सोमवार, अगस्त 21, 2017

10 साल बाद हुआ कांग्रेस की खौफनाक साजिश का पर्दाफ़ाश, जिसे देख आपके पैरों तले जमीन खिसक जायेगी

Ronnie Patel
10 साल बाद हुआ कांग्रेस की खौफनाक साजिश का पर्दाफ़ाश, जिसे देख आपके पैरों तले जमीन खिसक जायेगी
राजनीति के लिए नेता अक्सर झूठे वादे करते नज़र आते हैं. सत्ता पाने के लिए चापलूसी से लेकर मुफ्त वस्तुओं तक का लालच जनता को दिया जाता है. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने सत्ता की खातिर ऐसे-ऐसे कुकर्म किये हैं, जिनके बारे में जानकार आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. ऐसे ही एक कुकर्म का इंडिया टीवी ने पर्दाफ़ाश किया है.
हिन्दुओं को बदनाम करने की कांग्रेस की नापाक साजिश
समझौता एक्सप्रेस ट्रैन में हुए ब्लास्ट केस में एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जिसे देख देश ही नहीं बल्कि सारी दुनिया हैरान रह गयी है कि कोई राजनीतिक पार्टी सत्ता पाने के लिए इतना नीचे भी गिर सकती है? दरअसल समझौता ब्लास्ट केस को बहाना बनाकर कांग्रेस द्वारा हिन्दू आतंकवाद, सैफ्रॉन टेरर नाम के जुमले गढ़े गए थे.
पाकिस्तानियों को बचाने के लिए और शांतिप्रिय हिन्दुओं को दुनियाभर में बदनाम करने के लिए पाकिस्तानी आईएसआई ने कांग्रेस के साथ मिलकर एक खौफनाक साजिश रची, जिसमे 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट का इस्तेमाल किया गया. खुलासा हुआ है कि इस केस में प्रत्यक्षदर्शियों ने आतंकवादियों के स्केच बनवाये थे और इन स्केचों के आधार पर पुलिस ने पाकिस्तानी आतंकवादी को धर-दबोचा था.
खुलासा हुआ है कि पकडे गए पाकिस्तानी आतंकवादी ने अपना गुनाह भी कबूल किया था लेकिन उस वक़्त कांग्रेस की सरकार थी और मनमोहन सिंह नाकाम प्रधानमंत्री की तरह गद्दी पर बैठे थे. कोंग्रेसी नेताओं के दबाव में केवल 14 दिनों में इस पाकिस्तानी आतंकवाद को चुपचाप छोड़ दिया गया. उसके बाद बंद कमरे में हिन्दुओं को बदनाम करने की योजना बनायी गयी.
समझौता केस के जांच अधिकारी का खुलासा
योजना के तहत इस केस में स्वामी असीमानंद को फंसाया गया ताकि भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद को अमली जामा पहनाया जा सके. इस नापाक योजना को 10 साल पहले अंजाम दिया गया लेकिन ये खुलासा सिर्फ 12 दिन पहले हुआ, जब जांच अधिकारी ने अदालत में अपना सनसनीखेज बयान दर्ज करवाया. इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह इस केस के पहले जांच अधिकारी थे, जो कि अब रिटायर हो चुके हैं. ठीक 12 दिन पहले 9 जून को गुरदीप सिंह ने अदालत में अपना बयान रिकॉर्ड करवाया है.
अपने बयान में इंस्पेक्टर गुरदीप ने खुलासा किया कि पुलिस ने समझौता ब्लास्ट करने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमत अली को गिरफ्तार किया था. अजमत ने भारत में घुसपैठ की थी और वो बिना पासपोर्ट के, बिना किसी कानूनी दस्तावेज के दिल्ली, मुंबई समेत देश के कई शहरों में घूमा था.
ऊपर से आदेश आया, पाकिस्तानी संदिग्ध छोड़ा गया
इंस्पेक्टर गुरदीप ने बताया कि वो अजमत अली के साथ उन शहरों में भी गए थे, जहां वो गया था. उसने इलाहाबाद में जहां जाने की बात कही जो जांच में सही पायी गयी. जांच अपने अंजाम तक पहुंच ही रही थी कि तभी अचानक उनके सीनियर अधिकारियों, सुपिरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस भारती अरोड़ा और डीआईजी ने उन्हें पाकिस्तानी आतंकी को छोड़ने के निर्देश दे दिए. इन्ही के निर्देशों पर इंस्पेक्टर गुरदीप ने अजमत अली को कोर्ट से बरी करवाया. उनके इस बयान के बाद देश हक्का-बक्का रह गया.
