों ने अपने निजी जेल भी बना रखे है
.6 -सवरा. سوَرا Swara
इसका अर्थ है शारीरिक क्षति की भरपाई BloodFeud .यदि कोई किसी व्यक्ति के शरीर स्थायी को नुकसान करता है तो ,उसले बदले जो लिया जाता है उसे सवरा कहा जाता है .यह रिवाज भी कई स्थानों में है .कुरान में लिखा है-
“हे ईमान वालो ,बदला लेने में बराबरी होना जरूरी ठहरा दिया गया है ,आजाद का बदला आजाद ,गुलाम का बदला गुलाम ,स्त्री का बदला स्त्री .फिर यदि स्त्री के भाई की तरफ से कोई दिया जाये तो उसे उत्तम रीति से निपटा देना चाहिए .बदला लेना ही बुद्धिमानों का जीवन है “
सूरा -बकरा 2 :178 और 179
“हमने तुम्हें हुक्म दिया है कि जान के बदले जान ,आँख के बदले आंख ,कण के बदले कान ,नाक के बदले नाक ,दांत के बदले दांत और हरेक घाव के बदले घाव है “
सूरा -मायादा 5 :45 .
इन आयातों के अनुसार यदि कोई बदले में बहुत अधिक धन नहीं दे पाताहै तो ,लोग दिय्यत में उसकी लड़की या बहिन को लेने के हकदार होते हैं ,या जिरगा जबरदस्ती शादी करा देती है .आज भी पाकितान की अदालतों में ऐसे हजारों मामले पड़े हैं .क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी ऐसे मामले उठती रहती है .लेकिन शरियत के आगे कुछ नहीं कर पाती है.
7 -वुलवार.وُلوار Vulvar
महिला खतना Female Genital Mutilation ,इसके बारे में पिछले लेखों में विस्तार से दिया गया है .इसमे चार से पांच साल की बच्चियों की योनी की भगनासा (Clitoris )और उसके आसपास के भगोष्ठ को छील दिया जाता है .कई बार इस से बच्चियों की मौत भी हो जाती है .
सब जानते हैं कि मुसलमान हफ़्तों तक नहीं नहाते .वह इसे रसूल कि सुन्नत मानते हैं .मुसलमान नहाने से बचने के लिए बच्चियों कि खतना करा देते हैं .हदीस में कहा है कि
“यदि कोई खतना वाले पुरुष का अंग (लिंग )किसी बिना खतना वाली स्त्री के अंग (योनी )में प्रवेश करता है ,तो उस पुरुष को गुस्ल(स्नान )करना जरुरी है “सही मुस्लिम -किताब 3 हदीस 684 .
इसलिए मुसलमान बार बार नहाने से बचने के लिए लड़कियों कि खतना करा देते है .फिर मुहम्मद ने भी कहा था कि -
“उम्मे आत्तिय्या अन्सारिया ने कहा कि ,मदीना में एक औरत एक बच्ची की खतना कर रही थी .रसूल वहां गए और उस औरत से कहा कि इस बच्ची कि योनी को इतनी गहरायी से मत छीलना जिस से योनी कुरूप हो जाये ,और इस बच्ची के पति को पसंद न आये “
सहीह मुस्लिम -किताब 41 हदीस 3251
8 -औरतोंकी गवाही
अल्लाह और मुहमद औरतों को आधा प्राणी (Half Human )मानते थे .मुहम्मद की कई कई औरतें थी .और अल्लाह कुंवारा है .इसलिए यह औरतोंकी कद्र नहीं करते .इस्लामी कानून में औरतों की आधी कीमत है -
“औरतों की दिय्या(मौत की कीमत )मर्दों से आधी होगी” .सूरा -निसा 4 :92
“एक मर्द गवाह के विरुद्ध प्रमाण देने के लिए दो औरतों की गवाही लाना पड़ेगा .यदि दस मर्द हों तो उनके विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए 21 औरतों की गवाही जरूरी है “बुखारी -जिल्द 1 किताब 6 हदीस 301
“दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर मानी जायेगी “सूरा -बकरा 2 :282
यही कारण है कि अरब ,ईरान या पाकिस्तान में यदि किसी औरत पर बलात्कार होता है ,तो वह पूरे गवाह पेश नहीं कर पाती है .फिर शरई अदालतें उन पर व्यभिचार का आरोप लगा कर पत्थर मार कर मौत की सजा दे देती हैं ऐसे कई मामले अक्सर आते रहते हैं .
तात्पर्य यह है इस्लाम कुरान ,और मुहम्मद केवल गैर मुस्लिमों के लिए अभिशाप नहीं है ,बल्कि खुद मुस्लिम औरतो के लिए लानत है .इस्लामी कानून मुस्लिम औरतो की आजादी लिए बाधक है .और कुरआन और हदीसें सारी कुरीतियों की जननी हैं .
छोड़ दो ऐसा जंगली इस्लाम ,और फेक दो बेतुकी कुरआन और हदीसें !
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बुधवार, अप्रैल 08, 2020

