शुक्रवार, जनवरी 12, 2018

प्राण जाय पर धर्म ना जाए

प्राण जाए पर धर्म न जाए! वह दलित-कन्या थी दुःख है यह सब स्वतंत्र भारत में हुआ।कांग्रेस यही करवा रही थी अपने शासन में। 23 फरवरी 1981 का दिन था वह, जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में डाॅक्टर नसरुद्दीन कमाल अपने साथियों के साथ एक दलित परिवार को बंधक बनाए हुए थे। घर के सभी लोगों ने इस्लाम कबूल लिया था, घर के लोग ही क्यों लगभग एक हजार दलित धर्मांतरण करके जबरन मुस्लिम बनाए चुके थे। इसलिए मीनाक्षीपुरम का नाम बदलकर रहमतनगर रख दिया गया था।यह दलित गिने चमार के घर की कहानी है। उसकी 8 वर्ष की पोत्री थी वैदेही...वह किसी भी कीमत पर मुस्लिम बनने को तैयार नहीं हुई, ‘‘मै मर जाऊंगी लेकिन कलमा नहीं पढ़ूंगी,’’ उसने अपने दादा से कहा था, ‘‘बाबा आपने ही तो मुझे गायत्री मंत्र सिखाया था ना...आपने ही तो बताया था कि यह परमेश्वर की वाणी वेदों का सबसे सुंदर मंत्र है, इससे सब मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं, फिर मैं उन लोगों का कलमा कैसे पढ़ सकती हूं, जिन्होंने मेरे सहपाठियों का कत्ल कर दिया, क्योंकि वे भी मुस्लिम नहीं बनना चाहते थे। हम ऐसे मजहब को कैसे अपना सकते हैं?, जिसे न अपनाने पर कत्ल का भय हो, मुझे तो गायत्री मंत्र प्रिय है जो मुझे निर्भय बनाता है।’’ ''बेटी जीवन रहेगा तो ही धर्म रहेगा ना...जिद छोड दे और कबूल कर ले इस्लाम।'' बाबा ने अंतिम प्रयास किया था। उसने बाबा से सवाल किया था, ''बाबा आपने एक दिन बताया था कि गुरु गोबिंद सिंह के दो बच्चे दीवार में जिंदा चिनवा दिए थे, लेकिन उन्होंने इस्लाम नहीं कबूला था, क्या मैं उन सिख भाइयो की छोटी बहन नहीं? जब वे धर्म से नहीं डिगे तो मैं कैसे डिग सकती हूं?''‘‘दो टके की लौंडी, कलमा पढ़ने से इंकार करती है,’ डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल के साथ खड़े मौलाना नुरूद्दीन खान ने उसके बाल पकड़ते हुए चूल्हे पर गर्म हो रहे पानी के टब में उसका मुंह डूबा दिया था। पानी भभक रहा था, इतना गर्म था कि बनती भाप धुंए के समान नजर आ रही थी। बालिका के चेहरे की चमड़ी निकल गई थी एक बार ही डुबोते, चीख पड़ी थी, ‘‘भगवान मुझे बचा लो?’’ ‘‘तेरा पत्थर का भगवान तुझे बचाने नहीं आएगा, अब तो इस्लाम कबूल ले लड़की, नहीं तो इस बार तुझे इस खोलते पानी में डुबा दिया जाएगा।’’ मौलवी ने कहा था, फिर उसके दादा ने भी कहा, ‘‘कबूल कर ले बेटी इस्लाम, हम भी सब मुसलमान बन चुके, तू जिंदा रहेगी तो तेरे सहारे मेरा भी बुढ़ापा भी कट जाएगा।’’ मौलवी ने चूल्हे के पास से मिर्च पाउडर उठाकर उसकी आंखों में भरते हुए और चेहरे पर मलते हुए कहा, ‘‘दूध के दांत टूटे नहीं, और इस्लाम नहीं कबूलेगी।’’एक बार फिर तड़प उठी थी वह मासूम, पर इस बार भी यही कह रही थी, ‘‘नहीं मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’ मौलवी को भी क्रोध आ गया था, इस बार तो उसका सिर जलते हुए चूल्हें में ही दे डाला था। परंतु प्राण त्यागते हुए भी उस बालिका के मुख से यही निकल रहा था, ‘‘मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’ अंतिम बार डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल की ओर आशा भरी दृष्टि से देखा था, ‘‘मेरा धर्म बचा लो...डाॅक्टर साहब...पत्थर के भगवान नहीं आएंगे, आज से मैंने तुझे भगवान मान लिया...’’।अब उसमें कुछ नहीं रहा था, वह तो मिट्टी बन चुकी थी, डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल भी तो धर्मांतरण करने वाले लोगों की मंडली में ही शामिल था, लेकिन उस बालिका ने पता नहीं उसमें क्या देखा कि विधर्मी से ही धर्म बचाने की गुहार लगा बैठी थी, उस असहाय बालिका का धर्म के प्रति दृढ़ निश्चय देखकर हृदय चीत्कार कर उठा था नसरूद्दीन कमाल का, ‘‘या अल्लाह ऐसे इस्लाम के ठेकेदारों से तो मर जाना अच्छा है।’’ वह घर की ओर भाग लिया था और डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल पूरे दस दिन अपने घर से नहीं निकला, कुछ खाया पीया नहीं, बस उस बालिका का ध्यान बराबर करता और आंखों में आंसू भर आते उसके...गायत्री मंत्र का अर्थ जानने के लिए उसने एक किताब खरीदी। गलती से वह नूरे हकीकत यानी सत्यार्थ प्रकाश थी। उसने उसका गहराई से अध्ययन किया और 11 नवंबर 1981 को एक जनसमूह के सामने विश्व हिन्दू परिषद और आर्य समाज के तत्वावधान में अपने पूरे परिवार के साथ वैदिक धर्म अंगीकार कर लिया। डाॅक्टर नसरूद्दीन ने अब अपना नाम रखा था आचार्य मित्रजीवन, पत्नी का नाम बेगम नुसरत जहां से श्रीमती श्रद्धादेवी और तीन पुत्रियों शमीम, शबनम और शीरीन का नाम क्रमशः आम्रपाली, अर्चना और अपराजिता रखा गया। 15 नवंबर 1981 को आर्य समाज सांताक्रुज, मुंबई में उनका जोरदार स्वागत हुआ, जहां उन्होंने केवल एक ही बात कही, ‘‘मैं वैदेही को तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन हिन्दू समाज से मेरी विनती है, मेरी बेटियों को वह अपनाए, वे हिन्दू परिवारों की बहू बनेंगी तो समझूंगा कि उस पाप का प्रायश्चित कर लिया, जो मेरी आंखों के सामने हुआ। हालांकि वह मैंने नहीं किया, लेकिन मैं भी दोषी था, क्योंकि मेरी आंखों के सामने एक मासूम बालिका की निर्मम हत्या कर दी गई।’’आचार्य मित्रजीवन ने अपना शेष जीवन वेदों के प्रचार-प्रसार में लगा दिया, इसलिए उन्हें आज बहुत से लोग जानते हैं, उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वे जन्म से मुस्लिम थे और यह तो कोई जानता ही नहीं कि वैदेही कौन थी? वेद वृक्ष की छाया तले, पुस्तक का एक अंश, लेखिका फरहाना ताज -----------स्रोत : वैदेही के संदर्भ के लिए देखें 24 फरवरी 1981 इंडियन एक्सप्रेस वैदिक गर्जना, मासिक पत्रिका 1982 साभार