18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रैस ट्रेन में बम धमाका हुआ था, जिसमे 68 लोग मारे गए थे. इस हादसे को 10 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अबतक आखिरी फैसला नहीं आया है. बताया जा रहा है कि कोंग्रेसी नेताओं के दबाव के कारण पुलिस ने कोर्ट में पाकिस्तानी आतंकी को केस से बरी करने की अपील की थी और कोर्ट ने पुलिस की बात पर यकीन करते हुए पाकिस्तानी आतंकी को छोड़ दिया. फिर वो कहां गया ये किसी को नहीं मालूम.
सुशील कुमार शिंदे ने कहा भगवा आतंकवाद
हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए इतनी बड़ी राजनीतिक साजिश रची गयी, वो भी देश की सबसे पुरानी पार्टी द्वारा? पाकिस्तानी आतंकी को रिहा करके निर्दोष स्वामी असीमानंद को फंसा कर भगवा आतंकवाद का नाम दिया गया. इसके बाद तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने AICC की मीटिंग में भगवा आतंकवाद शब्द का जिक्र करके सबको चौंका दिया और फिर पी चिदंबरम और दिग्विजय सिंह ने बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए आये दिन भगवा आतंकवाद का जिक्र करना शुर कर दिया.
कांग्रेस के महामक्कार नेता दिग्विजय सिंह ने तो 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमले को भी आरएसएस से जोड़ते हुए इसे भी भगवा आतंकवाद कहना शुरू कर दिया था और इस झूठ को फैलाने के लिए एक किताब भी लिख डाली थी. हालांकि कसाब के पकडे जाने से उसकी ये चाल सफल नहीं हुई.
सवाल ये है कि कांग्रेस की हिन्दुओं से ऐसी नफ़रत की क्या वजह है, जिसके लिए हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए सोची-समझी साजिश रची गयी? ये साफ है कि भगवा आतंकवाद का जुमला बनाने के लिए, हिन्दू आतंकवाद का हव्वा खड़ा करने के लिए इस केस में पाकिस्तानियों को बचाया गया और हिन्दुस्तानियों को फंसाया गया. इस साजिश के पीछे किसका शातिर दिमाग था? क्या पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह या सुशील कुमार शिन्दे में से कोई इस साजिश में शामिल था? इस सच को बाहर लाने के लिए इस केस में नए सिरे से जांच शुरू की गयी है.
बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने के मुताबिक़ ये देश के साथ विश्वासघात है. डॉक्टर स्वामी ने कहा कि सिर्फ हिंदू आतंकवाद का नाम देने के लिए ये पूरी साजिश रची गयी थी.
अजमत अली है कौन?
कोर्ट में जमा दस्तावेजों के अनुसार अजमत अली एक पाकिस्तानी नागरिक था. उसे भारत में अटारी बॉर्डर के पास से जीआरपी ने उस वक़्त गिरफ्तार किया था जब वो पाकिस्तान वापस लौटने की कोशिश कर रहा था. उसके पास न तो पासपोर्ट था, न ही वीजा था और ना ही कोई अन्य कानूनी दस्तावेज. इस आतंकी ने पूछताछ में कबूल किया था कि वो पाकिस्तानी है और उसके पिता का नाम मोहम्मद शरीफ है. उसने अपने घर का पता बताय़ा था – हाउस नंबर 24, गली नंबर 51, हमाम स्ट्रीट, जिला लाहौर, पाकिस्तान.
ट्रेन में हुए धमाके के बाद दो प्रत्यक्षदर्शिय
ों शौकत अली और रुखसाना ने बम रखने वाले का जो हुलिया पुलिस को बताया था, वो अजमत अली से काफी मिलता-जुलता था. प्रत्यक्षदर्शी द्वारा बताये गए हुलिए के आधार पर स्केच बनाये गए थे और उन्ही के आधार पर अजमत अली और मोहम्मद उस्मान को इस केस में आरोपी बनाया गया था.