उल्टा पुल्टा तबलीगी मूसलिमि जमात का इतिहास

तब्लीग़ी जमात के बारे में टी.वी. पर धुँआधार बहसें होते, काँय काँय मचते एक सप्ताह हो गया मगर यह मूल विषय कि "सरकार के आदेशों की लॉक डाउन और कर्फ़्यू के बाद भी बड़े समूह ने अवहेलना क्यों की" छोड़ कर सारी दुनिया की बातें हो लीं। दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित मरकज़ में जाने कहाँ कहाँ से हज़ारों इस्लामी इकट्ठे हुए और देश के विभिन्न हिस्सों में क फैल गए। यह भारत में ही नहीं हुआ बल्कि पाकिस्तान, बंग्लादेश, मलेशिया आदि अनेक देशों में हुआ, हो रहा है। आइये इसके कारण की छान फटक करते हैं।
तब्लीग़ी जमात का जन्म आर्य समाज की शुद्धियों को रोकने के लिये हुआ था। आर्य समाज ने हज़ारों ऐसे मुसलमानों को शुद्ध कर वैदिक आर्य बनाया जो किसी काल में भ्रष्ट हो कर इस्लामी हो गए थे। इनमें बहुतेरे ऐसे थे जिनके रीत-व्यवहार हिन्दुओं के से थे। आर्य समाज के प्रताप को देख कर इस्लामी शुद्धता के केंद्र देवबंद के इलाक़े के ही एक मुल्ला मुहम्मद इलियास कांधलवी ने तब्लीग़ी जमात को शुरू किया। तब्लीग़ी जमात से हिसाब से मुसलमान ठीक रस्ते पर नहीं चल रहे और उन्हें अस्ली इस्लाम को अपनाना चाहिए अतः अब जानना ज़रूरी है कि अस्ली इस्लाम क्या है ?
इस्लाम के दो आधार क़ुरआन और हदीस हैं और दोनों का केंद्र मुहम्मद है। इस्लाम के अनुसार क़ुरआन में वही या अल्लाह की भेजी हुई आयतें हैं और हदीस में अल्लाह के पैग़ंबर का कहा हुआ, जिया हुआ जीवन है। हदीस को वही ग़ैर मतलू यानी बिना पढ़ी गयी वही और हदीस को क़ुरआन मुतवातिर कहा जाता है। ग़ैर मुस्लिम हदीसों से बहुत परिचित नहीं हैं मगर मुसलमानों के जीवन व्यवहार हदीस से ही निर्देशित होते हैं। हदीसों में मुसलमानों के खाने-पीने, मल-मूत्र त्यागने, स्नान करने, सैक्स करने, औरतों-गुलामों-लौंडियों के साथ व्यवहार, कपड़े पहनने-उतारने, जिहाद, जिहाद में ग़ैर-मुस्लिमों से लूटे गए माल {औरतों, बच्चों सहित } के बँटवारे, शिकार, श्रृंगार, शायरों, कुत्तों, छिपकलियों, गिरगिटों, चीटियों, क़यामत अर्थात दुनिया जहान के बारे में मुहम्मद के फ़ैसले, घोषणायें हैं। यह सारे फ़ैसले प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन में उतारने अनिवार्य हैं। इसी का नाम इस्लाम है।
प्रत्येक मुसलमान से अपेक्षा होती है कि वो इन घोषणाओं, फैसलों पर कोई सवाल उठाये बिना इन्हें अपने जीवन में उतारे यानी मुहम्मद का शब्दशः अनुसरण करे। इस्लाम में बुद्धि, जिज्ञासा, शंका का कोई स्थान नहीं है या कहें कि वो तीसरे स्थान पर आती है। बुद्धि, जिज्ञासा, शंका सदैव क़ुरआन और हदीस के संदर्भ में ही कार्य कर सकती हैं। मुहम्मद का जीवन प्रत्येक दृष्टि से इतना पाक और अनुकरणीय बताया जाता है कि उस पर सवाल उठाना किसी इस्लामी देश में क्या भारत, फ़्रांस, ब्रिटेन में भी मृत्यु को आमंत्रण देना हो सकता है। स्वयं क़ुरआन में सूरा अल अहज़ाब में 36वीं आयत घोषणा करती है "और न किसी ईमान वाले पुरुष को और न किसी ईमान वाली स्त्री को यह हक़ है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी बात का फ़ैसला कर दें तो उन्हें अपने मामले में कोई अधिकार रहे और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुला गुमराही में पड़ गया"
इस्लामियों के लिये मुहम्मद का जीवन अल्लाह के वचनों की साक्षात् अभिव्यक्ति है। इस्लाम में दीन और दौला अंतर्गुम्फित हैं। यह राजनैतिक और सामरिक व्यवहार है। शासन तंत्र से इसका गहन संबंध है। हदीसों का संकलन मुहम्मद इस्माईल अल बुख़ारी, मुस्लिम इब्नुल हज्जाज़, अबू ईसा मुहम्मद अत तिरमिज़ी, अबू दाऊद अस-सज़िस्तानी आदि ने किया। इनमें बुख़ारी और मुस्लिम सर्वाधिक प्रतिष्ठित और मान्य हैं। हदीस और क़ुरआन के प्रकाश में ही इस्लामियों के फ़ैसले लिये जाते हैं या लिये जाने चाहिये।
आपको इमराना कांड स्मरण होगा। छह जून 2005 को हुई यह घटना में मुज़फ़्फ़रनगर की इमराना ने आरोप लगाया था कि उसके ससुर ने उस के साथ बलात्कार किया है। न्याय की दृष्टि से अक़्ल को बिल्कुल ताक़ पर रखते हुए मौलवियों ने फ़तवा दिया था कि बलात्कार के बाद इमराना को अपने पति को अपना बेटा मानना होगा क्योंकि उसका निकाह ख़ारिज हो चुका है। सारे हाहाकार के बाद भी यह बात चर्चा में नहीं आयी कि इस फ़तवे का आधार क़ुरआन और हदीस ही थीं। अल्लाह के पैग़ंबर ने स्वयं अपने गोद लिये बेटे ज़ैद की बीबी ज़ैनब से निकाह किया था। इसकी छूट स्वयं अल्लाह ने अपने पैग़ंबर को क़ुरआनी आयत भेज कर दी। इस प्रकार किसी इस्लामी ससुर के लिये अपने बेटे की बीबी यानी अपनी बहू से निकाह जायज़ है।
एयर इंडिया हैदराबाद की घटना भी यही है। इममें एक 60-62 साल का शेख़ एक 9 साल की बच्ची के साथ प्लेन में बैठा था। बच्ची रो रही थी। एयर होस्टेस ने लड़की से बात करनी चाही तो शेख़ ने हस्तक्षेप किया और बताया कि ये मेरी बीबी है। एयर होस्टेस ने पुलिस बुला ली और शेख़ को पकड़वा दिया। 30-35 साल पुरानी इस घटना पर बहुत हंगामा मचा मगर यह बात छुपा ली गयी थी कि कुछ दिन बाद वो शेख़ अपनी बच्ची-बेगम को ले कर अरब चला गया। यह भी इसी लिये सम्भव हुआ कि हदीसों के अनुसार स्वयं अल्लाह के पैग़ंबर ने 51 बरस की आयु में 6 बरस की आयशा से निकाह किया था और 3 वर्ष बाद जब आयशा 9 बरस की हुईं और स्वयं 54 बरस के हुए तो शारीरिक संबंध स्थापित किये।
Narrated Hisham's father:
Khadija died three years before the Prophet departed to Medina. He stayed there for two years or so and then he married 'Aisha when she was a girl of six years of age, and he consummated that marriage when she was nine years old. (Sahih Al-Bukhari, Volume 5, Book 58, Number 236)