रविवार, दिसंबर 31, 2017

बथुआ गुणों की खान

*सागो का सरदार है बथुवा*
*सबसे अच्छा आहार है बथुवा*
बथुवा अंग्रेजी में Lamb's Quarters, वैज्ञानिक नाम Chenopodium album.
साग और रायता बना कर बथुवा अनादि काल से खाया जाता रहा है लेकिन क्या आपको पता है कि विश्व की सबसे पुरानी महल बनाने की पुस्तक शिल्प शास्त्र में लिखा है कि *हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए प्लस्तर में बथुवा मिलाते थे* और हमारी बुढ़ियां *सिर से ढेरे व फांस (डैंड्रफ) साफ करने के लिए बथुवै के पानी से बाल धोया करती।* बथुवा गुणों की खान है और *भारत में ऐसी ऐसी जड़ी बूटियां हैं तभी तो मेरा भारत महान है।*
बथुवै में क्या क्या है?? मतलब कौन कौन से विटामिन और मिनरल्स??
तो सुने, बथुवे में क्या नहीं है?? *बथुवा विटामिन B1, B2, B3, B5, B6, B9 और विटामिन C से भरपूर है तथा बथुवे में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटाशियम, सोडियम व जिंक आदि मिनरल्स हैं। 100 ग्राम कच्चे बथुवे यानि पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं। कुल मिलाकर 43 Kcal होती है।*
जब बथुवा शीत (मट्ठा, लस्सी) या दही में मिला दिया जाता है तो *यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है* और साथ में बाजरे या मक्का की रोटी, मक्खन व गुड़ की डळी हो तो इस खाने के लिए देवता भी तरसते हैं।
जब हम बीमार होते हैं तो आजकल डॉक्टर सबसे पहले विटामिन की गोली ही खाने की सलाह देते हैं ना??? गर्भवती महिला को खासतौर पर विटामिन बी, सी व लोहे की गोली बताई जाती है और बथुवे में वो सबकुछ है ही, कहने का मतलब है कि *बथुवा पहलवानो से लेकर गर्भवती महिलाओं तक, बच्चों से लेकर बूढों तक, सबके लिए अमृत समान है।*
यह साग प्रतिदिन खाने से गुर्दों में पथरी नहीं होती। बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। बथुए के साग का सही मात्रा में सेवन किया जाए तो निरोग रहने के लिए सबसे उत्तम औषधि है। बथुए का सेवन कम से कम मसाले डालकर करें। नमक न मिलाएँ तो अच्छा है, यदि स्वाद के लिए मिलाना पड़े तो काला नमक मिलाएँ और देशी गाय के घी से छौंक लगाएँ। बथुए का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है तथा दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ नित्य सेवन करें। *बथुवै में जिंक होता है जो कि शुक्राणुवर्धक है मतलब किसी भाई को जिस्मानी कमजोरी हो तो उसकॅ भी दूर कर दे बथुवा।*
बथुवा कब्ज दूर करता है और अगर *पेट साफ रहेगा तो कोइ भी बीमारी शरीर में लगेगी ही नहीं, ताकत और स्फूर्ति बनी रहेगी।*
कहने का मतलब है कि जब तक इस मौसम में बथुए का साग मिलता रहे, नित्य इसकी सब्जी खाएँ। बथुए का रस, उबाला हुआ पानी पीएँ और तो और *यह खराब लीवर को भी ठीक कर देता है।*
*पथरी हो तो एक गिलास कच्चे बथुए के रस में शकर मिलाकर नित्य पिएँ तो पथरी टूटकर बाहर निकल आएगी।*
मासिक धर्म रुका हुआ हो तो दो चम्मच बथुए के बीज एक गिलास पानी में उबालें । आधा रहने पर छानकर पी जाएँ। मासिक धर्म खुलकर साफ आएगा। आँखों में सूजन, लाली हो तो प्रतिदिन बथुए की सब्जी खाएँ।
पेशाब के रोगी बथुआ आधा किलो, पानी तीन गिलास, दोनों को उबालें और फिर पानी छान लें । बथुए को निचोड़कर पानी निकालकर यह भी छाने हुए पानी में मिला लें। स्वाद के लिए नींबू जीरा, जरा सी काली मिर्च और काला नमक लें और पी जाएँ।
*आप ने अपने दादा दादी से ये कहते जरूर सुना होगा कि हमने तो सारी उम्र अंग्रेजी दवा की एक गोली भी नहीं ली। उनके स्वास्थ्य व ताकत का राज यही बथुवा ही है।*
मकान को रंगने से लेकर खाने व दवाई तक बथुवा काम आता है और हाँ सिर के बाल ...... क्या करेंगे शम्पू इसके आगे।
लेकिन अफसोस , *हम किसान ये बातें भूलते जा रहे हैं और इस दिव्य पौधे को नष्ट करने के लिए अपने अपने खेतों में जहर डालते हैं।*
*तथाकथित कृषि वैज्ञानिकों (अंग्रेज व काळे अंग्रेज) ने बथुवै को भी कोंधरा, चौळाई, सांठी, भाँखड़ी आदि सैकड़ों आयुर्वेदिक औषधियों को खरपतवार की श्रेणी में डाल दिया और हम भारतीय चूं भी ना कर पाये।*

बुधवार, दिसंबर 27, 2017

पचास के दशक में इजराइल ने घोषणा कर दी की हमारा देश कोई धर्मशाला नहीं है जो मुसलमान सीना ठोककर यहाँ रह रहे हैं ...