जांच टीम ने 6 मार्च 2007 को कोर्ट से अजमत अली की 14 दिन की रिमांड मांगी और पूछताछ की गयी. लेकिन 14 दिन बाद, 20 मार्च को पुलिस ने कोर्ट ने अजमत अली की दोबारा रिमांड मांगने की जगह उसे छोड़ने की गुजारिश कर दी.
इंडिया टीवी ने गुरदीप सिंह को ढूंढ निकाला और उनसे बातचीत की. गुरदीप सिंह ने बताया कि शुरुआती जांच के बाद ही अजमत को छोड़ दिया गया था. उन्होंने उन बड़े अफसरों के बारे में भी बताया जिन्होंने आतंकी को छोड़ने के लिए दबाव बनाया. ऊपरी दबाव के चलते अजमत अली का ना तो नार्को टेस्ट किया गया, ना ही पोलीग्राफी टेस्ट किया गया.
अजमत अली को छोड़ देना तो एक बड़ा ट्विस्ट था ही लेकिन इससे भी बड़ा ट्विस्ट इस केस की शुरुआती जांच में आया था. शुरुआत में तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कहा था कि समझौता ब्लास्ट के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है लेकिन फिर कुछ ही दिन बाद उसे भगवा आतंकवाद से जोड़ दिया गया.
पुलिस अधिकारियों की एक मीटिंग की नोटिंग से खुलासा हुआ कि 21 जुलाई 2010 को बंद कमरे में कुछ अधिकारियों की मीटिंग हुई. इस मीटिंग तय किया गया कि हरियाणा पुलिस समझौता एक्सप्रैस ब्लास्ट की जांच में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है इसलिए केस को नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी को सौंप देना चाहिए और केस की जांच को भगवा आतंकवाद से जोड़ दिया जाए. कोंग्रेसी नेताओं के ऐसे सैकड़ों काले-किस्सों का अभी सामने आना बाकी है, जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, वो सभी पुलिस अधिकारी व् नेता फंसेंगे जो इस साजिश का हिस्सा बने.

जेहाद ए मोहब्बत का दांव : (नाम नहीं लिखा जाएगा )

Umakant Misra
# यह_कहानी_नहीं_सच_है ..
वह थीं गोरी चिट्टी,खूबसूरत खत्री हिन्दू, एमबीबीएस,एमएस, # डॉक्टर, महिला रोग विभाग की विभागाध्यक्ष, इतना बड़ा पद और आयु बमुश्किल 30 वर्ष,अविवाहित !! डॉक्टर साहिबा अपनी स्वास्थ्य विभाग की कार से अस्पताल आती-जाती थी ! कार के ड्राइवर महबूब मियां उम्र 25-26 साल,पढ़ाई आठवी पास ,दरमियाना कद,रंग गेहुआ,अच्छा गठा शरीर !! पहले तो ड्राइवर,ड्राइवर की औकात में ही रहा,मगर धीरे- धीरे उसने लगभग नामुमकिन से काम यानी डॉक्टरनी साहिबा पर जेहाद ए मोहब्बत का दांव खेलना शुरू किया !
वर्दी उतर गई,शानदार लिवास में महबूब मियां रहने लगे,डॉक्टरनी की घरेलु मदद भी होने लगी ,डॉक्टरनी को बताया कि हम भी राजपूत हिंदु थे सिर्फ एक पीढ़ी पहले तक !! मगर 'लोगों' ने इतना सताया कि वालिद को इस्लाम कुबूल करना पड़ा,हालाँकि दिल से अभी तक हिंदु ही हैं ..
बात आगे बढ़ी, इत्तेहाद,हिंदु-मुस्लिम एकता और खून के एक ही रंग की बाते भी महबूब मियां ने शुरू कीं ! शेरो-शायरी भी शुरू हुई, डॉक्टरनी को लगने लगा कि बेशक ड्राइवर है,सिर्फ आठ तक पढ़ा है,गरीब है मगर है ज़हीन और भरोसे लायक ! डॉक्टरनी खुलने लगीं , महबूब ने एक दिन बग़ैर डरे प्रेम निवेदन किया - डॉक्टरनी ने शायद कमज़ोर क्षणों में हाँ कर दी ! सम्बन्ध बने और गोपनीयता की दीवार के पीछे एक ऊंचाइयों तक पहुँच गए ! हिंदु-मुस्लिम की दीवार डॉक्टरनी ने तोड़ दी ! लेकिन महबूब का मकसद सिर्फ यहीं तक महदूद नहीं था !