Narrated 'Aisha:
that the Prophet married her when she was six years old and he consummated his marriage when she was nine years old, and then she remained with him for nine years (i.e., till his death). (Sahih Al-Bukhari, Volume 7, Book 62, Number 64; see also Numbers 65 and 88)
Aisha said: The Apostle of Allah (may peace be upon him) married me when I was seven years old. The narrator Sulaiman said: Or six years. He had intercourse with me when I was nine years old. (Sunan Abu Dawud, Number 2116)
शंकाओं, प्रश्नों को रोकने के लिये तलवार का भय दिखाया जाता है। आतंक फैलाया जाता है। 1981 में एक तक़रीर में इमाम ख़ुमैनी ने कहा था "मेहराब {मस्जिद} का मतलब है जंग की जगह। मेहराबों से जंग आगे बढ़नी चाहिये। जैसा कि इस्लाम की सभी जंगों की कार्यवाही मेहराबों से शुरू हुई। रसूल के पास दुश्मनों को मरने के लिये तलवार थी.हमारे पवित्र इमाम लड़ाका रहे हैं। वे सब फ़ौजी थे। वो लोगों की हत्याएं करते थे। हमें एक ख़लीफ़ा की ज़रूरत जो हाथों को काट सके, सिर धड़ से उड़ा सके और पत्थर मार मार कर लोगों की हत्या का हुक्म दे सके"
चौदह सौ वर्ष पुराने दीन इस्लाम की कल्पना इस रूप में हुई थी कि संसार को मसलमान बना लिया जायेगा। वो अब तक नहीं बना मगर अरब में तेल की खोज के बाद यह मिशन पुनर्जीवित हो उठा है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि सभी जगहों के मुसलमानों को कट्टर मुसलमान बनाने, बचे हुए काफ़िरों को मुसलमान बनाने अर्थात ईमान की दावत देने का कार्य ज़ोर शोर से चला रहा है। तब्लीग़ी जमात यही कर रही है।
इस्लाम स्वभाव से ही कठमुल्लावादी बल्कि उद्धत, आक्रामक कठमुल्लावादी प्रकृति का है। अल्लाह के पैग़ंबर मुहम्मद का अंतिम ख़ुत्बा है कि " आज से तुम्हारा दीन मुकम्मल हो गया" यानी मनुष्य के आचार-विचार सदैव के लिये क़ुरआन और हदीस की दृष्टि से तय कर दिए गए। उसमें कोई परिवर्तन अब नहीं हो सकता। तब्लीग़ी जमात, देवबंदी मदरसे ही हैं जो भारत, बांग्लादेश, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, फ़्रांस, इंग्लैण्ड, जर्मनी, बेल्जियम आदि विभिन्न देशों में जनसांख्यकीय परिवर्तन कर रहे हैं, जिन्होंने ग़ैर मुस्लिम देशों के नेतृत्व को इस्लामी दबाव में लिया है, जो दारुल हरब को दारुल इस्लाम बनाने के एजेंडे पर रात-दिन लगे हुए हैं।
इस्लाम किसी भी ग़ैरइस्लामी व्यवस्था, विश्वास, सत्ता को काफ़िर मानता है अतः ग़ैरइस्लामी व्यवस्था की आज्ञा का पालन करना, उसकी बात मानना कुफ़्र समझता है। फिर हाथ मिलाना, फूंकना, थूक आँखों पर लगाना, मुँह पर मलना, ज़बान चूसना तो अल्लाह के पैग़ंबर की परम्परा, व्यवहार है। इस्लाम की तब्लीग़ करने वाले अपने लोगों को मानसिक रूप से कुंद करते हैं और इसका सदियों का आज़माया हुआ तरीक़ा लगातार आदेशों का पालन कराना है। मुसलमानों से कुछ सामान्य व्यवहार की बातें देखिये।
फर्श पर बैठना खाना फ़र्श पर बैठ कर खाना, दायें हाथ से ही खाना, खाते समय चुप नहीं रहना, तीन उँगलियों से खाना खाने के बाद उँगलियाँ ज़रूर चाटना, दायें हाथ से पानी पीना, बायें हाथ से शैतान पानी पीता है, बैठ कर पानी पीना, हर घूँट को तीन साँस में पीना फिर बर्तन मुँह से हटाना, दाहिनी करवट सोना, दाहिनी हथेली दायें गाल के नीचे रख कर सोना, सोने से पहले सूरा इख़्लास सूरा फ़लक सूरा नास पढ़ना, इसके बाद तीन बाद बदन झटकना, कपड़ा पहनते समय दायें हिस्से से पहनना और उतारते समय बाएं हिस्से से उतारना, जूता पहनते समय पहले दाएं पैर का फिर बाएं पैर का जूता पहनना, शौचालय में जाते समय सर ढंका रखना, शौचालय में घुसते समय दुआ पढ़ना, शौचालय में पहले बाँया पैर रखना, शौचालय से बाहर आते समय पहले दाँया पैर निकालना, मस्जिद में जाते समय पहले दायाँ पैर निकालना और बाहर आते समय बाँया पैर रखना, नमाज़ से पहले पानी से तीन बार कुल्ला, चेहरे को तीन बार धोना, नाक के दोनों छेदों में तीन बार पानी डाल कर साफ़ करना, दाहिने हाथ की तीन बार कोहनी तक फिर बायें हाथ को तीन बार कोहनी तक साफ़ करना, भीगे हाथ से गले के चारों ओर साफ़ करना, भीगी हुई पहली ऊँगली से कान के भीतर और अंगूठे से बाहरी भाग की सफाई आदि आदि।
यह सूची बहुत लम्बी है। इन सब के पालन करने का दबाव इस्लामियों को हर समय आशंकित, चिंतित बनता है और वो हमेशा इस आशंका से ग्रसित रहते हैं कि कुछ ग़लती न हो जाये। यही कुंठाएं उनको सहज नहीं बनने देतीं। उन्हें हर समय जहन्नुम की आग का भी रहता है और वो इसकी भरपाई इस्लामियों की संख्या बढ़ाने पर जन्नत मिलने के आश्वासन, क़ुरआन कंठस्थ करने से जन्नत जाने का पुरस्कार से करते हैं। ऐसा नहीं है कि मुसलमान मदरसों के बालक प्रेमी वातावरण को नहीं जानते मगर तीन पीढ़ियों के लोगों के जन्नत जाने का मानसिक दबाव उन्हें अपने बच्चों को होम करने पर बाध्य करता है।
मानसिक रूप से इतने दास समूह से तभी कोई बुद्धिगम्य बात मनवाई जा सकती है जब इन कुढ़ब बातों को, कालबाह्य मानसिकता को तार्किक चुनौती दी जाये। यह कार्य आज से सौ वर्ष पहले इसी धरती पर हुआ था और ऋषि दयानंद सरस्वती जी द्वारा सत्यार्थ प्रकाश लिखी गयी थी। इस पुस्तक में ईसाईयत और इस्लाम का प्रखर खंडन है। इसका प्रचार साथ ही इस बात की महती आवश्यकता है कि इस अराष्ट्रीय समाज का नेतृत्व बदला जाये। जब तक यह नहीं होगा यह समूह राष्ट्र के पेट में बिना पचे पत्थर की तरह पड़ा रहेगा और रह रह कर पीड़ा देगा।
यह केवल पुलिस, प्रशासन की समस्या नहीं है बल्कि राष्ट्र को अराष्ट्रीय चिंतन द्वारा चुनौती है। इससे पूरी कठोरता से निबटना ही उपाय है
तुफ़ैल चतुर्वेदी