Umakant Misra
पचास के दशक में इजराइल ने घोषणा कर दी की हमारा देश कोई धर्मशाला नहीं है जो मुसलमान सीना ठोककर यहाँ रह रहे हैं ...
3 मई1950 की रात में बारह हज़ार से ज्यादा मुसलमानों को इजराइली सरकार ने पिछवाड़े पे लात मारकर इजराइल की सीमा से बाहर कर दिया,हालाँकि उसके इस कदम की पूरी दुनिया में आलोचना हुई .....
संयुक्त राष्ट्र संघ ने इजराइल को धमकाया ..
अरब देशों ने धमकी दी की एक बूंद तेल नहीं देंगे ...
उधर सोवियत संघ ने इजराइल को इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा .....
इजराइल के ऊपर हुवे इन चौतरफा हमलों का असर ये हुआ की इस घटना के महज 4 महीने बाद यानी सितम्बर में इजराइल ने फिर से 6 हज़ार मुसलमानों को लतियाते हुवे इजराइल से बाहर निकाल दिया....और उनकी जमीने यहूदियों को बाँट दी ....और साफ़ साफ़ शब्दों में धमकी दी जो उखाड़ना है उखाड़ लो ..हम तो अईसे ही मारेंगे ...........
सत्तर के दशक तक इजराइल में मुसलमानों की हालत भीगी बिल्ली वाली हो के रह गयी थी ...
इजराइली सरकार ने मुसलमानों को साफ़ शब्दों में समझा दिया था की रहना है तो कायदे से रहो नहीं तो इजराइल की सीमा तुम्हारे लिए खुली है .......
इस घटना को आज 66 साल बीतने जा रहे हैं ....और आज तक इजराइल में किसी मुसलमान की हिम्मत नहीं हुई की वो बगावत का झंडा बुलंद कर सके ........
इजराइल ने मुस्लिम तुष्टिकरण का स्थाई समाधान निकाल लिया और समस्या हमेशा के लिए खत्म हो गयी
लेकिन भारत में क्या समस्या है ??
क्यों तुले हैं हम मुसलमानों का पिछवाडा चाटने पे ??.
कुछ समय पहले बंगाल में हिन्दुवों के घर जला दिए गये ..
उन्हें सडक पर घसीट घसीट के मारा गया .....
उनकी औरतों के साथ बुरा सुलूक किया गया ....
कुल 9 घंटे तक हिंसा लूटपाट का नंगा नाच हुवा ..
और सरकार मीडिया और देश का बुद्धिजीवी वर्ग कान में तेल डाल कर सो गया .......
किसी चैनल ने इस घटना की चर्चा करना भी जरुरी नहीं समझा .
क्यों की इससे देश की धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाती .
लेकिन एक सेक्युलर हिन्दू सोचता है की मुझे क्या दिक्कत है ?
मै तो मजे में हूँ ...
मुझे क्या समस्या है . अबे दंगा तो बंगाल में हुवा है ..मै यहाँ बनारस में हूँ . बंगाल तो यहाँ से साढ़े छ सौ किलो मीटर दूर है ... मेरे बनारस के मुस्लमान तो साक्षात देव दूत हैं ...वो तो सावन के मेले में कावरियों को पानी पिलाते हैं दिवाली में पटाके भी जलाते हैं .. और नवरात्रों में तो मेरे यहाँ डांडिया भी खेलते हैं ......तो मुझे परेशान होने की क्या जरुरत ???..मै तो हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का झंडा बुलंद करूँगा ..मै तो दंगल देखूंगा ....रईस देखूंगा ......मैं टाइगर भी देखूंगा..... मै तुम जैसे दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक हिंदुत्व का हिस्सा नहीं हूँ .....मेरा हिंदुत्व मुझे भाईचारे मानवता का सन्देश देता हैं ..सारे मुस्लमान एक जैसे नहीं होते ..जरुर बंगाल में हिन्दुवों ने ही कोई गलती की होगी ......वरना मुसलमान भाई तो शांतिदूत माने जाते हैं ......मै पूछता हूँ की अगर वाकई हिन्दू बंगाल में मारा गया होता तो क्या सभी चैनल ये खबर नहीं दिखा रहे होते ??केवल जी न्यूज़ ही क्यों ये मुद्दा उठा रहा था??? जबसे बीजेपी सरकार आई है तबसे दंगे हो रहे हैं “..............
.....ये हर उस सेक्युलर सोच रखने वाले हिन्दू समाज की सोच है जिसे अकारण ही मुसलमानों से हमदर्दी है .......
लेकिन मै और मेरे जैसे राष्ट्रवादी सोच रखने वाले किसी भी व्यक्ति को भारत के मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है ..हमे कोई दुःख नहीं होता जब देश के किसी भी हिस्से में एक भी मुस्लमान किसी हिंसा में मारा जाता है ........जिन्हें भारत माता की जय बोलने में आपत्ति हो ..जिन्हें बन्दे मातरम गाने तकलीफ होती हो ...सूर्य नमस्कार करने में जिनकी अम्मी मरने लगती हों ..ऐसे लोगों से एक हिन्दू राष्ट्रवादी युवा कोई सहानभूति नहीं रखता ........
बंगाल की घटना का प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए ..बिलकुल उसी तरह जैसे इजराइल ने एक ही दिन में 12 हज़ार मुसलमानों को लात मारकर देश से निकाल दिया था.......वो दिन दूर नहीं जब देश का हिन्दू समाज मुसलमानों के साथ वही सुलूक करेगा जो आज अमेरिका ..इजराइल और बाकी यूरोपीय देश मुसलमानों के साथ कर रहे हैं ......
हिंदुवो को असहिष्णु कहने वालों को समझना पड़ेगा की ये देश धर्मनिरपेक्ष तब तक ही है जब तक हिन्दू समाज इसे धर्मनिरपेक्ष बनाए रखता है .....जिस दिन हिन्दू समाज वाकई असहिष्णु हो गया भारत में मुसलमानों को रहने के लिए किसी दुसरे मुल्क की तलाश करनी पड़ जायेगी ........

मंगलवार, दिसंबर 19, 2017

आखिर संभूलाल रैगर इतना हिंसक क्यों हुआ, उसकी क्या मजबूरी रही होगी क्योंकि हिंदू तो इतना हिंसक नहीं होता