सिर्फ 15 दिन में, खूबसूरत, MBBS, MS, खत्री हिंदु सरकारी डॉक्टर अपने परिवार के भरसक विरोध के वाबजूद ,कुछ 'कमज़ोर क्षणों' की बदौलत एक लफंगे मुस्लिम ड्राइवर के साथ निकाह करने के लिए मजबूर हो गई ! बुरका आया,नाम बदला !! मगर दोस्त, यह सच्चा किस्सा अभी भी खत्म नहीं हुआ !
डॉक्टरनी 5 साल में 3 मुस्लिम नामधारी बच्चों की माँ बन गईं ,ड्राइवर साहेब कभी -कभी तनखाह लेने अस्पताल जाते थे ! डॉक्टरनी ने बदनामी के चलते दूसरे शहर ट्रांसफर कराया ! मगर ड्राइवर ने लखनऊ से भागदौड़ और राजनीतिक संपर्कों के चलते पुनः डॉक्टरनी को वापस बुला लिया ! डॉक्टरनी ने सरकारी नौकरी के वाबजूद शहर के सबसे समृद्ध इलाके में अस्पताल खोल दिया ,और अस्पताल के मालिक बने महबूब मियां ड्राइवर ! ड्राइवर साहेब ,आज एक राजनीतिक दल के स्थानीय सर्वेसर्वा हैं,लखनऊ तक हनक है , लक्सरी गाड़ियों का काफिला है महबूब 'ड्राइवर' के पास ! महबूब मियां कई मज़हबी इदारों के मुतवल्ली हैं !
डॉक्टरनी सरकारी नौकरी छोड़ चुकी हैं और बुरका और हिजाब उनकी मज़हबी पहचान बन चुके हैं ! और आज भी महबूब मियां को पाल रही हैं, डॉक्टरनी की संपूर्ण अकूत संपत्ति ,महबूब मियां के नाम से है !
एक हिंदु औरत की आत्मा को मरे हुए 30 बरस हो चुके हैं !!

शुक्रवार, अगस्त 18, 2017

"16 अगस्त 1946 एक न भूलने वाला दिन"-

---"16 अगस्त 1946 एक न भूलने वाला दिन"-----
वैश्विक राजनीति का बहुत प्रसिद्द वाक्य है। "इतिहास भूलने वाले उसे दुहराने के लिये अभिशप्त होते हैं"। आइये 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के नेतृत्व में मुसलमानों द्वारा किये गये प्रदर्शनों को स्मरण किया जाये। मुस्लिम बहुल नगरों में भयानक ख़ूनख़राबे से भरी यह इस्लामी रैलियां कांग्रेस और हिन्दुओं पर दबाव बनाने के लिये की गयी थीं। जिनमें हज़ारों हिन्दुओं की हत्या की गयी थी, भयानक बलात्कार हुए थे, विध्वंसात्मक लूट की गयीं थीं। यहाँ यह जानना उपयुक्त है कि हिन्दुओं ने गाँधी के कायर नेतृत्व के बाद भी पूज्य गोपाल चंद्र मुखर्जी जिन्हें गोपाल पाठा भी कहा जाता के नेतृत्व में देर से सही मगर भरपूर उत्तर दिया था।
मुस्लिम लीग के सर्वमान्य नेता मुहम्मद अली जिनाह का वक्तव्य इसकी प्रेरणा था। "हमने सर्वाधिक महत्व का ऐतिहासिक निर्णय ले लिया है....... आज हमने संवैधानिक उपायों को तिलांजलि दे दी है।....... हमारी जेब में भी पिस्तौल है " संदर्भ फ़ाउंडेशन ऑफ़ पाकिस्तान लेखक पीरज़ादा पृष्ठ संख्या 559-560। जैसे जैसे 16 अगस्त निकट आता गया। मुस्लिम लीग ने सभी महानगरों और छोटे नगरों में हिन्दुओं के विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया।
सिंध और पंजाब पुलिस में 70% मुसलमान थे। संयुक्त प्रान्त { तत्कालीन उत्तर प्रदेश } तथा बंगाल में वे 50% थे। मुस्लिम लीग का साँप चारों ओर आग उगल रहा था। जघन्य कोलकाता हत्याकाँड के लिये मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और उसके दायें हाथ मुजीबुर्रहमान ने जो बाद में बांग्ला देश का राष्ट्रपति बना, ने कमान संभाल रखी थी। यह जानना उपयुक्त होगा कि जिस मुजीबुर्रहमान को 1971 में हम ने बचाया उसका रोल 1946 में किस क़दर नीच था। कोलकाता और आस-पास के मुस्लिम गुंडों को इकट्ठा किया गया। उन्हें हथियार और पैट्रोल बम बनाने के लिए उस काल में सरकार द्वारा नियंत्रित और राशन के पैट्रोल के कूपन दिए गए। हावड़ा में गुंडों की टोलियों का नेतृत्व ख़ुद कोलकाता के मेयर शरीफ़ ख़ाँ ने किया। 24 पुलिस मुख्यालयों में 22 हिन्दू अधिकारी बदल कर मुसलमान रखे गए। शेष 2 एंग्लो-इंडियन थे।
16 अगस्त की सुबह मुस्लिम लीग ने विशाल जुलूस निकाले। जिनके मिलन बिंदु पर मुख्यमंत्री सुहरावर्दी के नेतृत्व में विशाल सभा हुई। एक के बाद एक हर वक्त ने काफ़िर हिन्दुओं के विनाश के लिये भीड़ को उकसाया। सभा के बाद लौटती हुई भीड़ ने बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्या की। हिन्दुओं पर भयानक लूटपाट, आगज़नी, बलात्कार किये गये। इस्लामी काल के भीषण अत्याचारों को बड़े पैमाने पर फिर दुहराया गया। 2 दिन तक यह पिशाच लीला चलती रही। कोई रोकने टोकने वाला न था। किसी मुस्लिम दंगाई को गिरफ़्तार भी कर लिया जाता था तो तुरंत पुलिस मुख्यालय में बैठा मुख्यमंत्री सुहरावर्दी उसे छुड़वा देता था। अँग्रेज़ गवर्नर ऐफ़ बरोज़ गूंगा, बहरा, अँधा बना बैठा था।