मंगलवार, फ़रवरी 18, 2020

स्तब्ध कर देने वाला खुलासा, कांग्रेस अज़मल कसाब को हिन्दू घोषित करने वाली थी..

स्तब्ध कर देने वाला खुलासा*

कर्नल पुरोहित का पाकिस्तान में जासूसी नेटवर्क इतना मजबूत था । कि आतंकी हाफिज सईद और लख्वी तक उनसे डरते थे ।
कर्नल पुरोहित 9 साल बाद नवी मुंबई की तालोजा जेल से रिहा हो गए हैं । उनकी रिहाई के बाद कई खुलासे सामने आ रहे हैं । एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा
डाटा वैज्ञानिक गौरव प्रधान ने किया है ।
#डॉक्टर गौरव प्रधान ने कई बड़े नेताओं पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं । जिनकी सत्यता की जांच की जानी बेहद जरूरी हो गयी है ।
2010 में होनी थी सोनिया गाँधी और हाफिज सईद की मुलाकात ?*
डॉक्टर प्रधान ने खुलासा किया है । कि 2010 में सोनिया गाँधी और हाफिज सईद की मुलाकात होनी थी । पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद इटालियन अम्मी से 2010 में मिलना चाहता था । मगर इटालियन अम्मी ने इंकार कर दिया क्योंकि इसमें काफी रिस्क था ।
वैसे सोनिया गांधी की आतंकियों से हमदर्दी कोई नयी बात नहीं है । इससे पहले पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी आजमगढ़ की चुनावी रैली में कबूल कर चुके हैं कि बाटला हाउस एनकाउंटर में आतंकियों के मारे जाने की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी रो पड़ी थी ।
#दाऊद को बचाने के लिए अजित डोवाल को करवाया गिरफ्तार ?*
डॉक्टर प्रधान ने ये भी खुलासा किया कि 2005 में सोनिया-मनमोहन की सरकार के दौरान आज के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया था । क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान मे बैठे दाऊद को मारने की पूरी योजना बना ली थी ।
#पाकिस्तान के कहने पर कर्नल पुरोहित को किया गिरफ्तार !*
डॉक्टर गौरव प्रधान ने ये भी खुलासा किया कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले से ठीक पहले ही कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया था । क्योंकि कर्नल पुरोहित सेना के जासूस थे । और 26/11 आतंकी हमले के प्लान के बारे में जानते थे ।
डॉ गौरव ने ये भी बताया कि कर्नल पुरोहित की पत्नी अपर्णा पुरोहित ने कहा था । कि पाकिस्तान चाहता था । कि कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार कर लिया जाए । और सोनिया-मनमोहन सरकार भी इसके बारे में विचार भी कर रही थी ।
अपने खुफिया मिशन के दौरान कर्नल पुरोहित पाकिस्तान के कई संवेदनशील और नापाक राज जान गए थे । कर्नल पुरोहित का बड़ा जासूसी नेटवर्क भी पाकिस्तान में खुफिया जानकारियां जुटा रहा था । इसीलिए पाकिस्तान कर्नल पुरोहित की कस्टडी की मांग कर रहा था ।
गौरव प्रधान ने आगे खुलासा किया कि पाकिस्तानी जनरल पाशा के कहने पर ही कर्नल पुरोहित को ठीक 26/11 आतंकी हमले से पहले गिरफ्तार कर लिया गया था । क्योंकि पाकिस्तानियों को शक था । कि कर्नल पुरोहित को इस आतंकी हमले की भनक लग चुकी थी । और वो हमले को विफल कर सकते थे ।
#कश्मीरी और काँग्रेसी नेता आतंकियों की मदद करते थे ।*
इसके बाद डॉक्टर प्रधान ने और भी ज्यादा सनसनीखेज खुलासे करते हुए बताया । कि कर्नल पुरोहित को पता चल गया था । कि एक कश्मीरी नेता जो जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री भी था । वो और काँग्रेसी नेता “मिया आज़ाद” (गुलाम नबी आज़ाद) एक ही गाड़ी में घुमते थे । और उनके साथ उसी गाडी में आतंकी भी घूमते थे । गाड़ी पर लाल बत्ती लगी होने के चलते किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती थी। इसी नेता की गाड़ी का इस्तेमाल करके 2005 से लेकर 2010 तक कश्मीर में पैसों की फंडिंग भी की गयी थी ।
*हिन्दू आतंकवाद जुमले को साबित करने की साजिश ?*
डॉक्टर गौरव प्रधान ने खुलासा किया कि 26/11 मुंबई हमले का पूरा षड्यंत्र हिन्दुओ को आतंकी घोषित करने के लिए पाकिस्तान ने रचा था । ताकि इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों पर से ध्यान हटाया जा सके । प्लान था कि आतंकी हमला करने के बाद सभी आतंकियों को मार दिया जाएगा और इस हमले को भी हिन्दू आतंकवाद से जोड़ दिया जाएगा ।
उन्होंने बताया कि “26/11 आरएसएस की साजिश” नाम की किताब तो पहले से छाप कर रख ली गयी थी । जिसका विमोचन कोंग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने खुद किया था । गौरव प्रधान ने खुलासा किया कि जब आतंकी मुंबई में घुसे, उससे पहले ही देश के कई नेता इसके बारे में जानते थे । और उन्होंने हेमंत करकरे को ख़ास निर्देश दिए थे । कि एक भी आतंकी ज़िंदा ना बचने पाए ।
मगर सिपाही तुकाराम ओम्बले ने कांग्रेस और पाकिस्तान की सारी योजना पर पानी फेर दिया । और आतंकी कसाब को जिन्दा पकड़ लिए गया । आतंकियों ने हेमंत करकरे को पहचाना नहीं और धोखे से उन्हें गोली मार दी ।
*पी चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, अहमद पटेल और सोनिया गांधी का साजिश में हाथ ?*
इस पूरी साजिश के पीछे डॉक्टर प्रधान ने पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम, पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और अहमद पटेल का नाम लिया । उन्होंने साजिश के पीछे इटालियन आंटी कहते हुए सोनिया गाँधी की और भी इशारा किया है ।
*लाल कृष्ण आडवाणी,नरेंद्र मोदी और बाल ठाकरे को मारने की साजिश?*
डॉक्टर प्रधान ने खुलासा किया कि मुद्रिक में पाकिस्तानियों और भारत के गद्दारों की एक मीटिंग हुई थी । पाकिस्तान भारत की सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसियों के बारे में जानना चाहता था । इसी मीटिंग में योजना रखी गयी कि बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को मार दिया जाये । मगर इटालियन माता ने इंकार कर दिया । क्योंकि 2009 के चुनाव आने वाले थे । और हिंदूवादी नेताओं के मारे जाने से कांग्रेस को चुनाव में नुक्सान होने का डर था ।
*मोदी को फंसाने के लिए असीमानंद पर दबाव ?*
उन्होंने आगे खुलासा किया कि 26/11 हमले का पूरा का पूरा प्लान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को आतंकी संगठन बताकर हिन्दू आतंकवाद को सिद्ध करने के मकसद से बनाया गया था ।इसी तरह समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में ब्लास्ट के बाद गिरफ्तार किये गए पाकिस्तानी आतंकी को छोड़ दिया गया ।और स्वामी असीमानंद को इस केस में फंसा दिया गया ।
स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार करके थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गयीं ।और उनसे कहा गया कि यदि इन यातनाओं से बचना है । तो गुजरात के एक बड़े बीजेपी नेता (नरेंद्र मोदी) का नाम ले लो । इंकार करने पर असीमानंद को और यातनाएं दी गयी । ऐसा ही साध्वी प्रज्ञा के साथ भी किया गया ।
योजना थी । कि 26/11 के आतंकी हमले में सभी आतंकियों को मार कर सारा इल्जाम आरएसएस पर लगा कर संघ को आतंकी संगठन घोषित किया जाएगा । इसके बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी इसी तरह के केस में फंसा दिया जाएगा । क्योंकि इटालियन माता 2004 से ही जानती थी । की ये दोनों उसके लिए बड़ा खतरा हैं ।
*10 सालों तक जनरल पाशा का था भारत पर राज ?*
गौरव प्रधान ने दावा किया कि दरअसल 2004 से 2014 तक देश में मनमोहन-सोनिया नहीं बल्कि पाक आईएसआई का जनरल पाशा राज कर रहा था । जो वो चाहता था । वही यहाँ होता था । डॉक्टर गौरव प्रधान ने बताया कि कर्नल पुरोहित का पाकिस्तान में काफी अच्छा जासूसी नेटवर्क था । जिसके कायल खुद अजित डोभाल भी थे । अजित डोभाल भी ये देखकर हैरान थे । कि कर्नल पुरोहित ने अपने इसी जासूसी नेटवर्क के दम पर सात बार पाकिस्तान की साजिशों और हमलों को विफल कर दिया था ।
डॉक्टर प्रधान ने ये खुलासा भी किया कि कर्नल पुरोहित का पाकिस्तान में जासूसी नेटवर्क इतना मजबूत था । कि आतंकी हाफिज सईद और लख्वी तक उनसे डरते थे । इसी डर से दोनों आतंकी आकाओं की सुरक्षा भी पाकिस्तान ने बढ़ा दी थी ।
कर्नल पुरोहित पाक खुफिया एजेंसी और पाक आतंकियों दोनों के निशाने पर थे । जनरल पाशा के इशारे पर कांग्रेस सरकार ने कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार कर जेल में डलवा दिया । और बेपनाह यातनाएं दी । पूरी कोशिश की गयी । कि इस देशभक्त सेना के अफसर को आतंकी घोषित कर दिया जाय।
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*जागो सोए हुए हिन्दुओं*

रविवार, जनवरी 05, 2020

ब्राह्मणों ने हमने पढने नहीं दिया। बामनों ने हमे लूट लिया.....

हाय रे दादा, हाय रे बाबा
ब्राह्मणों ने हमने पढने नहीं दिया।
बामनों ने हमे लूट लिया.....
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अब ये बताओ की आज से 500 साल पहले तुम्हे पढने की जरुरत क्या थी??
पढ़कर क्या तुम,
हल चलाना सीखते हो??
औजार बनाना सीखते हो??
गाय चराना सीखते हो??
बाल काटना सीखते हो??
शिल्पकारी सीखते हो??
कपडा बनाना सीखते हो??
मौसम का अनुमान लगाना सीखते हो??
बीज छीटना सीखते हो??
निराई-गुड़ाई सीखते हो??
फसल काटना सीखते हो??
गोबर का खाद बनाना सीखते हो??
दूध दुहना सीखते हो??
मक्खन निकालना सीखते हो??
घी निकालना सीखते हो??
सब्जी उगाना सीखते हो??
चमडे निकालना सीखते हो??
धातु निकालना सीखते हो??
घर बनाना सीखते हो??
झोपड़ी छाना सीखते हो??
लकड़ी काटना सीखते हो??
तलवार चलाना सीखते हो??
घुड़सवारी करना सीखते हो??
पहलवानी करना सीखते हो??
लट्ठ चलाना सीखते हो??
शहद निकालना सीखते हो??
शिकार करना सीखते हो??
जाल लगाना सीखते हो??
गहना बनाना सीखते हो??
सिलाई सीखते हो??
रंग अबीर बनाना सीखते हो??
मसाला बनाना सीखते हो??
खाना बनाना सीखते हो??
चित्र बनाना सीखते हो??
मूर्ती बनाना सीखते हो??
रथ-बग्गी चलाना सीखते हो??
तालाब बनाना सीखते हो??
बच्चे को पालना सीखते हो??
सन्गीत गाना सीखते हो??
मिठाई बनाना सीखते हो??
तेल निकालना सीखते हो??
मिट्टी के बर्तन बनाना सीखते हो??
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अब यह बताओ की यदि आप पढ़ लिखकर यह सब नहीं सीख सकते थे तो 1000-500 साल पहले आपको पढने की जरुरत क्या थी?
आखिर गांव मे रहने वाले लोग क्युं पढते??
क्युं अपना कीमती समय पढ़ने और अक्षरज्ञान मे जाया करते??
क्या आज से 1000-500 साल पहले अक्षरज्ञान हासिल करना कोई तर्कसंगत बात थी??
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आज से 1000-500 साल पहले पढने लिखने वाला केवल 2-4 काम ही कर सकता था।
वह किसी राजा का दरबारी बन सकता था।
वह किसी जमीन्दार के यहां मुनीम बन सकता था।
और यह दोनो काम नही कर पाया तो उसके पास एक ही काम बचता था और वह था दीक्षा देकर भीक्षा मांगना।
और यह सब धन्धा ग्रामीण व्यवस्था मे सम्भव ही नही था।
यह सब नगरीय शासकिय व्यवस्था के काम थे।
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इसलिये यह कहना बन्द करो की बामनों ने हमे पढने नहीं दिया।
तुमने इसलिये नहीं पढा क्युकिं तुम्हे न तो दरबारी बनना पसंद था, न मुनीम बनना पसंद था और भीक्षा मांगने मे स्वाभिमान आड़े आ रहा था। जितने गणित के ज्ञान की आवश्यकता थी वह घर मे ही मिल जाता था।
इसलिये यह शोर मचाना बन्द करो की बामनों ने हमे पढने नही दिया।
दरअसल तुमको अक्षरज्ञान और पढाई की जरुरत ही नहीं थी। इसलिये ग्रामीण व्यवस्था मे सबसे फालतू का काम यानी पढाई करने की फालतू की जहमत तुमने की ही नही।
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जैसे जैसे अंग्रेजों का शासन बढ़ता गया, वैसे वैसे पुरे देश मे केन्द्रीयकृत नगरीय शासकिय व्यवस्था का वर्चस्व फैलता गया। भारत की आत्मा गांव से शहर की ओर भागने लगी।
सुविधाएं और लोग भी शहर मे भागने लगे। फलस्वरूप इस नये व्यवस्था मे पढे लिखे लोगों का महत्व बढ़ता चला गया।
जब तक गांव मे रहने वाली किसान और कामगार जातियां यह बात समझकर खूद पढना लिखना शुरु करतीं तब तक दरबारी, मुनीम और भीक्षा मांगने वाले जातियों ने नये व्यवस्था मे अपना सिक्का जमा लिया।
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चाहे कोई कितना भी शोर मचा ले,
कितना भी झूठा साहित्य बाच ले,
कितना भी लोगों को पागल बना ले,
यहीं इस देश का सत्य था, है और रहेगा।
डॉ भूपेन्द्र सिंह
वरिष्ठ यादव चिन्तक