हाल ही में हुए राजस्थान के राजसमंद में हुए घटना के बारे में मैं सोच रहा था कि आखिर संभूलाल रैगर इतना हिंसक क्यों हुआ, उसकी क्या मजबूरी रही होगी क्योंकि हिंदू तो इतना हिंसक नहीं होता यह मुसलमानों का काम है लेकिन शंभूलाल के बारे में सोचते हुए मैंने उन घटनाओं को याद किया जो बचपन से मेरे जहन में हैं। क्योंकि मेरा घर मुस्लिम बहुल इलाके में है। मेरा जन्म पढ़ाई लिखाई सब मुसलमानों के बीच हुई, हिंसा मैंने बचपन से देखी हैं। यही कारण है मेरे मां बाप मुझे मुसलमानों से दोस्ती ना रखने की सलाह देते थे क्योंकि हमने शुरू से मुसलमानों को एक हिंसक समुदाय के तौर पर देखा है। मैं उन घटनाओं का जिक्र करूंगा जब मेरी उम्र 15 से 16 साल की रही होगी और तब बिहार में लालू का जंगलराज था। मेरे शहर आरा भोजपुर में उस समय नौशाद आलम, चांद मियां जैसे दर्ज़नो गैंगस्टरों का बोलबाला था।
वह तीन घटना जो मेरे मोहल्ले की है। मेरे मोहल्ले में एक पुलिसवाला रहता था ईमानदार और देशभक्त लेकिन उसकी देशभक्ति एक ही रात में मुसलमानों की भिड़ ने निकाल दी। गलती इतनी थी कि 15 अगस्त को मोहल्ले के कसाई टोला में पाकिस्तानी झंडे को उतरवाने के लिए उसकी कुछ मुसलमानों से कहासुनी हो गयी थी। जेहादियों की अनगिनत भीड़ ने उसके घर पर धावा बोल उसे उसके पत्नी व बच्चों सहित पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी थी। उसके परिवार में बूढ़ा बाप बचा था क्योंकि वो उस दिन घर से बाहर था। तब लोकल विधायक के दबाव में इस केस पर लीपापोती कर दी गई थी, जिस कारण उस पुलिसवाले का बूढ़ा बाप भी कलप कलप कर मरा था।
दूसरी घटना- पाकिस्तान की जीत पर आतिशबाजी कर रहे हैं मुसलमान लड़कों को रोकने पर एक दलित लड़के की बल्ले से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। जेहादीयों की भीड़ ने एक गरीब मां बाप से उसके इकलौता बेटे को छीन लिया। तब गैंगस्टर नौशाद के दबाव में केस को रफा दफा कर दिया गया।
तीसरी घटना- मेरे बिरादरी की ही हैं। मेरा एक क्लासमेट था, जिसका नाम दुर्गेश था, जो मेरी जाति का भी था। उसकी चौदह वर्षीय बहन को एक कठमुल्ले ने प्यार के जाल में फंसाकर हैदराबाद ले गया, हफ्तों तक अपने मित्रों व रिश्तेदारों से उसका गैंग रेप करवाने के बाद उसे सऊदी अरब बेच दिया और तब उस लड़के को मोहल्ले के मुसलमानों ने पूरी तरह प्रोटेक्ट किया। लड़की के मां बाप भाई में सिर्फ उसका भाई बचा। मां वियोग में मर गई बाप ने सिस्टम व मुसलमानों के प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। दुर्गेश ने उस मुल्ले से बदला लेने की भी कोशिश की थी, पर वो सफल न हो सका था।
इन घटनाओं से मैं सीधे जुड़ा था चूँकि तीनों घटनाओं मेरे मोहल्ले की थी और अब मैं यह सोचता हूं कि अगर उस पुलिस वाले के बूढ़े बाप, उस नाबालिग दलित लड़के के पिता और सऊदी में बिकने वाली उस नाबालिग लड़की का भाई अगर मैं होता तो तब मैं क्या करता?? और तब जब हिंदुओं के नपुंसक समाज, भ्रष्ट और बिकी हुई पुलिस और मुसलमानों को अपना दामाद समझने वाली सरकार जब साथ ना दे।
अब आइए शंभूनाथ रैगर की कहानी जो अब तक सामने आई है उसकी बात करते हैं-
शंभू के पड़ोसियों के अनुसार वो काफी सरल व शांत स्वभाव का था, उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वो किसी की हत्या भी कर सकता है।
पड़ोसियों के बयान के अनुसार उसके पड़ोस की एक मुँहबोली बहन थी जिसकी उम्र महज 13 साल की थी जो उसे राखी भी बाँधती थी। इसी गांव का मोहम्मद बबलू शेख जिसने बहला फुसलाकर झांसा देकर उसकी बहन को लेकर बंगाल के सैयदपुर गाँव भाग गया था। जिसमें पूरा हाथ सीधे सीधे मो० अफ़राजुल का था। नाबालिग लड़की की मां की गुहार पर शंभू मर्जी से सैयदपुर गया। जहां 15 दिनों तक लड़की के शारीरिक शोषण के बाद शंभू उसे छुड़ाकर गांव लाया। लड़की की माँ ने संभू को 10 हज़ार का इनाम भी दिया था। लड़की को सैयदपुर से लाने से नाराज़ बंगाली मुसलमान मज़दूरों ने शंभू को खूब पीटा भी था और उसे उसके परिवार के साथ हत्या करने की धमकी भी दी थी। जिससे वह कुछ सनकी भी हो गया था।
जिस प्रकार पांचों उंगलियां समान नहीं होती, जिस प्रकार पांच भाइयों का विचार व मिजाज समान नहीं होता ठीक उसी प्रकार कोई अपनी बहन बेटी की इज्जत तार-तार होने पर आत्महत्या कर लेता है और कोई इज्जत का बदला लेने के लिए तालिबानी रास्ता चुनता है!
अब यहां सवाल यह है कि 13 साल की बच्ची पर इन वहशियों की नजर क्या सोचकर पड़ी! जाहिर सी बात है जिस धर्म में 9 साल की बच्ची से शादी मान्य हो उन्हें 13 साल की लड़की भोग की वस्तु ही दिखेगी।
सवाल ये भी हैं अगर ऐसा आपकी बहन और बेटी के साथ होगा और समाज-प्रशासन आपका साथ नहीं देगा तो आप क्या करोगे? दुनिया का कौन वो बाप और भाई होगा जो इस तरह की घटनाओं पर चुप बैठेगा।
और एक बात माननी पड़ेगी हमारे देश के मीडिया का। क्योंकि यहाँ मारने वाला दलित जाति से है और मरने वाला मुस्लिम समुदाय से, लेकिन हमेशा की तरह हत्या में दलित व मुस्लिम ढूंढने वाली मीडिया का न्यूज़ हेडलाइंस क्या है "हिंदू ने मुस्लिम शख्स को मारा"।
रोज तिल-तिल कर मरता हुआ इंसान ही, समाज, सिस्टम व नेताओं से इंसाफ न मिलने पर थक हारकर सर पर कफ़न बाँधकर जोश ए जुनून में इस तरह के कदम उठाता है। यदि यह हत्या हिंदू के साथ हुई होती तो मीडिया इसमें जाति ढूंढती कि कहीं मरने वाला दलित और मारने वाला स्वर्ण तो नहीं और आज बड़े बड़े न्यूज़ चैनल पर डिबेट्स भी होती। खैर यहां मारने वाला दलित और मरने वाला मुस्लिम समुदाय है तो कहीं जय भीम और जय भीम का नारा खतरे में न पड़ जाए इसलिए इसे 'दलित बनाम मुस्लिम' के बजाय 'हिंदू बनाम मुस्लिम' का नाम दे रही है, कोई बात नहीं सम्भू हिन्दू ही हैं, हम उसे हिन्दू ही मानते हैं। 'दलित' शब्द तो मीडिया, नेताओं व धर्मांतरण करने वाले दलालों का प्रोपगेंडा हैं।
खैर, बुद्धिजीवियों की तरह मैं भी इस तरह की निर्मम हत्या का समर्थन नहीं करता। (जब तक मेरा परिवार सुरक्षित हैं।) ~ व्यंग
(मुझे यह पोस्ट whatsapp पर प्राप्त हुई। मूल लेखक को कोटिशः धन्यवाद जिसने बखूबी सत्य को लिखने का सराहनीय प्रयाश किया है)