कोलकाता की सड़कों पर कुछ ही घंटों में 10 हज़ार हिन्दुओं के शव पड़े हुए थे। बुरी तरह के कटे-पिटे हिन्दुओं की संख्या 15 हज़ार से अधिक थी। 1 लाख से अधिक लोग बेघरबार हो गए। उनका सर्वस्व नष्ट कर दिया गया था। चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। मुस्लिम लीग का नेतृत्व तो इस जिहाद का संचालन ही कर रहा था मगर कांग्रेस का नेतृत्व भी गूंगा, बहरा, अँधा बन गया था। मोहन दास गाँधी का मुंह ही नहीं सिला हुआ था बल्कि साथ ही सारे के सारे कोंग्रेसी नेता मौन थे। हिन्दू वर्षों से जिनको अपना नेता मानते थे उन्होंने भयानक संकट, दारुण पीड़ा की इस घडी में हिन्दुओं से मुंह फेर लिया था।
स्टेट्समैन के संवाददाता किम क्रिस्टेन ने लिखा है "युद्ध के अनुभव ने मुझे कठोर बना दिया है किन्तु युद्ध की विभीषिका भी ऐसी भयावनी नहीं होती। यह दंगा नहीं है। इसके लिए तो शब्द मध्य युग { अर्थात इस्लामी जिहाद } के इतिहास में खोजना होगा। " संदर्भ गाँधी हिज़ लाइफ़ एंड थॉट पृष्ठ संख्या 253 लेखक जे बी कृपलानी
अंततः हिन्दुओं ने समझ लिया कि अपना बचाव उन्हीं को करना होगा। वो प्रत्युत्तर देने में जुट गये और पाँसा पलट गया। हिन्दू पौरुष का सूर्य उदय होते ही मुस्लिम आतंक का अंधकार छँट गया। बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रान्त में आततायी मुसलमानों को उसी दवा का भरपूर स्वाद मिलने लगा जिसकी खोज उन्होंने ही की थी।
आपमें से जिसने भी बेन किंग्सले वाली गाँधी पिक्चर देखी हो, वो कोलकाता के दंगों के समय गाँधी के आमरण अनशन के करुणापूर्ण दृश्य स्मरण कर पायेंगे। यह दृश्य कोलकाता की दो दिन तक रात-दिन चली इस्लामी हिंसा के हिन्दू प्रत्युत्तर के बाद का है। दो दिन से हिन्दुओं के नरसंहार पर मौन गाँधी हिन्दुओं के पराक्रम से विगलित हो उठे। गाँधी ने थरथर काँपते सुहरावर्दी को अपनी ओट में छिपा लिया। हिन्दुओं के प्रतिशोध से इस्लामी अत्याचारियों को बचाने के लिये गाँधी आमरण अनशन पर बैठ गये।
पूज्य गोपाल चंद्र मुखर्जी जिन्हें गोपाल पाठा भी कहा जाता के नेतृत्व में हिन्दू अपने चक्रवर्ती पूर्वजों को गौरवान्वित करने पर तुल गए। क्षत्रियत्व जाग उठा। बंगाल के साथ बिहार भी धूधू कर जल उठा। इस्लामी गुंडों पर पड़ती मार से उन्हें बचने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व ने उन पर हवाई जहाज़ और हैलीकॉप्टरों से गोलियां चलवायीं। यह वह समय था जब कांग्रेस को हिंदुओं के पौरुष को इस्लामी उद्दंडता के सामने डाटने का आह्वान करना चाहिए था मगर कांग्रेस हिंदु-पौरुष को शांत करने में जुट गयी और गाँधी ने हिन्दुओं के ख़िलाफ़ आमरण अनशन का तुरुप का पत्ता चल दिया। भोले-भाले शांतिप्रिय, धर्मभीरु हिन्दू गाँधी और कांग्रेस के दबाव में आ गये।
यह वह समय था जब हिन्दुओं को अपने पराक्रमी पूर्वजों के मार्ग पर चलना चाहिए था। यदि ऐसा होता तो पूज्य मातृभूमि का विभाजन न हुआ होता और इस्लामी समस्या का अंततोगत्वा उपयुक्त समाधान हो गया होता। राष्ट्रबन्धुओ ! पौरुष का कोई विकल्प नहीं होता। अपौरुष होना और स्त्रैण होने में कोई अंतर नहीं होता। आज के दिन को कभी मत भूलियेगा। यह दिन आँखों से आंसुओं के नहीं आग्नेय ज्वाला उठाने का है।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

गुरुवार, अगस्त 17, 2017

ये कोई कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है छत्तीसगढ़ की सलोनी । जो मुम्बई से छुड़ाई गई है ।

Umakant Misra
महिला मित्रो और सभी महिलाएं को एक बार यह कहानी जरूर पढ़ने को कहे.....
सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था, एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी, फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं,
उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया, तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम राजशर्मा था,
बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था अपनी डी पी मे,
सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्टकर ली, अभी उसे राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशनटिंग के साथ बज उठा,
उसने चेक करा तो वो राज का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें राज ने लिखा था " थैंक यू वैरी मच ",
वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा " थैंक्स किसलिये ?"
उधर से तुरंत जवाब आया " मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये ",
सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गई,
अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे राज के मैसेज नज़र आये, राज ने उसे कई रोमान्टिक कवितायेँ भेज रखीं थीं, उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया,
थोड़ी देर मे ही राज का रिप्लाई आ गया, वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था,
उसने राज को अपना संछिप्त परिचय दे दिया, उसका परिचय जानने के बाद राज ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी,
और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला,
सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था,
सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था,
जिस दिन उसकी राज से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है, राज उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था,आज रात फिर सलोनी राज से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद राज ने सलोनी से कहा ...
" यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मै तुमसे मिलना चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने का प्रोग्राम बनाओ ना ",
सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी,
शायद अंजान होने का डर था वो,
सलोनी ने यही बात राज से कह दी," अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे "
राज ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की," अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मै ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ " सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की,"
ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना " राज ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा,
और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था,
अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, राज ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था,
थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई,
राज उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया,
पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था,
सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा करा, उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली "
हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है "
" अरे यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ कर बात करते हैं "
और फिर राज ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी,
जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक आदमी बैठा हुआ नज़र आया,
शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था, सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर राज से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर खींच लिया और बाहर से राज ने उसे अंदरधक्का दे दिया,
ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसकेहाँथों को राज ने पकड़ लिया,
अब वो ना तो हिल सकती थी और ना ही चिल्ला सकती थी, और तभी कार से दूर खडा एक आदमी कार मे आ के ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और कार स्टार्ट करके तेज़ी से आगे बढ़ा दी,और पीछे बैठा आदमी जिसने सलोनी का मुँह दबा रखा था वो हँसते हुए राज से बोला " वाह असलम भाई वाह....... मज़ा आ गया...... आज तो तुमने तगड़े माल पर हाँथ साफ़ करा है...