रविवार, नवंबर 24, 2019

हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ?

हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ? 



𝑻𝒉𝒆 𝑷𝒊𝒏𝒅𝒂𝒓𝒊
ये तस्वीर 1908 की है, अमृतसर के हरमंदिर साहेब की जिसे ईसाई वामपंथी गोल्डन टेंपल कहते है ।
अब आपके मन मे ये प्रश्न उठा कि हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे है वो भी सिख तीर्थ में ?
ज़रा इतिहास में चलते है।
सिखों के पहले गुरु गुरु नानक थे।
2-गुरु अंगददेव
3- गुरु अमरदास
4-गुरु रामदास
5- गुरु अर्जुनदेव
6- गुरु हरगोविंद
7- गुरु हरराय
8 - गुरु हरकिशन
9- गुरु तेगबहादुर
10- गुरु गोविंद सिंह

सभी गुरु के नाम मे #राम #अर्जुन #गोविंद यानी के कृष्ण व हर यानी के महादेव के नाम पर है।

जब औरँगजेब ने कश्मीर के पंडितो को इस्लाम स्वीकार करने के कहा तो कश्मीरी पंडित गुरू तेगबहादुर के पास मदद के लिये गए गुरु तेगबहादुर ने कहा जाओ औरंगजेब से कहना यदि गुरु तेगबहादुर मुसलमान बन गया तो हम भी मुसलमान बन जायगे ये बात पंडित औरंगजेब तक पहुंचा देते है।

औरंगजेब गुरु तेगबहादुर को दिल्ली बुलाकर मुसलमान बनने के लिए कहते गुरु द्वारा अस्वीकार करने पर उन्हें यातना दे कर मार दिया जाता है।
अब प्रश्न ये की सिख हिन्दू से अलग है, तो कश्मीरी पंडितओ के लिए गुरु तेगबहादुर ने अपने प्राण क्यो दिए ?

गुरु गोविन्द सिंह का प्रिय शिष्य बंदा बहादुर ( लक्ष्मण दास ) भारद्वाज कुल का ब्राम्हण था। जिसने गुरु गोविन्द सिंह के बाद पंजाब में मुगलो की सेना से संघर्ष किया -
कृष्णा जी दत्त जैसे ब्राह्मण ने गुरु के सम्मान के लिए अपने सम्पूर्ण परिवार को कुर्बान कर दिया।

राजा रणजीत सिंह कांगड़ा के ज्वालामुखी देवी के भक्त थे।उन्होंने देवी मंदिर का पुर्ननिर्माण कराया -
आज भी कई सिख व्यापारियों की दुकानों में गणेश व देवी की मूर्ति रहती है आज भी सिख नवरात्रि में अपने घरों जोत जलाते है नवजोत सिंह सिद्धू के घर मे शिवलिंग की पूजा होती है

***

अब प्रश्न ये की सिख क्यों व कैसे हिन्दू से अलग कर दिए गए ?

1857 की क्रांति से डरे ईसाई ( अंग्रेज़) ने हिन्दू समाज को को तोड़ने की साज़िश रची 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया।जिसका केंद्र पंजाब का लाहौर था।
स्वामी दयानंद ने ही सबसे पहले स्वराज्य की अवधारणा दी जब देश का नाम हिंदुस्तान तो ईसाईयों ( अंग्रेज़ ) का राज क्यों।
स्वामी दयानंद के इन विचारों से पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़ गयी। लाला हरदयाल लाला लाजपतराय सोहन सिंह भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह जैसे क्रांन्तिकारी नेता आर्य समाजी थे,अतः ईसाई मिशनरियों( अंग्रेजो) ने अभियान चलाया की सिख व हिन्दू अलग है ताकि पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर किया जा सके इसके लिए अंग्रेज़ समर्थक सिखों ने अभियान चलाया की सिख हिन्दू नही है,और अलग धर्म का दर्जा देने की मांग की ( जैसे आज कर्नाटक में ईसाई बने लिंगय्यात हिन्दू धर्म से अलग करने की मांग कर रहे है। ) ईसाई मिशनरियों ( अंग्रेज़) ने 1922 में गुरुद्वारा एक्ट पारित कर सिखों को हिन्दू से अलग कर उन्हें अलग धर्म का घोषित कर दिया आजादी के बाद गुलाब चचा ने इसे बनाये रखा
दोस्तो हिन्दू सिखों का खून एक है।🚩

गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 में खालसा( पवित्र) पंथ का गठन किया और कहा मै चारो वर्ण के लोगो को सिंह बना दूँगा।

" देश धर्म संस्कृति की रक्षा प्राण देकर ही नही प्राण लेकर भी की जाती है।"

📺𝐒𝐮𝐛𝐬𝐜𝐫𝐢𝐛𝐞: https://www.youtube.com/channel/UCCI5j_6mO-aUIFWHPlsBKoA

शनिवार, नवंबर 23, 2019

गाजी मियां - पीर या कातिल ?