रविवार, दिसंबर 17, 2017

अनटाइटल्ड

भारतीय रेल में कई जगह आपको “रेल आपकी अपनी संपत्ति है” लिखा दिख जायेगा। इसके पीछे उद्देश्य ये होता है कि जिस चीज़ को आप अपना मानेंगे उसे सहेजने सँभालने का प्रयास भी करेंगे। जो अपना है ही नहीं भला उसका ख़याल क्या रखना ? भारतीय किताबों की बात करते ही यही समस्या होती है। रामायण-महाभारत के काल से कूद कर जब हम और आप रामचरितमानस पर आ जाते हैं तो बीच के ढाई हज़ार साल के लगभग का समय गायब हो जाता है।
ऐसे में लड़कियां-स्त्रियाँ कभी भी पूछ सकती हैं कि इनमें मेरा क्या है ? ये तो किसी मर्यादा पुरुषोत्तम की कहानियां हैं, युद्धों की कथाएँ हैं, इनमें स्त्रियों की तरफ से क्या लिखा गया जो मेरा होगा ? ये स्थिति तब है जब सिर्फ महिलाओं द्वारा लिखा गया पहला ग्रन्थ “थेरीगाथा” भारत का है। इसे करीब करीब गौतम बुद्ध के समय लिखा गया था (600 BCE)। इस काव्य संकलन में एक कविता किसी गणिका की है, एक धन-दौलत छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई महिला की भी है। एक कविता तो गौतम बुद्ध की सौतेली माता की भी है।
संस्कृत के महाकाव्यों के अलावा जिन महाकाव्यों की बात की जा सकती है, उनमें तमिल महाकाव्य भी आयेंगे। इनमें पांच सबसे महत्वपूर्ण गिने जाते हैं। शिल्पपत्तिकराकम्, मणिमेखलई, सिवका चिंतामणि और वलायापथी में से शिल्पपत्तिकराकम् और मणिमेखलई को भारत में थोड़ा बहुत इसलिए भी जाना जाता है क्योंकि इनपर आधारित एक टीवी सीरियल दूरदर्शन के शुरुआत के समय में प्रसारित होता था। कन्नगी नाम की नायिका की कहानी पर शिल्पपत्तिकराकम् आधारित है, और फिर उनकी बेटी की कहानी को मणिमेखलई में आगे बढ़ाया गया है। ये कहानी कोवलन नाम के कवेरिपत्तिनम के एक धनी व्यापारी की थी।
उसकी शादी एक दूसरे व्यापारी की बेटी कन्नगी से हुई थी। दोनो खुशहाल तरीके से जीवन व्यतीत कर रहे थे लेकिन एक शाही उत्सव में कोवलन एक नर्तकी माधवी से मिला। वो माधवी की दीवानगी में अपने घर और कन्नगी को भूल गया। कोवलन माधवी पर पैसे खर्च करता बिल्कुल कंगाल हो गया। गरीब हो जाने पर जब उसे माधवी के पास से भगा दिया गया तो उसका नशा उतरा और वो वापस कन्नगी के पास आया। कंगाल हो चुके पति के पास दोबारा व्यापार शुरू करने के लिए धन भी नहीं था, लेकिन प्राचीन काल से ही हिन्दुओं में स्वर्ण में धन का कुछ हिस्सा निवेश करने की परंपरा रही है।
कन्नगी के पास पायल थे, उसने कोवलन को अपने बहुमूल्य पायल दे दिए और इन पायलों के साथ वो दोनों मदुराई गए। मदुराई में उनको आश्रय मिल गया और कोवलन बाजार निकल गया एक पायल को बेचने। उन्हीं दिनों पांड्या के राजा के महल से रानी का भी पायल चोरी हुआ था। जैसे ही कोवलन ने वो पायल एक व्यापारी को दिखाई, वो भड़क उठा और सीधे उसे राजा के पास ले गया। वहाँ के राजा के आदेश पर पहरेदार ने कोवलन को मार डाला। कन्नगी को यह बात पता लगी, तो वो राजमहल की तरफ रोती-धोती दौड़ी।
राज दरबार में पहुंची कन्नगी के हाथ में, अपने पति के निर्दोष होने के प्रमाण स्वरुप, दूसरा पायल था। विलाप सुनकर, उसके पीछे नगर के लोग भी जुट आये थे | कन्नगी ने दरबार को दूसरी पायल दिखाई और कहा राजा ने ये अन्याय किया है। पायल को तोड़ने पर उसके अंदर भरे माणिकों से पता चला कि ये तो सचमुच दूसरी पायल है ! राजा को कोवलन के निर्दोष होने का पता चला तो वो अफ़सोस करता वहीँ जमीन पर मरकर गिर गया। कन्नगी का गुस्सा इतने पर शांत नहीं हुआ था।
कन्नगी ने तीन बार मदुराई का चक्कर काटा और नगर को ही शापित कर दिया। पूरा शहर ही जलकर भस्म हो गया। इस कहानी को दो काव्यों में लिखा गया है, पहले शिल्पादिकारम् में और फिर मणिमेखलई में। मणिमेखलई के रचयिता सत्तनार हैं। इन दोनों ग्रंथों की कहानी में थोड़ा अंतर है। शिल्पादिकारम् मुख्यतः कन्नगी की कहानी सुनाती है जबकि मणिमेखलई कहानी को आगे बढ़ाते हुए उनकी बेटी मणिमेखलई की कहानी सुनाती है जो हिन्दुओं के दर्शन के छह अंगों के अध्ययन के बाद बौध “अरिहंत” हो जाती है।
इन कहानियों को ना जानने और कभी ना सुनने का सबसे पहला नुकसान तो ये होता है कि हमें मणिमेखलई का नाम नहीं पता होता। इस वजह से हमें ये भी नहीं पता चलता कि माता पिता (कन्नगी-कोवलन) की मृत्यु हो जाने पर भी एक अनाथ बच्ची, मणिमेखलई के शिक्षा की व्यवस्था समाज में रही होगी। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर वो दर्शन के छह के छह अंग पढ़ती कैसे ? इतना पढ़ने में कोई एक दो साल ही तो लगे नहीं होंगे इसलिए बाल विवाह हो गया हो कहीं बारह साल की उम्र में ये भी संभव नहीं।
शिल्पपत्तिकराकम् और मणिमेखलई जैसी स्त्री प्रधान, उनके नजरिये से लिखा साहित्य भी है | जैसा कि आम तौर पर प्रचारित किया जाता है, वैसे इतिहास के सभी नायक कोई राजा-रानी नहीं, आम व्यापारी भी हैं। पूरी पूरी कहानियाँ स्त्रियों के दृष्टिकोण से लिखी गई हों ऐसा भी है, और स्त्रियों ने लिखी हो ऐसा भी है। यहाँ लड़कियों के गुरुकुल जाने की बात हजम करने में असुविधा हो रही हो तो आठवीं शताब्दी के आस पास का “उत्तररामचरित” जिसे भवभूति लिखा था उसे देखिये।
ये आम जनता के लिए मंचित किये जाने वाले प्रसिद्ध नाटकों में से एक था। ऐत्रेयी उत्तर भारत के एक नामी गिरामी कवि की छात्रा है, लेकिन उसके गुरु को आजकल एक महाकाव्य लिखने का शौक लगा है। ऐसे में वो ऐत्रेयी को ज्यादा कुछ सिखा नहीं पाते। मजबूरन ऐत्रेयी को अकेले ही घने जंगलों को पार कर के अपने गुरु (शायद वाल्मीकि) के आश्रम से दक्षिण में कहीं स्थित ऋषि अगस्त्य के आश्रम में जाना पड़ जाता है। ऐत्रेयी सफ़र के मुश्किल रास्तों की बात सोच रही है, और उसकी सहेली वसंती उसे अगस्त्य मुनि के आश्रम की तारीफें सुना रही है।
अभी की भारतीय यूनिवर्सिटी में एक साल ग्रेजुएशन कर के शायद दुसरे किसी विश्वविद्यालय में सीधे दुसरे साल में प्रवेश लेना नामुमकिन होगा। मगर इस “उत्तररामचरित” से लगता है एक विश्विद्यालय से दुसरे में ट्रान्सफर उस दौर में संभव था। रूप-सौन्दर्य के लिए चर्चित क्लियोपेट्रा जैसी नायिकाएँ भारतीय साहित्य में जरा कम होती हैं तो शायद इन कहानियों की नायिका के नायिका होने की एक वजह उनका ज्ञान भी रहा होगा। इन्होंने भारतीय दर्शन पढ़ने-सिखने में रूचि ली थी (जिसका एक हिस्सा वेदान्त भी है)।
बाकी जबरन किसी से कुछ करवाने को मेरा कोई ख़ास समर्थन नहीं रहता | किसी ब्यूटी कांटेस्ट में हर साल बदलने वाला मुकुट चाहिए या स्थायी परिचय, वो फैसला तो आपको ही लेना है ना ?
# NaimisheyShankhnaad