शबनम बानो इसकी मोटी कीमत देगी "
उसकी बात सुनकर असलम उर्फ़ राज मुँह ऊपर उठा कर ठहाके लगा के हँसा, उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई भेड़ियाअपने पँजे मे शिकार को दबोच के हँस रहा हो,
और वो कार तेज़ी से शहर के बदनाम इलाके जिस्म की मंडी की तरफ दौड़ी जा रही थी.....
ये कोई कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है छत्तीसगढ़ की सलोनी ।
जो मुम्बई से छुड़ाई गई है ।
ये सलोनी की कहानी उन लड़कियो को सबक देती है जो सोशल मीडिया से अनजान लोगो से दोस्ती कर लेती है और अपनी जिंदगी गवां लेती है ।
शेयर/कापी पेस्ट करे ताकि कोई और सलोनी ऐसी दलदल में ना फंस जाए ...

बुधवार, अगस्त 09, 2017

राजेश आर एस एस कार्यकर्ता की हत्या और केरल का वामपंथ

राजेश का नित्य का काम था कि वो शाम को दूकान से एक पैकेट दूध और बिस्कुट लेकर अपने घर जाते थे। दोनों बेटों को दूध और बिस्कुट देते थे और फिर हिन्दू धर्म ग्रन्थों से कुछ न कुछ ज्ञान की बात सुनाते थे। बड़ा बेटा कभी कभी शाखा गया था लेकिन अभी दोनों उम्र में छोटे थे तो उनके पूछने पर कि वो शाखा कब जाएंगे .. हँस के राजेश कहते थे थोड़ा और बड़े हो जाओ ... राजेश ने घर पर काम कराने के लिए पत्नी के गले का हार बेंच दिया था और उन पैसों को अपने मारे जा चुके साथियों के परिवार के सहायता राशि में दे दिया था। वो दुगुनी मेहनत करते थे, पैसे कमा के पत्नी का हार वापस देना था और समय समय पर पैसे सहायता कोष में भी देते रहना था ... वो राजमिस्त्री का काम करते थे
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उस दिन शाम को भी राजेश ने उस दूकान से दूध बिस्कुट लिया और घर की ओर चल पड़े ... कुछ समय बाद दुकानदार को खबर आया कि राजेश को मार दिया गया है .. वहां देखा तो राजेश की दोनों कलाइयाँ कटी हुई थी और उन कलाइयों में दूध - बिस्कुट का पैकेट मौजूद था .. दुकानदार बेहोश हो गया था .. राजेश के शरीर पर 89 बार धारदार हथियारों से वार करके काटा हुवा था ... राजेश 29 जुलाई 2017 को अनन्य यात्रा को चले जा चुके थे ...अपने अन्य साथियों निर्मल, रवीन्द्रनाथ, विनेश, बीजू, सुजीत, रामचंद्रन, बिनिश, राजू, अजुथन, संतोष और रमित के पास जिनको पिछले 17 महीनों में केरल में CPM के गुण्डों ने मार डाला है ... फर्क ये कि राजेश पर 89 वार किये और वहाँ लिखा हुआ मिला कि ये नया रिकॉर्ड है, पिछले 51 कट का रिकॉर्ड तोड़ दिया गया है...
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राजेश के अन्य साथियों की तरह राजेश की निर्मम हत्या पर कोई चर्चा नहीं, कोई मीडिया रिपोर्ट नहीं, न लोकतंत्र खतरे में, न अभिव्यक्ति खतरे में, न ही इस लिंचिंग पर कोई बात...जबकि CPM के गुण्डे केरल भर खुले में घूम के हत्या करने के नारे लगा रहेे हैं ...
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क्यों बात नहीं की जा रही क्योंकि वो RSS से जुड़ा इन्सान था, क्योंकि वो हिन्दू था, .. क्योंकि उसके हिंदुत्व ने अपने विरोधी को मार डालना नहीं सिखाया था जिस कारण उसके हत्यारे उसके द्वारा पहले ही मारे नहीं जा सके थे ... क्योंकि हत्या करने वाले कथित तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और सहिष्णुता के रखवाले गैंग वाले लोग थे और मीडिया में इन्ही वामपंथियो का जमावड़ा है ...