गाजी मियां - पीर या कातिल ?
प्रसन्नता की बात है कि सभी मुसलमान पीर फकीरों की पोल प्रामाणिक हवालों के साथ खुल गयी है । चाहे वो अजमेर का फकीर हो या निजामुद्दीन का औलिया सभी यहां विदेशी मुसलमान हमलावरों के साथ आये और हिंदुओं का कत्ल और धर्मांतरण कराने के जिम्मेदार थे । ऐसा ही एक हिंदुओं का कातिल गाजी मियां है जिसकी बहराइच में स्थित दरगाह में लाखों हिंदू जाते हैं। उनको यह भी नही पता कि इस्लाम में काफिरों के कातिल को गाजी नाम देकर सम्मानित किया जाता है । इस लेख में इसी कातिल की चर्चा की जायेगी ।
गाजी मियां की पहली लूट :
गाजी मियां का पूरा नाम सैयद सालार मसऊद गाजी था जो गजनी के कुख्यात बादशाह महमूद गजनवी का रिश्ते में भांजा लगता था। गजनवी ने अजमेर नगर गाजी मियां के बाप सैयद सालार साहू को दे दिया था जहां गाजी मियां का जन्म हूआ । एक बार गाजी मियां ने गजनी पहुंचकर अपने मामा को हिंदुस्तान पर हमला करने , हिंदुओं को लूटने और जबरदस्ती मुसलमान बनाने की पट्टी पढाई। फिर क्या था ! मामा भांजे ने अस्सी हजार तीन सौ तुर्कों की सेना लेकर धावा बोल दिया। गाजी मियां ने नगरकोट और मथुरा को लूटकर गुजरात में जबरदस्त ऊधम मचाया । अनेक मदिर , मठ लूटकर , हजारों हिंदुओं का कत्ल कर , हीरे जवाहरात लूटकर मामा के साथ वापस गजनी चला गया।
गाजी मियां की दूसरी लूट :
पहली लूट के कुछ दिनों बाद उसके मामा बादशाह महमूद गजनवी ने अपने वजीर के कहने पर कुछ वजहों के चलते अपने भांजे को देश निकाले की सजा दे दी। कहीं कोई ठिकाना ना देख यह भाग कर फिर हिंदुस्तान आ गया जिसे चढाई का नाम दे दिया गया।
हिंदुस्तान के धर्मांतरित मुसलमानों ने गाजी मियां का साथ दिया। अबकी बार इसने सिंध में अर्जुन और मुल्तान में सेठ अनंगपाल को लूटा। दिल्ली, मेरठ और कन्नौज में लूटमार मचाते, हिंदुओं का कत्ल और उन्हें तलवार के जोर से मुसलमान बनाते वह बाराबंकी पहुंचा। यहां के पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल तथा नगर को लूटकर इसने यहां अपनी छावनी बनाई। यहां मुसलमानों की बड़ी सेना बनाकर इसने सैफुद्दीन को बहराइच, मीर हसन को महोबा, अजीजुद्दीन को गोपामऊ, अहमद मलिक को लखनऊ और मलिक फैज को बनारस जिहाद के तहत हिंदुओं का कत्ल , लूटमार, धर्मपरिवर्तन और उनकी औरतों का बलात्कार करने भेजा। यही कुरानिक जिहाद है। खानजादे , बंजारा,कुंजड़े, रंकी आदि जो पहले हिंदू थे मुसलमान हो गये पर आज भी हिंदुओं की तरह ही रहते हैं। समय की मांग है कि अब इन सबकी घर वापसी करवा लेनी चाहिये ।
राजा सुहेलदेव पासी व गाजी मियां का युध्द:
कड़ा मानिकपुर के वीर हिंदुओं ने गाजी मियां की सेना से कड़ा युध्द किया। कड़ा मानिकपुर का राजपरिवार अनेक हिंदुओं के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ लेकिन बहराइच में लड़ाई होती रही। सैफुद्दीन की हार होते जानकर गाजी मियां बहराइच में आकर लड़ने लगा। लेकिन वीर हिंदुओं के सामने गाजी मियां की एक ना चली । उसकी हार पर हार होती रही और उसकी सेना के सिकंदर, बरहना, मातुल, रजब, हठीले, इब्राहीम आदि सभी सभी योध्दा मारे गये । गाजी मियां एक महुये के पेड़ के नीचे ठहर कर लड़ने लगा। तभी महाराज सुहेलदेव जी ने एक बाण ऐसा तानकर मारा कि गाजी मियां अपनी घोड़ी लल्ली से नीचे गिरकर कुटिला (टेढ़ी) नदी के किनारे महुये के पेड़ के नीचे गिरकर मर गया।
गाजी मियां की दरगाह :
गाजी मियां सन 1034 में मारा गया। इसके मारे जाने के 317 साल बाद सन 1351 में फिरोज तुगलक ने अपनी मां के कहने पर इसकी मजार बनवाई। मजे की बात यह है कि मारे जाने के बाद इसकी लाश का क्या हुआ किसी को आजतक कुछ नही पता । जहां तुगलक ने इसकी दरगाह बनवाई वहां हिंदुओं का पवित्र बालार्क तीर्थ था और एक पवित्र सूर्यकुंड भी जहां ज्येष्ठ मास में स्नान का प्रसिध्द मेला लगता था। जब तुगलक को खोज के बाद भी गाजी मियां की लाश या कब्र का कुछ पता न चला तो कुछ मुसलमानों के यह कहने पर कि इसकी लाश को सूर्यकुंड में फेंक दिया गया था उसने कुंड को पाटकर गाजी मियां की दरगाह बनवा दी जो आज भी वहां मौजूद है।
हिंदू कभी अपने पवित्र कुंड में, जहां वो श्रध्दा से स्नान करते हैं, अपने दुश्मन की लाश भी नहीं डाल सकते। लेकिन एक बहाना ढ़ूंढ लिया गया। इस कब्र में गाजी मियां की लाश है ही नही जो जांच में भी साबित हो जायेगी। कुंड में हिंदुओं का जो मेला लगता था उसे मुसलमानों ने गाजी मियां की पूजा के मेले का रंग दे दिया। बौध्दों के पुराने मंदिर का नाम बदलकर 'कदम रसूल' कर दिया, शंकर भगवान के त्रिशूल को मुसलमान गाजी मियां की 'सांग ' कहने लगे। हिंदुओं को इसपर गम्भीरता से विचार करना चाहिये कि हिंदू मेला और तीर्थस्थान को गाजी मियां की दरगाह और पूजा का रूप दे दिया गया है। अत: एक भी हिंदू वहाँ ना जाकर इसे वापस लेने का आंदोलन शुरू करे।
गाजी मियां से जुड़ी गप्पें :
1- जुहरा बीबी रुदौली, जिला बाराबंकी, के एक तेली की अंधी लड़की थी। इसके मां बाप ने अधी होने के कारण इसे गाजी मियां की कब्र पर चढ़ा दिया था। मरने के बाद जुहरा भी वहीं दरगाह में दफना दी गयी । कुछ दिनों बाद जुहरा के घर वाले हर साल मरी हुयी जुहरा का गाजी मियां से ब्याह करने लगे। अभी भी जुहरा की पलंग पीढ़ी (डोली) रुदौली से दरगाह आती है और दोनों मरे हुओं का ब्याह हर साल होता है।
2- भूत भगाने का धधा :
दरगाह के एक ओर बरहना पीर के डंडे तार में बांधे हुये हैं और इनसे भूत भगाये जाते हैं।भूत अधिकतर औरतों को ही लगते हैं जो यहां भारी तादाद में पहुंचती हैं। जबकि बीते हुये काल को भूत कहते हैं। भूत ना तो किसी को लगता है और नही कोई भगाता है। लेकिन हिंदू औरतें इस बहकावे में आ जाती हैं।
3- कोढ़ी अच्छा करने का नाबदान :