शनिवार, दिसंबर 16, 2017

बीबीसी का गीता प्रेस विरोध और बीबीसी को जवाब

पंडित मधु सूदन व्यास
Sumant Bhattacharya
गीताप्रेस भी खूब लङा है अंग्रेजों से
.............
# BBC_को_जवाब
आज से लगभग छः महीना पहले मैनें BBC में गीताप्रेस परएक लेख पढा था।लेख में यह कुतर्क गढा गया था किस तरह गीताप्रेस नामक छापखाना हिंदू भारत बनाने के मिशन पर काम कर रहा है।उसके बाद मैनें एक और -गीताप्रेस का महिलाओं पर तालिबानी सोंच-शिर्षक से एक लेख पढा।दोनों लेख पढकर मेरे दिमाग की घंटी बज उठी थी।आखिर BBC गीताप्रेस जैसे विशुद्ध धार्मिक प्रेस का विरोध क्यों कर रही है अवश्य ही इसके पिछे कोई न कोईरहस्य छिपा हुआ है क्योंकी BBC भारत में उसी का विरोधकरता आया है जो अंग्रेजी सत्ता के विरोधी था।तभी मेरे दिमाग ने कहा अवश्य ही गीताप्रेस भी अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध रहा होगा।
.....तब से लेकर मैं खोज करता रहा कल मेरी खोज पुरी हुई और आज BBC के उस पुराने लेख को काउंटर कर रहा हुं।आगे बढने से पहले गीताप्रेस के विरूद्ध कम्युनिस्टों का अलग षडयंत्र चल रहा है गीताप्रेस पर एक वामपंथी पत्रकार ने भी किताब लिखी है जिसका नाम --Gita Press And The Making Of Hindu India है।.
....ऐसे तो गीताप्रेस की स्थापना 1924 में हुई है उसके पहले कलकत्ता में 1920 में "गोविंद भवन कार्यालय" की स्थापना हुई और उससे पहले 'कल्याण' पत्रिका शुरू हुई थी।बहुत कमलोगों को जानकारी होगा गीताप्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार एक क्रांतिकारी थे और उनके क्रांतिकारी संगठन का नाम था-अनुशीलन समिति।कलकत्ता में बंदुक,पिस्तौल और कारतुस की शस्त्र कंपनी थी जिसका नाम "रोडा आर.बी. एण्डकम्पनी" था।यह कंपनी जर्मनी,इंग्लैण्
ड आदी देशों से बंदरगाहों से शस्त्र पेटीयां मंगाती थी।
.....देशभक्त क्रांतिकारीओं को अंग्रेजों से लङने के लिए पिस्तौल और कारतुस की जरूरत थी लेकिन उनकें पास धन नही था कि वें खरीद सकें तब अनुशीलीन समिति के क्रांतिकारीओं नेशस्त्र पेटीओं को चुराने की योजना बनाई और इस काम को हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को सौंप दिया गया।हनुमान प्रसाद जी ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।इस रोडा बी.आर.डी. कंपनी में एक शिरीष चंद्र मित्र नाम के बंगाली कलर्क था जो अध्यात्मिक प्रवृति के था और हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को बहुत आदर करता था।पोद्दार जी ने इसका फायदा उठाकर उस कलर्क को अपने पक्ष में कर लिया।
.......एकदिन कंपनी ने शिरिष चंद्र मित्र को कहा संमुद्र चुंगी जिन बिल्टीओं का माल छुङाना है वह छुङा कर ले आएं।उसने यह सुचना तत्काल हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को दे दिया।सुचना पाते ही पोद्दार जी कलकत्ता बंदरगाह पर पहुंच गये।यह बात है 26 अगस्त 1914 बुधवार के दिन का।बंदरगाह पर रोडा कम्पनी के 202 शस्त्र पेटीयां आया हुआ था।जिसमें 80 माउजर पिस्तौल और 46 हजार कारतुस था जिसे कंपनी के कलर्क शिरिष चंद्र मित्र ने समुंद्री चुंगी जमा कर छुङा लिया।
.....इधर बंदरगाह के बाहर हनुमान प्रसाद पोद्दार जी शिरिष चंद्र का इंतजार कर रहे थे।इसमें से 192 शस्त्र पेटीयां कंपनी में पहुंचा दी गई और बाकी के 10 शस्त्र पेटीयां हनुमान प्रसाद पोद्दार के घर परपहुंच गई।आनन-फानन में पोद्दार जी ने अपने संगठन के क्रांतिकारी साथीओं को बुलाया और सारे शस्त्र को सौंपदिया।उस पेटी में 300 बङे आकार की पिस्तौल थी।इनमें से 41 पिस्तौल बंगाल के क्रांतिकारीयों के बिच बांट दिया गया बाकी 39 पिस्तौल बंगाल के बाहर अन्य प्रांत में भेज दी गई काशी गई, इलाहाबाद गया,बिहार,पंजाब
,राजस्थान भी गया।
...आगे जब अगस्त 1914 के बाद क्रांतिकारीयों ने इन माउजर पिस्तौलें से सरकारी अफसरों ,अंग्रेज आदी को मारने जैसे 45 काण्ड इन्हीं पिस्तौल से सम्पन्न किये गये थे।क्रांतिकारीयों ने बंगाल के मामूराबाद में जो डाका डाला था उसमें भी पुलिस को पता चला की रोडा कम्पनी से गायब माउजर पिस्तौल से किया गया है।थोङा आगे बढ गये थे खैर पिछे लौटते हैं।
.......हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को पेटीयों के ठौर-ठिकाने पहुंचाने-छिपानेमें पंडित विष्णु पराङकर (बाद में कल्याण के संपादक ) और सफाई कर्मचारी सुखलाल ने भी मदद की थी।बाद में मामले के खुलासा होने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार, कलर्क शिरीष चंद्र मित्र ,प्रभुदयाल ,हिम्मत सिंह ,कन्हैयालाल चितलानिया,फुलचंद चौधरी ,ज्वालाप्रसाद,ओंकारमल सर्राफ के विरूद्ध गिरफ्तारी के वारंट निकाले गये।16 जुलाई 1914 को छापा मारकर क्लाइव स्ट्रीव स्थित कोलकाता के बिरला क्राफ्ट एंड कंपनी से हनुमान प्रसाद पोद्दार जिको गिरफ्तार कर लिया गया।शेष लोग भी पकङ लिये गये।सभी को कलकता के डुरान्डा हाउस जेल में रखा गया।पुलिस ने 15 दिनों तक सभी को फांसी चढाने,काला पानी आदी की धमकीदेकर शेष साथीयों को नाम बताने और माल पहुंचाने की बातउगलवाना चाहा लेकिन किसी ने नही उगला।पोद्दार जी के गिरफ्तार होते ही माङवारी समाज में भय व्याप्त हो गया पकङे जाने के भय से इनके लिखे साहित्य को लोगों ने जला दिया था।
.....पर्याप्त सबुत नही मिलने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार जी छुट गये।इसका दो कारण था पहला कि शस्त्र कंपनी के कलर्क शिरिष चंद्र मित्र बंगाल छोङ चुके थे इसलिए गिरफ्तार नही किये गये दुसरा कारण तमाम अत्याचार के बाद किसी ने भेद नही उगला था।
.... इस घटना से छः साल पुर्व 1908 में जो बंगाल के मानिकतला और अलीपुर बम कांड हुआ उसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से गीताप्रेस गोरखपुर के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार शामिल रहे।उन्होनें बम कांड के अभियुक्त क्रांतिकारीयों की पैरवी की।पोद्दार जी का भुपेन्द्रनाथ दत्त,श्याम सुंदर चक्रवर्ती ,ब्रह्मवान्धव उपाध्याय ,अनुशीलन समिति के प्रमुख पुलिन बिहारी दास,रास बिहारी बोस, विपिन चंद्र गांगुली,अमित चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारीयों से सदस्य होने के कारण निकट संबध था।अपनें धार्मिक कल्याण पत्रिका बेचकर क्रांतिकारीयों को पैरवी करते थे।बाद में कोलकता में गोविंद भवन कार्यालय की स्थापना हुई तो पुस्तक और कल्याण पत्रिका के बंडल के नीचे क्रांतिकारीयों के शस्त्र छुपाये जाते थे।.
....इतना ही नही खुदीराम बोस,कन्हाई लाल ,वारीन्द्र घोष, अरबिंद घोष,प्रफुल्ल चक्रवर्ती के मुकदमे में भी अनुशीलन समिति की ओर से हनुमान प्रसाद पोद्दार ने पैरवी की थी।उन दिनों क्रांतिकारीयों की पैरवी करना कोई साधारण बात नही था।
.....भारत विभाजन के मांग पर कांग्रेसी नेता जिन्ना के सामने चुप रहते थे तो गीताप्रेस के कल्याण पत्रिका पुरजोर आवाज में कहता था-- "जिन्ना चाहे देदे जान, नहीं मिलेगा पाकिस्तान " कहकर ललकारता था यह पंक्ति कल्याण के आवरण पृष्ठ पर छपता था।पाकिस्तान निर्माण के विरोध में कल्याण महीनों तक लिखता रहा।
......गीताप्रेस के कल्याण पत्रिका ऐसा निडर पत्रिका था कि उसने अपने एक अंक में प्रधानमंत्री नेहरू को हिंदू विरोधी तक बता दिया था।इसने महात्मा गांधी को भी एक बार खरी-खोटी सुनाते हुए कह डाला था--"महात्मा गांधी के प्रति मेरी चिरकाल से श्रद्धा है पर इधर वे जो कुछ कर रहे हैं और गीता का हवाला देकर हिंसा-अहिंसा की मनमानी ब्याख्या वें कर रहे हैं उससेहिंदूओं की निश्चित हानि हो रही है और गीता का भी दुरपयोग हो रहा है।"
......जब मालविय जी हिंदूओं पर अमानवीय अत्याचारों की दिलदहला देने वाली गाथाएं सुनकर द्रवित होकर 1946 में स्वर्ग सिधार गयें तब गीताप्रेस ने मालवीय जी की स्मृति में कल्याण का श्रद्धांजली अंक निकाला इसमें नोआखली,खुलना,तथा पंजाब सिंध में हो रहे अत्याचारों पर मालवीय जी की ह्रदय विदारक टिप्पणी प्रकाशित की गई थी जिसे उत्तरप्रदेश और बिहार के कांग्रेसी सरकार ने श्रद्धांजली अंक को आपतिजनक घोषित करते हुए जब्त कर लिया था।
...जब भारत विभाजन के समयदंगा शुरू हो गया था और पाकिस्तान से हिंदूओ पर अत्याचार की खबर आ रही थी तब भी गीताप्रेस ने कांग्रेसनेताओं पर खुब स्याही बर्बाद की थी।तब कल्याण ने अपने सितम्बर-अक्टुबर1947 के अंक में यह लिखना शुरू कर दिया था-"हिंदू क्या करें' इन अंको में हिंदूओं को आत्मरक्षा के उपाय बताया जाता था।
मित्र Sanjeet Singh की लेखनी