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CPM तथा अन्य वामपन्थी गैंग के गुंडे हत्याएं करते हैं..सोशल मीडिया पर बैठे वैचारिक वामपंथी आतंकवादी इनको बौद्धिक संरक्षण देते हैं और मीडिया नामक वामपंथी कुत्ता इनके आगे पीछे दुम हिलाता घूमता है...दुसरे का बछड़ा चुराकर मारकर खाने वाले अख़लाक़ पर ये वामपंथी वैचारिक अत्तंकवादी विश्व भर में चिल्लाए ... लेकिन मेहनत की कमाई से अपने बच्चों को दूध बिस्कुट खरीदकर खिलाने वाले राजेश और अन्य की निर्मम हत्या पर ख़ामोशी ... इतना बड़ा दोगलापन ...
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केरल में वामपंथी खुले आम नारे लगाते हैं कि उनको मारने के लिए कोई ट्रेनिंग नहीं चाहिए वो मारने में एक्सपर्ट हैं ....बात यही है सच कि वामपन्थी ऐतिहासिक हत्यारे हैं, ये वैश्विक हत्यारे हैं .. भारत में इनके नाम साईंबाड़ी, नन्नूर, मरीचझांपी, बीजोन सेतु काण्ड आदि लिखा है तो इन्होने विश्व भर में करोड़ों मारे हैं..पूरे विश्व में इन लोगों ने इसके रिकॉर्ड बनाए हैं...कम्बोडिया के वामपंथी पोल पोट ने अपने देश की 21% जनसँख्या मार डाली थी और नरमुण्डो का म्यूजियम बनवाया था..ईदी अमीन नमक रक्तपिपासू भी इन्ही के जमात का था ....
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रूस के Stalin के अनुसार "The death of one man is a tragedy but The death of millions is a statistic." जिनकी ऐसी सोच रही हो उन्होंने कितने मानव हत्या को अंजाम दिया होगा उसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। वामपंथियों के सारे नेता mass murderer रहे हैं ... Mao, Fidel Castro and Kim Il-sung .. इनके द्वारा मारे गए लोगों का आंकड़ा दर्दनाक है ::: USSR (Russia)- 20 miilion, Vietnam- 1 million, China- 65 million, Afghanistan- 1.5 million, Eastern Europe- 1 million, Cambodia- 2 million, Africa- 1.5 million, North Korea- 2 million
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नास्तिकवाद इन वामपन्थियों दिल में है, वे भगवान के अस्तित्व से इनकार करते हैं। चूंकि वे सृष्टिकर्ता या ईश्वर की अवधारणा में विश्वास नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं में भी कोई दिलचस्पी नहीं है - इसलिए इनका कोई नैतिक पक्ष नहीं है। कम्युनिज्म के इस भौतिकवादी दर्शन ने भारत के चरवाका या लोकायत दर्शन के साथ बहुत सारी समानताएं साझा की हैं। उनके लिए अगर कुछ वामपंथ को बाधित करता है तो वो पाप है, अगर कुछ वामपन्थ को बढ़ाने का कारण बनता है तो वो ही पुण्य है। इसका मतलब यह नहीं है कि वामपंथियों के पास कोई धर्म नहीं है, उनके पास भी धर्म है, उनका धर्म उस व्यक्ति की पूजा करना सिखाता है जो उनका नेता या शासक हो और जो नरसन्हार करने का मज़ा लेता हों..उसकी बातें ही धर्म है...तो संक्षेप में वामपंथियों के अनुसार...न कोई भगवान...न ही कोई पाप..तो कोई वामपंथी हत्या अनैतिक नहीं ...
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हे वामपंथीयों तुम जितना मर्ज़ी जुर्म कर लो, खूब अनैतिक काम कर लो, कितने भी मासूम और निहत्थों के मौत का मज़ा ले लो....लेकिन याद रखना भारत की धर्म की अंतिम लड़ाई आदि शंकराचार्य की धरती केरल से ही होगी...और मेरी बात को याद रखना उस समय विजयी भारतवर्ष होगा..विजयी सनातन होगा...तब धर्म का राज स्थापित होगा और अधर्म का समूल विनाश होगा...मलेच्छों का नाश होगा...