दरगाह संगमरमर की बनी है। गाजी मियां की कब्र बीचों बीच है और अगल बगल जुहरा और उसके भाइयों की कब्रें हैँ। मरी हुयी जुहरा और गाजी के ब्याह के दिन कब्र को स्नान कराया जाता है। मैला पानी मोरी (नाबदान) में जमा हो जाता है। मेले के दिनों अनेक कोढी इसी गंदे नाबदान में आकर पड़े रहते हैं। सूर्यकुंड में पहले एक गर्म पानी का स्त्रोत था जिसमें नियमित स्नान करने से कोढ़ आदि अनेक चर्म रोग ठीक हो जाया करते थे। यह नाबदान उसी गर्म पानी के स्त्रोत की नकल है। अब देखिये कैसे कोढ़ ठीक होता है ? इन्हीं कोढ़ियों के बीच में योजनाबध्द तरीके से अचानक कभी कभी स्वस्थ मुसलमान कोढी होने का नाटक कर कूद जाते हैं, जो काया पावा, काया पावा (कोढ़ अच्छा हो गया) कहकर उछलते,कूदते और चिल्लाते हैं। यह शोर मेले भर में फैलाया जाता है कि गाजी मियां ने कोढ़ी का कोढ़ अच्छा कर दिया। हिंदू फिर गाजी मियां को करामाती देवता समझने लगते हैं।
जबकि गाजी ना कोई देवता है और ना ही उसमें कोई करामात है। उसे मरे 900 साल से भी अधिक हो गये। उसकी कब्र का भी कुछ पता नहीं है। कहीं होगी तो एक भी हड्डी सलामत नहीं बची होगी। कब्र पर ऐसा नाटक मुजावर और डफाली ही करते हैं ताकि हिंदुओं से पैसा ऐंठा जाये और उन्हें मुसलमान भी बना लिया जाये। ऐसे ही गाजी मियां जैसे हिंदुओं के कातिल पीर , मदार आदि की पूजा के बहानें हर साल लाखों हिंदू मुसलमान बनाये जा रहे हैं।
4- मामा भांजे की लड़ाई :
डफाली मेले में कहते फिरते हैं कि यह मामा भांजे की लड़ाई, गाजी मियां लक्ष्मण के अवतार थे और गाय बचाने की लड़ाई में मारे गये थे। डफालियों की यह बात सरासर झूठी है। मामा भांजे की लड़ाई नहीं, महमूद गजनवी और गाजी मियां ही मामा भांजे लगते थे जिन्होंने हिंदुओं को मारा, सताया और कत्ल किया। गाजी मियां लक्ष्मण का अवतार नहीं बल्कि दरिंदा मुसलमान था। गाय बचाने की कौन कहे, उसने तो खूद गायों और हिंदुओं का कत्ल ए आम किया था। किसी भी हिंदू को डफाली, मुजाफर फकीर आदि के बहकावे में कभी नहीं आना चाहिये ।
डफालियों की करतूत :
डफाली बाल लगा हुआ एक झंडा लिये रहते हैं जिससे हिंदू लड़कों, औरतों और बीमारों को झाडते फूंकते और गाजी मियां की तारीफ के गाने गाते हैं। इस झंडे की हकीकत यह है कि जब गाजी मियां तलवार के जोर पर हिंदुओं को मुसलमान बनाता था तो उनकी चोटियां काटकर एक झंडा बना लेता था। डफाली गाजी मियां की यही नकल करते हैं और अपने झंडे के बालों को सुरा गाय की पूंछ बताते हैं। अब ये अपने झंडों को सुरा गाय की पूंछ ना कहें तो तो कहें क्या ? अगर हिंदुओं को मालूम हो जाये कि यह बाल उनके पुरखों की चोटियां या नकल है तो भला कौन हिंदू इन्हें अपने दरवाजे पर खड़ा होने देगा ?
डफाली हिंदुओं को समझाते फिरते हैं कि गाजी मियां औलाद देते हैं, उनको पूजने से लड़के नहीं मरते , बड़ी बरक्कत होती है। अब जब इस दरिंदे की पोल खूल ही चुकी है तो हर पढ़े लिखे हिंदू को चाहिये वह गांव देहात के हर गरीब भोले भाले हिंदु भाई बहनों को समझा दे कि यह सारी बातें झूठी हैं। गाजी उनके पुरखों का कातिल था और इसकी फर्जी दरगाह सूर्यकुंड पर बनी है। डफालियों से कोई पूछे अगर ऐसा है तो गाजी मियां और उसके साथी कैसे मर गये ? अभी भी रोज कितने ही मुसलमान बीमार होकर मरते हैं, डफाली इन मुसलमानों से पूजा क्यों नहीं करवाते ? क्या गाजी मियां की पूजा का असर हिंदुओं पर ही अधिक होता है जो सारे मुसलमान डफाली , फकीर, मुजावर सिर्फ हिंदुओं के पीछे ही लगे रहते हैं ? सच तो यह है कि गाजी मियां, शहीद मर्द, पीर मजार, मस्जिद की फूंक भीख मांगने आदि का बहाना कर ये धूर्त आजतक हिंदुओं को मुसलमान बनाये जा रहे
हिंदू जागने लगा है :
बहुत से हिंदुओं ने अब गाजी मियां , ताजिया, पीर, मजार आदि मुसलमानी कब्रों को पूजना छोड़ दी है। बाकी लोग भी धीमें धीमें समझ रहे हैं कि गाजी मियां हिंदुओं और गौ माता का हत्यारा था और उसकी पूजा उन्हें नहीं करनी चाहिये। यह देखकर डफालियों को परेशानी हो रही है और नित नये नये हथकंडों से हिंदुओं को बहका और डरा रहे हैं कि तुम्हारे पुरखे गाजी मियां को पूजते थे। अब अगर तुम उनको नहीं पूजोगे तो गाजी मियां नाखुश होकर तुम्हारे बाल बच्चों का बुरा हाल कर देंगे। समस्त हिंदुओं को समझ लेना चाहिये कि इन शातिर मुसलमान पीरों की कब्र में सड़ी गली हड्डियां किसी काम की नहीं हैं। ये खूद को सड़ने गलने से बचा नहीं पायीं तो हिंदुओं का क्या खाक करेंगी !
इसबात को समझाने के लिये बस एक उदाहरण काफी है। सुल्तानपुर के दलित हिन्दू सम्पती ने पिछले कई साल से गाजी मियां की पूजा बिल्कुल बंद कर दी है । अपने घर से गाजी मियां की चौकी भी खोदकर बाहर फेंक दी है। जब डफाली रवाना बजाते हुये उसके घर आये तो उसने फटकार कर कह दिया कि-
"जाओ, मैं नहीँ पूजता तुम्हारे गाजी मियां को। मुझे मालूम चल गया है कि गाजी मियां कौन था और उसने हिंदुओं के साथ क्या क्या अत्याचार किया है ।"
डफालियों ने सम्पती को बहुत डराया धमकाया और समझाया पर उसने एक ना सुनी। अब न वो गाजी मियां की पूजा करता है और ना ही किसी कब्र, ताजिया आदि पर चढ़ाई रेवड़ी, बताशा, शर्बत, मलीदा आदि ही खाता है। दस साल में उसके तीन लड़के हुये जो सब स्वस्थ और प्रसन्न हैं। गाजी मियां उसकी किसी भी संतान का एक बाल तक टेढ़ा नही कर पाया।
गाजी मियां की पूजा किसी भी हिंदू को भूलकर नहीं करनी चाहिये। परम पिता परमेश्वर को प्रेम से पूजो ओर धर्म कर्म से रहो तो फिर देखो , एक गाजी मियां की कौन कहे, बीस गाजी मियां और समस्त मुसलमान पीरों की कब्र में सड़ी गली हड्डियां मिलकर भी किसी हिंदू का एक बाल भी टेढ़ा नहीं कर सकतीं। ऐसा ही सारे हिंदुओं को समझा देना चाहिये। सदियों से गाजी मियां और वीर हिंदुओं के बीच हुये युध्द पर गावों में गाये जा रहे आल्हा का आनंद लेते हुये बोलिये :
' सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय !'
' गाजी मियां की पूजा और हिंदू '
- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय

रविवार, नवंबर 10, 2019

सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?

सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?
सिख , हिन्दू नहीं होते है , इस फर्ज़ीवाड़े को सबसे पहले गढ़ने वाला मैक्स आर्थर मेकलीफ़ ( Max Arthur Macauliffe) था ।
यह गुरुमुखी का विद्वान भी था जिसने Guru Granth Sahib का English translation भी किया था ।
Max Arthur Macauliffe जिसे सिख पंथ को एक धार्मिक संस्था का रूप दिया था का हिंदूइस्म के विषय में क्या विचार थे जरा ध्यान दे-
It (Hinduism) is like the boa constrictor of the Indian forests. When a petty enemy appears to worry it, it winds round its opponent, crushes it in its folds, and finally causes it to disappear in its capacious interior....Hinduism has embraced Sikhism in its folds; the still comparatively young religion is making a vigorous struggle for life, but its ultimate destruction is, it is apprehended, inevitable without State support.
【 हिंदी अनुवाद - यह (हिंदू धर्म) भारतीय जंगलों का Boa Constrictor (उष्णकटिबंधीय अमेरिका का एक बड़ा और
शक्तिशाली सर्प, कभी-कभी बीस या तीस फुट लंबा ) की तरह है। जब एक छोटा विरोधी इसकी चिंता करता प्रतीत होता है, तो यह अपने प्रतिद्वंद्वी के चारों ओर घूमता है, इसे अपने लपेटे में ले लेता है, और आखिरकार इसे अपने विशालता में गायब कर देता है .... हिंदू धर्म ने सिख धर्म को अपने लपेटे में लिया है; अभी भी तुलनात्मक रूप से यह युवा धर्म जीवन के लिए एक सशक्त संघर्ष कर रहा है, लेकिन इसका अंतिम विनाश यह है कि इसे राज्य समर्थन के बिना अपरिहार्य माना जाता है। 】
Max Arthur Macauliffe 1864 मे इंडियन सिविल सर्विसेज से पंजाब में आया था। 1882 में ये पंजाब का डिप्टी कमीशनर बना।
मेकलीफ़ वो पहला इंसान था जिसने सिख हिन्दू नहीं है कि परिकल्पना की थी। उसने देखा कि सिख एक मार्शल कौम है। इसलिए सिख आर्मी के लिए उपयुक्त है।
इसलिए इन्होंने पंजाब मे आर्मी की नौकरी में सिखों के लिए आरक्षण लागु कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप कोई भी राम कुमार सरकारी नौकरी नही पा सकता था पर वही राम कुमार दाड़ी मूछ और पगडी रखकर राम सिंह बनकर नौकरी पा सकता था। उस समय तक इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाता था।
इसका नतीजा ये हुआ कि पंजाब मे सिख population 1881 से 1891 के बीच 8.5% बढी।
1891 से 1901 के बीच 14% बढी।
1901 से 1911 के बीच 37% बढी।
1911 से 1921 के बीच 8% बढी।
इनके पंजाबी के ट्यूटर थे Kahn Singh Nabha जिन्होने 1889 मे "हम हिन्दू नहीं" नामक पुस्तक लिखी । जिसको Macauliffe जी ने फंड किया ।
1909 मे खुद Macauliffe साहब ने भी Sikh religion: Its Gurus, Sacred writings, and authors नामक पुस्तक लिखी । जिसकी भूमिका में इन्होंने ये भी बताया है कि किस तरह इन्होंने खालसा पूजा पद्यति आरम्भ की और सिखो के लिए आर्मी में अलग शपथ परम्परा की शुरुआत की ।
इस समय तक गुरूद्वारो ( दरबार) महंतो और साधुओं की देखरेख मे होते थे। गुरूद्वारो के लिए महंतो और हिन्दु पुरोहित की जगह खालसा सिखो की प्रबंधक कमेटी का विचार भी इन्हीं का था। इन गुरूद्वारो से जुड़ी हुई जमीन और सम्पत्ति भी थी।
1920 के शुरूआत से महंतो से गुरूद्वारो को छीनने का अकाली दल का सिलसिला चालू हुआ। इसके लिए महंतो पर तरह तरह के आरोप लगाकर( महिलाओ से दुष्कर्म, गलत कर्मकांड आदि) उन्हे बदनाम किया गया, जनता मे उनके खिलाफ छवि बनाई गयी।
सबसे पहले बाबे दी बेर गुरूद्वारा, सियालकोट जो एक महंत की विधवा की देखरेख मे था, बलपूर्वक कब्जाया गया।
फिर हरमंदिर साहिब ( स्वर्ण मंदिर) छीना गया। फिर गुरूद्वारा पंजा साहिब कब्जाया गया। इसका कब्जे के विरोध 5-6 हजार लोगो ने गुरूद्वारा घेर लिया जिन्हे पुलिस ने बलपूर्वक हटाया।
फिर गुरूद्वारा सच्चा सौदा, गुरूद्वारा तरन तारन साहिब आदि महंतो पर आरोप लगा पुलिस के सहयोग से कब्जाये गये।
इन कब्जो के लिए महंतो को पीटा गया उनकी हत्यारे की गई। जिसके लिए बाकायदा बब्बर अकाली नामक दल का गठनकर मूवमेंट चलाया गया।
ननकाना साहिब गुरूद्वारे पर कब्जा सबसे अधिक बडा खूनी इतिहास है। जिसमे दोनो के कई सैकडो लोग तक मारे गये।
फिर गुरूद्वारा गंजसर नाभा और कई अन्य हिसंक तरीके एवं पुलिस के सहयोग से महंतो से छीने गये।
1925 मे सिख गुरूद्वारा बिल पारित हुआ और कानून बना कर गुरूद्वारो के कब्जे खालसा सिखो को दिये गये। SGPC का गठन हुआ।
फिर एक रेहता मर्यादा बनाई गई जो तय करती है कि कौन सिख है और कौन नही। जिसका पूर्णरूपेण उद्देश्य सिख से हिन्दू विघटन निकाला है।
SGPC के तत्वावधान मे सिख इतिहास को नये सिरे से लिखा गया। हिन्दू परछाई को को सिख मे से जितना हो सके अलग किया गया। नये नये हिन्दू ( खासकर ब्राह्मण) विलेन कैरेक्टर सिख इतिहास में घड़े गए।
पंजाबी मे पारसी भाषा के शब्दो का अधिकधिक प्रयोग किया गया। गंगू बामन और स्वर्ण मंदिर की नीव मुसलमान के हाथो रखवाना, जिसका इससे पहले कोई प्रमाण और इतिहास नही है, घडे गये और इनका प्रचार किया गया ।
गुरू गोविंद सिंह जी की वाणी दशम ग्रंथ मे चंडी दी वार और विचित्र नाटक को इसमे ब्राह्मणी मिलावट घोषित किया गया।
हकीकत राय, सति दास, मति दास, भाई दयाल आदि के बलिदानों को सिखों के बलिदान बताकर प्रचारित किया गया। जबकि इनके वंशज तो आज की तारीख मे भी हिन्दू है।
बंदा बहादुर जिसका की उस समय तत खालसा बनाकर विरोध किया गया और मुग़लों से मिलकर मिलकर उसे पकड़वाया गया था। SGPC आज उसे सिख हीरो के रूप में बताती है।
निर्मली अखाडा जोकि गुरू गोविंद सिंह जी का ही डाला हुआ है और संस्कृत एवं वेदांत के प्रचार प्रसार को समर्पित है हिन्दू विरोध की खातिर इस तक को SGPC ने सिख इतिहास से नकार दिया।
गुरू नानक के पुत्र थे श्रीचंद जोकि अपने समय कै महानतम और प्रसिद्ध योगी थे ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी।
गुरू राम राय जोकि गुरू हर राय के बडे पुत्र थे ने देहरादून मे अपनी गद्दी स्थापित की। इनकी जगह इनके छोटे भाई कृष्ण राय ने पिता की गद्दी सम्भाली और अगले सिख गुरू कहलाये।
ये सभी अखाडे आज भी महंतो द्वारा संचालित है। समाज सेवा मे है।
आनंद मैरिज एक्ट पास कर सिखों के लिए अलग से विवाह पद्यति आरम्भ की गई। अन्यथा 1920 से पहले तक तो हिन्दू पुरोहित ही सिख घरों में विवाह आदि वैदिक संस्कार करवाने जाते थे।
पर Max Arthur Macauliffe की नीति जिससे एक अलग खालसा सिख पंथ की नीव पड़ी की परिणति खालिस्तान आन्दोलन के रूप में सामने आई। बब्बर खालसा उग्रवादियों ने करीब 50000 हजार निरपराध हिन्दुओं की हत्या कर दी। अवसरवादी राजनीती के चलते इन हत्याओ को इस देश ने भुला दिया।
सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है "गुरु ग्रन्थ साहिब" इसको आप उठाकर पढ़ेंगे और देखेंगे तो इसमें "हरी" शब्द 8 हज़ार से भी अधिक बार इस्तेमाल किया गया है, वहीँ "राम" शब्द 2500 से अधिक बार, जबकि "वाहेगुरु" शब्द मात्र 17 बार गुरु ग्रन्थ साहिब को ही अब सिखों का गुरु माना जाता है, चूँकि सिख के आखिरी गुरु गोबिंद सिंह ने इसे ही आगे के लिए गुरु घोषित किया था।
गोविन्द सिंह का तो नाम भी "गोविन्द है" और "सिंह" हिन्दू उपनाम है, जो सिख समूह के बनने से पहले से ही हिन्दू इस्तेमाल करते आये है ।
खालिस्तानी वो लोग हैं जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज हिंदुओं की बानी के बावजूद अपने ही धर्म ग्रन्थ को झुठला कर कहते हैं कि "यह वो राम , वो। कृष्णा, वो जगदीश " नहीं हैं। अपने ही दसवें गुरु के लिखे चण्डी दी वार " चढ़ मैदान चण्डी महिषासुर नु मारे" को झुठलाते हैं। "देव शिवा वर मोहे इहे" को झुठलाते हैं। लाखों खालिस्तानी है आज, इनका पूरा गैंग सक्रिय है, कनाडा, ब्रिटैन जैसे देशों में तो इनका पूरा गैंग ही सक्रिय है, और पाकिस्तान से इनकी बड़ी मित्रता है
ये हिन्दुओ को गाली देते है । ये हिन्दुओ की ही संतान, इन सभी के पूर्वज हिन्दू ही थे, स्वयं नानक भी पैदा होते हुए हिन्दू थे
उनके पिता का नाम कालू चंद, (कालू, कल्याण मेहता) था ।
और ये खालिस्तानी हिन्दुओ को गाली देते है, इन खालिस्तानियों को औरंगजेब और पाकिस्तान प्यारा है ।
आईये इस अलगववदवादी मानसिकता से बचे। एकता में ही शक्ति है। यह सन्देश स्मरण करे।
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सलंग्न चित्र-पाकिस्तान में स्थित एक गुरूद्वारे का है जिसमें पाकिस्तान सरकार ने एक इस्लामिक स्कूल में परिवर्तित कर दिया।