बुधवार, दिसंबर 13, 2017

वह दिन दूर नहीं जब ये आग तुम्हारे भी घर के ठीक पास ही होगी

दिनेश कुमार प्रजापति
उदयपुर शहर चांदपोल क्षेत्र , कुछ मुस्लिम युवक सरेआम एक शादीशुदा जोड़े को रोककर महिला से बदतमीजी करते हैं , दूसरे दिन अखबार में समाचार पढ़के सारा शहर दंग रह जाता है कि उदयपुर जैसे शांत एवं सभ्य जगह पर जहाँ होली के दिन भी आप सपत्नीक दुपहिया वाहन पर निसंकोच आ जा सकते है वहाँ ऐसी हरकत ??
जिला राजसमंद ,गाँव धोइंदा
रैगर समाज के पुश्तेनी काम चर्मकारी को तथाकथित सामाजिक उत्थान आंदोलन और चमड़ा फैक्टरियां लूट चुकी तो अब यह समाज ज्यादातर कंस्ट्रक्शन साइटों पर मजदूरी करता है जहाँ कम पैसे के चक्कर में कई आयातित बंगलादेशी मुस्लिम भी मजदूरी /कारीगरी करते हैं।
ऐसे ही कुछ मुस्लिम कारीगरों ने रैगर समाज की 3-4 मज़दूरनियों को फांस कर पहले शोषण किया और फिर अपने साथ ले जाकर कालीचक (प.बंगाल का आपराधिक केंद्र ) वैश्यावृत्ति हेतु बेच दिया ।
उनमे से एक लड़की के मुँहबोले मामा का बेटा जो मार्बल का व्यापारी था और सजग धार्मिक नागरिक था वह स्तब्ध रह गया , दूर कस्बे की आग अब उनके पड़ोस के घर तक पहुंच चुकी थी । वह पुरुषार्थी था तो हिम्मत की अपनी बहन जैसी लड़की को बचाने उस "ममतामयी " चक्रव्यूह बंगाल से उस बहन को बचाके लाने की , मौत के घर में जल्लादों से भिड़ कर युक्ति लगा कर वह उस लड़की को ले आया ।
लड़की तो आ गई लेकिन उन दल्लों और जल्लादों के आंखों में खटक गया कि ऐसे तो यह दुकानदारी ही खत्म हो जाएगी जिसमें "सभी का हिस्सा " बदस्तूर पहुंचता है ।
बंगाली जल्लादों ने संदेश भिजवाया राजसमंद (हिंदुआ सूर्य की भूमि मेवाड़) के स्थानीय जल्लाद भाइयों को की इस गुस्ताख़ को इसकी औकात दिखाई जाए जिसने हमारे शिकार को बचाने की जुर्रत की ।
स्थानीय जल्लाद जिनके हौंसले हमेशा दीनी सहायता , मक्कारी तिकडमों और बेईमान बिके हुए हिन्दुओं की गद्दारी के बूते सातवें आसमान पर ही होते हैं वे लगे उस वीर को धमकाने , बारह साल की मानसिक दिव्यांग लड़की तक के कत्ल की धमकियों के साथ !
मूर्ख नही था वह ! पता था कि जो जंग उसने छेड़ी है उसमें सामने वाला पक्ष प्रतिघात तो करेगा ही पहले से अधिक घातक वार के साथ करेगा । बहुत विचार किया उसने , बहुत कागजी शेरों को एक्शन के नाम पर संवैधानिक होते देखा , कईयों ने तो बुद्ध ,महावीर और गांधी तक कि कसमें दिला दी लेकिन जाने वह कौनसी मिट्टी का बना था उसने क्रूरता का जवाब दो कदम और घटिया क्रूरता से देने का निर्णय किया ।
पता था उसे की पुलिस ,प्रशासन और कोर्ट से ज्यादा प्रश्न उन्ही के दिलों मे उठेंगे जिनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए वह अपना जीवन बलिदान करने जा रहा है ।
आप वीडियो देखकर विचलित हो गए ??
प्राकृतिक हैं ,नही देखा जाता , अभ्यास जो नही है , इराक मे isis के धर्मगौरव लड़ाकों द्वारा मारी गई कूर्द बच्चियों के केवल मृत शरीर देखियेगा ये वीडियो भूल जाएंगे आप ।
महाभारत के युद्ध में कृष्ण कहते है कि यह युद्ध है इसमे भीम भी चाहिए जो दुःशासन की भुजाएं उखाड़ फेंके और हृदय का रक्त पी जाएं , यहाँ घटोतकच भी चाहिए जो शत्रु सैनिक को बीच मैदान जीवित निगल जाए और धृष्टद्युम्न भी चाहिए जो द्रोण को मार सके जिसे मारने की इच्छा तुम पांडवों की कभी थी ही नहीं और किसी का यह सामर्थ्य नही ।
धृष्टद्युम्न ने जो किया सही किया या नही यह प्रश्न है ही नही ,प्रश्न है कि कौरवों के सफाये के लिए यह कृत्य अपरिहार्य हैं या नही , और हाँ यदि यह टाला जा सकता था तो द्रोपदी चीर हरण के नए संस्करण के लिए स्वयं को तैयार कर लो पार्थ ।
हिन्दू समाज को भी यह समझना पड़ेगा " its bloody war ! Damn war for the existence of fittest , at any cost ! "
शम्भू ने जो किया वह उचित /अनुचित , सही /गलत से परे अपरिहार्य मात्र था । बेईमान पुलिस , जालसाज शत्रु , सत्तालोलुप नेताओं और नपुंसक न्यायव्यवस्था से निराश एक स्वाभिमानी व्यक्ति और कर भी क्या सकता था ??
कौन जिम्मेदार है आखिर इस विभत्स घटना का ??
मात्र शंभु ?
मृतक अफराजुल ?
जेहादी मानसिकता जो अब वैश्यावृति जेहाद तक पहुंच गई है ?
हिन्दू -मुस्लिम वैमनस्य ?
वोट बैंक की प्यासी सरकारें ?
न्याय व्यवस्था की लीपापोती करने वाला प्रशासन ??
रिश्वतखोर भ्रष्ट पुलिस ?
सोते हिन्दू ??
क्या सभी जिम्मेदार नहीं है इस घटना के लिए ??
हर समाज कुछ लिखित -अलिखित नियमों से चलता है , स्त्री पर आधिपत्य भी एक ऐसा ही विषय है ।
आपको देश का कानून इजाजत दे सकता है अंतर्धार्मिक विवाह की लेकिन संबंधित समाज कभी इन संबंधों को स्वीकृति नही देता जिनके रीति ,रिवाजो , खान पान , रहन-सहन , जीवन मूल्यों एवं मुख्य विचारधारा में उत्तर -दक्षिण का फर्क हो !
हम कितने भी सभ्य सुसंस्कृत क्यों ना हो जायें स्त्री पर आधिपत्य को लेकर हमारे अवचेतन में हमेशा कबीलाई संस्कृति ही जिंदा रहेगी और खासकर तब जबकि एक पक्ष बिल्कुल आदिकालीन कब्जाई रणनीति पर उतर आया हो ।
क्या कोई जाति ,धर्म अपने अस्तित्व के लिए आत्मरक्षा के लिए लड़ें भी नही जबकि जिम्मेदार व्यवस्थाएं मात्र पाखंड कर के इतिश्री कर ले ।
जो मारा गया वह उस नेक्सस का सबसे आसान शिकार था , शम्भू ने लड़ाई की शुरुआत आसान शिकार से की ताकि बाकी के अपेक्षाकृत अधिक क्रूर और संसाधनों से लैस उसके साथी जल्लादों तक उसके आक्रमण का संदेश इस तरह से जाए कि उनकी चूलें हिल जाए , इसीलिये उसने इतना क्रूर कर्म करना स्वीकार किया जिसका स्वयं वह भी अभ्यस्त नही था ।
मुस्लिम कसाईयों ! चालाकी और धूर्तता आपको एक मोर्चा जितवा सकती है विश्वयुद्ध नहीं , ये काठ की हांडी रोज नहीं काम दे सकती । भारत मे रहकर हिन्दुओ के शोषण का जो अनैतिक पाप आप लोग चंद सत्तालोलुपों के उकसाने पर कर रहे हैं वह कभी न कभी आपके लिए अस्तित्व का खतरा बनके सामने आएगा ही और उस दिन ये लोग एक क्षण में पाला बदल लेंगे और आपके साथ दूसरा बर्मा घटित हो जाएगा । अपने युवाओं को बच्चों को दूसरे समाज की स्त्रियों के प्रति उचित व्यवहार का प्रशिक्षण दीजिये अन्यथा बिलो दी बेल्ट आघात का प्रतिघात सिक्स इंच बिलो दी बेल्ट ही मिलेगा ,यह तय है ।
हिन्दुओ की धार्मिक सहिष्णुता और वैचारिक टॉलरेन्स का बहुत दुरपयोग हो चुका अब भी वक्त है सुधर जाइये । भारत जैसी भूमि और ऐसे लोग कहीं नही मिलेंगे यह सिद्ध करने की आवश्यकता नही है ।
आपके नकली रहबर आजकल शम्भू की ही तरह माथे पर चंदन लगाए मंदिर मंदिर भटक रहे हैं ,ये इशारा है समझ जाइये ।
भाजपा सरकार और प्रशासन जो स्वयं बांग्लादेशियों को बंगाली आधार कार्ड देकर भारत भर के शांत इलाकों को बर्बाद करने के षडयंत्रों को देखते हुए भी शुतुरमुर्ग की तरह मिट्टी मे मुँह दबाके के बैठी है वह भी उतनी ही दोषी है जो अब इस घटना को शंभू की निजी सनक और मानसिक स्थिति का नाम देकर लीपापोती मे लगी हुई है ।
आखिर क्या हम अपने खून पसीने से टैक्स इसलिए चुकाते हैं कि ये बांग्लादेशी /रोहिंग्या दरिंदे हमारी ही भूमि और हमारे ही संसाधनों का दोहन करके हमारी ही बहन बेटियों से वैश्यावृत्ति करवायें ??
शर्मनाक है यह स्टैंड इन सरकारों का और इस घोर अन्यायपूर्ण आत्मघाती अन्धव्यवस्थाओं का ।
आज हजारों शांतिदूतों की भीड़ के सामने आप रेगरों के साथ अन्याय करके जो इस आग को दबाने का प्रयत्न कर रहे हो यही आग एकदिन ज्वालामुखी बनकर फूटेगी बर्मा ,मुजफ्फरनगर और गुजरात की तरह शायद तभी सभी को समझ आयेगा की राजसमंद में आखिर हुआ क्या था ?
वीडियो देख़कर आंसुओं से बुद्ध बन जाने वाले हिन्दुओ कम से कम चुप रहकर ही अपनी मूर्खता साबित होने से बचालो? अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब ये आग तुम्हारे भी घर के ठीक पास ही होगी ।। https://m.facebook.com/dineshkumar.kumar.5070?fref=nf&refid=52&ref=opera_speed_dial&_ft_=qid.6498862080791759691%3Amf_story_key.719499100830027103%3Atop_level_post_id.1625560880833460&__tn__=C-R